शुक्रवार, 28 मई 2021

श्री राम चरित गुणगान.(स्वरचित बाल प्रयास💐)

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का पावन चरित्र अगाध है तथा सहस्त्रों शारद-शेष महेश-दिनेशादि के लिए अगम्य है। महर्षि वाल्मीकि, गोस्वामी तुलसी दास आदि महान कवियों व रचनाकारों ने भगवान श्री राम के चरित्र एवं लोकपावनी लीलाओं पर लेखनी चला कर अपने हृदय को पवित्र किया है। वास्तव में भगवान के गुणानुवाद का गायन एवं चिंतन प्राणी मात्र का कर्तव्य है। 

हम धन्य हैं कि पवित्र भारत भूमि में वृंदावन धाम जैसे श्री कृष्ण के नित्य लीला स्थल में मानव जन्म प्राप्त किया है। अपने आराध्य श्री राम की लीलाओं को विभिन्न छंदों के माध्यम से रखने का यह स्वार्थी-प्रयास है। स्वार्थ यही है कि इस माध्यम से प्रभु के श्री चरणों का स्मरण होता रहे और राजस-तामस भावों से भरी यह आत्मा प्रभु भक्ति की किंचित योग्यता पा सके। 

इन रचनाओं में काव्य-कला तो नाम मात्र को भी नहीं है पर सरलतम रूप में हृदय के भाव अवश्य हैं। कुछ त्रुटियाँ (जो कि ज़रूर होंगी और इतनी होंगी कि उन्हें गिना भी न जा सके) नज़र आऐं तो केवल भाव पर ध्यान दे कर प्रभु स्मरण का आनंद उठाएं।

💐सभी बंधुओं को सादर जय श्रीराम💐

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बगहंस छंद-💐

1.राम-नाम पूर्ण-काम 

दिव्य रूप, जलद-श्याम। 

दिव्य-भाव गुण अगाध,

भक्ति प्रेम, हृदय साध।।


2.चरित-दिव्य गुण अमोल 

भुवन मोह,मधुर बोल।

एक आस,लघु प्रयास, 

हरो, चित्त क्लेश त्रास।।


 3.काव्य-शून्य,कृति अपूर्ण, 

 करो, हृदय गर्व चूर्ण।

 राम-प्रेम हो अनन्य,

 सफल जन्म जीव-धन्य।।

 

4.अल्प शक्ति,विशद काम,

करें पूर्ण, मात्र राम। 

हृदय जगे, दिव्य ज्ञान, 

करें कृपा, गुण-निधान।। 


5.ज्ञान-शक्ति,गुण प्रभाव,

चित्त सजे भक्ति-भाव।

दृढ़ चरित्र, हृदय धार,

गान करूं, गुण अपार।। 


6.पुण्य उदय पाप क्षीण,

चरण पड़ा भक्त दीन। 

मिले, कृपा वरद हस्त,

कठिन मार्ग, हो प्रशस्त।।

सुगति छंद-

7. हरि-अंश से,रवि वंश में,

रघुवंश के शुभ अंश में।

इक्ष्वाकु,अज, दशरथ हुए,

यश कीर्ति के बहु नभ छुए।।


8. सत् शक्ति का सागर बने,

इतिहास ने सद्गुण गिने।

वे अवध पति यशराज थे,

अनुपम अनोखे काज थे।।


9.अति दिव्य कोसल राज था, 

सब स्वर्ग का सा साज था। 

सब भांति मन आनंद था,

मन में न कोई द्वंद था।।


10.हर सुख मिला था सृष्टि का, 

सद-लक्ष्मी की वृष्टि का। 

सुत-हीन रहते थे दुखी, 

जग-दृष्टि में जो थे सुखी।। 


11.सुख पूर्ण दशरथ नृप रहें,

मन खिन्नता किस से कहें। 

सब कुछ मिला पर, सुत नहीं,

मन की खुशी, दुख में बही


12.धन वाजि-गज झूमा करें,

मणि रत्न से घर को भरें।

सन्तान सुख यदि ना मिले,

मुस्कान-मुख कैसे खिले।।

छवि छंद-

13. त्रेता युग की घटना महान,

युग व्यापक था तब दिव्य ज्ञान।।

थे यज्ञ-दान युग की पुकार। 

नृपगण करते थे बार-बार।।


14.संग्राम करें जब देव दनुज,

यद्यपि दशरथ थे नृपति मनुज। 

सहयोगी देवों के बनकर, 

द्नुजों से लेते थे टक्कर।। 


15.देवों का उन पर वरद हस्त,

दुर्जन रहते थे सदा त्रस्त।

पीड़ित करता था सुत-अभाव,

 शिशु लीला दर्शन चित्त-चाव।। 

 

