श्री वृन्दावन धाम दर्शन श्रृंखला (1)
शुभारम्भ- 8.5.21 शनिवार
आइए इस श्रृंखला के द्वारा श्री वृंदावन दर्शन प्रारम्भ करते हैं -
1. अक्रूर मन्दिर (अक्रूर घाट)
वृन्दावन के द्वार पै मिलै घाट अक्रूर।
धाम यहां से पास ही,और न मथुरा दूर।
और न मथुरा दूर,कृष्ण बलराम पधारे।
संग चले अक्रूर,कंस राजा के द्वारे।।
धन्य हुए अक्रूर,यहीं पाया हरि दर्शन।
होता है प्रारम्भ, यहां से ही वृन्दावन।
2. भतरौंड़ विहारी का मंदिर
यमुनातट भोजन किया, तीर्थ बना भतरोंड़।
आस-पास जंगल तथा जगह हुई थी ढोंण।
जगह हुई थी ढोंण न कोई आता जाता।
टीले पर मंदिर का छोटा ध्वज लहराता।।
ब्राह्मणियों से भोजन मांगें कान्हा नटखट।
यज्ञ कर्म कर रहे विप्र बैठे यमुना तट।।
3.(भोजन-स्थली)
जिसथल प्रभु भोजनकिये, वहभोजन स्थान।
निकट घाट अक्रूर की, कथा कहें विद्वान।
कथा कहें विद्वान,भक्त बनवाये मंदिर।
गोपीनाथ श्यामसुंदर की प्रतिमा रख कर।।
पुण्य कार्य जो होंय,न होवें किंचित निष्फल।
हरि-लीलाका साक्ष्य, किये प्रभु
भोजन जिस थल।।
4. लीलानंद ठाकुर पागल बाबा का मंदिर
पागल बाबा नाम से मंदिर बना विशाल।
सात मंजिलें हैं बनी संगमरमरी जाल।।
संगमरमरी जाल कृष्ण लीलाएं सुंदर।
लीलानंद विहारी कहलाते हैं ठाकुर।।
आस-पास बढ़ते जाते हैं होटल ढाबा।
दिव्य शक्ति के धनी सिद्ध थे पागल बाबा।।
5.लुटेरिया हनुमान जी का मंदिर
पागलबाबा से चले लुटेरिया हनुमान।
दक्षिण मुख का द्वार है सिद्ध तीर्थ स्थान।।
सिद्ध तीर्थ स्थान यहां हरि गोपी घेरीं।
पता देत हनुमान, नाम पड़ गया लुटेरी।।
कभी यहां पर दूर-दूर फैला था जंगल।
वही अकेला आ पाए जो हो कुछ 'पागल'।।
6.बालकभक्त ओम प्रकाश का समाधि स्थल
बालक ओमप्रकाश ने त्याग दिया जल अन्न।
कृष्ण दरस की लालसा, मन में रखे प्रसन्न।।
मन में रखे प्रसन्न दिवस बीते चौरासी।
बालक की आंखें थी हरि दर्शन की प्यासी।।
हठ कर बैठा युवक प्रगट कीन्हे प्रतिपालक।
शुभ समाधि है निकट, जहां बैठा वह बालक।।
7. कांच मंदिर (कृष्ण प्रणामी आश्रम)
मोर मुकुट बंसी यहां पूजन का आधार
शीशों से सुंदर सजा मंदिर का विस्तार
मंदिर का विस्तार द्वार गोवर्धन धारण
चलते वाहन रुक जाते मंदिर के कारण
रामधाम है निकट बिहारी बाग सलोना
चना पुआ का आश्रम से नित मिलता दोना।।
8. जयपुर मंदिर
राधा माधव की छटा भव्य यहां का द्वार।
देखभाल करती यहां जयपुर से सरकार।।
जयपुर से सरकार पत्थरों पर यह कविता। ताजमहल को टक्कर देती है सुंदरता।।
अनुपम स्थापत्य नजर को जिसने बांधा।।
मंदिर कारण रेल चली लायीं श्री राधा।।
9. तराश वाला मंदिर
वनमाली बाबू किये, मंदिर का निर्माण।
बेटी के श्रीकृष्ण में सदा बसे थे प्राण।।
सदा बसे थे प्राण, कि ठाकुर बने जमाई।
जमीदार जैसी ठाकुर की छवि पधराई।
इस तराश मंदिर की महिमा बड़ी निराली
बनमाली के बने जमाई, हरि बनमाली।।
10. रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम
काले-बाबू नाम से अस्पताल मशहूर।
गांव-गांव विख्यात है,सेवा भी भरपूर।।
सेवा भी भरपूर, मिशन यह राम-कृष्ण का।
भूखे दीन दुःखी जन की सेवा का चस्का।।
श्रेष्ठ चिकित्सा सुख सुविधा के रंग निराले।
भेद नहीं है, धनी रंक गोरे या काले।।
11.आनंदमयी माँ का आश्रम
आश्रम सुंदर देखिए, आते मथुरा राह।
बाहर से ही जग उठे, प्रभु दर्शन की चाह।।।
प्रभु दर्शन की चाह,कि परिसर परम् शांत है।
करें कृपा आनंदमयी,यदि मन अशांत है।।
सुंदर छवि के दर्शन कर , मन जाता है रम।
तपोवनों की याद दिलाता है यह आश्रम।।
12.मानव सेवा संघ
मानव सेवा संघ के,स्वामी शरणानंद।
दिव्य ज्ञान का स्त्रोत थे, किंतु जन्म से अंध।।
किंतु जन्म से अंध,संगठन गज़ब बनाया।
सेवा त्याग प्रेम का शुभ संदेश सिखाया।।
अनुयायी भी अपने गुरु को मानें देवा।
ईश भक्ति का रूप जगत में मानव सेवा।।
13.पंचायती गौशाला
गौशाला है नगर की, विशद और प्राचीन।
गो-सेवा के हित यहां, विधियां नित्य नवीन।।
विधियां नित्य नवीन, गाय बूढ़ी या रोगी।
चाहे होय दुधारू, सेवा सबकी होगी।।
बचीं तस्करों से,या घर से जिन्हें निकाला।
सबका आश्रय पंचायती बनी गौशाला।
14. भारत सेवाश्रम संघ
योग शक्ति से युक्त थे स्वामी योगानंद।
भारत सेवाश्रम जहाँ, दिखे शांति आनंद।।
दिखे शांति आनंद नित्य होते सम्मेलन।
यहां योग के साधक करते चिंतन-मंथन।।
सुविधा पा साधकगण साधन करें भक्ति से।
योगानंद प्रसिद्ध हुए निज योग शक्ति से।।
15. मथुरा-वृन्दावन मार्ग
वृन्दावन के मार्ग में भवन कुंज मठ द्वार।
आश्रम होटल घर गली कालोनी बाजार।।
कालोनी बाजार भोजनालय भंडारे।
अन्नक्षेत्र चल रहे, रंक के बने सहारे।।
एक दिवस में नहीं पूर्ण वृन्दावन दर्शन।
मथुरा जी से अधिक मनोरम है वृन्दावन।।
16. चुंगी चौराहा
अगला चौराहा यहां , पंच मार्ग का जोड़।
भीड़ गाड़ियां ले रहीं, इक दूजे से होड़।।
इक दूजे से होड़, राह इक अंदर जाती।
नगर निगम और रथ-घर को एक राह मिलाती।।
कोतवाली कॉलेज रंगजी का है नगला।
बाएं हाथ बढ़ो, मंडी चौराहा अगला।।
17A.सिद्धपीठ कात्यायनी मंदिर
सिद्धपीठ कात्यायनी सिद्धि विनायक साथ।
सदा सर्व मंगल रहे, इनका हो यदि हाथ।।
इनका हो यदि हाथ, हटें दुःख संकट भारी।
चैत्र क्वार नवरात्र बड़ी सुंदर तैयारी।।
स्वर्णमयी हैं मूर्ति,अर्चना पूर्ण रीत की।
दूर-दूर तक व्यापक महिमा सिद्धपीठ की।।
17B.मातभवानी शीश पर, रखदेतीं जब हाथ।
तीन लोक चौदह भुवन, नवग्रह देते साथ।।
नवग्रह देते साथ स्वर्णमय मूरत सोहै।
छवि छलके आनंद, भक्तजन का मन मोहै।।
केशव आश्रम राधाबाग बना वरदानी।
नव दुर्गा हैं दुर्गतिनाशिनि मातु भवानी।।
18. बड़ा बगीचा
बड़ा बगीचा नगर की, बना हुआ है शान।
कोई आयोजन करो, इसका आता ध्यान।।
इसका आता ध्यान, ठहरती यहां सवारी।
ब्रह्मोत्सव आतिशबाजी पर मारा-मारी।।
रैली हो या खेल तमाशा, सबको खींचा।
रंगनाथजी का यह उत्तम बड़ा बगीचा।।
19.मुंगेर मन्दिर
वृन्दावन के मार्ग पर, मंदिर है मुंगेर।
सुंदर वृक्ष कदम्ब के, यहाँ ढेर के ढेर।।
यहां ढेर के ढेर, विराजें राधामोहन।
मंदिर के निर्माता थे राजा रघुनंदन।।
चम्पकलता विशाखा ललिता जू के दर्शन।
शांति अनोखी यहां, बने मन भी वृन्दावन।।
20A.गुरुकुल विद्यालय
गुरुकुल विद्यालय कभी, था नगरी की शान।
खंडहरों में आज भी मिलते कई निशान।।
मिलते कई निशान, चलावें आर्य समाजी।
आयुर्वेद प्रधान, किंतु अब कोई न राजी।।
परिसर बहुत विशाल, रह गए छोटे संकुल।
धनी भक्त की बाट जोहता,बैठा गुरुकुल।।
20B.आर्यसमाज विचार का गुरुकुल है स्थान।
पूर्वकाल इसने दिए, अध्येता विद्वान।।
अध्येता विद्वान, कभी थी गरिमा भारी।
धन्य महेंद्र प्रताप भूमि अर्पित की सारी।।
हुई मान्यता रद्द, प्रशासन की नाराजी।
परम्परा चल रही अभी भी आर्यसमाजी।।
21.वेंकटेशमंदिर
उच्च शिखर मंदिर बड़ा,वेंकटेश का धाम।
सघन वृक्ष छाया तले, मिलता है विश्राम।।
मिलता है विश्राम, बड़ा ही गज़ब नज़ारा।
खेलों का मैदान लगे बच्चों को प्यारा।
रथ मेला नवरात्र यहां की रौनक भाती।
थाने से ही दिखे ध्वजा ऊंची लहराती।।
22.वरदराज कुंज खटला आश्रम
वरदराज की कुन्ज का है आकर्षक रूप।
यद्यपि ओटक में बसी,लेकिन वास्तु अनूप।।
लेकिन वास्तु अनूप, यहां खटला विद्यालय।
जीर्णोद्धार हुआ तो बिल्कुल बदल गया यह।।
बड़े बगीचे ब्रह्मोत्सव में जब भी आवें।
सुंदर मंदिर वरदराज में निश्चय जावें।।
23. साधु माई का आश्रम
