हर्षित हुए भालू कपि वृन्द।
हनुमत का उत्साह देखकर,
सबके मन छाया आनंद।।
84.सिंहनाद कर पवन पुत्र ने
कहा वानरों से तत्काल।
जाता हूं सीता सुधि लाने
तुम सब अपना रखो खयाल।।
85.पूंछ घुमाकर पर्वत पर चढ़
हनुमत ने ली बड़ी उछाल।
कांप उठा आकाश,दिशाएँ दहलीं
भूमि हुई बेहाल।।
86.याद किया रघुवर चरणों को
मन ही मन फिर किया प्रणाम।
राम काज हित सदा समर्पित
कर्म किया करते निष्काम।।
87.पवन वेग से पवन तनय ने
दक्षिण दिशा किया प्रस्थान।
कितनी दूर?कहां रुकना है?
मन में नहीं तनिक अनुमान।।
88.अंगद जामवंत से योद्धा
इंतजार करते अब रोज।
मन में था विश्वास पवनसुत
सीता सुधि लाएंगे खोज।।
89.वायु वेग से उड़ते जाते
कहीं न लेते थे विश्राम।
क्या दिन-रात? निरंतर वे
चलते रहते प्रतिपल अविराम।।
90.लगातार उड़ते देखा तो
ऊपर उठ आया मैनाक।
उड़ता था वह कभी गगन में
इंद्रदेव ने छीनी धाक।।
91.पवन तनय से बोला- कपिवर!
दो-पल कर लीजै विश्राम।
सागर पार जा रहे हो,
जो है त्रिकाल में दुष्कर काम।।
92.हनुमत बोले धन्यवाद
अति कृपा बनाए हैं श्री राम।
राम काज करने से पहले
मुझे कहां पल भी विश्राम?
93.डूब गया मैनाक, पवनसुत
पुनः बढे लंका की ओर।
गहन गरजता महा सिंधु था,
जिसका कोई ओर न छोर।।
94.चले जा रहे पवन पुत्र
बस, मन में एक लक्ष्य संधान।
महावीर अंजनी तनय जय
जय हे महाबली हनुमान।।
95.बुद्धि सिंधु की बुद्धि परीक्षा, का
देवों ने किया विचार।
कितने योग्य कुशल बलधारी?
आज चले जो सागर पार किया।।
96.किया सिंधु यदि पार पवनसुत,
क्या वापस आ पाएंगे?
राक्षसपति रावण के योधा,
क्योंन इन्हें खा जाएंगे?
97.नाग जननि सुरसा को भेजा
वह भी आ पहुंची तत्काल।
हनुमत सम्मुख खड़ी हो गई
खोल लिया निज मुख विकराल।।
98.कहने लगी पवनसुत से
तुम आज बनो मेरा आहार।
देव गणों ने नियत किया है,
या विधान विधि के अनुसार।।
99.पवन तनय बोले हे माता!
राम काज हित जाता हूं।
सीता अनुसंधान बाद
फिर खुद ही वापस आता हूं।।
100.सिया कहां किस हाल रह रहीं,
मुझे पता यह करना है।
मुझे मृत्यु भय नहीं क्योंकि
इक दिवस सभी को मरना है।।
101.समाचार सीता मैया का
प्रभु को जाए सुनाऊंगा।
पुनः आपका भोजन बनने,
मैंवापस आ जाऊंगा।।
102.सुरसा बोली मैं भूखी हूं,
तुम्हें नहीं जाने दूंगी।
उदर पूर्ति के हेतु आज
बलिदान तुम्हारा मैं लूंगी।।
103.कहा पवनसुत ने सुरसा से
अच्छा तो फिर आ जाओ।
सम्मुख हूं मैं भोजन बनकर
हर्ष सहित तुम खा जाओ।।
104.सुरसा ने अपना भीषण मुख,
योजन भर तक फैलाया।
दो योजन का रूप
वीर बजरंगबली ने दिखलाया।।
105.सोलह योजन सुरसा-मुख तो
बत्तिस योजन के हनुमान।
सुरसा का मुख बढ़ता जाता,
ज्यों मानव मन का अभिमान।।
106.सौयोजन तक जब सुरसा ने
अपने मुख को फैलाया।
हनुमत ने तब धारण कर ली,
मच्छर सी लघुतम काया।।
107.सुरसा के मुख में प्रविष्ट हो,
बाहर खड़े हुए हनुमान।
बोले, उगला भोजन करने का
न नीति में कहीं विधान।।
108.मुख में घुसकर बाहर आया,
अब न रोकिए मेरी राह।
अब न मार्ग अवरोधक आवें,
कार्य सफलता की है चाह।।
109. सुरसा बोली पवन पुत्र तुम
साहस बुद्धि शक्ति की खान।
तुम्हें न कोई रोक सकेगा
तुम हो महाबली हनुमान।।
110.देव गणों को जो शंका थी,
तुमने किया उसे निर्मूल।
तीन लोक की बुद्धि शक्ति
हनुमत है तव चरणों की धूल।।
111.राम काज तुम पूर्ण करोगे
सुरसा देती शुभ आशीष।
जब दैवी आशीष मिला तो
फिर आगे बढ़ चले कपीश।।
112.सागर तल में बसी सिंहिका
छाया ग्राही कहलाती।
छाया से ही पकड़-पकड़ वह
जीव जंतु को खा जाती।।
113.जो भी पंछी या जल प्राणी
महा उदधि को करता पार।
छाया पकड़ करे निष्क्रिय तो
बन जाता वह जीव शिकार।।
114.हनुमत की छाया को पकड़ा
गति में जब आया अवरोध।
सोच रहे हनुमंत हृदय में
कैसा है यह नया विरोध।।
115.निशाचरी की माया देखी,
जल में उतर पड़े तत्काल।
छाया पकड़े खड़ी सिंहिका
जिसका था स्वरूप विकराल।।
116.मुष्टि-प्रहार किया हनुमत ने,
पहुंचाया उसको यमलोक।
सागरतल का विघ्न कटा,
जलचर भी सारे हुए विशोक।।
117.राम कृपा से मारुति नंदन
आ पहुंचे यों सागर पार।
स्वर्णमयी लंका थी अद्भुत
चारों ओर सिंधु विस्तार।।
118.रंग-बिरंगे पुष्प खिले थे
भ्रमर कर रहे थे गुंजार।
पक्षी चहक रहे बगिया में,
अति उन्नत भवनों के द्वार।।
119.पर्वत एक नजर आया तो,
उछल चढ़े उस पर तत्काल।
कोट-कंगूरों से सज्जित थी
लंका नगरी बड़ी विशाल।।
120.सागर उसका रक्षक बनकर,
चारों ओर लहरता था।
तीन लोक विजयी रावण का,
झंडा वहां फहरता था।।
श्री हनुमत-चरित्र -9 (सुंदरकांड आधार)
दिनांक- 15.5.21 शनिवार से आगे💐
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121.स्वर्णिम परकोटे दरवाजे,
दमक रहे थे चारों ओर।
उस अपार संपदा और,
वैभव का कोई ओर न छोर।।
122.अति विशाल लंका नगरी में,
गली-गली घूमे हनुमान।
एक-एक घर में जाकर,
सीता का करते अनुसंधान।।
123.खोज खोज कर थके तभी,
देखा एक मंदिर वहां विशेष।
राम नाम ध्वनि गूंज रही थी,
नहीं तमस का था लवलेश।।
124.विप्र-वेश में परिचय लेने,
पहुंच गए मंदिर के द्वार।
भक्त विभीषण का घर था,
जो रहते वहां नीति अनुसार।।
125.हनुमत सोच रहे थे
लंका,निपट राक्षसों का आवास।
इस नगरी में कैसे
कर सकता है कोई संत निवास।।
126.वेश विभीषण का संतों सा,
द्वार लिखा था जय श्री राम।
दोनों ने देखा तो झुक कर,
एक दूजे को किया प्रणाम।।
127.परिचय दिया विभीषण ने
मैं, हूं रावण का लघु भाई।
मेरे इष्ट देव हैं दशरथ नंदन
राघव रघुराई।