16.गुरुवर वशिष्ठ के गए पास,

आशीष मिले, मन यही आस।

वह दिव्य तपोवन करें वास,

मृग-सिंह घूमते आसपास।।


17. गुरु को बतलाया महत् कष्ट,

 हूँ पुत्र हीन, अब आयु नष्ट।

 हो पुत्र जन्म, दें यह शुभ वर

अब समय नहीं काया नश्वर।।


18. यह दिव्य-राज,ना हो अनाथ,

नृप ने गुरू-पग पर रखा माथ।

गुरुवर बोले-: पुत्रेष्टि-हवन 

देवों के हित तुम करो यजन।।


19.जब हों प्रसन्न प्रभु अग्नि रूप,

पूरित हों  सारे क्लेश-कूप। 

मुनि ऋष्यश्रृंग हैं ज्ञानवान, 

बुलवाओ, देकर पूर्ण मान।। 


20. वे इसके ज्ञाता हैं विशेष,

मन में न रखें अभिमान लेश। 

तब किया दिव्य मख आयोजन, 

देवों ने पाया अभिनंदन।।

 छविछंद-

21.हर आहुति पड़ती निरपवाद। 

पावक प्रभु ने भेजा प्रसाद।।


22.गौ विप्र संत सब हुए तुष्ट।

कीं दान धेनु सब हृष्ट-पुष्ट।।


23.पायस ले पावक हुए प्रकट। 

तेजोमय मुख और रूप विकट।। 


24.अब करो पत्नियों में वितरित। 

सुत होंगे, अब ना हो चिंतित।। 


25.तिय कौशल्या थीं ज्ञानवान।

कैकई सुमित्रा  गुण निधान।। 


26.राजा ने प्रभु को किया याद।

वितरित कर डाला प्रभु प्रसाद।। 


27.मन ही मन हरि को कर प्रणाम।

राजा दशरथ थे पूर्ण काम।


28.सबके मन में लग रही आस। 

कब होगा पूरा सदप्रयास।।


29.थी प्रजा परम संतुष्ट आज।

प्रार्थना करें, हो पूर्ण काज।।


30.वह यज्ञ हुआ था परम भव्य।

थे मंत्र दिव्य और शुद्ध हव्य।। 


31.कर्ता, होता,पूजक विशेष। 

किंचित भी मन शंका न शेष।।


32.सबको विश्वास यही था दृढ़। 

मन में आशा का वट सुदृढ।।


33.हो गया सफल पुत्रेष्टि यजन।

ऋषि-गण ने किया पूर्ण चिंतन।।


34.राजा हाथों में ले प्रसाद। 

निज इष्टदेव कर हृदय याद।।


35.चल दिए त्वरित अंतःपुर को।

करके प्रणाम निज गुरुवर को।।

हरि छंद-


36.तीनों ही रानी-अति प्रेम सानी।

आशीष पाया-मिल बांट खाया।। 


37.मन में खुशी थी- आशा यही थी। 

प्रभु कब पधारें-जीवन संवारें।।


38.दिन बीत जाते-घर को सजाते। 

उल्लास छाया-शुभ काल आया।।


39.मधु-मास प्यारा, सबका दुलारा।

अभिजित मुहूरत-मंगल की मूरत।।


40.प्रभु राम आए-बाजे बधाये।

दिन था सुहाना-सुख का खजाना।। 


41.रानी सुमित्रा-मन की पवित्रा।

दो पुत्र पाए-मन को लुभाए।।


41.कैकेई रानी-अति ही सयानी।

एक सुत की माता-सुख ना समाता।।


42.मंगल बधाई- जग कीर्ति छाई। 

नित नव उमंगें- बाजें मृदंगें।। 


43.मंगन जो आए-बहु रत्न पाए।

मंगल मनाया-आनंद छाया।।


44.नारद,पुरारी-देवों की नारी। 

दर्शन पधारे-दशरथ के द्वारे।।


45.प्रिय रामप्यारे-लक्ष्मण दुलारे।

चारों ही न्यारे-नयनों के तारे।।


46.वानर नचावें-तितली उड़ावें।

छोटी धनुहियां-पग में पनहियां।। 


47.श्यामल सलोने-अमृत के दोने।

नर और नारी- सुख पे सवारी।।


48.बहु वर्ष बीते- मन चित्त जीते।

गुरु धाम आये-बहु ज्ञान पाये।। 


49.गुरु भाग्य जागे-रस प्रेम पागे।

हैं ज्ञान धारी- महिमा तुम्हारी।। 


50.दशरथ विचारें-मुखड़ा निहारें।

अति प्रेम प्रीते- लख कर ही जीते।।


51.कौशिक पधारे-दशरथ के द्वारे।

आदर से लाये- सुख से बिठाए।।


52.मस्तक नवाया-आशीष पाया।

बालक दिखाये- चरनन झुकाये।।


53.चारों ही भाई-अनुपम लुनाई।

मोहित मुनी थे-धुन के धनी थे।।


54.दानव दहाड़ें-मख को उजाड़ें।

राजन बचावें-दानव हरावें।।


55.प्रिय राम आएं-लक्ष्मण को लाएं।

दोनों ही भ्राता-मम सँग पठायें।।


 56.दशरथ न माने-दुख में समाने। 

 प्राणों से प्यारे-चारों दुलारे।।

 

57.वन पथ कँटीला-कैसी ये लीला।

रिपु शक्तिशाली-तुलना ख़याली।।


58.कौशिक कुपित थे-मन में क्षुभित थे।

गुरु ने बुलाया-पथ भी दिखाया।।


59.हित है तुम्हारा-आशिष हमारा। 

दोनों को लाओ-मुनि संग पठाओ।।


60.अब रामप्यारे-लक्ष्मण दुलारे।

मुनि ने सम्हारे-मुनि संग सिधारे।।


61.गुरु संग जावें-भक्तों को भावें।

सजते थे वन में- बसते थे मन में।।**


(प्रतिभा छंद)

62. भयानक राह थी वन की,

न चिंता थी उन्हें तन की।

कराना यज्ञ था पूरा,

दनुज का गर्व हो चूरा।। 


63.राह में ताड़का आई,

सँग मारीच को लाई।

भयंकर रूप कटु वाणी,

किसी को थी ना अनजानी।।


64.गरज कर राम को रोका, 

कहां जाते हो तुम? टोका।

तानकर बाण जो मारा,

गिरी कर घोर चितकारा।। 


65.बाण जब वक्ष में लागा, 

प्राण तन छोड़कर भागा।

बिना फल बाण प्रभु मारा, 

उड़ा मारीच,भव पारा।।


66.गिरा, जा सिंधु के तट पर,

न जाने वह बचा क्यों कर।

सुबाहू  की भुजा काटी,

पलों में चाटता माटी।। 


67.भगाए जब असुर सारे,

गए दशग्रीव के द्वारे।

सभी संकट प्रभु टारे,

बने श्री राम,जन-प्यारे।।


68.कोटी तब मस्त मुस्काई, 

मुखों पर लालिमा छाई। 

हवन अब हो रहे भारी,

अनुष्ठानों की तैयारी।। 


69.हृदय के जोश जब  जागे, 

सभी भय मुंह छिपा भागे। 

बने प्रभु धर्म के रक्षक,

कुटिल खल पाप के भक्षक।। 


70.प्रकृति सत्कार थी करती,

मधुर मधु भाव थी भरती।

वृक्ष पर पुष्प जो हिलते,

 राम-मुख,देखकर खिलते।।

 

71.मृगों की दौड़ती टोली,

लिए सूरत बड़ी भोली।

राम के हाथ से चरते,

सदा पीछे लगे फिरते।। 


72.तपस्वी ऋषि-मुनी सारे,

लगाते नित्य जय कारे।

धन्य प्रभु राम अवतारी, 

विपद पल में  हरीं सारी।।


73. जनक राजा बड़े मानी,

परम विद्वान और ज्ञानी।

सुकन्या जानकी पाई, 

दरश शुभ दिव्य सुखदाई।।


74.रूप गुण शील बसते थे,

दरस को सुर तरसते थे।

गुणों से था हृदय जीता,

सुनयना की सुता सीता।। 


75.स्वयंवर हो रहा भारी, 

बड़ी ही दिव्य तैयारी।

धनुष शिव का चढ़ाना था,

तभी सम्मान पाना था।। 


76.दिव्य धनु जो चढायेगा,

वही शुभ वर कहाएगा। 

बने सीता वधू जिसकी,

बढे यश कीर्ति जब उसकी।। 


77.लोक-पति सुर असुर आते,

हृदय आनंद उमगाते।

सुखद शुभकामना जागी,

लखन प्रिय राम अनुरागी।।


78.स्वयंवर देखना चाहें,

शील से कह नहीं पावें।

राम प्रभु सामने आए, 

गुरु-चरण शीष को नाये।।


79.सरल मन मृदु मधुर वाणी,

विनय  नव नेह में सानी। 

मिले अनुमति अगर स्वामी, 

चलें हम शिष्य अनुगामी।। 


80.नगर में घूम हम आवें,

 परम आनंद मन पावें।

 मुदित कौशिक मुनी बोले,

 हृदय आनंद पट खोले।।

 