साधु माई का यहां आश्रम है गुमनाम।
चंचल मन को भी जहां मिल जाता विश्राम।।
मिल जाता विश्राम भजन करते हैं साधक।
आराधन में संसारी जन बनें न बाधक।।
निज भक्तों को साधन शक्ति यहां दिखलाई
कृष्ण चरण की थी उपासिका साधु माई।।
24.चार संप्रदाय आश्रम
कॉलोनी गोरा नगर, आश्रम एक विशाल।
कथा भागवत का यहां रहता नित्य धमाल।।
रहता नित्य धमाल निकट चलता विद्यालय।
चार संप्रदाय आने में भी लगता था भय।।
वीराने में कई बार होती अनहोनी।
गौरा नगर नाम की यहां बसी कॉलोनी।
25.श्री हरिदेव जी मंदिर
रंगनाथ नगला निकट राजे श्री हरिदेव।
दक्षिण पद्धति से यहां पूजा अर्चन सेव।
पूजा अर्चना सेव त्रिदंडी जीयर स्वाम।
सुंदर मंदिर बना,न मिलती कोई खामी।।
ब्रह्म उत्सव में सज कर मंदिर लगे सुनहला।
सदा रहे गुलजार रंग-ठाकुर का नगला।।
26.श्री टटिया स्थान मोहिनिविहारी जी
स्वामी श्री हरिदास की तपस्थली दिव्य।
ब्रज-रज मंडित भूमि पर टटिया साजें भव्य।।
टटिया साजें भव्य, दरस है कंथा करुवा।
श्री मोहिनी बिहारी, पावे अरबी हलुवा।।
सुंदर मधुर समाज गान नित होवे नामी।
भादौ शुक्ला अष्ट, रंग बरसावें स्वामी।।
27. चैतन्य कुटी
परकम्मा की राह में श्री चैतन्य कुटीर।
संत नागरी दास जी यहां बसे अति धीर।।
यहां बसे अति धीर, संत सेवा थल जानौ।
श्री हरि नाम अखंड,कि वट-छाया पहचानौ।।
मंदिर द्वारे करें कीर्तन, बूढ़ी अम्मा।
रात दिवस भर चलती वृंदावन परिकम्मा।।
28. निकुंज वन
रामायण की कथा के वाचक संत अनेक।
संत विजय कौशल यहां रखते अपनी टेक।।
रखते अपनी टेक, कि उपवन भव्य बनाया। पशु-पक्षी भी पलें, सघन वृक्षों की छाया।।
नरहरि दास किया करते थे प्रभु आराधन।
निकुंज वन में मिलै रास रस और रामायण।।
29.विश्राम वट
छाया है विश्राम वट, परिक्रमा की राह।
आए थे चैतन्य, मन कृष्ण दरस की चाह।।
कृष्ण दरस की चाह, खोज कर लीला स्थल।
भ्रमण किया ब्रज धाम,बने भक्तों के संबल।।
इस वट पर श्री गौर चंद्र ने आश्रय पाया।
आकर्षित कर लेती,यह पावन वट-छाया।।
30. श्याम कुटी
सज्जन के सुख के लिए अर्पित है जी जान।
सहज जगे बैराग तो, श्याम कुटी पहचान।।
श्याम कुटी पहचान नहीं पाखंड दिखावा।
सादा भोजन,सरल भाव, सादा पहनावा।।
दिव्य भूमि पर भक्तिमयी, हो जाता चिंतन।
करते यहां निवास वृद्ध साधक और सज्जन।।
31. यमुना-पुल
यमुना जी पर है बना पक्का पुल सुविशाल।
पुल तो है सुंदर मगर,सड़क बड़ी बदहाल।।
सड़क बड़ी बदहाल, हुए हैं गहरे गड्ढे।
खुले हुए दो-चार यहां दारू के अड्डे।।
एक्सप्रेस-वे,जहां रोज प्राणों की बाजी
कितना कचरा गिरे,किंतु पावन यमुना जी।।
32.चामुंडा मंदिर
ग्राम राजपुर के निकट मां चामुंडा द्वार।
वृक्षों से परिसर घिरा, नहीं अधिक विस्तार।।
नहीं अधिक विस्तार, दिव्य नवमी आयोजन
कन्या लांगुर यहां,नित्य तब करते भोजन।।
हुई बसावट आज, कभी था लुटने का डर।
गोधूलिपुर बसा, निकट है ग्राम राजपुर।।
33.बैरागी बाबा आश्रम
बैरागी बाबा हुए,भजनानंदी संत।
अलमस्ती से थी भरी जिनकी सदा रहन्त।
जिनकी सदा रहन्त,नृत्य-मय था संकीर्तन।
सहज सरल हरिनाम निष्ठ था उनका जीवन।।
शिष्य संत हरिबोल, राम-धुन के अनुरागी।
आश्रम सेवा करें गृहस्थी और बैरागी।।
34.श्री हरिदास का रसोपासना पीठ
स्वामी श्री हरिदास का रसोपासना पीठ।
रतन दास बाबा रखे,इसकी पूरी दीठ।।
इसकी पूरी दीठ, बिहारी पद-अनुरागी।
रम्य भूमि पर, मोही-मन,होवै बैरागी।।
करते साधन भजन रास-रस के अनुगामी।
पूजित श्यामा श्याम त्रिलोकी के जो स्वामी।।
35.गोरे दाऊ जी का मंदिर
गोरे दाऊ की यहाँ,प्रतिमा बनी विशाल।
अतिथि साधु और संत का रखते सदा खयाल।।
रखते सदा खयाल, चले अविरल भंडारा।
कभी न भूखा सोवे, दीन दुखी बेचारा।।
अन्न क्षेत्र दिन-रात,कि बारहमासी प्याऊ।
वैष्णव सेवा धाम बनाया गोरे दाऊ।।
36.नीम करोली आश्रम
नीम करोली नाम,यह सिद्ध संत का धाम।
मारुति दर्शन से मिले, तन मन को विश्राम।।
तन-मन को विश्राम, बिराजित वैष्णो माता।
जागृत सिद्ध समाधि देख,यहां मन रम जाता।।
पर्वों पर आनंद करें शिष्यों की टोली
कैंची धाम विराजत बाबा नीम करोली।।
37. राम मंदिर अटल्ला चुंगी
स्वामी राम नरेश ने किया भव्य निर्माण।
सीताराम विराजते लखन हाथ धनु-बाण।।
लखन हाथ धनु-बाण, अग्र बैठे बजरंगी।
जगमोहन सुविशाल जगह कि यहां न तंगी। रामानंदी संत भक्ति पथ के अनुगामी।
वर्तमान, रघुनाथ दास जी इसके स्वामी।।
38. गोलोक धाम आश्रम
निम्बारक-मत का यहां आश्रम है गोलोक। सुविधा युत आवास है, नहीं किसी पर रोक।।
नहीं किसी पर रोक, कि संतों की सरदारी।
सुंदर छवि ले राजित श्रीगोलोक बिहारी।।
गोरक्षा और धर्म संत जन के प्रतिपालक।
श्री गोपाल शरण संचालक, मत-निम्बारक।।
39.मिथिला कुन्ज आश्रम परिक्रमा मार्ग
वृंदावन रस शक्ति है भक्ति ज्ञान का पुंज।
राधा कृष्ण उपासना,होती मिथिला कुंज।।
होती मिथिला कुंज दूर से दिखे अटारी।
बैठे हैं हनुमान, यहां बनकर ब्रज नारी।।
मारुति गोपी रूप देख,आश्चर्य करें मन।
ऐसे कई रहस्य छुपाये है वृंदावन।।
40. कृष्ण कृपा धाम परिक्रमा मार्ग
गीता ज्ञान प्रचार में जिन्हें मिले आनंद।
कृष्ण कृपा का धाम हैं, स्वामी ज्ञानानंद।।
स्वामी ज्ञानानंद,करें गीता पर प्रवचन।
राधा कृष्ण स्वरूप दिव्य ठाकुर का दर्शन।।
गीता ज्ञान सुधा का बिंदु कभी जो पीता।
कृष्ण कृपा उपलब्ध कराती, भगवत गीता।।
41. राधा गोविंद मंदिर चैतन्यविहार
मंदिर एक विशाल है रचना हुई विशेष।
चूने या सीमेंट का इसमें लगा न लेश।।
इसमें लगा न लेश, लाल पत्थर लगवाया।
संत कृष्ण बलराम जिन्होंने इसे बनाया।। पच्चीकारी दिव्य, कला का सुगढ़ नमूना।
सात मंजिला शिखर, जोड़ता कहीं न चूना।।
42. भक्ति मंदिर चैतन्य विहार
प्रेम भाव की भूमि यह, मंदिर बने अनेक।
भक्ति ज्ञान वैराग्य का, मंदिर खुद में एक।।
मंदिर खुद में एक, जगत में कहीं न दूजा।
भक्ति ज्ञान वैराग्य संग, हो विधिवत पूजा।।
वासुदेव विद्वान, झलक दिखती स्वभाव की।
मंदिर से हो रही घोषणा, प्रेम भाव की।।
43.राधामाधव दिव्य देश
दक्षिण भारत में बना, कृष्ण भक्ति का संघ। राधा माधव सेव्य हैं,पर दक्षिण का ढंग।।
पर दक्षिण का ढंग, गरुड़ स्तंभ सजाया।
संत अनंताचार्य देव ने यह बनवाया।।
वृंदावन में भक्ति रूप रचना है कण-कण।।
यहां प्रेम निधि लुटे सदा, उत्तर या दक्षिण।।
44. टिकारी वाला राम मंदिर
यमुना के तट पर बना भव्य टिकारी घाट।
अतिक्रमण ने घाट को आज दिया है पाट।।
आज दिया है पाट, शिखर की शोभा न्यारी।
मंदिर सीताराम, कहाया किंतु टिकारी।।
कुंभ पर्व पर यहीं अखाड़ों का दल बसना।
कभी घाट छूती,अब नजर न आती यमुना।।
45. जगन्नाथ मंदिर जगन्नाथघाट
एक संत हरिदास ने,सपने आज्ञा पाय ।
जगन्नाथ बलभद्र जी यहां दिये पधराय।।
यहां दिये पधराय, कलेवर दिव्य सजाया।
बृज-जन को प्रभु जगन्नाथ का दरश दिखाया।।
जीर्णोद्धार कराया ईश्वर पुरि महंत ने।
दिव्य धरोहर को सम्हलाया एक संत ने।।
46.पानी घाट
पानी घाट रहा कभी, वृंदावन शमशान।
संत-आश्रमों ने इसे दिलवाया सम्मान।।
दिलवाया सम्मान, भूमि यह दुर्वासा की।
यहां बैठ मन शांत,न इच्छा रहतीं बाकी।।
रात गए आना कहलाता था नादानी।
घाटों पर घर बने नजर ना आता पानी।।
47.सुदामा कुटी
साधु संत-सेवी यहां,हुए सुदामा दास ।
तपोनिष्ठ जीवन जिया,परम कठिन अभ्यास।।
परम कठिन अभ्यास, कि भोजन बारहमासी।
हो शतायु, यश कमा, हुए साकेत निवासी।।