128.दाँतों बीच जीभ जैसा मैं,
जीवन यहां बिताता हूं।
घोर विरोधी निशाचरों के
मध्य, राम गुण गाता हूं।।
129.बोले हनुमत उन्हीं वीर
रघुनायक, का सेवक हनुमान।
लंका में आया हूं करने
सीता मां का अनुसंधान।।
130.दशरथ नंदन राम भद्र को,
चौदह बरस मिला बनवास।
भाई संग रह रहे बन में,
उन्हें नहीं वन का अभ्यास।
131.सूने गृह से मां सीता को
हर लाया है रावण क्रूर।
एक बार जो पता लगे तो,
इसको दंड मिले भरपूर।।
132.कहा विभीषण ने- मां सीता,
मन में लिए दरस की आस।
वन अशोक में दशमुख ने,
है बना रखा उनका आवास।।
133.कुटिल कुरूप राक्षसी उनको
घेरे रहती हैं दिन रैन।
डांट डपट करती हैं एवं
सदा बोलतीं कड़वे बैन।।
134.है अशोक वाटिका निकट ही,
जहां बिराजे सीता माता।
नीचे नयन,गिराती आंसू
गहरी श्वास और कृष गात।।
135.घेरे रहतीं निशाचरी गण
पल भी उन्हें नहीं विश्राम।
मुख से उच्चारित रहता है
जग पालक रघुवर का नाम ।।
136.हनुमत चले विदा लेकर
अब जा पहुंचे उपवन के बीच।
मां सीता को पीड़ित करने
तभी आ गया रावण नीच।
137.कहने लगा कि हे सीते तुम,
अगर मान लो मेरी बात।
सारे सुख चरणों में लोटें
जीवन बन जाए सौगात।।
138.कहा सिया ने ओ रावण सुन,
तू तो है जुगनू सा कीट ।
राम सूर्य हैं, प्रखर तेज को
सह न सके तू पापी ढीठ।।
139.रावण का अपमान हुआ तो
हत्या हेतु हुआ तैयार।
और गरज कर खड़ा हो गया
खींची चंद्रहास तलवार।।
140.पत्नी ने समझाया,नारी
सदा सदा को रहे अवध्य।
नीति धर्म के पंडित हो तुम
नीति खड़ी इस वध के मध्य।।
141.तब रावण ने वन अशोक में,
बढ़ा दिए कुछ पहरेदार।
जो रावण को प्रिय थे एवं
उसके जैसे रखे विचार।।
142.रावण लौट गया महलों को,
वृक्ष-खोह बैठे हनुमान।
सह न पा रहे सीता का दुख
पल पल बीते युगों समान।।
143.सीता का संकट देखा,
संकट मोचन को आया ध्यान।
यही समय है सीता मैया
सुने राम प्रभु का गुणगान।।
144.राम जन्म से सिया हरण तक,
सारी कथा सुनाते वीर।
सम्मुख आए नहीं सिया के
मच्छर जैसा रखा शरीर।।
145.राम कथा सुनकर सीता को,
हुआ भक्ति का भावावेश।
बोली सम्मुख आओ मेरे,
तुम हो कोई व्यक्ति विशेष।।
146.पीठ फेर कर बैठी सीता,
जब सम्मुख कूदे हनुमान।
निशाचरीमाया रावण की,
लगा रहीं सीता अनुमान।।
147.हे माता मैं रामदूत हूँ
नाम अंजनीसुत हनुमान।
प्रभु सेवा सर्वस्व समर्पित,
मेरी एक यही पहचान।।
148.दे कर यह मुद्रिका स्वयं
करुणानिधान ने कहलाया।
चिंता मुक्त रहो सीते
मैंने ना तुम्हें पल विसराया।।
149.एक बार जो खबर मिली तो
दलबल लेकर आऊंगा
रावण को परिवार सहित
मैं हरा तुम्हें ले जाऊंगा।।
150.हनुमत की लघु काया देखी
हुई सिया के मन शंका।
खड़े हुए हनुमान चरण तल में,
फैली स्वर्णिमलंका।।
151.मस्तक छूता स्वर्ग लोक को,
चरण पहुंचते थे पाताल।
रोम रोम में झूल रहे थे,
पर्वत मेरु समान विशाल।।
152.हनुमत की काया देखी तो,
सीता को आया विश्वास।
यह केवल कपि भालु न होंगे,
निश्चय ये हैं सबसे खास।।
153.हनुमत बोले- मैं हूं वानर,
जाति वंश कुल सबसे हीन।
केवल उछल कूद करता हूं,
ज्ञान बुद्धि बल से भी दीन।।
154.जो कुछ शक्ति नजर आती है,
वह है प्रभु का परम् प्रताप।
हमें नहीं कुछ करना होता,
सब होजाता अपने आप।।
155.प्रभु की कृपा दृष्टि होती तो
महा गरुड़ को खाता व्याल।
जिसके सिर पर हाथ राम का,
उसका क्या कर सकता काल?
156.माता भूख लगी है मुझको,
मधु फल लटकें चारों ओर।
अनुमति बिना लिए खाऊं तो
जग में कहलाऊंगा चोर।।
157.हो प्रसन्न उत्तम फल खाओ,
और मिटाओ खूब थकान।
समाचार शुभ ले कर आए,
तनय बने हो तुम हनुमान।।
158.क्या कौतुक करने वाले हैं,
नहीं किसी को था अनुमान।
ले आशीष सिया माता का,
वन में उतर पड़े हनुमान।।
159.भर किलकारी वृक्ष हिलाते,
गर्जन करते जय श्री राम।
जो रखवाले बने रुकावट,
किया वहीं पर काम तमाम।।
160.वन-विध्वंस हुआ तो रक्षक,
पहुँचे रावण के दरबार।
वानर आया अति बलशाली,
सही न जाती उसकी मार।।
161.वृक्षों उखाड़े बाग उजाड़ा,
रखवाले कर डाले ढेर।
पानी सिर तक चढ़ा आया है,
अब न तनिक भी करिए देर।
162.रावण गरज उठा गुस्से में,
रखवालों की सुनी गुहार।
पता लगाओ किस वानर ने,
भव्य वाटिका करी उजाड़।
163.पवन तनय को काबू करने,
बेटा भेजा अक्ष कुमार।
एक चपेट लगी तो सीधे,
जा पहुंचा यमपुर के द्वार।।
164.कुछ को नोचा कुछ को रगड़ा,
कुछ को दांतों से काटा।
कहीं लात और कहीं पूँछ,
तो किसी गाल पर था चांटा।।
165.शेष बचे सब घायल होकर,
चीख-चीख कर रहे पुकार।
यह कपि काबू नहीं हुआ तो,
हम न बचेंगे अबकी बार।।
166.सेना को व्याकुल देखा तो,
मेघनाथ को बुलवाया।
रण कौशल के संग उसे,
आता था छल बल और माया।।
167.मेघनाद के सँग मारुति का,
युद्ध विलक्षण और घनघोर।
एक तरफ बजरंग अकेले,
पूर्ण कटक था दूजी ओर।।
168.सम्मुख रण में लगा हारने,
उसने लिया कपट का साथ।
ब्रह्म-अस्त्र को देख मरुतनंदन ने
रण से खींचा हाथ।।
169.ब्रह्मा के आदर में हनुमत
खड़े हुए दोनों कर जोड़।
पाशबद्ध हो गए सहज ही,
नहीं त्रिलोकी में था जोड़।।
170.इंद्रजीत हनुमत को लेकर,
पहुंचा रावण के दरबार।
कैसा वानर है? कौतूहल
सबके मन में भरा अपार।।
171.रावण का दरबार भव्य था,
बड़ा अनोखा उसका ठाट।
इंद्र वरुण और काल अग्नि भी,
खड़े जोहते उसकी बाट।।
172.राम नाम के बल से हनुमत की
आंखें करती विद्रोह।
आन बान और शान, दशानन की
देखी तो हुआ न मोह।।
173.पवन तनय को बंधा हुआ लख,
करने लगी सभा उपहास।
पुत्र निधन को याद किया तो
गर्म हुई रावण की श्वास।।
174.कौन?कहां से आया है तू?