81.बुलावा है जनकपुर से,

 दरश को देव भी तरसे। 

 अगर इच्छा तुम्हारी है, 

हमें प्राणों से प्यारी है।। 


82.जनकपुर को चली टोली,

भीड़ भी साथ में होली। 

दिखा आश्रम बड़ा न्यारा, 

मनोहर दिव्य विस्तारा।। 


83.राम उत्सुक हुए भारी, 

दृष्टि मन मोहिनी प्यारी।

विजन यह देश है किसका,

प्रश्न प्रभु दूर हो मन का।। 


84.ऋषी गौतम की प्रिय नारी, 

अहिल्या शाप की मारी।

इंद्र ने जो ठगी छल से,

ऋषी जाने तपोबल से।। 


85.शाप पति से मिला भारी,

बनी पाषाण बेचारी।

युगों से यूं पड़ी है वह,

दरश हित ज्यों अड़ी है वह।। 


86.प्रतीक्षा राम की करती, 

हृदय में भाव बहु भरती। 

मिला स्पर्श चरणों का, 

युगों का सुप्त मन चौंका।। 


87.फैलती ज्योति जंगल में,

कलेवर त्याग कर पल में।

दिव्य बन सामने आई,

परम प्रभु की कृपा पाई।। 


88.जय-ध्वनि लोक त्रय छाई, 

हृदय आनंद सुखदाई।

जयति जय राम रघुराई,

कृपा से मुक्ति है पाई।।


89.जनकपुर ज्यों निकट आता,

हृदय को था बहुत भाता। 

इंद्र दरबार भी फीका,

लगे वह स्वर्ग धरती का।।


90.बगीचा एक मन भाया,

वहीं विश्राम है पाया।

नगर घूमें दोऊ भाई,

नयन तन मनहि सुखदायी।।**


(चौबोला)

91.पुरी आज दुल्हन सी सजी, 

लख कुबेर संपत्ति भी लजी। 

राम लखन जब मग में चले,

भवन झरोखे झटपट खुले।। 


92.जन मन में आशा थी यही,

राम लखन दिख जाएं कहीं। 

बालक वृद्ध आश्रम खड़े 

दरश हेतु पथ पर ही अड़े।। 


93.देखें तो चरणों में नवें 

ताक रही छिपकर बहू में 

बालक,थामे उंगली चले

राह दिखा फूलों से खिले।। 


94.पुष्प वृष्टि छत से ही करें, 

महामोद नयनों में भरे।

जो असमर्थ दूर से तकें, 

हिरदै के सुख से ही छकें।। 


95.जनकराज स्वागत में लगे,

नयनों में आशा रस जगे। 

राम वाटिका में जब गये, 

लख जानकी, भाव कुछ नये।। 


96.जनक लली मन्दिर को चलीं,

राम दरस मन कलियां खिलीं। 

वर मांगें गौरा से यही, 

नयनों से जाएं ना कहीं।। 


97.गुरु,गणपति, गौरा से कहें, 

राम सदा मन में ही रहें।

पिता, प्रतिज्ञा अब ना करें, 

सीता, प्रभु-मृदुता से डरें।। 


98.इस धनु के आगे सब डिगे, 

शौर्य- शक्ति बस मन में जगे। 

सीता यही निवेदन करें, 

नेह नवल तन मन में भरें।। 


99.राज-सभा का सुंदर मंच,

लख कर लज्जित हुए बिरंच। 

नर-नारी बालक और वृद्ध, 

उच्च निम्न निर्धन समृद्ध।। 


100.सभा मध्य बैठे सब आय,

नयनों में सुख नहीं समाय।

देश-देश के नरपति धीर,

बुद्धिमान सज्जन मति धीर।। 


101.आमंत्रित नृप रहे विराज, 

ख़ूब सजाये अपने साज। 

राम लखन संग विश्वामित्र, 

लोग निहारें, बनकर चित्र।। 


102.जो कर पाएगा धनु-भंग, 

चले जानकी, उसके संग। 

करनी है पूरी यह शर्त, 

कीर्ति अन्यथा जावे गर्त।। 


103.बहुतों ने आजमाया हाथ,

किंतु भाग्य ने दिया न साथ। 

कुछ सज्जन साधे थे मौन, 

चुप देखें, धनु तोड़े कौन।। 


104.बैठ गए जब, सब मन मार,

श्रम दीखा, जाता बेकार। 

जनकराज बोले अति दीन,

धरा हुई वीरों से हीन??


105.झुका खड़े,सबअपना माथ, 

किसको दूँ, सीता का हाथ?

अनुज लखन की आंखें लाल, 

वचन सुने चौंके तत्काल।। 


106.बैठे हैं रघुवंशी वीर, 

रामचंद्र राघव रणधीर। 

इनके सम्मुख ओछी बात, 

सुनकर हमें लगा आघात।। 


107.हमें नअनुमति वरना आज, 

अभी देखता सकल समाज। 

मैं ही यह धनु देता तान, 

किंतु राम का था अपमान।। 


108.किया प्रभू ने तब संकेत,

लक्ष्मण भी तब हुए सचेत। 

मुनि कौशिक बोले- हे राम! 

