💐विदुर नीति तृतीय अध्याय प्रारम्भ💐
(यहां से तीसरा अध्याय प्रारम्भ हो रहा है।इस अध्याय में दानव राज विरोचन,ब्राह्मण सुधन्वा एवं कन्या केशिनी के संवाद द्वारा धर्म नीति का सुंदर विवेचन किया गया है।
कृपया ध्यानपूर्वक अवलोकनकरें।-जय श्री राम)
**************************************
💐विदुरनीति भावानुवाद (3/ 49-50)💐
49. बुद्धिमान हो तुम विदुर करो ज्ञान की बात।
तृप्ति ना होती है मुझे,शीतल हो मन गात।।
शीतल हो मन गात वक्तृता उत्तम लगे तुम्हारी।
धर्म नीति की सुंदर बातें लगे चित्तको प्यारी।।
कहें विदुर सुनिए राजन, स्नान सभी तीरथ का। पुण्य-प्रदाता कर्म जो कि प्रेरक है स्वर्गिकपथ का।।
तीर्थ में ध्यान पूजन तथा आचमन
इससे बढ़कर है वाणी से मधुरिम वचन।
भाव कोमल किसी के लिए यदि जगें,
इसपे होंगे निछावर करोड़ों यजन।।
मीठी वाणी से मिलता है जग में सुयश,
मर के स्वर्गों का सुख जीव पाता रहे।
स्वर्ग में उसका जीवन रहे तब तलक,
जब तलक विश्व यश गान गाता रहे।।
एक इतिहास सुनाऊं,
दिव्य यह कथा बताऊं,
मधुरता का यश गाऊँ।
दो मित्रोंके संग केशिनी-चरित आज बतलाऊँ।।
50.सुंदर कन्या केशिनी,अनुपम गुण की खान।
चाह रही पति भी मिले,धनी और विद्वान।।
धनी और विद्वान स्वयंवर पति के लिए रचाया।
बलि का पुत्र विरोचन उसको पानेके हितआया।। बुद्धिमान केशिनि ने बलि-सुत से येवचन उचारे।
ब्राह्मण याफिर दैत्य, हृदयकिसको उच्चासन धारे।।
दैत्य होते बड़े या कि ब्राह्मण बड़े?
है ये शंका मेरी आप सुलझाइए।
किसका आसन बड़ा? किसको आदर मिले?
कौन पूजित है? मुझको यह समझाइए।
हैं अगर दैत्य से विप्र ऊंचे भले,
तो सुधन्वा स्वयंवर में बुलवाइए।
मैं सुधन्वा से शादी करूंगी यहीं,
आप तत्क्षण यहां से चले जाइए।।
सुधनवा को बुलवाओ,
विरोचन तुम हट जाओ,
प्रश्न मेरा सुलझाओ,
जो उत्तम कुल जन्म उसी से मेरा वरण कराओ।।
51.कहे विरोचन-केशिनी!हम विधि की संतान।
शासक हम संसार के,अति उत्तम विद्वान।।
अति उत्तम विद्वान,देवता विनत हमारे आगे। ब्राह्मण हैं क्या चीज़,जीविका हित
जो घर को त्यागे।।
कहे केशिनी- प्रातकाल में तुमको यहीं मिलूंगी।तुममें जो उत्तम होगा,मैं उसके संग चलूंगी।।
तब ये बोला विरोचन सुनो सुंदरी,
कल सुधन्वा को लेकर यहीं आऊंगा।
मैं सुधन्वा से बढ़कर हूं,इस बात को,
सिद्ध करके ही तुमको मैं दिखलाऊंगा।
कह रहे हैं विदुर- रात बीती उधर ,
सूर्य मंडल उदय से अंधेरा हटा।
केशिनी और विरोचन जहां थे खड़े,
वह सुधन्वा भी आकर वहीं पर डटा।।
विप्र देखा अभ्यागत,
केशिनी करती स्वागत,
अर्घ्य-आसन को उद्यत।
सिंहासनपर सधा विरोचन,
किंतु भिन्न रखता 'मत'।।
52.सुधन्वा-
स्वर्ण सिंहासन छू लिया
आसन का सम्मान।
किंतु साथ बैठूं यहां,
इसका नहीं विधान।।
इसका नहीं विधान कि हम दोनों में भारी अंतर।
मैं ब्राह्मण तुम क्षत्रिय, साथ न रहें एक आसन पर।।
विरोचन-
पीढ़ा और चटाई, योग्य तुम्हारे कुश का आसन।
धरती के तुम योग्य, न सजते तुम्हें स्वर्ण सिंहासन।।
सुधन्वा-
बाप-बेटा एकासन पे बैठे सजें
दो द्विजाति भी सँग बैठ सकते सदा।
शूद्र दो, बैठ सकते सहज साथ में,
अन्य कोई नहीं, संग जिसका बदा।।
हैं तुम्हारे पिता, भक्त प्रह्लाद भी,
होके चरणों में नत, वो भी बैठे रहें।
तुम हो बालक,सदा प्यार में हो पले,
ज्ञान तुमको नहीं, तुमसे अब क्या कहें??