किस के बल पर किया विनाश?
मुझे जानता नहीं कदाचित,
मन में हुआ किंचित त्रास??
175.क्यों उजाड़ दी तूने बगिया?
रख वालों को क्यों मारा?
है कितना निःशंक, क्या तुझे
जीवन नहीं रहा प्यारा??
176.रावण सुन इस सकल सृष्टि के
जो श्री हरि संचालक हैं।
निर्माता जग-पालक एवं
कालरूप संहारक हैं।।
177.जिनके बल से शेषनाग,
धरती को धारण करते हैं।
जिनका पा संकेत कार्य सब
बनते और बिगड़ते हैं।।
178.संचालन चर-अचर जगत का,
करती है जिनकी माया।
उनकी कृपा शक्ति का मैंने
खेल जरा सा दिखलाया।।
179.मैं वानर जब फ़ल खाता हूं,
पेड़ उजड़ ही जाता है।
वह निश्चय पिटता है जो,
भोजन के आड़े आता है।।
180.जिसने पहले मुझको मारा,
मैंने भी उसको मारा।
मैंने अपनी जान बचाई,
तुम कहते हो संहारा।।
181.बंधने का संकोच न मुझको,
मैं तो हूं राघव का दास।
तुम सब नष्ट न होने पाओ,
मेरा केवल यही प्रयास।।
182.हे रावण ! तुम मन से त्यागो
अपनी कटुता और अभिमान।
धीर, वीर,बलवान आप हो
चारों वेदों के विद्वान।।
183.हाथ जोड़ विनती करता हूं,
मेरा कहा मान लो आप ।
ऋषि पुलस्त्य के उत्तम कुल का
क्यों बनते हो तुम अभिशाप??
184.एक बार तुम हाथ जोड़कर
शरण राम की आ जाओ।
सब अपराध क्षमा होंगे, तुम
जीवन का फल पा जाओ।।
185.राम सिया के मिलने में तुम
अब न बनो किंचित बाधक।
वो शिव भी श्री राम भक्त हैं
तुम जिनके हो आराधक।।
186.दोष तुम्हारा, लेकिन
लंका वासी मारे जाएंगे।
अहंकार की बलिवेदी पर,
अपने प्राण गँवाएँगे।।
187.इनके प्राण बचाना भी
पहला कर्तव्य तुम्हारा है।
चाहे यहआश्रित हैं, लेकिन
जीवन सबको प्यारा है।।
188.जब हनुमत ने कहा की रावण,
शरण राम की आओ तुम।
परब्रह्म परमेश शरण ले कर,
निर्भय हो जाओ तुम
189.रावण क्रोधित हो कर बोला,
तू है बुद्धिहीन वानर।
मैं त्रैलोक्यजयी रावण हूँ,
मुझे लगेगा किससे डर ??
190.मृत्यु कभी भी निकट न आये,
मुझको मिला ब्रह्म-वरदान।
तू तो सेवक-धर्म निभाता,
करके स्वामी का गुण-गान।।
191. उसका संदेशा लाया है,
मेरा संदेशा ले जा।
लंका का दल बल लखने को,
ही उसने तुझको भेजा।।
192.अब तेरे ही हाथों अपनी,
शक्ति उसे दिखलाऊंगा।
तुझे पूंछ प्यारी है? ले,
मैं तेरी 'पूंछ' जलाऊंगा।।
193.वध न दूत का करते, ऐसा
नीति हमें बतलाती है।
वही नीति निज शक्ति दिखाने की,
भी राह सुझाती है।।
194.बिना पूंछ के,तू जब जाकर,
अपनी शक्ल दिखाएगा।
शक्ति और सामर्थ्य हमारा,
तू उसको बतलाएगा।।
195.तेरी हालत देख तपस्वी,
निश्चय ही डर जाएंगे।
बिना लड़े ही भय-कातर हो,
वो वापस हो जाएंगे।।
196.सभी निशाचर इस वानर को,
अभी पकड़ कर ले जाओ।
नगर घुमाओ धूम मचाओ,
और अपना मन बहलाओ।।
197.घुमा फिरा कर खेलकूद कर,
वापस इसको ले आना।
पूंछ जला कर तुम इसको,
लंका से बाहर कर आना।।
198.पर-पीड़क उन असुरगणों को,
जब मनचाही मिली मुराद।
'एक तमाशा होगा' लंका में,
चहुँ-दिशि फैला संवाद।।
199.रस्सी कपड़ा रेशम डोरी,
पाया जिस ने जो भी हाथ।
निज-विनाश के महायज्ञ में,
चला सभी को लेकर साथ।।
200.खेल समझ कर बच्चे बूढ़े,
हनुमत को दौडाते थे।
आगत का विचार कर हनुमत,
मन ही मन मुस्काते थे।।
201.था भविष्य का ज्ञान किसे,
अब प्रलय कौन सी आएगी।
अब जो होगा,उसको लंका,
कभी भुला ना पाएगी।।
202.असुर बेखबर थे विनाश से,
कोलाहल था चारों ओर।
युवक मारते थे पत्थर, तो
बच्चे भी करते थे शोर।।
203.कपड़ा रूई टाट-पटम्बर,
कम पड़ता था,पूंछ विशाल।
किंतु निशाचर आग लगाने,
हेतु दौड़ते थे बेहाल।।
204.लंका का सारा कपड़ा घृत,
तेल, पूंछ पर चिपका कर।
आग लगा कर उछल रहे थे,
लंका के सारे निशिचर।।
205.मारुति ने देखा,पावक ने किया
पूंछ पर अब अधिकार।
धीरे-धीरे पूंछ ले रही,
इंद्रधनुष जैसा विस्तार।।
206.ज्यों बिजली की लपट भूमि पर,
आकर के लहराती हो।
या लंका नगरी के ऊपर
मृत्यु ध्वजा फहराती हो।।
207.झटका देकर तभी पवनसुत,
खड़े हुए कंगूरे पर।
अप्रत्याशित कर्म देखकर,
असुर गणों में फैला डर।।
208.परकोटे भंडार द्वार,
पशुशाला या ऊंची दीवार।
मारुति की प्रलयंकर काया देख,
मच रहा हाहाकार।।
209.चारों ओर अग्नि की ज्वाला,
फैली प्रलयंकर विकराल।
नर नारी आबाल-वृद्ध सब
भाग रहे, होकर बेहाल।।
210.सारी लंका दहक रही थी,
फैली दावानल सी आग।
शस्त्रागार कोष गलियां घर,
भभक रहे थे उपवन-बाग।।
211.लंका दहन किया मारुति ने,
दिया दशानन को संदेश।
वह तब तक ही बचा हुआ है,
जब तक नहीं राम आदेश।।
212.लंका जलकर राख हुई,
पर बचे रह गए दो स्थान।
एक विभीषण का घर,
दूजा,सुंदर अशोक वन उद्यान।।
213.सागर जल से पूंछ बुझाकर,
आज्ञा ले मां सीता से।
वापस चले दशानन को
भय देकर अपनी प्रतिभा से।।
214.सागर तट पर खड़ा
प्रतीक्षा करता उत्सुक वानर दल।
उन निराश वानर वीरों का,
हनुमत एकमात्र थे बल।।
215.देखा,जब हनुमान आ रहे,
लगा उछलने वानर टोल।
इतने दिन से मूक खड़े थे,
फूट पड़े उत्साहित बोल।।
216.जामवंत अंगद भी करते,
पवन तनय की जय-जय कार।
सीता की सुधि ला कर, सबका
किया राज-भय से निस्तार।
217.कपि-राजा के मधुबन के
फल खाए वन भी किया उजाड़।
कार्य-सिद्धि का गर्व भरा था,
उनको सकता कौन लताड़।।
218.आंजनेय को आगे करके,
सब पहुंचे रघुवर के पास।