तुमको करना है यह काम।। 


109.हरो जनक के मन की पीर,

तुम सामर्थ्यवान बलवीर। 

ली प्रभु ने चरणों की धूल,

चारों ओर खिले ज्यों फूल।।


110.धनुष मंच पर पहुंचे राम,

उठा लिया लेकर गुरु नाम।। 

पल में किया धनुष को भंग, 

देख रह गई जनता दंग।।


111.सीता ने डाली जय माल,

जनक राज हो गए निहाल। 

सभा मध्य फैला उत्साह,

सबको प्रभु दर्शन की चाह।। 


112.अवधपुरी को पहुंचे दूत, 

नगरी का सौंदर्य अकूत। 

मिला जनकपुर का संदेश, 

सबके मन आनंद विशेष।। 


113.अवधपुरी में था आनंद,

किंतु जनकपुर छाया द्वंद। 

धनुष भंग का सुनकर हाल, 

परशुराम पहुंचे तत्काल।।


114.किसने तोड़ा धनुष विशाल, 

मैं आया बन उसका काल। 

यहां विराजे जितने वीर,

मुझसे हैं परिचित रणधीर।। 


115.मम समक्ष क्षत्रिय हैं दीन,

इक्कीस बार भूमि ली छीन। 

निकले बाहर वो स्वयमेव,

उसे बचावें दनुज न देव।।


116.उठकर खड़े हुए श्री राम, 

हाथ जोड़कर किया प्रणाम। 

मैं तो हूं छोटा सा दास, 

बात हुई ना ऐसी खास।। 


117.है स्वीकार मुझे हर दंड,

शांत करें यह क्रोध प्रचंड। 

लक्ष्मण ने बोले  कटु बोल, 

राम बोलते मन में तोल।। 


118.होता जाता कठिन विवाद, 

लक्ष्मण परशुराम संवाद।

राम शील के थे प्रतिरूप, 

शीतल करी क्रोध की धूप।। 


119.परशुराम ने किया प्रणाम, 

राम सकल जग के विश्राम। 

राम विष्णु का ही अवतार, 

वे हैं नारायण साकार।।


120जब जानी यह सच्ची बात, 

धनुष भंग,भूले आघात।

वन को लौटे दिव्य मुनीश, 

वर-कन्या को दे आशीष।।


121. चली अवधपुर से बारात।

मधुर सुगंधित बहती वात।।

हाथी घोड़े रथी सवार, 

विविध भांति बांधे हथियार।। 


122.बाल मंडली में उत्साह,

मित्र राम दर्शन की चाह।

युवा टोल के मन में जोश,

वृद्ध, खुशी से थे बेहोश।। 


123.हुआ राम का दिव्य विवाह,

पूर्ण हुई भक्तों की चाह। 

लक्ष्मण को उर्मिल का साथ,

दी मांडवी भरत के हाथ।।


124.श्रुतकीरति रिपुसूदन संग,

शुभ विवाह की भरी उमंग। 

दशरथ मन आनंद विभोर,

आनंद छाया था चहुँ ओर।। 


125.पाया प्रेम नेह सम्मान, 

किया अवधपुर को प्रस्थान। 

सबके मन आनंद अटूट,

ज्यों दरिद्र ने ली निधि लूट।।


126.स्वागत हुआ नृपति के द्वार,

जननी मन उत्साह अपार।

राम लखन सौंदर्य निधान, 

भरत शत्रुघन गुण की खान।। 


127.अवध निवासी भरे उछाह, 

उमड़ रहा रस गंध प्रवाह। 

दिवस सुनहरे, महकीं रात,

चर्चा में यह दिव्य बरात।। 


128.रसमय मधुमय राम विवाह,

पूरी बहु जन्मों की चाह। 

सुख में मग्न राज दरबार,

राज-कार्य में करें विचार।।


129.जगी ह्रदय में इच्छा एक, 

करें राम का अब अभिषेक।

राजकाज से जुड़ते राम,

वाणी मधुर दरस अभिराम।।


130.अति विनम्र एवं विद्वान,

प्रजा निछावर करती प्राण। 

जुड़ा एक दिन जन-दरबार,

आंगन में थी भीड़ अपार।।


131.नृप संबोधित करें समाज, 

उचित घोषणा करता आज। 

घटती शक्ति हुआ में वृद्ध, 

राज्य विशद व्यापक समृद्ध।।


132.राज्य चलाएंगे अब राम, 

मैं महलों में लूं हरिनाम। 

राम अवध के हों युवराज, 

यदि चाहे यह राज समाज।।


133.जनगण को यह था स्वीकार, 

सभी राम से करते प्यार। 

गूंज उठा सारा दरबार, 

हुई राम की जय-जय कार।।


134.शीघ्र करें हम यह शुभ काम,

कल युवराज बनेंगे राम। 

समाचार से छाई धूम, 

नगर रहा खुशियों से झूम।।


135.भरत न थे भाई के पास,

जीवन के यह क्षण थे खास। 

राम चाहते उनका साथ,

पिता चरण में नावें माथ।।


136.तात! भरत भी होते आज,

मैं प्रसन्न मन करता काज। 

शुभ मुहूर्त में करो ना देर, 

बाद भारत को लेंगे टेर ।।


137.महलों में छाई थी धूम, 

सेवक रहे खुशी में झूम।

नाम मंथरा, दासी एक,

कुटिल हृदय थी सुप्त-विवेक।। 


138.कारण समझ ना पाई मूढ़, 

देखा जब आनंद निगूढ़। 

औरों के मुख, जानी बात, 

हृदय लगा भीषण आघात।।


139.पहुंची वह कैकेई पास, 

कहा, खबर लाई हूं खास। 

जगे तुम्हारे दुर्दिन आज, 

राम बनेंगे अब युवराज।।


140.तुम तो सोतीं पांव पसार, 

विधि करती घनघोर प्रहार। 

अब न शयन का बाकी वक्त, 

तुम होंगी, घर से परित्यक्त।। 


141.कौशल्या के मन आनंद,

नहीं सुमित्रा के मन द्वंद।

ना पहचान सकीं छल-छंद, 

तुम तो फँसी प्रेम के फंद।।


142.लगी राम को देने शाप,

सिर फोड़े और करे विलाप।

कैकेई ने दी फटकार,

बोलीं, तुझे लाख धिक्कार।। 


143.मेरी नयन-ज्योति हैं राम, 

राज्य-लोभ से हैं निष्काम।

इससे बड़ा न शुभ कुछ आज, 

राम करेंगे हम पर राज।।


144.मैं तो दूँ खुद को ही वार,

किंतु अभी ले यह उपहार। 

दिया गले का हार उतार,

दासी को यह लगा प्रहार।। 


145.रानी तुम हो बुद्धि विहीन,

समय बनाता तुमको दीन।

यह राजा का है षड्यंत्र, 

कौशल्या देती यह मंत्र।।


146.सुत को भेज दिया ननिहाल,

तुम्हें न आता जरा खयाल। 

तुम भोली-भाली नादान, 

तुमने दिया न इस पर ध्यान।। 


147.भरत बनें रघुवर के दास, 

लक्ष्मण होंगे उनके खास। 

कौशल्या की दासी आप, 

जीवन होगा तब अभिशाप।।


148.अब कुछ ऐसा करो उपाय,

बिगड़ी हुई बात बन जाए। 

वरना छोड़ो सुख की आस,

करो गुलामी का अभ्यास।।


149.कुटिल थी मंथरा दासी,

बनी वह राज्य की फांसी।

सरल थी कैकयी रानी,

अहित की बात भी मानी।।


150.सुरासुर युद्ध में रानी, 

बनी नृप हेतु वरदानी।