अक्षय है भंडार कृपा बरसे अनंत की।
शिष्य सुतीक्षण करते सेवा साधु संत की।।
48.वंशीवट
रासस्थल श्री कृष्ण का उत्तम लीला धाम।
कहते धीर समीर को,भक्ति रूप निष्काम।।
भक्ति रूप निष्काम,निकट निर्मल यमुना तट। ब्रजरस का वरदान, दिव्य छाया बंसीवट।।
वृंदावन का दिव्य दरश हो जाता निष्फल। अवलोकन यदि नहीं किया मधुमय रास-स्थल।।
49. गोपेश्वर महादेव
भोले बाबा बन गये,बृज की नारी ललाम।
महारास के भाव में, पुरुषों का क्या काम।।
पुरुषों का क्या काम,रास ब्रजराज रचाया।
रास-दरस को शिव ने गोपी वेष बनाया।।
प्रेम वृष्टि में डूबे, कुंज गली में डोले।
इसी भूमि पर,बने गोपिका शंकर भोले।।
50.लाला बाबू का मंदिर
लाला बाबू नाम से मंदिर है मशहूर।
वन उपवन सी शांति में नाचे हृदय मयूर।।
नाचे हृदय मयूर, सिद्ध श्री विग्रह दर्शन
कृष्ण-चंद्रमा दरश करे जीवन परिवर्तन।।
आकर्षक मंदिर, ठाकुर का रुप निराला।
ठाकुर कृष्ण चंद्र के,यह प्रिय लाली-लाला।।
51A. रंगनाथ मंदिर
रंगनाथ मंदिर बना परिसर बहुत विशाल।
ऊंचा गोपुर देखकर यात्री होंय निहाल।।
यात्री होंय निहाल,कि परिक्रमा पुष्करणी।
खंभों पर हरि-लीला बनी हुई मन हरणी।
संप्रदाय श्री में दक्षिण पूजा विधि सुंदर।
वृंदावन मणि-मुकुट रंग जी का यह मंदिर।।
51B.दस दिन ब्रह्मोत्सव चले,खुलता बैकुंठ द्वार। रथ मेला में भीड़ भी जुड़ती यहां अपार।।
जुड़ती यहां अपार निकलती भव्य सवारी।
अन्नकूट आतिशबाजी की बड़ी तयारी।।
गज और ग्राह लड़ाई जिस दिन रक्षाबंधन।
स्वर्ण-खम्भ में उत्सव बिन ये रहें न दस दिन।।
52.ब्रह्म-कुंड
करमैती तप-स्थली,मीरा का विश्राम।
रंगनाथ के निकट ही ब्रह्मकुंड अभिराम।।
ब्रह्मकुंड अभिराम संत जन यहां विराजे।
कुंड मध्य कमलासन ब्रह्मा मूरति साजे।
सांझी-उत्सव होय भूमि तब जगमग करती।
यहीं गुफा में कभी भजन करती करमैती।।
53.तुलसी राम दर्शन स्थल
रामकृष्ण दोऊ एक हैं, यहां न किंचित भेद।
ग्रंथ भागवत कथन को करें प्रमाणित वेद।।
करें प्रमाणित वेद,दिव्य लीलाओं दिखराई। मुरलीधर श्री कृष्ण, बने धनु-धर रघुराई।
तुलसी का विश्वास बात भक्तों के हठ की।
कृष्ण भये रघुनाथ,कि महिमा राम कृष्ण।।
54.ब्रह्मचारी जी का मंदिर
गिरधारी की शरण में,द्वार-कोट-दीवाल।
मंदिर भव्य विशाल है श्री राधा गोपाल।।
श्री राधा गोपाल,ग्वालियर के अधिकारी-।
करें व्यवस्था,कभी कभी आवें नर नारी।।
मंदिर विस्तृत, लम्बी चौड़ी बारहद्वारी।
रख-रखाव कमजोर, अंधेरे में गिरधारी।।
55.अमिय निमाई गौरांग मंदिर
निज इच्छा श्रीधाम में,आए प्रभु गौरांग।
विग्रह परम् विशाल है,मोहक है हर अंग।
मोहक हैं हर अंग, रेलगाड़ी से आए।
संकीर्तन अविराम, सुनाकर प्रभु पधराये।
कलकत्ता से चले,भक्तजन करें प्रतीक्षा।
हर लीला में सर्वोपरि है प्रभु की इच्छा।।
56.अगर विहारी मंदिर-
अगर बिहारी के निकट,गोपीनाथ बाजार।
मंदिर है छोटा,मगर बाहर ऊंचा द्वार।।
बाहर ऊंचा द्वार,मकानों ने है घेरा।
दीवारों पर सीलन भीतर घिरा अंधेरा।।
आज भव्यता हीन व्यवस्था में बेजारी।
पता नहीं,कैसे रह पाते अगर बिहारी??
57.शीतला मंदिर गोपीनाथ बाजार
मातु शीतला का भवन, है सच्चा दरबार।
मंदिर से मशहूर है, गोपीनाथ बजार।।
गोपीनाथ बजार, कि जब आता बासौड़ा।
मां-बहनों से भर जाता है रस्ता चौड़ा।।
स्वस्थ रहें, यह चाहत,पर संयम हो पहला।
रोग मुक्त करती है,सबको मात शीतला।।
58.कृष्ण काली पीठ
राधा रानी का नगर, मां काली का पीठ।
नष्ट किये मां ने असुर, चंड मुंड से ढीठ।।
चंड मुंड से ढीठ, कृष्ण काली की महिमा।
दिव्य पीठ ने रखी बचाकर अपनी गरिमा।।
केशव सेवायत पूजें, प्रतिमा नूरानी।
कहें कृष्णकाली पर, पुजतीं राधा रानी।।
59.सिंहपौर हनुमान जी
श्री राधा गोविंद के,द्वार खड़े दरबान।
दिव्यरूप दक्षिणमुखी सिंहपौर हनुमान।।
सिंहपौर हनुमान, बचाया प्रभु का मंदिर।
मुगल-सैन्य पर टूट पड़े जब लाखों बंदर।।
हो मारुति का हाथ, कटें तब कोटिक बाधा।
भक्तों पर आशीष रखें ब्रजरानी राधा।।
60A.गोविंद देव मंदिर
मध्य नगर में देखिए, मंदिर एक विशाल।
कभी स्वर्ग छूता रहा आज हुआ बदहाल।।
आज हुआ बदहाल, इमारत बड़ी अजब है।
सुंदर हैं स्तंभ,शीर्ष तक लगे गजब है।।
राधा गोविंद रमे हुए ब्रज के घर-घर में।
ऐसा मंदिर अन्य, न दिखता कहीं नगर में।।
60B.ठाकुर गोविंद देव जी, पहुंचे राजस्थान।
बिन विग्रह के हो गया मंदिर यह वीरान।।
मंदिर यह वीरान,अटारी पर चमगादड़।
द्वार झरोखे,उछल कूद करते हैं वानर।।
कभी दीप जलता था, इसके उच्च शिखर पर।
मंदिर बने मसान, जहां से जाएं ठाकुर।।
61. बिल्वमंगल समाधि मंदिर
ठाकुरकी छवि दिव्य है,मनको दिया लुटाय।
भक्ति मार्ग से पूर्व ही, जग सौंदर्य सुहाय।।
जग सौंदर्य सुहाय,भाग्य जब मर जाता।
वनिता-रसिक शरीर बिल्वमंगल बन जाता।।
परम भक्त की यह समाधि, जागे प्रेमांकुर।
भक्तों को स्वीकारें हर स्थिति में ठाकुर।।
62.वृंदा देवी (पाताल देवी) का मन्दिर
वृंदावन में थी कभी, तुलसी वन की धूम।
कंक्रीट वन देखिये, सारी नगरी घूम।।
सारी नगरी घूम, न दिखती वृंदा रानी।
गोविंद निकट बिराज रही हरि की पटरानी।।
श्री विभु गरबसा मोहे सबका मन
वृंदा रूप अनूप अलंकृत यह वृंदावन।।
63. साक्षी गोपाल मंदिर स्थल
सिंहपौर के निकट थे,श्री साक्षी गोपाल।
भक्त भाव रक्षा करें, भक्तों के प्रति पाल।।
भक्तों के प्रतिपाल भक्त की दीन्हीं साखी।
गए उड़ीसा अपने प्रण की लज्जा राखी।।
वृंदावन से सागर तक प्रभु गए दौड़ के।
मंदिर अब मैदान, दरश बस सिंहपौर के।।
64. साक्षी गोपाल मंदिर स्थल
सिंहपौर के निकट थे,श्री साक्षी गोपाल।
भक्त भाव रक्षा करें, भक्तों के प्रति पाल।।
भक्तों के प्रतिपाल भक्त की दीन्हीं साखी।
गए उड़ीसा अपने प्रण की लज्जा राखी।।
वृंदावन से सागर तक प्रभु गए दौड़ के।
मंदिर अब मैदान, दरश बस सिंहपौर के।।
65.गोविंद कुंड
तप-स्थल प्राचीन है,करें साधना संत।
गोविंद कुंड विशाल की महिमा अमित अनंत।। महिमा अमित अनंत स्रोत जल के हैं सूखे।
घाट,कूप,भूखंड आज रक्षण के भूखे।।
कुटियाओं में कभी रहा करती थी हलचल।
सिद्धि साधना हेतु परम पावन तपस्थल।।
66.श्री धाम गोदाविहार मन्दिर
लघु भारत का रूप है मंदिर यहां विशाल।
भारत के विस्तार का, आता सहज खयाल।।
आता सहज खयाल, संत ऋषि गायक गुणि जन। राजा,वीर विजेता,दानव,देव भक्तगण।
श्री गोदा विहार में संस्कृति होती सिंचित। प
अनुपम स्थल यही, जहां दिखता लघु भारत।।
67.छत्तीसगढ़ की कुन्ज
मथुरा मल्ल विराजते छत्तीसगढ़ की कुंज।
कई अखाड़े हैं यहां त्याग शक्ति के पुंज।।
त्याग शक्ति के पुंज,अखाड़ा यह निर्वाणी।
त्यागी बालानंद संत की दिव्य कहानी।।
सजें हुलास बिहारी, त्यागी जन का पहरा।
अनी-अखाड़ों से सज्जित वृंदावन मथुरा।।
68.केशीघाट
कालिंदी तट पर बना पावन केसी घाट।
आज खंडहर हो रहा कभी दिव्य था ठाट।।
कभी दिव्य था ठाठ, घाट से छूती धारा।
जलधारा का दूर तलक फैला विस्तारा।।
अतिक्रमण से सुंदरता की बिखरीं चिंदी।
अब तो नाला बनी, सिसकती है कालिंदी।।
69A.श्री राधारमण जी
प्रगटे शालिग्राम से, प्रतिमा ललित ललाम।
भक्त संत गोपाल की भक्ति पूर्ण निष्काम।।
भक्ति पूर्ण निष्काम माध्व-गौड़ेश्वर चिंतन।
राग प्रेम रस पूर्ण, भाव भक्ति अभिनंदन।।
राधारमण विराजें,मधुर भाव रस लिपटे।
स्वयं प्रकट प्रभु, भक्त-भाव रक्षा हित प्रगटे।।
69B.मंदिर राधारमण के, निकट देखिऐं डोल।