विरह व्यथा से राम खिन्न थे,
लक्ष्मण भी थे खड़े उदास।।
219.जामवंत बोले रघुवर से,
दया आप कर दें जिस पर।
दुर्गम पथ भी सुगम सरल हो,
कार्य सिद्ध होते सत्वर।।
220.वरद हस्त सिर पर प्रभु का हो,
कार्य न कोई रहे असिद्ध।
कृपा राम की होती जिस पर,
वह होता है जगत प्रसिद्ध।।
221.हे प्रभु! जो है दास आपका,
तीन लोक में उसे न भय।
देव दनुज मानव पशु सबसे,
निर्भय रहता वह निश्चय।।
222.वही विजय हासिल करता है,
विनयशीलता सदा सजीव।
हाथ कृपा का हटे शीश से,
होता तेजहीन निर्जीव।।
223.कृपा आपकी, पवन तनय का,
चरणों में था दृढ़-विश्वास।
इस कारण ही कार्य-सिद्धि कर,
हमें सब खड़े आपके पास।।
224.हनुमत का जो सुना पराक्रम,
रघुवर के मन को भाया।
सीता मां कैसे रहती हैं,
रामभद्र को बतलाया।
225.मन रहता तल्लीन मातु का
प्रभु, तव-चरणों में दिन-रात।
दीर्घ श्वास लेतीं, होती नयनों से,
आंसू की बरसात।।
226.अपनी यह चूड़ामणि देकर,
कहा आपसे यह संदेश।
एक-एक पल युग जैसा है,
प्रभु मुझको है कष्ट विशेष।।
227.दीनबंधु हे प्रणतपाल प्रभु,
तुम हो शरणागत वत्सल।
सह न सकूंगी यह वियोग,
प्रभु मेरी प्रीति सत्य निश्चल।।
228.राम विरह की अग्नि प्रज्ज्वलित,
यह काया रुई का ढेर।
अश्रु-धार से बची रही यह,
किंतु नाथ अब करो ना देर।।
229.करुणामय अब समय नहीं है,
अब प्रयाण करिए तत्काल।
दुष्ट दलन के लिए चलें अब,
बन कर उस दशमुख का काल।।
230.प्रभु बोले- "मन वचन कर्म से,
मुझे मानते जो आश्रय।
मैं ही हूं जिन की अंतिम गति,
उन्हें जगत में कैसा भय??"
231.हनुमत बोले-"विपद वही है,
याद ना आए जब हरिनाम।
राक्षस गण क्या कर पाएंगे?
सिया जीत लाएंगे राम।।
232.राघव बोले-"हे प्रिय हनुमत!
मुझ पर किए कोटि उपकार।
सदा ऋणी हूं पुत्र तुम्हारा,
चुका न पाऊं यह ऋण भार।।
233.कैसे लंका दुर्ग जलाया,
मुझे बताओ तो, हनुमान।
रावण की संपदा शक्ति का,
कैसे लगा तुम्हें अनुमान।।"
234.हनुमत बोले- "उछल कूद ही,
वानर का है अंतिम बल।
किंतु आपकी कृपा, कठिनताको भी
करती परम सरल।।
235.राक्षस वध, वाटिका उजाड़ी,
ध्वस्त हुई स्वर्णिम लंका।
प्रभु वहथी बस कृपा आपकी,
इसमें जरा नहीं शंका।।
236.जिस पर कृपा आपकी हो तो,
अनहोनी वह कर जाए।
बड़वानल की अग्नि स्वयं ही,
एक सूत से जल जाए।।
237.वानर दल था अतिप्रसन्न,
हो रही राम की जय जयकार।
तब कपीश से कहा राम ने,
अब चलने का करें विचार।।
238.वानर दल उत्साह भरे हैं,
इनको अनुमति दें तत्काल।
रावण के दिन, गिने जा चुके,
उसे बुलाता, उसका काल।।
239.कपि स्वामी सुग्रीव राज का,
दूर तलक पहुंचा संदेश।
वानर-दल चल पड़े उछलते,
भिन्न-भिन्न बल रखें विशेष।।
240.रघुपति के चरणो में सारे,
कपि यूथों ने किया प्रणाम।
दृष्टि पड़ी रघुवर की,
सारी कपि-दल ने पाया विश्राम।।
241.राम कृपा से वानर गण भी,
हुए पंख-युत पर्वतराज।
हर्षित हो श्री राम चले,
उभरे शकुनों के सरताज।।
242.सीता को शुभ शकुन हुए तो,
सीता का मन हरषाया।
रावण को अपशकुन बने,
वह दशमुख मन में अकुलाया।।
243.दाँत और नाखून रीछ-वानर के,
सबसे प्रिय हथियार।
सिंह गर्जना करते हैं कपि,
जय जय जय श्री राम पुकार।।
244.दिक्पालों ने भी भय पाया,
कोलाहल से हो चंचल।
राम शक्ति सज्जित होकर,
निकल पड़ा है रामा दल।।
245.सागर तट तक सब आ पहुंचे,
बिखर गया फिर वानर-दल।।
कुछ करते विश्राम वृक्ष पर,
कुछ खाते थे मीठे फल।।
246.लंका में भी डरे हुए सब,
अपने घर में करें विचार।
किसी तरह पहले बच पाए,
पर न बचेंगे अबकी बार।।
247.दूत एक आया था, जिसने
यह विध्वंस मचाया है।
अब आगे क्या होगा!अब तो,
मालिक खुद चढ़ आया है।।
248.मंदोदरी हुई व्याकुल,
जब उन तक पहुंचा यह संदेश।
रावण के अभिमानी मन को,
वह समझाने लगी विशेष।।
249.राघव से शत्रुता न पालें,
वह हैं श्री नारायण रूप।
सीता लौटा दें उनको,
अन्यथा मृत्यु का दिखे स्वरूप।।
250.ज्यों जाड़े की रात,
कमल-वन कर देती पूर्ण विनाश।
इसी तरह सीता कर देगी,
राक्षस कुल का सत्यानाश।।
251.जैसे सर्पों के समक्ष,
मेंढक हो जाते हैं बेबस।
उसी तरह से रामबाण पर,
नहीं किसी का होगा वश।।
252.एक दूत हनुमत से,
लंका ने देखी अपनी औकात।
सारा रामा दल आया तो,
कितनी काली होगी रात।।
253.रावण हंसकर, अहंकार से
बोला तब करके उपहास।
सत्य कहा है- साहस एवं,
बुद्धि नहीं नारी के पास।।
254.वानर तो हम सबका भोजन,
वह लंका में आएंगे।
भूखे तड़प रहे हैं निशिचर,
दो पल में खा जाएंगे।।
255.सभा भवन में बैठा रावण,
समाचार उसने पाया।
सागर के उस पार,
राम वानर-दल लेकर चढ़ आया।।
256.सचिवों से मांगी सलाह तो
बोले-"इसमें करना क्या?
तीन लोक के जयी वीर को
नर-वानर से डरना क्या।।"
257.मंत्री गुरु और वैद्य अगर
मनचाही बात बताते हैं।
राज्य धर्म और कायाको,
निश्चय हानि पहुंचाते हैं।।
258.रावण के सारे सचिवों ने
यही राह अपनाई थी।
चापलूस थे सिर पर,
सच की कहीं नहीं सुनवाई थी ।।
259.तभी विभीषण ने आकर,
अपने अग्रज को किया प्रणाम।
अति विनम्र होकर बोले वे,
रावणके चरणोंको थाम।।
260. हेभ्राता! यदि आप मुझे दें,
चर्चा करने का आदेश।
अल्प बुद्धि है मेरी,फिर भी
परामर्श यह सुनें विशेष।।
261.यदि हम चाह रहे हों, भाई!