दिए वरदान दो तुम को,

भुनाओ आज तुम उनको।।


151.भरत को राज तुम मांगो, 

मोह की नींद से जागो। 

राम को भेज दो वन में, 

न शंका रख जरा मन में।।


152.बिताएं वो बरस चौदह,

कटेगा भरत का हर भय।

हटेंगे राह के कंटक,

मिलेंगे राज-सुख बेशक।।



153.भरत जब लौट आएंगे,

अकंटक राज पाएंगे।

झुकेंगे सब चरण-तल में,

समय बदलेगा दो पल में।।


154.तजो श्रृंगार तुम सारे,

उन्हें दिन में दिखें तारे।

सहजता से न कुछ मांगो,

न अपने क्रोध को त्यागो।।


155.नृपति रनिवास जब आयें,

तुम्हें कुछ क्रुद्ध वह पायें। 

जो कारण जानना चाहें,

कथन हर मानना चाहें।।


156.शपथ तब राम की लेना, 

न अवसर दूसरा देना।

भले वह कुछ ना कह पावें,

तुम्हारा दुख न सह पावें।।


157.वचन फिर मांग तुम  लेना, 

करो हर शस्त्र अब पैना।

 न अब संकोच में आओ, 

 न यह अवसर पुनः पाओ।।

 

 158.कसा था जाल यह पूरा,

 किया हर नेह को चूरा। 

 महल को जब नृपति आए, 

 न कैकेयी कहीं पाए।।

 

159.मिली वह कोपभवनों में,

उतरता क्रोध नयनों में। 

नृपति यह देख अकुलाये,

समझ उनकी न कुछ आए।।


160.जमाया खेल रानी ने, 

कपट रख कर सयानी ने। 

न दशरथ कुछ समझ पाए,

कुटिल के फंद में आए।।


161.कैकेयी कुटिल, दशरथ थे सरल चित्त,

चाल ये  चतुर, वो समझ नहीं पाए हैं। 

देवासुर युद्ध में, प्रखर वीरता दिखा के,

रानी ने नृपति से, दो वरदान पाये हैं।। 


भरत अवध राज, पावें,राम वन जावें,

ऐसे कुविचार,कैकेयी के मन आये हैं। 

वचन बँधे थे,वरदान दे दिए परंतु, 

राम के वियोग में,नृपति घबराए हैं।। 


162.राजा समझावें, रानी समझ ना पावें, 

राम वन चले जावें, एक यही हठ ठानी है। 

मंथरा पढ़ाई, दुरमति मन छाई, 

राजा वचन बंधे हैं,रानी कपट सयानी है।। 


राजा हैं चकित, मन हुआ है थकित, पर 

रानी हैं अड़ी हुई, ना बदली ये बानी है।

हित की ना बात सुने,हानि मन में ना गुने,

समझी न रानी,यही नाश की निशानी है।।


163.हुआ वज्रपात, दशरथ के मनोरथ पे, 

राम का गमन सुन, चित्त खेद भारी है। 

सुखद सजा साज, सिर पर गिरी ये गाज,

झपटा हो  जैसे बाज,बात ही बिगाड़ी है।। 


नारी ने सजाया घर, नारी ने बनाया नर, 

नारी के स्वरूप ने,ये दुनिया संवारी है।।

देव का विधान, भूले सब ज्ञान-ध्यान,

इस नाश का विधान बनी,आज एक नारी है।।


164. नगर निवासी नाच रंग में रंगे थे, 

मन कमल खिले थे राम-अभिषेक आज है। 

सुबह हुई तो देखा, सूना है महल आज, 

अवध के मौसम का बदला मिजाज है।। 


सब के दिलों पे पहले से राज करता था, 

जाएगा वो वन, किसी और सिर 'ताज' है। 

एक रात में ही खेल, उलट-पुलट हुआ 

राम वनगामी  हैं, भरत रघुराज है।। 


165.लखन सियाने सुना सखाओं सहेलियों से, वलकल धार, आज राम वन जाएंगे।

दहल गये  है सभी,  सोच मन कांप रहा, 

राम का दरश, हम कैसे अब पाएंगे।। 


जिन में बसे हैं प्राण,उनका प्रयाण,

वन हेतु,यह दुख हम कैसे सह पाएंगे। 

दोनों ने किया विचार, कुछ भी कहे संसार, 

अवध को त्याग, उनके ही साथ जाएंगे।। 


166.राम है प्रसन्न शेष सभी विचलित फिरें,

आपस में कहें, कोई रानी को मनाइए। 

कैकेयी महल में, बैठी हैं क्रुद्ध सिंहनी सी, 

बार-बार कहती हैं राम को बुलाइए।।


रघुकुल में तो यही, रीत है सदा से,

भले, प्राण चले जायें पर वचन निभाइये। 

राम सिया लखन पिता के चरणों में झुके,

समय हुआ है हमें वन भिजवाइये।।


167.यह वन गमन श्रीराम का 

किंचित सहा जाता नहीं। 

सब हैं इसी संताप में,

कुछ भी कहा जाता नहीं।। 


168.सीता तपस्वी वेश में 

पैदल खड़े रघुनाथ हैं।

विधि के लिखे को मेट पाना 

कब किसी के हाथ है??


169.कैकई को सब कोसते, 

उसने सुधा को विष किया।

निज नाश का सामान रच, 

खुश हो रही कैसी तिया??


170.रथ को लिए मंत्री खड़े,

जनता खड़ी तैयार है। 

हर आंख में आंसू दिए 

उस लोभ को धिक्कार है।। 


171.वन को चले रघुनाथ 

पीछे छोड़कर सूनी गली।

लक्ष्मण लिए धनु हाथ, 

सँग चलती सुनयना की लली।। 


172.बच्चे जवां बूढ़े सभी 

मीलों तलक दौड़े चले। 

दुख सिंधु था उमडा 

खिसकती थी ज़मीं पैरों तले।। 


173.तमसा किनारे रात बीती,

फिर सुबह यह काफिला।

कर गोमती को पार,

संध्या सुरसरी से जा मिला।।


174.सिंगरौर में विश्राम करते

पार गंगा को किया।

कंकड़  भरे वन-पंथ पर 

पैदल चलें कोमल सिया।।


175.लौटा अवध रथ रिक्त,

दशरथ के हृदय भूचाल था।

सुत-शोक हिय को फाड़ता, 

दिखता उन्हें निज काल था।। 


176.बेचैन रोते चीखते 

दशरथ यूं ही तड़पा किये।

 पीड़ा सहन ना हो सकी,

 सुर धाम दशरथ चल दिए।।

 

177.यह दूसरा आघात था 

कुछ भी समझ आता न था।

यह मृत्यु-वत संकट घड़ी थी,

हर हृदय उमड़े व्यथा।।


178.रथ भेज बुलवाया गया,

आए भरत ननिहाल से।

देखा नगर उजड़ा हुआ,

फिरते स्वजन बेहाल से।।


179. आये भरत जब श्री अवध,

साम्राज्य था संताप का।

उतरे हुए चेहरे दिखे,

ज्यों असर हो अभिशाप का।। 


180.पहुंचे महल निज मातु के 

सब मुंह सिये, खामोश थे। 

वे आज थे शमशान से, 

आनंद का जो कोष थे।।


181.सूनी सड़क चेहरे झुके 

पंछी न कलरव कर रहे। 

गुमसुम खड़े आंसू झरें, 

जैसे स्वयं से डर रहे।।


182.पहुंचे महल में जब भरत,

माँ ने दुलारा प्यार से।

भयभीत मन कब शांत था?