संत भट्ट गोपाल के, रोम रोम हरि बोल।
रोम-रोम हरि बोल, भावना दिव्य प्रकासी,
प्रगटे शालिग्राम शिला सों, प्रभु अविनासी।।
राग रंग सों रीझत हैं, भक्तन करुणाकर।
अंत:परिसर विष्णु प्रिया कौ अभिनव मंदिर।।
70.राधा गोकुलानंद मन्दिर
ठाकुर सेवी भक्तवर लोकनाथ शुभ नाम।
राधा गोकुलनंद की छवि मोहक अभिराम।।
छवि मोहक अभिराम नरोत्तम ठाकुर पूजे। लोकनाथ अरु विश्वनाथ ने लखे न दूजे।।
लोकनाथ सेवित विग्रह राजत हैं जयपुर।
देवालय हैं सप्त, जगावें मन प्रेमांकुर।।
71A. शाहबिहारी जी का मंदिर
शाह बिहारी का दरश,अद्भुत और अनूप।
खम्भ निखर उठते कि जब,खिले सुनहरी धूप।। खिले सुनहरी धूप,संगमरमर जब दमके।
टेढ़े खंभे देख,लोग रह जाते थम के।।
सावन में झूलन की फिर अद्भुत तैयारी।
चित्त चुरा ले जाते हैं श्री शाहबिहारी।।
71B. वसंती कमरा (शाहजी मन्दिर)
कमरा वासंती खुले,जगमग झाड़ फनूस।
तिल भर ना रहती जगह, होती ठूंसम-ठूंस।।
होती ठूंसम-ठूंस गांव का रेला आता।
जो देखे एक बार,चित्त रम कर रह जाता।।
मधुर फुहारें पड़ें, पढ़े मन प्रेम ककहरा।
रखता छवि नायाब, बसंती रंग का कमरा।।
72A. श्री निधिवन राज मन्दिर
लता-पता की ओट में,राजें निधिवनराज।
राग रंग उत्सव सदा प्रमुदित संत समाज।।
प्रमुदित संत समाज, प्रकट यहां हुए बिहारी।
हर बिहार पंचमी यहां को चलै सवारी।।
श्री हरिदास समाधि, दिखावै बांकी-झांकी।
देव संत ऋषि रूप भावना लता-पता की।।
72B. श्री हरिदास जी की समाधिमन्दिर
स्वामीश्रीहरिदास जी ललिता सखि अवतार।
इस समाधि पर रसिकजन आते बारंबार।।
आते बारंबार राग बहु भांति सुनावें।
कलाकार विद्वान हाजिरी यहां लगावें।।
वानर भी भरपूर, कि ज्यों प्रभु के अनुगामी।
भक्त जनों के मुकुट,बिहारी जी के स्वामी।।
73.मीराबाई वाला मन्दिर
शाह बिहारी के निकट स्थल गोविंदबाग।
यहां विराजे भक्तजन, करके घर का त्याग।।
करके घर का त्याग, यहां पर मीरा आईं।
यहीं करी, गिरधर नागर सेवा सुखदाई।।
भजन कुटी मीराबाई की सबसे न्यारी।
यमुना तट,दामोदर छवि और शाहबिहारी।।
74. श्रृंगार वट
राधा रानी का किया नटवर ने श्रृंगार।
लीला स्थल दिव्य यह, महिमा अपरंपार।।
महिमा अपरंपार विराजे यहां निताई।
यमुनातट अतिनिकट,पुलिन तनमन सुखदाई।।
संत-संग चहुँ ओर, कटें जीवन की बाधा।
रज का हो स्पर्श कृपा करदें श्री राधा।।
75.राधा दामोदर मन्दिर
राधा दामोदर यहां मंदिर है प्राचीन।
रूप गुसाईं भक्ति से प्रभु उनके आधीन।।
प्रभु उनके आधीन युगल छवि मन सुखदाई।
चरण चिन्ह अंकित गिरिराज शिला मनभाई।।
कार्तिक नियमित सेवा है मंगलमय अवसर।
भक्त हृदय में रचे बसे, राधा दामोदर।।
76.गौड़ीय श्री सप्त देवालय
गौड़ वैष्णवी भाव के मंदिर लखिये सात।
नाम-निष्ठ संकीरतन चले, यहां दिन-रात।।
चले यहां दिन-रात सप्त देवालय सुंदर।
राधा संग मदन मोहन, छलिया दामोदर।।
गोपीनाथ,रमन-राधा,गोकुलानंद और,
श्रीराधा गो-विंद राजें, श्रीश्यामसुंदर वर।।
77.राधा श्यामसुंदर मन्दिर
नूपुर खोकर राधिके, मन में हुईं उदास।
सेवक श्यामानंद को हुआ दिव्य आभास।।
हुआ दिव्य आभास ढूंढ़ कर नूपुर लाए।
प्रिया चरण में भाव भक्ति पूरित पहिराए।।
श्री विग्रह का दरस उगाए मन प्रेमांकुर।
पावन स्थल, जहां मिला राधे का नूपुर।।
78.रास-मंडल
रास रसीली भूमि पर श्री राधा नवरूप
मंगलमय छवि साजती,आनंद रूप अनूप।।
आनंद रूप अनूप अष्ट सखियों का डेरा।
रसिक भूमि पर भव्य रासमंडल का घेरा।।
तरुवर उद्धवरूप प्रेम की राह कंटीली।
श्री राधा की प्रेम धरा यह रास रसीली।।
79A.सेवा-कुन्ज
राधावल्लभ भाव में डूबा सेवा कुंज।
नित्य रास की भूमि यह,भक्ति चेतना पुंज।।
भक्ति चेतना पुंज,प्रिया जी सदा विराजें।
श्याम गौर सुखरूप निकुंजन में नित साजें।।
भाव भक्ति से हीन जनों को,दर्शन दुर्लभ।
हित हरिवंश लड़ैते ,ठाकुर राधा वल्लभ।।
79B.सेवा कुंज बिराजते,सदा युगल सरकार।
गद्दी सेवा है यहां, होय नियम अनुसार।।
होय नियम अनुसार, कुंज की शोभा न्यारी।
श्री हरिवंश बिराज रहे बंसी अवतारी।।
खिचड़ी का परसाद, पगी हैं जिसमें मेवा।
प्रेमभाव रसमय, राधा रानी की सेवा।।
80. दान-मान गली
श्री वृंदावन धाम में गलियों का है जाल।
दान मान दोनों गली, रहीं बड़ी बद-हाल।।
रहीं बड़ी बद-हाल, कृष्ण लीला का स्थल।
बदहाली को देख हृदय हो जाता बेकल।।
बनी-ठनी नागरी दास का शयन सनातन।
कोटि रहस्य छुपाए बैठा श्री वृंदावन।।
81.फौजदार वाली कुन्ज-
स्वयं प्रकट गोपाल की छवि अनुपम रस-सार।
फौजदार की कुंज है निकट प्रताप बाजार।।
निकट प्रताप बाजार दिव्य इतिहास निराला। परमहंस ने पिया यहां ब्रज रस का प्याला।।
वीर सुभाष यहां ठहरे,कुछ बात न अटकी।
कृष्ण कन्हैया ने निज महिमा स्वयं प्रकट की।।
82.श्रीजी का मंदिर-
गली गली में हैं यहां आश्रम कुटी निकुंज।
जन श्रद्धा का केंद्र है श्रीजी वाली कुन्ज।।
श्रीजी वाली कुन्ज दरस आनंद मनोहर।
रोगमुक्त करती चरणामृत वाली पोखर।।
छवि अनुपम लख, मन लागै वृषभानु लली में।
सम्प्रदाय का रूप यहां की गली गली में।।
83.शाहजहां पुर वाला मन्दिर-
नगर बीच मशहूर है यह प्रताप बाजार।
शाहजहांपुर नाम से मंदिर का यह द्वार।।
मंदिर का यह द्वार अनोखी बनी तिबारी।
खंब रूप में मूरत यहां सजीं बृजनारी।
सांझी-उत्सव सुंदर देखो श्राद्ध पक्ष में।
ऐसा मंदिर नजर ना आवे लक्ष-लक्ष में।।
84.पथवारी माता का मंदिर-
पथवारी मंदिर यहां देता दृढ़ विश्वास।
श्रद्धा का यह केंद्र जो रखे शक्ति कुछ खास।।
रखे शक्ति कुछ खास निकट है मस्जिद जामा मुस्लिम पढें नमाज पहन कर चुस्त पजामा।।नवदुर्गा में होती है सुंदर तैयारी।
भक्तों की भयहारी हैं मैया पथवारी।।
85.गौड़ीय मठ किशोरपुरा-
अनुपम मठ सुंदर भवन शिखर पूर्ण विस्तार।
गली मध्य मंदिर,मगर पाया नहीं प्रचार।
पाया नहीं प्रचार गौड़ मत की है अर्चा।
झूलन उत्सव दिव्य नगर में होती चर्चा।।
दर्शन से हो शांति भीड़ भी मिलती है कम।
श्री चैतन्य देव का,मठ स्थापित अनुपम।।
86. प्रेम महाविद्यालय केशीघाट
विद्यालय यमुना निकट भवन बना प्राचीन।
कुंवर महेंद्र प्रताप ने दे दी निजी जमीन।।
दे दी निजी जमीन ज्ञान का स्रोत बहाया।
शिल्प कुशलता हेतु इसे अनुरूप बनाया।।
बना क्रांति का केंद्र, फिरंगी को भी था भय।
प्रेम धर्म विस्तारक प्रेम महा-विद्यालय।।
87. गौड़ीय मठ राधानिवास
अति सुंदर गौड़ीय मठ मथुरा मार्ग बीच।
भव्य द्वार सुंदर भवन रहा भक्ति को सींच।।
रहा भक्ति को सींच, सदा होता संकीर्तन।
प्रेम मूर्ति श्री महाप्रभु का पावन चिंतन।।
कृष्ण कन्हैया की रस-लीला देखो जी-भर।
श्री चैतन्य विचार केंद्र यह मठ अति सुंदर।।
88.केशी घाट
तीरथ है अनुपम यहां सुंदर केसी घाट।
यमुना जी का था यहां सबसे चौड़ा पाट।।
सबसे चौड़ा पाट घाट से दूर न जाती।
बारहमासी यमुना की लहरें लहरातीं।।
केशी-वध स्थली पूरती सकल मनोरथ।
पावन केशीघाट धाम का अनुपम तीरथ।।
89.लक्ष्मी नारायण मंदिर
घाट किनारे है खड़ा,मंदिर एक विशाल।
लक्ष्मी रानी कुंज का तुम्हें बताएं हाल।।
तुम्हें बताएं हाल कि अद्भुत दिखे नजारा।
यमुना पुलिन झरोखों से लगता है प्यारा।।
पैसों के बल घेर लिए मंदिर चौबारे।
यही पिंड होते, जो लगते 'घाट किनारे' ।।
('घाट किनारे लगना' अर्थात मृत्यु को प्राप्त होना। यह बृजवासी कथन यहां प्रायः बोला जाता है।)
90.जुगल किशोर मन्दिर केशीघाट
आते जाते सहज ही इस पर जाता ध्यान।