सदा सदा अपना कल्याण।
शांत हृदय विश्वास स्वयं पर,
एवं अंतिम पद निर्वाण।।
262.तो परनारी के चेहरे का,
सच्चे मन से कर दें त्याग।
चौथ चंद्रमा जैसी पर-तिय,
किस्मत में भर देती आग।।
263.तीन लोक का मालिक भी,
यदि प्राणिमात्र से करता वैर।
सर्वनाश हो जाता इक दिन,
उसकी कहीं न दिखती खैर।।
264.काम क्रोध मद लोभ,
चार दुर्गुण यह सदा नरक के द्वार।
इन्हें त्याग, श्री राम चरण-
भजने में ही सबका उद्धार।।
265.अवध नाथ श्रीराम,
नहीं साधारण मानव या भूपाल।
त्रिभुवन के स्वामी श्री हरि हैं,
पूर्ण ब्रह्म,कालों के काल।।
266.गो-ब्राह्मण प्रतिपालक प्रभु ने,
संतों पर उपकार किया।
दुष्ट-नाश, सज्जन रक्षण हित,
मानव का अवतार लिया।।
267.शरणागत की रक्षा करते,
कृपासिंधु राघव रघुनाथ।
सीता लौटा कर रघुवर के,
चरणों में रख दें निज माथ।।
268.विश्व-द्रोह का पाप लगा हो,
घृणा करे जिससे संसार।
सर्वेश्वर श्री राम उसे भी,
अपना कर,करते उद्धार।।
269. हे अग्रज! मैं बार बार
करता हूँ चरणों में वंदन।
अहंकार को त्याग , करो
श्री रामभद्र का आराधन।।
270.ऋषि पुलस्त्य ने भ्राता तुमको,
भेजा यह उत्तम संदेश।
रक्षक बनो आज लंका के,
त्यागो काम क्रोध आवेश।।
271.सुनी विभीषण की वाणी तो,
गरज उठा रावण तत्काल।
शत्रु पक्ष की करे प्रशंसा,
इसे यहां से रखो निकाल।
272.सहम गए सारे दरबारी,
किंतु विभीषण नहीं डरे।
हाथ जोड़ रावण से विनती,
करने लगे वही ठहरे।।
273.सद और असद्बुद्धि तो सबके,
मन में करती सदा निवास।
किंतु उचित का सत्य कराता
बोध,हृदय को दे आभास।।
274.सद बुद्धि को मिले सम्पदा,
असद झेलता कष्ट अपार।
आज आपके मन चिंतन में,
इसी असद का है विस्तार।।
275.चरण पकड़ बैठा हूँ भाई,
करते हो यदि मुझसे प्यार।
सीता रघुवर को लौटा दो,
भैया,मन में बनो उदार।।
276.बार बार जब कहा,विभीषण ने,
सीता का करिये त्याग।
तब रावण के मन में सहसा,
भड़की प्रबल क्रोध की आग।।
277.अंधा होकर क्रोध-अग्नि में,
कर बैठा भाई से घात।
सरल हृदय निर्दोष विभीषण के,
सीने में मारी लात।।
278.यद्यपि रावण ने भाई का,
किया सभा में घोर अपमान।
किंतु विभीषण ने भाई का,
अंतिम पल तक रक्खा मान।।
279.भक्त विभीषण अपमानित हो,
जा पहुंचे श्री राम शरण।
भाई का अपमान किया,
तब से श्री-हीन हुआ रावण।।
280.लंका से चल पड़े विभीषण,
मन में करते यही विचार।
मैं रावण का भाई हूं,
क्या मुझे करेंगे प्रभु स्वीकार?
281.जिन चरणों की रज को पाकर,
हुआ अहिल्या का उद्धार।
क्या पावन चरणों का दर्शन,
कर पाऊंगा अब की बार?
282.इसी तरह से अपने मन में,
भांति-भांति के लिए विचार।
भक्त विभीषण अश्रु बहाते,
आ पहुंचे सागर के पार।।
283.लगे सोचने वानर,
क्या रावणने भेजे हैं यह दूत।
नहीं भरोसे के लायक, ये
आखिर हैं राक्षस के पूत।।
284.तब बोले कपिराज,
इन्हें ले चलो अभी रघुपति के पास।
निर्णय देंगे वही उचित,
हम सबको है इसका विश्वास।।
285.कहन लगे सुग्रीव राम से,
प्रभु सुनिए मेरी यह बात।
यह रावण का भाई है,
जो करने आया हमसे घात।।
286.महाबली मायावी होती,
दुष्ट निशाचर की यह जात।
इन्हें बांध कर रखना अच्छा
चाहे कितना हो प्रणिपात।।
287.कृपासिंधु श्रीराम मुस्कुरा कर
बोले यह वचन प्रमाण।
मेरा प्रण शरणागत रक्षा,
चाहे इसमें जाएं प्राण।।
288.प्रभु के वचन सुने हनुमत ने,
मन में करने लगे विचार।
धन्य राम राघव जो करते,
पितु सम,निजभक्तों से प्यार ।।
289.कहते हैं श्रीराम- व्यक्ति,
जो करके निज अनहित अनुमान।
शरणागत का त्याग करे,
उसके दर्शन का नहीं विधान।
290.कोटि ब्रह्म हत्याओं का भी,
जिसके शीश चढ़ा हो पाप।
मेरे सम्मुख होते ही,
हो जाता वह निश्छल निष्पाप।।
291.जिसके मन में कपट भरा,
उसको न सुहाता ईश चरित्र।
दुष्ट भाव से भरा हुआ,
कैसे मुझ तक आएगा?मित्र!
292.केवल निर्मल मन वाला ही,
मेरे दर्शन पाता है।
कपट दंभ छल छिद्र युक्त मन,
मुझको तनिक न भाता है।।
293.अगर भेद लेने भी आया,
हानि नहीं कर पाएगा।
जग के सारे असुरों को,
लक्ष्मण ही मार गिराएगा।।
294.यदि भयभीत शरण आया है,
सहज उसे अपनाउँगा।
मित्र बनाकर उसे,स्वयं के
प्राण समान बचाऊंगा।।
295.प्रभु की अनुमति पाकर,
लेने जा पहुंचे अंगद हनुमान।
अंगद थे अनजान किंतु,
हनुमत से थी पिछली पहचान।।
296.आगे-आगे चले विभीषण,
पीछे दोनों वानर वीर।
अश्रु-बिंदु झर रहे विभीषण,
राम दरस को बड़े अधीर।।
297.राम लखन को देखा,
उन्नत मस्तक एवं भुजा विशाल।
कमलनयन के दर्शन पाकर,
भक्त विभीषण हुए निहाल।।
298.ठहरे से रह गए नयन,
वाणी भी उनकी थी अवरुद्ध।
कौन मूढ़? रह पाएगा,
शोभा-सागर से कभी विरुद्ध।।
299.श्यामल काया,रूप सलोना,
सिंह-कंध और उन्नत वक्ष।
कामदेव का मनमोहित हो
देखा ऐसा रूप अलक्ष्य।।
300.हाथ जोड़कर खड़े विभीषण
मेरा कलुषित निशिचर वंश।
कैसे? क्यों?क्या कहूं?आपसे,
आप ब्रह्म नारायण अंश।।
301.जैसे उल्लू को होता है,
अंधकार से अनुपम प्यार।
राक्षस कुल की तामस काया,
एक आप अंतिम निस्तार।।
302.सुयश भक्तवत्सलता का है,
सुनकर ही में आया आज।
चरणों में ही पड़ा रहूंगा,
न हों आप शंकित नाराज।।
303.राघव ने देखा कि विभीषण,
चरणों में है पड़े हुए।
लक्ष्मण को सँग में लेकर,
श्री रामभद्र उठ खड़े हुए।।
304.कैसे हो लंकेश? तथा
कैसा है लंका में परिवार?
कहा विभीषण ने- प्रभु मेरा
जीवन दोधारी तलवार।
305.दुष्ट मंडली सदा हमारे,
चारों ओर करे नर्तन।
ऐसे में दुष्कर हो जाता,
प्रभु चरणों का आराधन।
306.कोटि जन्म तक नरकानल में,
चाहे हमें जलाया जाय।
किंतु विधाता हमें दुष्ट का,
मुख फिर कभी नहीं दिखलाय।। (छं.परि.)