वे खुश न थे सत्कार से।। 


183.माता पिता जी हैं कहां,

सब क्यों यहां मृतवत् खड़े?

सबके नयन आंसू भरे,

चेहरे लगें चित्रों जड़े ।।


184.राजा गये सुर-धाम बेटा! 

राम-सिय वन को गए।

अब तुम संभालो यह अवध,

दायित्व हैं तुम पर नये।। 


185.ये शब्द कानों में पड़े,

विश्वास दो पल को हिला।

मां के हृदय से पुत्र के 

दिल का बढ़ा कुछ फासला।।


186.माता तुम्हें माता कहूं? 

पर आचरण है शत्रु का।

संसार के आगे,तुम्हारे 

कर्म से,सिर है झुका।।


187.विष दे दिया होता प्रथम,

कोई न दुख होता मुझे।

मैं पुत्र हूं तुम हो जननी,

धिक्कार दूं कैसे तुझे??


188.नाता न माता पुत्र का, 

मैं तोड़ता हर बंध हूँ।

दशरथ तनय बनकर सुखी, 

हर नेह से स्वच्छंद हूँ।।


189.गुरु से कहा तब भरत ने,

आदेश मुझको दीजिए।

फिर राम वापस आ सकें, 

कुछ कार्य ऐसा कीजिए।।


190.अंत्येष्टि के हर कर्म,कर पूरे 

भरत ने यह कहा।

हे श्री अवध के वासियों!

संताप अति तुमने सहा।।


191.प्रिय राम रूठे हैं उन्हें,

मैं ही मना कर लाऊंगा।

यदि साथ में ना ला सका तो 

लौट कर ना आऊंगा।। 


192.वे ही संभालें  राज यह 

मैं दास बनकर ही रहूं।

जब दोष यह मेरा नहीं, 

यह कष्ट मैं क्यों कर सहूं??


193.भ्राता-पिता से हीन,

कैसा राज?किसका राज है? 

यह राज पद कांटों भरा,

मुझको न ये सुख-साज है।। 


194.सारी अयोध्या चाहती थी,

राम ही युवराज हों। 

मैंने न चाहा राज ये,

मुझ पर न तुम नाराज हो।। 


195.यह राज्य है श्री राम का,

वो ही अवध फिर आएंगे। 

गुरू,मातु, मंत्री,नागरिक,

उनको लिवाने जाएंगे।


196.सारी अयोध्या में यही, 

शुभ बात व्यापक हो गई। 

उत्साह मन से, द्वार पर ही 

अवध सारी सो गई।।


197.प्रातः हुई सब चल दिए,

मन में प्रबल उत्साह था। 

चतुरंगिणी सेना सजी,

सारा नगर हमराह था।। 


198.गंगा किनारे जा लगे,

राजा निषादों का खड़ा।

उसको लगा, यह युद्ध है,

वह सैन्य के सम्मुख अड़ा।। 


199.नावें  डुबा दीं धार की, 

ललकार कर आगे चला।

देखा भरत का नेह तो, 

बहु-प्रेम से सबसे मिला।। 


200.जब सैन्य कोलाहल सुना,

लक्ष्मण कुपित लगने लगे।

गत कष्ट फिर मन में जगे, 

जो डंक से चुभने लगे।।


201.जब खलबली वन में हुई,

पंछी बसेरा त्यागते।

मृग,सिंह,चीते,अश्व,गज,

सब चीखते और भागते।।


202.बाहर खड़े सौमित्र ने,

जाना भरत हैं आ रहे।

कुछ क्रोध में डूबे वचन,

प्रभु राम से जाकर कहे।।


203.राज्य छीनने के लिए 

रचा गया षड्यंत्र।

हम भी हैं सब जानते,

मिला कहां से मंत्र।। 


मिला कहां से मंत्र 

कहां से साहस पाया। 

भरत शत्रुघ्न दोनों को 

किसने भड़काया।। 


आये आज स-सैन्य 

उन्हें हम मजा चखाएं। 

उनका बल अभिमान,

युद्ध में आज भुलाएं।।


204.कहा राम ने लखन से 

करें क्रोध का त्याग।

क्षमा सुधा की बूंद है,

क्रोध दहकती आग।।


क्रोध दहकती आग 

न करना शंका मन में।

राज्य लोभ ना जगे 

भरत के मन चिंतन में।।


भरत सदा से हैं मेरे 

मन के अनुगामी।

मुझे मानते रहे सदा 

वे अपना स्वामी।।


205.राम वचन सुन लखन के 

ह्रदय जगा विश्वास।

तन मन से पावन भरत,

उन्हें हुआ आभास।।


उन्हें हुआ आभास 

कोसने लगे स्वयं को। 

क्यों न नियंत्रित किया 

उन्होंने कटु-चिंतन को।। 


कोल किरात भील वनचर 

ऋषि मुनिवर  ज्ञानी।

भरत आगमन सुना,

चले करने अगवानी।।


206.पर्वत पर छाई कुटी 

कलरव करते मोर।

प्रकृति सुंदरी की छटा,

छाई है चहुँ ओर।।


छाई है चहुँ ओर,

रंग भीनी हरियाली।

सिया लखन सँग, 

राम दरस की छटा निराली 


भरत शत्रुघ्न झुके,

राम को करें दंडवत।

अद्भुत नेह निहार,

जी उठा मानो पर्वत।।


207. आये हैं कुटी के द्वार 

रथ त्याग के सवार,

राम को निहार,

सब दुख दूर भागे हैं। 

अवध निवासी गुरु, 

प्रजा जन मित्र बंधु, 

राम के अनूप प्रेम 

मध्य अनुरागे हैं।।


धन्य हैं भरत धीर

राम भक्ति के स्वरूप 

राम के दरस हित 

सब सुख त्यागे हैं।

धन्य है अवध 

धन्य चित्रकूट भूमि,जहां 

देव हाथ जोड़ खड़े 

मानुष के आगे हैं।।


209. कहते भरत 

प्रभु वन को पधारे आप 

अवध के वासी सब, 

हो गए अनाथ हैं। 

संकट सहेंगे लाख 

कष्ट नहीं होगा हमें, 

मस्तक पे आपका 

रखा हुआ जो हाथ है।।


युग कोटि बीत जाएं, 

हम लाख समझाएं,

किंतु अपयश की तो,

बन गई बात है।

एक ही विचार 

आप अवध पधारें प्रभु 

हम दीन-दास 

सदा आपके ही साथ हैं।।


210. अद्भुत क्षण था अनुपम अवसर 

था मंत्रमुग्ध सारा परिकर। 

श्री भरत राम के चरण पड़े,

गुरु बंधु मित्र करबद्ध खड़े।।


211.माताएं देखी श्वेत वसन,

शंकित हो गया राम का मन।

तब कहा भरत ने हे भाई!