ठाकुर जुगल किशोर का मंदिर है वीरान।।
मंदिर है वीरान यवन ने इसे उजाड़ा।
सुंदर रूप, काग-उल्लू का बना अखाड़ा।।
मंदिर बने मसान कि ठाकुर नजर ना आते।
दिखें भग्न अवशेष दूर से आते जाते।।
91.भ्रमर घाट
गंभीरा मंदिर निकट बरघाट विक्रम ब्रह्म घाट विश्राम जहां बैठ संसार से मन होता प्रणाम मनु पता ऊपर आम लहर थी जमुना रानी किंतु आज नालो ने बनाया पानी कृष्ण प्रेम में यहां हुए चैतन्य अधिरा गोस्वामी श्रीवत्स बनाया यह गंभीरा
92. गोविंद घाट
शाह बिहारी के निकट घाट नाम गोविंद।
यमुना जी की थी यहां कभी धार स्वच्छंद।। तभी धार स्वच्छंद बहा करती थी निर्मल पूजा अर्चन को मिलता पावन यमुना जल कुंजन कुंजन एक गिरी है यमुना प्यारी छाए निधिवन राज निकट त्रिशा बिहारी
93. चीर घाट
चीरघाट गोपाल की लीला की पहचान।
जहां कृष्ण सिखला गए जल जीवन सम्मान।।
जल जीवन सम्मान, नीर की महिमा न्यारी।
निर्वसना स्नान पाप बन जाता भारी।।
यह संदेश दिया सखियों के वस्त्र हरण कर।
वह प्राचीन कदम्ब खड़ा है चीर घाट पर।।
94. हिम्मत गिरि कुंज
वृंदावन में है यहां सुंदर कुंज-निकुंज।
छह सदियों प्राचीन है, हिम्मत गिरि की कुंज।।
हिम्मत गिरि की कुंज, लोग कम ही पहचानें।
नंद महल है आज,नगर के वासी जाने।।
बुर्ज हवेली भवन, कुंज छोटे घर आंगन।
सुंदर शोभा धाम, रसीला श्री वृंदावन।।
95.गंगा मोहन कचहरी
गंगा मोहन घाट की,वास्तुकला बेजोड़।
मुगल काल के भवन से, मानो लेती होड़।।
मानो लेती होड़, भरतपुर राजघराना।
चौबारे चौंतरे, यहां का है नजराना।।
यमुना जी का भव्य नजारा दिखता चंगा।
राजा सूरजमल की प्यारी रानी गंगा।।
96.झाड़ू मंडल
झाड़ू मंडल में सदा करें संत जनवास।
वीतराग निश्चित तथा प्रभु में रख विश्वास।
प्रभु में रख विश्वास, नाम जप करें निरंतर।।
राधामाधव प्रेम भक्ति रस है अभ्यंतर।।
शुद्ध प्रेम और भक्ति नहीं किंचित भी छल-बल।
जागृत हैं चैतन्य, सिद्ध थल झाड़ू मंडल।।
97.इमली-तला
इमली तला विशेष है आराधन निष्काम।
गौर-चंद्र ने तरु तले,यहां किया विश्राम।।
यहां किया विश्राम,वृक्ष की अजब कहानी।
*इमली* रोपण कर्ता हैं खुद राधा रानी।।
गौर विकल थे कृष्ण बिना ज्यों जल बिन मछली।
कृष्णप्रिया राधा रानी की प्रिय यह इमली।।
*इस संरक्षित वृक्षके दर्शन यहां कियेजा सकते हैं)*
98.नागा जी की कुंज
नागा जी की कुंजका अजब अनोखा ठाट।
भक्ति-भाव में संत जन करते भजन विराट।।
करते भजन विराट बिहारी जी के दर्शन।
चरण चिन्ह और चित्रों का,होता नित पूजन।।
संत चरण में बैठ हृदय हो जाता राजी।
यहीं भजन करते थे, ब्रज-दूलह नागाजी।।
99.विहार घाट
घाटों की है श्रृंखला, सभी एक से एक।
शुभ समाधि *हरिवंश* की, रखी भक्तिकी टेक।।
रखी भक्ति की टेक,भजन में जीवन यहीं बिताया।
निम्बारकमत का प्रचार जन-जन मन तक पहुंचाया।।
विहारेश शंकर का मंदिर,शिव में लगन जगाए।
दर्शन करे अवश्य, कभीजो परिकम्मा को आये।।
*(ये श्री हरिवंश देवाचार्य जी, वंशी अवतारी श्री हित हरिवंश महाप्रभु से भिन्न हैं)*
100A.राधा वल्लभ मंदिर
प्यारी छवि मन मोहिनी, मंदिर उड़त गुलाल।
श्रीहित के हिय में बसें,(श्री)राधावल्लभ लाल।। राधावल्लभ लाल व्याहुले नित्य मनावें।
भक्त-वृन्द हू प्रभु के दुर्लभ-दर्शन पावें।।
नित्य यहां रस वृष्टि दरस की महिमा न्यारी।
हरि के चंचल नैन,निकट श्री राधा प्यारी।।
100B.राधा वल्लभ मंदिर
मुरली के अवतार श्री, हितहरिवंश दयाल।
मंदिर निर्माता रहे,मुंशी सुंदरलाल।।
मुंशी सुंदरलाल मार्ग वनचंद्र बताये।
जो मंदिर बनवाय साल में सो मर जाये।।
डरे न सुंदरलाल प्रेम की राह मधुर ली।
मंदिर भव्य बनाय,सुनी कान्हा की मुरली।।
101.नरसिंह मंदिर
राधावल्लभ के निकट मंदिर है प्राचीन।
श्री नृसिंह भगवान की कृपा पा रहे दीन।।
कृपा पा रहे दीन कि मंदिर बड़ा निराला।
भीषण नरसिंह रूप,संकटों में रखवाला।।
श्री नृसिंह का आराधन,काटे भव-बाधा।
उग्र रूप होयँ कृष्ण,शांत करतीं श्री राधा।।
102.आनंदीबाई मंदिर
आनंदीबाई बड़ी,भक्तिमती ब्रजनार।
पूजा ठाकुर की करी, प्रेम भक्ति अनुसार।।
प्रेम भक्ति अनुसार अनोखे लाड़ लड़ातीं।
ठाकुर को ब्रज ग्वाल,गोपिका रूप धरातीं।।
हृदय भाव वात्सल्य यहां है सहज दिखाई।
राधावल्लभ के पीछे आनंदी बाई।।
103. कलकत्ता वाला मंदिर
कलकत्ता के सेठ ने भवन बनाया एक ।
आंगन बहुत विशाल है खिड़की द्वार अनेक।।
खिड़की द्वारा अनेक,बड़ी ही भव्य हवेली।
होली झूलन और बसंत सुषमा अलबेली।।
भाव भरे मंदिर में इसकी अलग महत्ता,
देखभाल भरपूर,रहें मालिक कलकत्ता।।
104. यशोदा नंदन मंदिर
प्यारी मूरत श्याम की जो लेती चितचोर।
प्रेम भरे मंदिर यहां गली-गली हर ओर।।
गली-गली हर ओर,माधुरी है मनभावन।
बड़वाला में राधा संग यशोदा नंदन।।
झूलन होली की होती अनुपम तैयारी।
मनमोहक मनमोह करें मूरत यह प्यारी
105A. मदन मोहन जी
यमुना जी के निकट है ऊंचा मंदिर एक।
सुंदरता को देखकर ठिठक जाए हर एक।।
ठिठक जाय हर एक, कलश की जुड़ी कहानी।
कैसे लूटा कलश,कहानी कहती नानी।।
ठाकुर मोहन-मदन,भाव से रहते राजी।
कभी छू रहीं, आज दूर बहती यमुना जी।।
105B. मदन मोहन जी
संत सनातन भक्ति के मूर्तिमान थे रूप।
मदन मोहिनी छवि हृदय, राजै दिव्य स्वरूप।।
राजै दिव्य स्वरूप,यवन ने मंदिर लूटा।
बसे करौली नगर, धाम वृंदावन छूटा।।
जहाँ विराजें श्याम, वहीं अभिनव वृन्दावन।
षड-गुसाईं सिरमौर, भक्तवर संत सनातन।।
106. अद्वैत वट-
गुरुवर श्री अद्वैत की भजन भूमि श्रीधाम।
पावन यह अद्वैत-वट ,मिले शांति विश्राम।।
मिले शांति विश्राम,कृष्ण चैतन्य बिराजे।
सुंदर छवि शुभ रूप मनोहर मूरत साजे।।
श्री अद्वैताचार्य,महाप्रभु के निज परिकर।
भक्त मंडली मध्य आप कहलाए गुरुवर।।
107. मदन टेर
राधा वल्लभ लाल का मंदिर यह प्राचीन।
मदनटेर राजे प्रथम,सुषमा है श्री-हीन।।
सुषमा है श्री-हीन, न कोई आता जाता।
वृक्षावलि को देख, हृदय उसमें रम जाता।।
श्री हरिवंश कृपा से कटतीं कोटिक बाधा।
वृंदावन रस निधि हैं कुंज बिहारी राधा।।
108. श्रीजी का बगीचा
श्री जी मंदिर वाटिका सुंदर और विशाल।
वृक्ष लता बहु सज रहे, बकुल कदंब तमाल।।
बकुल कदम्ब तमाल, पुष्प है रंग बिरंगे।
देखभाल के बिना,मार्ग लगते बेढंगे।।
एक बार जो भ्रमण करे,वह आता फिर-फिर।
मालिक सर्वेश्वर हैं रक्षक श्री जी मंदिर।।
109.वाराह घाट
सुंदर और प्राचीन हैं यमुना तट के घाट।
आज उजड़ते जा रहे कभी खूब था ठाठ।।
कभी खूब था ठाट,वराह देव की पूजा
ऐसा मंदिर घाट नजर आता नहीं दूजा
भू रक्षक वाराह देव गुणनिधि मंगल कर।
घाटों पर जल नहीं,किंतु लगते है सुंदर।।
110.कालीदह
कालीदह स्थान पर, लीला हुई विशेष।
दमन कालिया का हुआ,कहलाता नागेश।।
कहलाता नागेश,गरुड़ से बचकर आया।
यमुना दह में आकर, खुद को यहां छुपाया।।
पर्यावरण सुरक्षा को,समझाने वाली
कालिय-दह लीला में था, खलनायक 'काली' ।।
111.युगल घाट
पावन यमुना तीर परयुगल घाट प्राचीन।
युगलविहारी की यहांसेवा नित्य नवीन।।
सेवा नित्य नवीन,गोपियां गातीं थी हरि-लीला।
युगल किशोर हमारा ठाकुर रसिया रंग रंगीला।।
मन्दिर हैं अवशेष,देख कर रो उठता सबका मन।
लुप्त हो रहे,वृन्दावन से लीला स्थल पावन।।
112.A कृष्ण बलराम मंदिर
स्वामी श्री प्रभुपाद ने,लिया सत्य संकल्प।
कृष्ण प्रेम व्यापक करें,जिसका नहीं विकल्प।।
जिसकानहीं विकल्प,नामरस को जगमें फैलाया।