307.जब तक विषय वासना में मन,
तब तक कहां मिले विश्राम।
शांति तभी मिल पाती है जब,
मन में बसे हुए हों राम।।
308.लोभ मोह मद मत्सर, केवल
तब तक मन को करते भ्रांत।
जब तक प्रभु का रूप ह्रदय में,
आकर उसको करे न शांत।।
309.राग द्वेष के उल्लू,
ममता-निशा मध्य,सुख पाते हैं।
प्रभु का कृपा सूर्य उगता,तब
सहज नष्ट हो जाते हैं।।
310.चरण कमल के दर्शन पाकर
मेरा जीवन हुआ सफल।
कृपासिंधु जब करें कृपा तो
होते तीनों काल कुशल।।
311.अदम अदम स्वभाव निशाचर हूं,
मैं कभी भला नहीं कर पाया।
अगम अगोचर प्रभु ने मुझ को
सहज भाव से अपनाया।।
312.शिव बिरंचि ऋषि मुनि से सेवित
जो हैं पावन चरणकमल।
धन्य भाग्य उनको छू पाया,
मुझसा कुटिल असुर चंचल।।
313.सुनो विभीषण बतलाता हूं,
जो है मेरा सहज स्वभाव।
काग भुसुंडि शिवा और शिव भी,
जानें मेरे मन का भाव।।
314. द्रोह चराचर का करके भी,
सभय शरण जो आता है।
उसको मैं अपना लेता हूं,
वह निर्भय हो जाता है।।
315.घर परिवार मोह ममता के,
धागों की डोरी बँटकर।
मेरे चरणों से जुड़ जाता,
जग संबंधों से हटकर।।
316.इच्छाओं से मुक्त तथा
समदर्शी है जिसका जीवन।
मेरे मन में बस जाता वह,
ज्यों लोभी के मन में धन।
317.तुम जैसों के लिए सदा ही,
धारण करता हूं काया।
जो है मुझ पर पूर्ण समर्पित,
उन्हें नहीं व्यापे माया।।
318.हे लंकेश आपके मन में,
बसे हुए गुण सारे हैं।
इस कारण प्राणों से भी,
बढ़कर प्रिय आप हमारे हैं।।
319.राघव ने वचनों का अमृत,
बार-बार जब बरसाया।
भक्त विभीषण संग,वहां का
वानर दल भी हरषाया।।
320.कहा विभीषण ने,प्रभु मेरे
मन में दूषित काई थी।
मेरी भाव भक्ति में वह
अवरोधक और दुखदाई थी।।
321.राम प्रेम की जलधारा ने
इसको आज बहाया है।
मोह-वासना नष्ट हुई,
मैंने अनुपम सुख पाया है।।
322.परम भक्ति का दान दिया,
फिर प्रभु ने मांगा सागर जल।
किया राज्य अभिषेक
विभीषण को दे डाला राज्य अचल।।
323.रावण के क्रोधानल से जो,
कभी न था बचने वाला।
उसी विभीषण को लंका का,
राज्य, राम ने दे डाला।।
324.जो धन पाने हेतु शंभु पर
दस-दस शीश चढाए थे।
घोर तपस्या करके रावण
जिस धन को ले पाए थे।।
325.राघव ने संपदा, विभीषण को
दे दी वह सकुचा कर।
सारे भय से मुक्त किया
उस शरणागत को अपनाकर।।
326.ऐसे करुणानिधि को तज
दूजों को शीश झुकाता है।
ऐसा मानव सींग-पूंछ बिन भी,
पशु ही कहलाता है।।
327.प्रभु ने दिया विभीषण को
निज सेवक के जैसा सम्मान।
वानर दल उत्साहित बोला,
जय जय हे प्रभु कृपा निधान।।
328.सर्वरूप सर्वेश्वर बोले
नीतिवचन अवसर अनुसार।
हे कपीश! लंकेश!बताओ,
कैसे हो यह सागर पार??
u329.जीव जंतु से भरा भयानक
जलसमूह यह उदधि अपार।
इस अथाह सागर को हम सब,
किस विधि कर पाएंगे पार।।
330.कहा विभीषण ने- रघुनायक!
कैसी करी आपने बात।
कोटि उदधि को सुखा डालता,
प्रभु के सायक का आघात।।
331.आप अगर चाहें तो सागर,
पल भर में दे देगा राह।
एक दृष्टि हो वक्र, सिंधु का-
रुक जाएगा प्रबल प्रवाह।।
332.यद्यपि है सामर्थ्य आपमें,
किंतु नीति का यह आदेश।
पहले सागर से ही पथ मांगे,
करके प्रार्थना विशेष।।
333.रघुकुल के गुरु हैं सागर,
वह उचित उपाय बताएंगे।
वानर भालू इस संकट से,
सहज पारहो जाएंगे।।
334.मित्र आपकी बात बात उचित है,
अगर भाग्य का होगा साथ।
सारे काम सहज होंगे,
यदि रखें विधाता सिर पर हाथ।।
335.राघव के मृदु वचन सुने, (तो)
लक्ष्मण के मुख का बदला रंग।
बोले- "भाग्य भरोसे रहना,
यह तो है कायर का ढंग।।"
336.नाम विधाता का लेना,
है कायर के मन का आधार।
सुखा डालिए सागर को,
पल भर में सेना होगी पार।।
337.धैर्य रखो प्रिय अनुज
कार्य सब होंगे,नीति नियम अनुसार।
ऐसा कह कर कुशा बिछाकर,
बैठे राम सिंधु के द्वार।।
338.यहां दशानन गृह में जब से,
गए विभीषण घर को त्याग।
स्वर्णमयी वैभव-नगरी का,
उजड़ा सुख संपति सौभाग्य।।
339.रावण ने दो गुप्तचरों को,
भेजा था राघव दल में।
भेद ले रहे थे,सेना कैसी है?
शक्ति सैन्य बल में।।
340.करुणामय राघव की लीला,
देखी,भूले अपना भान।
खुलकर करने लगे प्रशंसा,
जय श्री रामचंद्र भगवान।।
341.गाने लगे राम का गुण तो,
कपट वेश कर डाला भंग।
निशाचरी माया छूटी,
जब मिला संत जन का सत्संग।।
342.शत्रु पक्ष का दूत देखकर,
वानर करने लगे किलोल।
बांध लिया,राजा के सन्मुख,
लेकर चले,बजाते ढोल।।
343. सूर्य-तनय सुग्रीव राज ने,
दिया वानरों को आदेश।
अंग भंग कर इन दोनों को,
वापस भेजो इनके देश।।
344.छूट मिली राजा से,फिर तो,
हुए कौतुकी वानर वीर।
तरह तरह से लगे पीटने,
राक्षस तब हो गए अधीर।।
345.कोई चांटे मार रहा, तो
कोई खुरच रहा था पीठ।
कुछ थे झपट रहे चेहरे,पर
पा कर शक्ति हो गए ढीठ।।
346.राघव की दे रहे दुहाई,
खूब कर रहे जय जयकार।
किंतु न काबू आते वानर,
करते उछल-उछल कर वार।
347.नाक कान जो काटेगा
उसको है रामचंद्र की आन,
हम तो केवल दूत, हमारे लिए-
न कोई दंड विधान।।
348.तब लक्ष्मण ने दया द्रवित हो,
उन्हें बुलाया अपने पास।
कहा, कि निज स्वामी रावण को,
देना यह संदेशा खास।।
349. हे कुलघातक मूढ़ दशानन!