यह समाचार अति दुखदाई।।


212.प्रिय पिता हुए स्वर्गारोही,

मैं कहलाया भ्राता-द्रोही। 

सह सके न विरह तुम्हारा वे,

पा गए कष्ट निस्तारा वे।।


213.सुन हुआ राम का हृदय भग्न, 

हो गये उसी पल शोक मग्न।

तर्पण कर व्रत स्नान किया,

गुरुजन विप्रों को दान दिया।।


214.अगले दिन बैठी सभा विशद,

गुरु संत वृद्धजन की संसद।

कैकेयी थीं नत दृष्टि लिए,

कर रहीं याद जो कर्म किए।। 


215.करबद्ध खड़े हो गए भरत, 

बोले प्रभु आज यही जनमत। 

अब आप अयोध्या लौट चलें,

मुरझाए मन के कमल खिलें।।


216.हो गया पूर्ण आज्ञा पालन,

अब तोड़ें वचनों के बंधन।

वह अवध रही तुमको पुकार, 

खग मृग तरु टेरें बार-बार।। 


217.सरयू शमशान बनी तुम बिन,

बरसों जैसे बीते यह दिन।

मां की अनुमति सिर धार चलो,

भैया! अब अपने द्वार चलो।।


218.नैनो से बहती अश्रु-धार,

मन में गहराते बहु विचार।

अवरुद्ध कंठ सिर झुका खड़े,

प्रभु चरणों में सब विनत पड़े।।


219.तब कहा राम ने- बंधु सुनो! 

तुम प्रेम विवश कायर न बनो।

मेरा है मर्यादित जीवन,

कैसे तोडूं मैं पिता वचन।।


220.आदेश मिला मुझको वन का,

वरदान तपस्वी जीवन का। 

अब राज संभालो तुम जाकर,

मैं अवधि बिता, आऊंगा घर।।


221.चाहे शशि जले,भानु शीतल,

या फिर उमड़े सागर का जल।

ठंडी हो अग्नि,फटे भूतल, 

पर मेरा निश्चय रहे अटल।।


222.हो गए निराश छोड़ बैठे जब आस 

कहें भरत- हे स्वामी! कोई राह तो बताइए। 

चौदह बरस कैसे कट पाएंगे हमारे?

विरह के दावानल, से हमें बचाईए।। 


जाऊं मैं अवध, राज भी संभालूं आपका ही, 

अपनी खड़ाऊँ मेरे शीश पे रखाइये।

चौदह बरस रहे, शासन खड़ाऊंओं का,

अवधि बिता के अविलंब आप आइए।।


223.चरण पादुका रूप में,

मिला अवधि आधार। 

कर प्रणाम वापस चले,

मान रहे आभार।। 


मान रहे आभार, 

किया राघव चरणों का वंदन।

सिंहासन पर करें 

पादुका का ही पूजन अर्चन।।

राम-धरोहर मान 

भरत कर रहे अवध पर शासन। 

प्रभु सेवा में किया 

समर्पित अपना तन मन जीवन।।


224.कभी न पहने राजसी,

वस्त्र मुकुट पदत्राण।

नंदीग्राम को भरत ने 

सीधे किया प्रयाण।।


सीधे किया प्रयाण 

शत्रुघ्न ही यह राज्य चलाएं।

वनवासी बन भरत 

सिय-राम चरण  गुण गाऐं।।


भरत निभाते नेह

बिता कर कठिन तपस्वी जीवन।

राज्य सुखों को त्याग,

बनाया घर को ही वन-कानन।। 


225.आश्रम था प्रभु राम का 

दिव्य रूप आकार।

वृक्ष वनस्पति शोभते, 

पुष्प अनेक प्रकार।।


पुष्प अनेक प्रकार 

वृक्ष, फल लटकें बड़े रसीले।

शुक-पिक चातक-मोर 

कूजते फिरते रंग रंगीले।।


शीतल सुरभित मलय पवन 

मन को अति ही हरषाये।

प्रकृति यहां कण-कण में 

नित चहुँ दिश अमृत बरसाए।।


226.वन प्राणी विश्वास से 

बैठे प्रभु के पास।

सिंह मृगों में था नहीं,

हिंसा का आभास।।


हिंसा का आभास,

वृत्तियां थीं बिल्कुल परिवर्तित।

प्रेम बरसता था सब पर,

मन में भय रहा न किंचित।।

 