विरोचन-
रत्न सोना गज वाजी,
वस्तु महलों में साजी,
लगाता सबकी बाजी,
कोई ज्ञानी निर्णय दे,तब हो पाऊंगा राजी।।
(वाजि=घोड़ा)
53.सुधन्वा-
स्वर्ण गाय रथ गज रखो,तुम अपने ही पास।
हमें न धन की चाह है, हमें कष्ट अभ्यास।।
हमें कष्ट अभ्यास, प्राण की अभी लगावें बाजी। निर्णय कोई करे, तभी हम भी हो पावें राजी।।
विरोचन-
कहां चलें हम निर्णय के हित,कौन बड़ा है ज्ञानी। मनुज और देवोंका निर्णय बन जाता नादानी।।
प्राण की शर्त लगाकर,
चलें प्रहलाद भक्त पर,
सत्य में वह हैं बढ़कर।
वह निर्णायक रहें,मुझे फिर पक्षपात का ना डर।।
पास प्रहलाद के दोनों मिलकर चले,
उनको देखा तो प्रहलाद हैं सोचते।
साथ कैसे चले आ रहे आज वे,
एक दूजे को थे, जो कभी नोंचते।।
हे विरोचन! सुधन्वा के संग तुम यहां,
क्या सहज आप में मित्रता हो गई?
तुम कभी साथ मिलते हो, देखा नहीं,
शत्रुता आपकी, क्या कहीं खो गई??
54.विरोचन-
नहीं सुधन्वा का बना, मैं साथी या मीत।
प्राणों की बाजी लगी, चाहें अपनी जीत।।
चाहें अपनी जीत,प्रश्न हम यह लेकर हैं आए।
हम दोनों में कौन बड़ा,कृपया हमको बतलायें।।आप सत्य ही सदा बोलते,सत्य आपका निर्णय। आप अगर मध्यस्थबने तो, हमेंनहीं किंचित भय।।
प्रहलाद-
अतिथि मेरे घर आए,
कोई जल इन्हें पिलाये,
चरण इनके धुलवाये।
श्वेत गाय हैं रखी,अतिथि सादर उसको ले जाये।।
सुधन्वा-
जल मिला मार्ग में, चाहिए कुछ नहीं,
आप मेरी ये शंका मिटा दीजिए।
विप्र हैं श्रेष्ठ जग में या सुत आपका,
प्रश्न आया कठिन,सो बता दीजिए।।
प्रह्लाद-
पुत्र प्यारा मुझे, आप भी पूज्य हो,
एक निर्णय यों कैसे बताऊंगा मैं।
धर्मसंकट बड़ा आपने ला दिया,
'कौन उत्तम है!' ये कह न पाऊंगा मैं।।
55. सुधन्वा-
गाय धनसंपदा सब विरोचन को दें,
मुझको मेरी ये शंका का उत्तर मिले।
श्रेष्ठता का पता गर मिलेगा मुझे,
केशनी संग जीवन की बगिया खिले।।
प्रहलाद-
सत्य बोले नहीं और असत् संग दे,
ऐसे वक्ता की गति तो बता दें जरा।
सुधन्वा-
हो जुआरी ज्यों सर्वस्व हारा हुआ,
थक के कोई श्रमिक ज्यों पड़ा अधमरा।
सौतन का सुख देखकर, ज्यों दुख पाती नार।
गलत न्याय कोई करें, नहीं उसका उद्धार।।
नहीं उसका उद्धार कैद होकर बहु पीड़ा पाता। अन्यायी जो नृपति शत्रु से भी अपमान कराता।।
पशु केलिए पांच, गौ के हित दसपीढ़ी दुख पावे। अश्वहेतु शत, मनुज हेतु यह सहस बार तड़पावे।।
नरक की आग जलावे,
तनिक सुख चित्त न पावे,
पीट मस्तक पछतावे।
अन्यायी की पीढ़ी-पीढ़ी पल भर चैन न पावे।।
56.स्वर्ण हेतु बोले असत, उसकी दुर्गति घोर।