लक्ष्मण का संदेश सुनो।
कोई भी निर्णय लेना, पर
उससे पहले इसे गुनो।।
350.मौखिक ही कह देना उससे,
जाकर,यह मेरा संदेश।
सीता को दो त्याग, अन्यथा
संकट सिर पर खड़ा विशेष।।
351.लक्ष्मण के चरणों में नत हो,
करके राघव का गुणगान।
दूतों ने संदेशा लेकर,
लंका हेतु किया प्रस्थान।।
352.मन-चिंतन में राम बसे थे,
मुख में बसा राम का नाम।
रावण के चरणों में जाकर,
शुक-सारण ने किया प्रणाम।।
353.कहा दशानन ने हंसकर-
शुक! अपनी कुशल बताओ तुम।
लंका में हो पूर्ण सुरक्षित,
किंचित मत घबराओ तुम।
354.कुलघाती उस मूढ़ विभीषण का,
मुझको बतलाओ हाल।
आज अचानक आ बैठा है,
जिसके सिर पर काल कराल।।
355.लंका में शासन करता था,
बना तपस्वी का अब दास।
उसके साथ अकारण होगा,
इसके भी जीवन का नाश।।
356.कपि सेना का हाल बताओ,
जिसकी शक्ति बताई है।
काल प्रेरणा से जो मरने,
सागर तट पर आई है।।
357.जब तक सागर पार खड़े हैं,
तब तक हैं रक्षित मुझसे।
महा सिंधु ने बचा रखा है,
उन सब को मेरे भय से।।
358.कथा बताओ तपस्वियों की,
जो मुझसे भय खाते हैं।
रीछ वानरों के घेरे में,
अपने प्राण बचाते हैं।।
359.मेरा यश वैभव सुनकर
क्या वापस लौट गए डर कर?
शत्रु शक्ति कैसी?कितनी है?
हे शुक! इसका वर्णन कर।।
360.शुक ने कहा-क्रोध को तज कर,
मेरा कहा मानिए नाथ।
जाकर जैसे मिले विभीषण,
सारी कथा जानिए नाथ।।
361.भ्राता जाकर मिले राम से,
लंका राज दिया तत्काल।
वानर दल ने दूत जानकर,
हमको किया बहुत बेहाल
362.नाक कान वह काट रहे थे,
हमने दी रघुवर की आन।
लखनलाल ने बुला लिया,
तब जाकर बच पाई थी जान।।
363.राम-सैन्य वर्णन कर पाऊं,
मुझ में कब इतनी सामर्थ्य।
कोटि-कोटि संख्या बल उनका,
अंको की हर सीमा व्यर्थ।।
364.विकट वेश काया विशाल है,
भाँति भाँति के उनके रंग।
युद्ध हेतु तत्पर रहते हैं,
मन में रखते सदा उचंग।।
365.पुत्र आपका मारा,
एवं नगर जलाया जिसने घोर।
वह वानर तो सारे दल में,
सबसे ज्यादा है कमजोर।।
366.द्विविद,मयंद,नील,नल,अंगद
दधिमुख परम यशस्वी नाम।
निशठ, केसरी औ कपीश संग,
जामवंत से बल के धाम।।
367.शक्ति शौर्य बल विक्रम में,
सारे कपि हैं सुग्रीव समान।
अतुलित बलशाली हैं
सबको राम कृपा का है वरदान।।
368.तीन लोक तिनके समान हैं,
ऐसी इनके बल की धार।
पद्म अठारह सेनानायक,
गणना इसकी परम अपार।।
369.हर वानर अतुलित बल धारी,
जो तुमको दे सकता मात।
बड़े क्रोध में दांत पीसते,
और भींचते अपने हाथ।।
370.रामाज्ञा पावें तो वानर,
सागर शोषित कर डालें।
बड़े-बड़े पर्वत खंडों से,
सारा जलनिधि भर डालें।।
371.वानर कहते-रावण को,
मिट्टी में आज मिला देंगे।
यों लगता है ये लंका की,
नीवें आज हिला देंगे।।
372.शूरवीर हैं ही, उस पर-
फिर मिला राम का शुभ-आशीष।
कोटि काल को, पल में जीतें,
ऐसे ये बलवीर कपीश।।
373.तेज बुद्धि बल श्री राघव का,
शेष सहस्त्र न पावें पार।
एक बाण से सिंधु सुखा दें,
पर बैठे सागर के द्वार।।
374.मार्ग विभीषण ने दिखलाया,
सागर से पथ मांग रहे।
करते हैं प्रार्थना सिंधु से,
तीन रात से जाग रहे।।
375.शुक से समाचार सुन रावण,
करने लगा खूब उपहास।
इस कारण कपि सचिव बनाए,
बुद्धि न किंचित इनके पास।।
376.सदा सदा का कायर है जो,
उसका मत करके स्वीकार।
सागर से जिद ठानी, उसकी
असत प्रशंसा है बेकार।।
377.जिसका सचिव विभीषण जैसा,
बुद्धिहीन कायर डरपोक।
यश और विजय न मिलती उसको,
वह पाए निंदा और शोक।।
378.अहंकार से भरे वचन जब
बोला रावण बारंबार।
दूत कुपित हो गया, हृदय में
जगी घृणा एवं धिक्कार।।
379.हे स्वामी लक्ष्मण ने भेजी,
राम पक्ष से यह पाती।
पढ़ो,कि क्या कहना है उनका,
और ठंडी कर लो छाती।।
380.वाम हस्त से रावण ने
वह पाती ली, करके उपहास।
पढ़वाने फिर लगा सचिव से,
समाचार भेजा क्या खास।।
381.हे रावण अब समय नहीं है,
खिला नहीं बातों के फूल।
अपने कुल का नाशक मत बन,
राह छोड़ दे ,यह प्रतिकूल।।
382.राघव का विरोध करके तू,
कहीं नहीं बच पाएगा।
देव त्रिदेव सभी के दर से,
मार भगाया जाएगा।।
383.अहंकार को त्याग
राम पद-कमल हेतु बन रहो भ्रमर।
या राघव की क्रोध अग्नि में,
जलो कुटुंब सहित सत्वर।।
384.पत्र पढ़ा तो रावण भय से
कांप उठा सुन यह संदेश।
किंतु अहंकारी था, बोला
मद में डूबे वचन विशेष।।
385.छोटा तपसी बालक-पन में
करता है बस वचन-विलास।
पड़ा हुआ धरती पर लेकिन,
छूना चाह रहा आकाश।।
386.शुक बोला-अभिमान त्याग कर,
मेरी बातों का लें बोध।
सर्वनाश यदि नहीं चाहते,
त्यागें तत्क्षण राम विरोध।।
387.तीन लोक-स्वामी हैं रघुवर,
लेकिन उनका मृदुल स्वभाव।
वह तो शत्रु हेतु भी रखते,
निज मन में करुणा का भाव।।
388.शरण गहो उनकी, वह तत्क्षण
क्षमा करें सारे अपराध।
सीता राघव को लौटा कर,
बिगड़ी बात अभी लें साध।।
389.जैसे ही शुक ने सीता को,
लौटाने की कही सलाह।
रावण के तन मन में फैला,
क्रूर क्रोध का भीषण दाह।।
389.स्वामि-भक्त शुक की छाती पर,
किया मूढ़ ने चरण प्रहार।
कर प्रणाम शुक भी उस ही पल,
चला राम रघुवर के द्वार।।
390.ऋषि अगस्त के घोर शाप से,
राक्षस का कुल था पाया।
करुणा-वरुणालय श्री हरि ने,
क्षमा भाव से अपनाया।।
391.मुक्त हुआ तामस शरीर से,
फिर ऋषि की काया पाई।
जा पहुंचा अपने आश्रम को,
जो था अनुपम सुखदाई।।
392.तीन दिवस बीते,प्रभु
बैठे रहे, धैर्य रख, सागर तीर।
सागर ने जब करी उपेक्षा,
राघव भी हो उठे अधीर।।
393.बोले राम क्रोध दिखलाकर,
जब तक भय न दिखाते हैं।
तब तक मूढ़ जीव सत् की
शुभ राह नहीं अपनाते हैं।।