दूर-दूर तक चित्रकूट में,

फैली राम-कहानी।

सभी सुखी थे,वे मनुष्य हों 

या जंगल के प्राणी।।


227. यूं ही बीत गया बहु काल।

दर्शन पा सब हुए निहाल।। 


228.ऋषि मुनियों का शुभ सत्संग।

दिनचर्या का था यह अंग।। 


229.किया राम ने हृदय विचार।

यहां हो गया बहुत प्रचार।।


230.शांति घटी, कोलाहल घोर।

है प्रसिद्धि पहुंची चहुंओर।।


231.ऋषि मुनियों का कर वंदन। 

अनुमति लेकर किया गमन।।


232.दंडक वन था अगम विशाल। 

प्रजा दानवों से बेहाल।। 


233.ऋषि गण थे दुख से संतप्त। 

वह विशाल वन था अभिशप्त।। 


234.करने जन गण का उद्धार।

वहीं वास का किया विचार।।


235.सिद्ध पुरुष थे मुनि शरभंग। 

पाने को उनका सत्संग।।


236.उत्सुक रहते थे सुधि लोग।

सहज बन गया था संयोग।।


237.मुनि को थी दर्शन की आस।

चिर संचित थी यह अभिलाष।। 


238.किंतु आयु ना देती साथ। 

सबसे प्रबल काल का हाथ।।


239.मुनि का आया अंतिम काल।

राम दरश से हुए निहाल।।


240.योग अग्नि में त्यागा तन।

ऊर्ध्व लोक को किया गमन।।


241.प्रेत क्रियाएं करके राम।

पहुंचे ऋषि अगस्त्य  के धाम।।


242.थे सुतीक्ष्ण मुनि उनके शिष्य।

अंधकारमय बना भविष्य।।


243.कर बैठे थे कोई भूल।

स्वयं भाग्य पर डाली धूल।। 


244.मुनि ने दिया इन्हें था त्याग। 

इनके मन जागा बैराग।।


245.लेकर गुरु दर्शन की आस। 

रहते थे आश्रम के पास।।


246.राम आगमन का संवाद।

सोचा,अब हटता अपवाद।। 


247.ले जाऊं गुरुवर के द्वार। 

वे भी मानेंगे आभार।। 


248.राम लखन सीता के साथ।

गुरु के द्वार नवाया माथ।।


249. मुनि अगस्त्य थे शक्ति निधान।

विश्व करे उनका गुणगान।।


250.किया राम ने विनत प्रणाम।

पिता सहित बतला कर नाम।।


251.मुनिवर! मैं दशरथ सुत राम।

चरणों में कर रहा प्रणाम।।


252.सिया और लक्ष्मण हैं साथ।

कृपया रखें शीश पर हाथ।।


253.मुनि ने किया पूर्ण सत्कार।

तपः शक्ति का ले आधार।। 


254.उत्तम भोग कंद और मूल।

जो थे अवसर के अनुकूल।।


255.सादर भेंट किए उपहार।

अस्त्र-शस्त्र उत्तम हथियार।।


256. शस्त्र-शास्त्र में थे निष्णात।

दिव्य अस्त्र थे उनको ज्ञात।।


257. दिया राम को सारा ज्ञान।

जिससे कार्य होंय आसान।।


258.आश्रम में छाया आनंद।

कुछ दिन वास किया स्वच्छंद।।


259.दंडक वन रहता गुलजार।

घटनाएं लेती आकार।।


260.राम बसें ऋषियों के बीच।

भाव भक्ति को रखते सींच।।


261.जिस कारण चाहा वनवास।

अवसर वह आना था खास।।


262.भूमि करूंगा, निशिचर हीन।

यही राम का वचन प्रवीन।।


263.वन वासी जीवन स्तम्भ।

हुई नई लीला प्रारम्भ।।


264.सूपनखा मायाविनी,करती वहां निवास।

जो जैसा वह चाहती,पाती बिना प्रयास।।(दोहा)



265.एक दिवस करके सिंगार।

लेकर मनमोहक आकार।। 


265.पहुंची पर्णकुटी के द्वार।

परिणय की करती मनुहार।।


266.सूर्पनखा का हुआ प्रवेश। 

कपटी रूप सजीला वेश।।


267.उसका भाई था लंकेश।

दूषित हुआ दिव्य वह देश।। 


268.अनुपम था राघव का रूप। 

दिव्य भाव छवि छटाअनूप।। 


269.देखा वह मनमोहक वेश। 

आकर्षित हो गई विशेष।।


270.लज्जा त्याग रखी निज चाह।

राम! करो मम संग विवाह।।


271.मैं अनुपम सौंदर्य निधान।

तुम त्रिलोक में पूज्य महान।।


272.रखा विधाता ने यह जोड़ 

जग में हम दोनों बेजोड़।।


273.मैं पत्नी युत बोले राम।

लखन बनाए तेरा काम।।


274.तब वह चली लखन के पास।

पाने का कर रही प्रयास।। 


275.लखन कहें,मैं प्रभु का दास।

पूरी हो कैसे अभिलाष।।


276.इस विवाह को समझो व्यर्थ। 

दासी जीवन का क्या अर्थ।।


277.पुनः राम का मांगा हाथ।

किंतु जानकी देखी साथ।।


278.सोचा,बड़ी रुकावट सीय।

यह त्रिलोक में अति कमनीय।।


279.पहले इसका करूं विनाश।

तब पूरी हो मेरी आस।। 


280.जब ना रहे सीता का संग। 

स्वप्न न मेरा होगा भंग।।


281.झपट पड़ी सीता की ओर।

लखन खड्ग लेकर घनघोर।।


282.कूद पड़े दोनों के बीच। 

सोचा, अबला है पर नीच।। 


283.सपनों का रखना यदि मान।

आवश्यक है दंड विधान।। 


284.नाक कान पर किया प्रहार।

उमड़ी प्रबल रक्त की धार।। 


285.चीख मार, भागी वन ओर।

बसते वहां और भी चोर।।


286.पहुंची खर दूषण दरबार।

उन्हें सुनाई आर्त पुकार।।


287.सुना बहन का यह अपमान।

बदला लेने किया पयान।।


288.इधर राम ने किया विचार।

इस घटना का हुआ प्रचार।।


289.संभव हो सकता है युद्ध।

असुर शक्तियां हुई विरुद्ध।।


290.अनुज लखन से, बोले राम।

तुम्हें साधना है यह काम।। 


291.होगा अभी युद्ध विकराल। 

तुम सीता का रखो ख्याल।।


292.असुर चाहते हैं प्रतिशोध।

अभी प्रबल है उनका क्रोध।। 


293.हमें यही रखना है ध्यान।

सीता का न करें अपमान।। 


294.गिरि कंदर में जाओ वीर।

सिय रक्षा में रहना धीर।।


295.इन्हें, अकेला मैं भरपूर।

सारा गर्व करूंगा चूर।। 


296.चले लखन सीता के साथ।

भ्राता-चरण नवा कर माथ।।


297.आई निशिचर अनी अपार।

जैसे हो सागर का ज्वार।।


298.राम खड़े थे उनके मध्य। 

ले शर-चाप पूर्ण सन्नद्ध।।


299.हुआ भयानकतम संग्राम।

राक्षस सहस,अकेले राम।।


300.मारो-काटो का,था शोर।

हाहाकार मचा हर ओर।।


301.जिसको लगे राम के बाण। 

प्राण स्वर्ग को करें प्रयाण।। 


302.खर-दूषण का हुआ विनाश।

जय ध्वनि से गूंजा आकाश।। 


303.दंडक वन में छाई शांति।

निखर उठी फिर वन की कांति।।


304.यज्ञ हुए फिर से आरंभ। 

ज्ञान भक्ति के दृढ़ स्तंभ।। 


305.निर्भय था सबका जीवन।

राम समर्पित था तन-मन।।


306.खर दूषण के वध के बाद।

शूर्पणखा को आई याद।।


307.रावण तक पहुंचे संवाद।

तब पूरा होगा प्रतिवाद।।

💐💐(प्रथम भाग पूर्ण)💐💐


(...अशेष)💐💐




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