भक्त विदेशी जुड़े,दिव्य श्रीहरि कीर्तनकरवाया।।
देश-देश में भक्त हुए इनके सच्चे अनुगामी।
अभयचरण प्रभुपाद,भक्तिवेदांत प्रचारकस्वामी।।
112B.कृष्ण बलराम मंदिर
भक्त विदेशी भी यहां,सुख पाते अभिराम।
गौर निताई संग में,सजे कृष्ण बलराम।।
सजे कृष्ण बलराम, मंडली झूमें नाचें गाँवें।
संध्या समय आरती में,ढप ढोल मृदंग बजावें।।
पावन कृष्ण भक्ति के ये उत्साही नए प्रवेशी।
प्रेमभक्ति का भाव यहां नितसीखें भक्त विदेशी।।
113.चित्रकूट धाम
बाहर से ही दीखता मंदिर का यह द्वार।
गणपति हनुमत मूर्ति का नभ-चुम्बी विस्तार।।
नभ-चुम्बी विस्तार,धाम यह बड़ा निराला।
चित्रकूट है नाम,सभी का देखा भाला।।
मन प्रसन्न होता, दर्शन का अवसर पाकर।
सुविधाएं हैं अंदर, तो सुंदरता बाहर।।
114.मां श्यामा आश्रम
श्यामा मां का यह भवन, सुंदर और विशाल।
सरकंडे जैसी लगें, बाहर की दीवार।।
बाहर की दीवार,सलोने ठाकुर दर्शन।
वृक्षावलियां इसे बनाती हैं मनभावन।।
भक्ति भाव युत स्थल है शोभा अभिरामा।
वृंदावन की,भक्तिमति देवी मां श्यामा।।
115.भक्ति वेदांत द्वार
अभय चरण प्रभुपाद के यश का यह विस्तार।
छटीकरा की राह पर बना उच्च यह द्वार।।
बना उच्च यह द्वार, नगर में बहुत पुराना।
सदा वाहनों का होता है आना जाना।।
वन विहार मंदिर है,रस बरसे कण-कण से।
मन हो जाता अभय,भक्ति हरि अभय-चरण से।।
116.श्री निंबार्क द्वार
राधा सर्वेश्वर कृपा,बृजवासी का प्यार।
श्री श्रीजी महाराज कृत यह निंबारक द्वार।।
यह निंबार्क द्वार भव्य सुंदर अलबेला।
मंदिर निकट अनेक,रहे वाहन का रेला।।
द्वार मध्य से गुजरें,अपना शीश नवाकर।
रहे सर्व आनंद,कृपा राधा सर्वेश्वर।।
117A.प्रेम मंदिर
प्रेमभाव की भूमि यह,मंदिर बने हजार।
किंतु प्रेम मंदिर यहां,कृष्ण प्रेम का सार।।
कृष्ण प्रेम का सार,यहां बहती रसधारा।
भव्य भवन, प्रांगण विशाल,है अजब नजारा।।
मंदिर रचना, झलक दिखाती है स्वभाव की।
श्री कृपालु की प्रवचन धारा, प्रेम भाव की।।
117B.प्रेम मंदिर
संगमरमरी चमक है लीला लखौ अनेक।
अवतारों के दृश्य भी,यहां एक से एक।।
यहां एक से एक,विद्युती दिव्य छटाएं।
दीवारों पर कान्हा की चित्रित लीलाएं।।
एक बार जो आवै, होता हृदय सुनहरी।
ताजमहल से टक्कर,मंदिर संगमरमरी।।
118.अक्षय पात्र
अक्षय भोजन बांटता,मंदिर अक्षय पात्र।
मिलजुल कर सब स्वादलें,गुरु छात्राऔर छात्र।।
गुरु छात्रा और छात्र,बड़ी ही विकट रसोई।
पलें हजारों लोग, न वंचित रहता कोई।।
भरा रहे भंडार,नहीं चुक जाने का भय।
जनपद के बालक करते,नित भोजन अक्षय।।
119.वैष्णो देवी मंदिर
छटीकरा के निकट ही,प्रतिमा दिखे विशाल।
सिंह वाहिनी के निकट,बैठे हनुमत लाल।।
बैठे हनुमत लाल,सैकड़ों फुट ऊंचाई।
नव दुर्गा प्रतिमाएं हैं,भूगर्भ बसाई।।
ऊंचे मंदिर यह पंजाबी परंपरा के।
एक सड़क के पार,दरश हैं छटीकरा के।।
120.प्रियाकांत जू मन्दिर
खिले कमल के पुष्प सा, मन्दिर एक विशेष।
प्रियाकांत के रूप की,महिमा दिव्य-अशेष।।
महिमा दिव्य-अशेष, श्वेत छवि
मुग्ध करे सबका मन।
निर्माता हैं कथाव्यास
ठाकुर जी देवकि नंदन।।
भव्य रूप सुंदर प्रांगण,
ज्यों होता हो नित जलसा।-(उत्सव)
फोटो प्रेमी भक्तों का,
मन उमगे खिले कमल सा।।
121. षट शिखर मंदिर
सुनरख के रस्ते मिलें, मठ मंदिर बाजार।
अति सुंदर मंदिर बना, विधि-विधान अनुसार।।
विधि-विधान अनुसार, सुगढ़ मंदिर बनवाया।
छह शिखरों के तले,देवगण को पधराया।।
मस्तक नत हो जाता इसकी सुषमा को लख।
कई गांव हैं धाम निकट, उनमें है सुनरख।।
122.गरुड़ गोविंद मंदिर
द्वापर की पहचान का,बाकी यही निशान।
सुंदर दिखता द्वार,जो सहसा खींचे ध्यान।।
सहसा खींचे ध्यान, गरुड़ गोविंद निराला।
कृष्ण पौत्र श्री वज्रनाभ ने खोज निकाला।।
यात्रा के हित सिद्ध, नहीं दुर्घटना का डर।
गरुड़ पीठ पर कृष्ण, याद करवाते द्वापर।।
123.भागवत निवास
साधक सन्तों की कुटी, यह भागवत निवास।
शांति हृदय में उतरती, पहुंचें इसके पास।।
पहुंचें इसके पास, प्रकृति की प्रभुता पायें।
संत दरश से नयन हमारे नहीं अघायें।।
एकांतिक साधन में रत,सच्चे आराधक।
संसारी भी आये तो , बन जाता साधक।।
124. आनंद वृंदावन
संत अखंडानंद जी थे उद्भट विद्वान।
ग्रंथ भागवत वेद का, उनको अनुपम ज्ञान।।
उनको अनुपमा ज्ञान,कथा ने जगत लुभाया।
ठाकुर नृत्य गोपाल हेतु, यह भवन बनाया।।
आनंद वृंदावन में महिमा, हरि अनंत की।
आश्रम बना प्रमाण,कीर्ति है परम संत की।।
125.बालाजी आश्रम
बालाजी का आश्रम, सुख सविधा सम्पन्न।
नित्य अन्न भोजन बंटे,पावें भिक्षु विपन्न।।
पावें भिक्षु विपन्न, कि उत्तम विश्रामालय।
जैसी सुविधा चाहें, वैसी मिलती निश्चय।।
द्वारे पर प्रभु दर्शन,मन हो जाता राजी।
ट्रस्ट चलाती हैं, उत्तम आश्रम बालाजी।।
126.हाथी टीला
हाथी बाबा नाम के थे मनमौजी संत।
उसी नाम टीला बना, वे ही प्रथम महंत।।
वे ही प्रथम महंत संतसेवी जन आते ।
मारुति नंदन के मंगलमय दरशन पाते।।
शिक्षालय भी चला रहे उत्साही साथी।
माँ बतलाती, कभी यहां बंधते थे हाथी।।
127.कृष्ण भक्ति आश्रम
कृष्ण भक्ति का आश्रम, शांत तथा रमणीय।
वृक्षावलियाँ झूमतीं, अति सुंदर कमनीय।।
अति सुंदर कमनीय, बनी हैं लघु कुटियाऐं।
साधक घर से दूर, यहां प्रभु-ध्यान लगाएं।
यह स्थल है साधक जन की दिव्य शक्ति का।
बाहर से साधारण, आश्रम कृष्ण भक्ति का।।
128.फोगला आश्रम
भजनाश्रम सम्पत्ति हैं वृन्दावन के मध्य।
उनमें से यह फोगला, प्रमुख रूप सम्बद्ध।।
प्रमुख रूप सम्बद्ध नाम ध्वनि चले अखंड यहां पर।
आवासी सुविधा होती उपलब्ध,सहज और सत्वर।।
कभी रास रस वृष्टि, कभी हैं कथा भागवत उत्सव।
हर आयोजन उत्तम होता सुविधाएं हर सम्भव।।
129.दावानल कुंड
ब्रजवासी जब घिर गए, दावानल के बीच।
कान्हा ने उस अग्नि को लिया हृदय में खींच।।
लिया हृदय में खींच, यहीं पर पिया घोर दावानल।
उन दावानल कुंड विहारी की छवि निरखें चंचल।।
किंतु काल क्रम ने बिखराई आखिर यहां उदासी।
कान्हा को निज हृदय समेटे बसें यहां ब्रज वासी।।
130.मोती झील
सुंदर और समृद्ध थी पावन मोती झील।
लेकिन कचरा-घर बनीं, संरक्षण में ढील।।
संरक्षण में ढील,बढ़ रहा अतिक्रमण है भारी।
सुंदर झील पतन पर बैठी,सिसक रही बेचारी।।
आज पुरानी विरासतों के लोपन का बैठा डर।
कुछ बरसों के बाद ,पीढियां देखेंगी चित्रों पर।।
131.कौशल किशोर मंदिर-
रघुपति लीला रूप थे,सज्जनता की खान।
कौशलेंद्र के दास थे संत सरल विद्वान।।
संत सरल विद्वान,राम की लीला कीन्हीं।
राम भक्ति की शक्ति,हृदय ने उनके चीन्ही।।
बड़ा राम मंदिर,गाता है गुण गर्वीला।
पूर्व काल में करी, संत ने रघुपति लीला
132.साधु बेला
उदासीन श्रीचंद जी गुरु नानक के पूत।
ज्ञान भक्ति की प्रेरणा,जीवन था अवधूत।।
जीवन था अवधूत देश भर में है साधू वेला।
सेवाभावी रूप आश्रमों का है अति अलबेला।।
तीर्थ दरश को जब भी कोई वृन्दावन में आवें।
नगर मध्य इनके भवनों में सारी सुविधा पावें।।
133.हरी निकुंज
संकीर्तन का केंद्र है, आश्रम हरी निकुंज।
श्री मुकुंद हरि संत थे सहज भक्ति के पुंज।।
सहज भक्ति के पुंज रसिक जन के मन भाये।
भक्त जनों में 'संकीर्तन-सम्राट' कहाए।।
आश्रम है रमणीक,सहज ही लग जाता मन।
अष्ट प्रहर अविराम यहां चलता संकीर्तन।।
134.विद्यापीठ
पावन विद्या-दान का पूरक विद्या पीठ।
छात्र गणों को दे रहा, संस्कारों की दीठ।।
संस्कारों की दीठ, पुराना यह विद्यालय।