394.लक्ष्मण! मेरे धनुष तीर
तरकस को, तत्क्षण ले आओ।
कैसी है रघुवंश शक्ति,
इस मूढ़ उदधि को दिखलाओ।।
395.अग्निबाण से अभी सिंधु-
जलधारा पूर्ण सुखा दूंगा।
सूखे सागर से होकर
इस दल को पार लगा दूंगा।।
396.शठ से विनय शीलता एवं
कुटिल व्यक्ति से प्रेम निभाव।
कृपण व्यक्ति से नीति कथाएं,
करते हैं विपरीत प्रभाव।।
397.ममता मोह-भाव में डूबे,
मानव को यदि बांटें ज्ञान।
लोभी को वैराग्य बताएं,
कामी से हरि का गुणगान।।
398.अच्छी बात प्रभाव न डालें,
जिनका मन है अति चंचल।
ज्यों ऊसर धरती पर बोया-
बीज सदा होता निष्फल।।
399. ऐसा कहकर रघुपति ने
ले धनुष चढ़ाया उस पर बाण।
उथल-पुथल था सिंधु,सभी
जल-जीव मांगते इससे त्राण।।
400.ताप असह्य हुआ तो सारे,
जलचर प्राणी अकुलाये।
विप्र-वेश में स्वर्ण थाल मणि
रत्न लिए जलनिधि आए।।
401.केला जब तक कटे नहीं
तब तक न फलद बन पाता है।
शठ-मति का यदि दमन न हो,
नहीं अपना शीश झुकाता है।।
402.भीत सिंधु ने चरण पकड़
प्रभु से तब क्षमा याचना की।
करुणा सागर में सिंधु हेतु,
किंचित भी कोप न था बाकी।।
403.नभ जल पावक और पवन भूमि,
जड़मति यह सदा सदा के हैं।
मायापति की माया के वश,
चलते यह टेढे-बांके हैं।।
404.जिसके लिए प्रसारित होता,
प्रभु का जब जैसा आदेश।
वह प्राणी उस भांति
कर्म करके ही,सुख पाता सुविशेष।।
405.मुझको शिक्षा देकर रघुवर,
किया आपने बहुत भला।
मर्यादा भी रही, पाप भी
नष्ट हुआ अगला-पिछला।।
406.शूद्र वही,जो कुटिल सोचता,
मर्यादा नहीं रखे गंवार।
ढोल तथा पशुवत नारी,
ताड़न के ये अधिकारी चार।।
407.इन्हें दंड देने में,होता नहीं
कभी नैतिक अपराध।
वही गृहस्थी है सच्चा,
जो इन्हें बुद्धि से लेता साध।।
408.देंगे यदि आदेश आप,
तो सहज सूख, मैं जाऊंगा।
सैन्य पार होगा पर,मैं
मतिमंद नीच कहलाऊंगा।।
409.प्रभु आज्ञा तो सदा अटल है,
वेदों ने बतलाया है।
कार्य सिद्ध वैसे ही होगा,
जैसी प्रभु की माया है।।
410.सागर के मृदु वचन सुने,
तो कृपासिंधु भी मुस्काए।
तुम्हीं सुझाओ राह कि कपिदल,
सिंधु पार कैसे जाए।।
411.सागर बोला- प्रभु! सेना में,
नील तथा नल दो भाई।
सेतु बनाने के 'कौशल' में,
दोनों रखते चतुराई।।
412.बाल-पने में शाप मिला था,
जो कुछ जल में डालेंगे।
पर्वत या पाषाण खंड को,
नौका सा तैरा लेंगे।।
413.वो जिस पत्थर को छूलें,
अद्भुत घटना घट जाती है।
शिला तैरने लगतीं,लहरें
उन्हें किनारे लाती हैं।।
414.प्रभु की दिव्य प्रताप शक्ति से,
कठिन नजर जो आता है।
ऐसा दुष्कर कर्म, खेल में ही,
पूरा हो जाता है।।
415.सैनिक पत्थर ढोएंगे,
मैं भी निज शक्ति लगाऊंगा।
लहरों की ताकत से उनको,
तट से दूर हटाऊँगा।।
416. खेल खेल में स्वामी,
योंही सुंदर पुल बन जाएगा।
सुयशआपका युगों युगों तक,
जग में गाया जाएगा।।
417.यह अमोघ शर,जिसे आपने,
मेरे लिए निकाला है।
व्यर्थ न हो पाएगा यह,
जो प्रलय मचाने वाला है।।
418.उत्तर तट के वासी,
जो अति दुष्ट कुटिल मतवाले हैं।
वेद-धर्म के घातक हैं,
दुखदायक विष के प्याले हैं।।
419.घोर बाण उन पर छोड़ें,
उनका संहारक बन जाए।
दोष हीन सज्जन जनता,
उन के भय से मुक्ती पाए।।
420.प्रभु ने सागर की पीड़ा,
हर ली तब अपने सायक से।
छिड़ना था वह महायुद्ध,
लंका के उस अधिनायक से।।
421.सागर ने वंदन कर के
फिर तत्क्षण ही प्रस्थान किया।
प्रभु-सम्मुख वह झुकताही है,
जिसने किंचित अभिमान किया।।
422.सागर लौटा निज भवन हेतु,
प्रभु के मन को यह मत, भाया।
कलि संकट घालक चरित्-
दास तुलसी ने है परहित गाया।।
423.सुख का निधान,संशय नाशक,
दुख दूर कराने वाला है।
राघव का यह गुणगान
मानसी दिव्य-कमल की माला है।।
424. हर आशा और भरोसा तज,
प्रभु के गुण जो भी गाता है।
संसार अग्नि से मुक्त तथा,
प्रभु की शरणागति पाता है।।
425.मंगल दाता शुभ भाव युक्त,
प्रभु का गुणगान परम पावन।
क्यों इसे न तू अपनाता है,
हरि माया से भरमाया मन।।
426.जग पावन कारी राघव के,
सुंदर गुण जो नर गाते हैं।
संसार सिंधु से, बिन प्रयास
वो सहज सरल तर जाते हैं।।
427. वीर हनुमंत रामदूत का चरित्र दिव्य-
जीवन को पुण्य प्रेम पंथ दिखलाता है।
दीनता दयालुता का पोषक चरित्र,
मन मानव का भक्ति सुधा धार में नहाता है।
पावन बनाता पाप पंक से बचाता, नाम
पवन के पूत का सभी को सुख दाता है।
सरल हृदय ले के शरण जो आता,
वीर बजरंगी उसे प्यारे राम से मिलाता है।।
428.स्वर्ण-शैल सी देह है,अतुलितबल के धाम। ज्ञानी गुणी विशेष तुम, सदा अग्रणी नाम।।
सदा अग्रणीनाम निशाचर 'वन' तोतुम 'दावानल'।
वानर दल के लिए आपका नाम बना है संबल।। रघुनायक के सेवक हनुमत,सदा रहे अनुगामी।
रामभक्त हे पवन पुत्र! हम करते कोटि नमामि।।
💐💐💐💐💐जय श्री राम💐💐💐💐💐
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श्री हनुमत चरित्र (सुंदरकांड आधार) का आज समापन चरण है। भक्तप्रवर महावीर श्री हनुमान जी के चरित्र अगाध हैं। हम जैसे तुच्छ व कलिमल में आपादमस्तक डूबे सांसारिक प्राणियों में वो क्षमता कहाँ है जो ऐसे पावन चरित्र के वर्णन हेतु कलम चला सकें? यह तो हमारे द्वारा भगवत चरणों में समर्पित छोटी सी वाक्य पुष्पांजलि थी, जो जैसी बनी उन्ही को प्रस्तुत कर दी। आशा है आप सभी मित्रों ने भी इसका आनंद लिया होगा,यद्यपि आपकी टिप्पणियों की संख्या अधिक नहीं रही फिरभी जिन किन्हीं बंधुओं ने टिप्पणी या पसन्दगी ज़ाहिर करके उत्साह वर्धन किया उन सभी का अभिनंदन व आभार।💐💐💐💐💐💐💐
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