उत्तम शिक्षण,और सुरम्य परिसर भी निश्चय।
परिश्रमी,गुरुजन छात्रों में भरते चिंतन।
उत्तम विद्याकेन्द्र भावना भी अति पावन।।
135.हिताश्रम सत्संग भूमि
हित आश्रम स्थापना कीन्ही श्री हितदास।
राधावल्लभ लाल के श्री चरनन की आस।।।
श्री चरनन की आस दिव्य प्रवचन नित होवें।
रस बरसै नित रास, भक्त निज सुधबुध खोवें।।
करैं सुधी जन शोध, व्यवस्था हैं अति उत्तम।
ज्ञान ध्यान रस भाव भूमि धारक हित आश्रम।।
135A बांके बिहारी मंदिर
स्वामी श्री हरिदास के ललित लड़ैते लाल।
नित्य रास रस वृष्टि से सज्जन होंय निहाल।।
सज्जन होंय निहाल दरश की महिमा न्यारी।
बारह मासी भीड़-भाड़ रहती है भारी।।
'वृंदावन के राजा' का मंदिर यह नामी।
सेवायत हैं हरिदासी वंशज गो-स्वामी।।
135B बांके बिहारी मंदिर
अक्षय तृतीया के दिवस चरण दरस आनंद।
दर्शन से कट जाएंगे, कोटि पाप, यम फंद।।
कोटि पाप यम फंद,सदा गूंजे जयकारा।
बांकी छवि दिखरावै,यह हरिदास दुलारा।।
दर्शन मिलें कि जब हों कोटि पुण्य का संचय।
यहाँ सदा आनंद वृष्टि होती है अक्षय।।
135C बांके बिहारी मंदिर
फूलडोल में होंय प्रभु, झूला पे आसीन।
ठाकुर बाँके की छवी, दिन प्रति होंय नवीन।।
दिन प्रति होय नवीन, रंग भरनी होय होरी।
बरसैं रंग गुलाल लाज मत करियो गोरी।।।
ब्रज सुषमा मन भरै, यहां के मधुर बोल में।
श्वेत छटा में सजें बिहारी,फूलडोल में।।
136.काले दाऊजी-
काले दाऊ राजते,शहर पुराने बीच।
मनमोहक छवि आपकी,बरबस लेती खींच।।
बरबस लेती खींच,बिहारी जी जो जावै।
मूरत बड़ी विशाल,देखता ही रह जावै।।
दाऊजी के मिलें,यहां दो रूप निराले।
एक छोर पर गोरे हैं, दूजे पर काले।।
137.सनेह बिहारी मंदिर-
नगर मंदिरों से सजा बिखरे श्यामा श्याम।
बंक-बिहारी के निकट नेह-बिहारी नाम।।
नेह-बिहारी नाम, कि मालिक मृदुल गुसाईं।
नगर मध्य ये उत्तम संरचना बनवाई।
बचपन से देखा है मंदिर है घर-घर में।
लीला स्थल छुपे अनेकों यहां नगर में।।
138.गंगा जी मंदिर-
गंगा मंदिर देखिए,जो खुद में है एक।
निकलें जब बाजार से झुके शीश प्रत्येक।।
झुके शीश प्रत्येक ललित छवि मन को भाई।
शुभ्र श्वेत श्रृंगार नयन को है सुखदाई।।
सुरसरि के चरणों में मन हो जाए पतंगा।
यमुनामय वृन्दावन में,पूजित माँ गंगा।।
139A.रसिक बिहारी मंदिर-
रस गाहक रसराज का रसिक बिहारी नाम।
मंदिर कितना शांत है ठाकुर ललित ललाम।।
ठाकुर ललित ललाम चमत्कारी छवि भायी।
रुका व्यजन, तो पंडित की कर दयी पिटाई
लीला नित नव करें,भक्त महिमा संवाहक।
रसिक बिहारी प्रेम भक्ति पोषक रस गाहक।।
139B.रसिकबिहारीलाल है चंचल ठाकुर एक।
रस भीनी लीला रची,सदा एक से एक।।
सदा एक से एक,पधारे डूंगरपुर से।
अनुपम छवि दर्शन को यहां देव भी तरसे।। निधिवन से प्रकटे यह छलिया मदन मुरारी।
रसिक देव आचार्य, सेव्य श्री रसिक बिहारी।।
140.गिरधारी जी का मंदिर -
गिरधारी मंदिर यहां रखता एक उमंग।
बारहमासी चल रहा यहां सदा सत्संग।।
यहां सदा सत्संग बैठते नित विद्वज्जन।
ग्रंथ पुराणों पर होता है नियमित प्रवचन।।
दर्शन के संग ज्ञान लाभ लेते नर-नारी।
शहर पुरातन मध्य विराजे हैं गिरधारी।।
141.व्यास घेरा-
ब्यास भरोसे कुंवरि के सोवत पांव पसार।
नटवर नागर ने दिया सेवा का अधिकार।।
सेवा का अधिकार कि मंदिर बहुत पुराना
बना खंडहर आज, लगे सबको अंजाना
समथर वाली कुंज उसी चिंतन को पोसे।
आज वंशधर, पाल रहे घर व्यास भरोसे।।
142.बनखंडी-
बनखंडी स्थान पर महादेव का वास।
शिव दर्शन का संत को,था नियमित अभ्यास।।
था नियमित अभ्यास,न चल पाई जब काया।
शिव शंभू ने यहीं,निकट आवास बनाया।।
कभी यहां थे झाड़-फूंस, वन बड़े प्रचंडी।
महादेव की सिद्ध स्थली, है बनखंडी।।
143. किशोरवन-
ब्यासवंश अवतंस हैं, हरे राम जी ब्यास।
भक्तिभाव युत नेह का मन में किया विकास।
मन में किया विकास, विशाखा के अवतारी।
राधा की छवि देख रहे,यहां कुंज बिहारी।।
श्री किशोर-वन कृष्ण रूप प्रभु नाम अंश के। सेवायत आराधक है श्री व्यास वंश के।।
144.मदन मोहन कुंज-
तपोभूमि यह संत की भजन ध्यान से पुष्ट।
परंपरा है वैष्णवी,ठाकुर भी संतुष्ट।।
ठाकुर भी संतुष्ट,संत केशव कश्मीरी।
ज्ञान तपस्या भक्ति प्रेम का भाव अबीरी।।
ताम्रपत्र भी मिला अनेकों कष्टों को सह।
दिव्य भक्ति संसार दिखाती तपोभूमि यह।।
145.बड़ी कुंज-
नागा गंगाराम ने,बनवाई यह कुन्ज।
ठाकुर सीताराम का, विग्रह है छवि-पुंज।।
विग्रह है छवि-पुंज, धर्म हित शस्त्र उठाये।
अनी-अखाड़े जुड़े, संत नागा कहलाये।।
राजा ठाकुर हेतु स्वयं सुख वैभव त्यागा।
बड़ी उपेक्षित कुन्ज, बचाये रखते नागा।।
146.बदन सिंह की कुंज-
बदन सिंह की कुंज का भुला दिया इतिहास।
कुछ दीवारें ढह रही यमुना तट के पास।।
यमुना तट के पास, कि चूड़ामल के भाई।
किया डीग पर राज, भव्य यह कुंज बनाई।।
ठाकुर मंदिर पूजा छूट चुकी है कब की।
अपना शव ढो रही कुंज यह बदन सिंह की।।
147.धूरिया वाली कुन्ज-
टटिया मारग के निकट, रहे धूरिया संत।
कुंज धूरिया की कभी,महिमा रही अनंत।।
महिमा रही अनंत,पुज रहे राधा माधव।
रज-सेवी धूरिया, धाम सेवा हर संभव।।
कुंज नष्ट हो गई बिछीं है टूटी खटिया।
थोड़ी रौनक बचा रहा है,मंदिर टटिया।
148.फावरिया वाली कुन्ज-
फावरिया की कुन्ज का गुम हो गया अतीत।
दो सन्तो की सिद्धि की, भूमि जगाए प्रीत।।
भूमि जगाए प्रीत, खंडहर का ही दर्शन।
रसिक संत ने किया मदन मोहन आराधन।।
कभी अखाड़ों की रौनक, थीं उच्च अटरिया।
गुम हो गईं समाधि धूरिया और फावरिया।।
149.पडरौना वाली कुन्ज-
पडरौना की कुन्ज है, स्थित बीच बजार।
सम्प्रदाय निम्बार्क की,सेवा विधि अनुसार।।
सेवा विधि अनुसार, किशोरी वल्लभ दर्शन।
'राय ईश्वरी' का न्यौछावर था तन मन धन।।
भव्य कुन्ज है,ठाकुर का भी रूप सलौना।
सर्राफा बाजार कुन्ज अनुपम पडरौना।।
150.करौली वाली कुंज
कुन्ज करौली द्वार पर, भव्य चित्र बहुरूप।
ठाकुर हरी शिरोमणी, दर्शन दिव्य अनूप।।
दर्शन दिव्य अनूप,सुचित्रित है जगमोहन।
राजा थे हरबख्श,किया अर्पित तन मन धन।।
समय निगलता, सुंदर चित्रों की रंगोली।
जीर्ण शीर्ण,पर दर्शनीय है कुन्ज करौली।।
151.खपाटिया कुन्ज
यमुना के तट पर खड़ी,कुन्ज एक वीरान।
राजस्थानी शिल्प के, दिखते कई निशान।।
दिखते कई निशान कभी था अद्भुत रूप सजाया।
इसी कुन्ज के कारण, घेरा खपाटिया कहलाया।।
ठाकुर जानराय पूजित हैं अति उत्तम संरचना।
कभी द्वार पर टकराती थीं लहर लहर कर यमुना।।
152.भीम कुन्ज गोविंदघाट
चुप साधे बैठी हुई, भीम कुन्ज सुविशाल।
ठाकुर राधाकांत का मंदिर भी बदहाल।।
मन्दिर भी बदहाल,किंतु मनमोहक इसका परिसर।
वैभव छीना गया किंतु आबाद अभी हैं कुछ घर।।
कोटा राजा भीमसिंह की थी ये भव्य हवेली।
अब चमगादड़ और कबूतर करें यहां अठखेली।।
153.बड़ी सूरमा कुन्ज
राधा के संग सोहते, ठाकुर नयनानंद।
बड़ी सूरमा कुन्ज की, कथा भरे आनंद।।
कथा भरे आनंद, विरह में नैनन ज्योति गंवाई।
सुरमा देकर राधा रानी ने,वापस लौटाई।।
कृष्णदास कविराज साधना कीन्ही यहां अगाधा।
प्रिय मुकुंद को दृष्टि दिलाई, जय ब्रज स्वामिनि राधा।।
154.श्री अद्वैताचार्य मन्दिर-
सेवा कुंज गली निकट मंदिर सीतानाथ
श्री अद्वैत आचार्य जी राजत पत्नी साथ।
राजत पत्नी साथ शिखर पर वृंदा देवी।
ठाकुर मदन गुपाल संत जन इनके सेवी।।
लता पता से सज्जित मंदिर शोभा अद्भुत।
शुभ-परिकर गौरांग, प्रेम और भक्तिभाव युत।।
155.श्री निम्बार्क कोट-
राजत हैं राधारमण श्री निंबारक कोट।
संकरी गलियों मध्य है,दूकानों की ओट।।
दूकानों की ओट, बना यह रक्षक परंपरा का। संप्रदाय निम्बार्क,रत्न यह ब्रज की वसुंधरा का।। रास महोत्सव दर्शन वाणी संत यहां रहते रत।
श्री निंबारक संग,आद्य पंचायत यहां विराजित।।
156.कानपुर वाला मंदिर-
श्री राधा ब्रजरमण का मंदिर यह प्राचीन।
ठाट निराले थे कभी,लेकिन अब श्री-हीन।।
लेकिन अब श्री-हीन समयकी कैसी निष्ठुर लीला। उत्सव रस की बाट देखता ठाकुर रंग रंगीला।।
शहर कानपुर से वृंदावन आए, हुई न बाधा।
किंतु आज वीराने में, ब्रजरमण संग श्रीराधा।।
157.गोरी लाल कुंज-
गोरी लाल विराजते,रसिक बिहारी पास।
रसिक शिरोमणि सेवत, स्वामी श्री हरिदास।
स्वामी श्री हरिदास, प्रेम की महिमा न्यारी।
बुंदेलों ने मंदिर सेवा खूब संवारी।।
श्री नरहरि आचार्य सेव्य यह अनुपम जोरी।
रसिकशिरोमणि संग विराजे राधा गोरी।।
158.पीसी मां का मंदिर-
पीसी मां के प्रेम की,है अद्भुत पहचान।
गौर-निताई पुज रहे, केवल प्रेम विधान।।
केवल प्रेम विधान मूर्तियां बनी काठ की।
पीसी माँ करती थीं सेवा ठाट-बाट की।।
पराधीन प्रभु भक्तों के इसकी नहिं सीमा।
ठाकुर बातें करते, ऐसी थीं पीसी माँ।।
*(बंगाल में बुआजी को पीसी मां कहा जाता है)*
159.बड़ी दतिया कुंज-
हीरा मोहन लाल की,छवि अनुपम अनमोल।
रानी हीराकुंवरि ने, दिया हृदय को खोल।।
दिया हृदय को खोल,भव्यता वर्तमान में खोई।
कभी सुसज्जित कुंज,
आज वीरानी में है सोयी।।
कभी जहां बजती शहनाई ,
और ढप ढोल मजीरा।
कालचक्र के काले बादल, निगल गए यह हीरा।।
160.प्रिया वल्लभ मंदिर-
दतिया कुंज विराजते राधा वल्लभ लाल।
अनुपम छवि मन मोहिनी मन को करे निहाल।।
मन को करे निहाल,
प्रिया वल्लभ हैं रसिक दुलारे।
परमानंद दास के पूजित ठाकुर सबके प्यारे।।
रानी बखतकुंवरि ने यह अनुपम मंदिर बनवाया। यहां 'लली' के हाथों,प्रभु ने अपना पाग बंधाया।।
161.श्याम राय का मंदिर-
भूत गली में, श्याम का, मंदिर परम विचित्र।
श्याम राय खंडित पुजें,दर्शन करिए मित्र।।
दर्शन करिए मित्र,
चरण खंडित की अजब कहानी।
कालिंदी धारा से लायीं दिनाजपुर की रानी।।
देव सिद्ध ऋषि हैं बैठे, वृंदावन वृक्षावलि में।
ताल वृक्ष में यहां,संत तप करते भूत गली में।।
162.डेरा गाजी खान के गोपीनाथजी-
डेरा गाजी खान से,आए गोपीनाथ।
करी रेल की यात्रा,सेवायत के साथ।।
सेवायत के साथ,देश का हुआ विभाजन।
अपना डेरा त्याग, आ गए ये वृंदावन।।
गौतम पाड़ा निकट,बनी है सुखन-हवेली।
दाऊ संग विराजे,लीला नई नवेली।।
163.बड़े दाऊजी का मंदिर-
यवनों के आतंक में,भाग गए सब देव।
वृंदावन ठाड़े रहे,यमुना और बलदेव।।
यमुना और बलदेव,लोग कहते यहउक्ति पुरानी। प्रतिमा बड़ी विशाल,
आंख जो उठे न फिर हट पानी।।
गोविंददेव गए जयपुर तब जाने का था मौका।
पर दाऊ जी यहीं रुके थे,दमन किया यवनों का।।
164.सवा मन शालिग्राम का मंदिर-
वृंदावन मंदिर नगर,दुर्लभ दृश्य अनेक।
मंदिर शालिग्राम का सकल विश्व में एक।।
सकल विश्व में एक,सवा मन की मूरत यह भारी। पावन श्री गंडकी नदी से आए ये बलधारी।।
एक हिरण्यगर्भ हैं तो दूजे हैं मुक्ति नारायण।
कांवर में रखकर पैदल ही आए यह वृंदावन।।
165.बर्मा वाला मंदिर
गोपेश्वर के निकट ही यह सुरम्य स्थान।
बर्मा मंदिर नाम से मिली इसे पहचान।।
मिली इसे पहचान रास माधव विग्रह पधराया। राजपुरोहित श्री अचिंत्य ने यह मंदिर बनवाया।।
चंदन द्वार सजे सोने से सुख मिलता दर्शन कर।
एक पंथ दो काज निकट में ही बाबा गोपेश्वर।।
166.कांच वाला मंदिर-
बुंदेले राजा हुए,कीर्तिमान सावंत।
ठाकुर जुगल किशोर की छवि यहां लखौ अनंत। छवि यहां लखौ अनंत कांच वाला मंदिर कहलाता। छत दीवारों पर शीशों का अजब नजारा आता।। एक प्रमुख छवि शीशों में पड़ कर सहस्त्र बन जाती। हरेराम जी व्यास,वंश की गुण गरिमा बतलाती।।
167.अजब मनोहर जी का मंदिर-
जयपुर शैली में बनी अजब मनोहर कुंज।
अजब मनोहर लाल जी राजत सुषमा पुंज।।
राजत सुषमा पुंज कि छीपीगली पुरानी आऔ। अजब कुंवरि के बनवाए मंदिर के दर्शन पाऔ।। बीस बरस से अन्न-क्षेत्र की खुली हई है थैली। संप्रदाय है हंस, और मंदिर की जयपुर शैली।।
168.अष्टसखी मंदिर-
अष्ट सखी संग राजते यहां लड्डू गोपाल।
चित्रावलियाँ भव्य हैं,मन हो जाए निहाल।।
मन हो जाय निहाल,राम रंजन राजा निर्माता। ललितादिक सखियों संग,
प्रभु दर्शन में मन रम जाता।।
मोर पंख की पिछवाई में राजत रासबिहारी। हरि-लीला के दृश्यों ने सुंदरता खूब निखारी।।
169.जुगल किशोर मंदिर-
वृंदावन में तीन थल, ठाकुर युगल किशोर।
सखियन संग रसराज यहां, करें केलि बरजोर।।
करें केलि बरजोर, ब्यासघेरा में सुंदर साजे।
जुगल घाट पर दूजे, तीजे केसी घाट विराजे।।
गोविंद और हरिदास तुंवर ने वारा तनमन जीवन। भक्ति ज्ञान वैराग्य प्रेम का संगम है वृंदावन।।
170.गोपीनाथजी मंदिर-
मधु पंडित सेवित यहां,राजे गोपीनाथ।
राधा राजत दाहिने मातु जाह्नवा साथ।।
मातु जाह्नवा साथ, रेवती की अवतारी।
गौ चारण वंशी वादन यहां किए मुरारी।।
रायसेन राजा निर्मित, यवनों से खंडित।
स्वयंप्रकट ठाकुर सेवा कीन्ही मधु पंडित।।
171.धीर समीर-
धीर समीरे यमुना तीरे वसति वने वनमाली। प्रियालाल की दिव्य भूमि की
सुषमा बड़ी निराली।।
श्याम राय की लीला लख कर
पवन यहां रुक जाती।
इस कारण रमणीय भूमि यह धीर समीर कहाती।।
गौरी दास पुजाये ठाकुर प्रेमा भक्ति अधीरे।
युगल लाल की लीला अविरल होती धीर समीरे।।
172.वनचंद्र जी का डोल-
राधा की मुख छवि दरस ध्यान करें बनचंद्र।
चैत्र सुदी ग्यारस यहां,बरसै अति आनंद।।
बरसै अति आनंद डोल प्राचीन बनाया।
राधा वल्लभ लाल यहां झूलन सुख पाया।।
श्रीवनचंद समाधि रास रस बहै अगाधा।
प्रीतम प्रेम उजास, बिराजें स्वामिनि राधा।।
173.राधा टीला-
राधा टीला दिव्य थल,लता पता प्राचीन।
एक प्राण दो देह की,छवि है नित्य नवीन।।
छवि है नित्य नवीन, श्याम ने रूप गोपिका धारा। राधारानी ने कान्हा का सुर संगीत संवारा।।
साधु संत के भजन भाव में यहां न आतीं बाधा। श्याम-शिष्य को गुरु बनकर,
संगीत सिखातीं राधा।।
174.मान सरोवर-
मान सरोवर राजतीं श्री राधे सरकार।
यहां श्याम अनुचर बने प्रिया करें उद्धार।।
प्रिया करें उद्धार बनी एकांत निवासी।
करें निहोरे श्याम राधिका चरण उपासी।।
हित हरिवंश तपस्थल हरि राजत करुणाकर।
भानु नंदिनी का मनभावन मानसरोवर।।💐💐
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श्री राधे....!!
श्री वृन्दावन धाम की,महिमा अमित अनंत।
भांतिभांति वर्णन करें,रसिक साधु और संत।।
रसिक साधु और संत,
सेस,सारद, सुर पार न पावैं।
कलि मल ग्रसित विमूढ़
हीन मतिमंद कहा गुन गावें।।
कृपा-कोर राधा रानी की,
जो जैसौ बनि पायौ।
बाल-प्रयास कियौ,
'वृन्दावन-दर्शन' अल्प करायौ।।
श्री राधे की कृपा भयी तौ,
पुनः होयगौ चिंतन।
कछु दिन अल्प विराम लियौ है....!!
जय जय श्री वृन्दावन...!!💐💐
【 परिशिष्ट स्थानों व कुछ अन्य स्थलों के वर्णन के लिए तथ्य संकलन व रचना विस्तार हेतु कुछ समय के लिए आपसे विदा ले रहे हैं। आशा है श्रृंखला ने आपको आंशिक आनन्द अवश्य पहुंचाया होगा।
त्रुटियों हेतु सुधी जनों से क्षमाप्रार्थना है।】
💐जय जय श्यामा जय जय श्याम।💐
💐जय जय श्री वृन्दावन धाम।।💐
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