पितर तथा वंशज बढें, सतत नरक की ओर।।
सतत नरककी ओर,भूमि और नारी हेतु हो झूठा। सर्वनाश में पड़े,और फिर पकड़े काल अंगूठा।।
भूमि तथा स्त्री के हित तुम
असत् कभी मत कहना।
कोटि-कोटि युग तक तुमको
अति नरक पड़ेगा सहना।।
प्रह्लाद-
सुत विरोचन सुनो बात मन से लगा,
ब्राह्मणों से बड़ा जग में कोई नहीं।
शक्ति क्षत्रिय रखें,शक्ति भी श्रेष्ठ है,
ज्ञान गरिमा के आगे वो टिकती नहीं।।
अंगिरा हैं पिता, यह सुधन्वा है सूत,
अंगिरा ऋषि का मुझसे अधिक मान है।
यह सुधन्वा है तुमसे सदा श्रेष्ठतम,
सत्य यह है कि 'इनका ही सम्मान है'।।
और जो जननि तुम्हारी,
श्रेष्ठ जग में वह नारी,
तुम्हें प्राणों से प्यारी,
किंतु सुधन्वा की माता के,सम्मुखनिम्न बिचारी।।
57.सुधन्वा-
स्वार्थ वश झूठ ना बोला,
पुत्र पर चित्त न डोला,
धर्म पर मन को तोला।
पुत्र तुम्हारा वापस दे भरता हूँ यह झोला।।
पुत्र वापस दिया है तुम्हारा तुम्हें,
केशिनी संग चरण मेरे धुलवाईये।
कह रहे हैं विदुर- "झूठ मत बोलिए,
स्वार्थ वश नाश की राह मत जाइए।।
दंड रख हाथ में,जीव के कर्म पर,
देवता तो कभी पहरा देते नहीं।
चाहते वह जिसे संकटों से परे,
हर तरह से रखें बुद्धि उसकी सही।।
चित्त लगाता जब मनुज,श्रेष्ठ कर्म की ओर।
कार्य सिद्ध होवें सकल, सफल रहें हरओर।।
सफल रहें हर ओर, किंतु कपटीतो मुक्ति न पावे। मायावी को वेद शास्त्र भी पंथ न उचित दिखावे।। जैसे पंख उगें तो शावक नीड़ त्याग उड़ जाता। अंतकाल में वेद, कपट-सेवी को है तज जाता।।
58.मद्य-पान, हर पल कलह,और समूहसे बैर।
भेद बोय पति-पत्नी में,तनिक नउसकी खैर।।
तनिक न उसकी खैर, भेद जो गृह कुटुंब में डाले। राजा से करले विवाद, यदि पड़े अक्ल पर ताले।। गलत राह को त्याग, दुष्ट चिंतन से चित्त हटाए।
त्याग योग्य यह पंथ छोड़, जीवन आनंद उठाए।।
हस्तरेखा लखे, शत्रु या मित्र हो,
वैद्य हो या जुआरी या चोरी करे।
नृत्य-जीवी हो, ये सात अस्थिर मनुज,
इनकी कोई गवाही पे, चित ना धरे।।
मौन पालन तथा यज्ञ स्वाध्याय सँग,
प्रातः संध्या यजन, जो करे भाव से।
ठीक हो काम चारों, परम सुख मिले,
हों नियम से नहीं, (तो) संकटों में फंसे।।
भवन में आग लगावे,
मीत को जहर पिलावे,
सोमरस बेच कमावे।
जारज सुत के धन से जोअपना भी मन बहलावे।।
59.मित्र-द्रोही, चुगलखोर लंपट तथा
गर्भ-हत्या करे, द्विज जो मदिरा पिये।
वेद-निंदक, पतित, क्रूर, तीखा बके,
घूँस खाए, तथा काग जैसा जिए।।
शक्ति रहते हुए जो न रक्षा करे,
जो शरणा आ पड़ा उसकी हिंसा करे।
निज गुरू-पत्नि में वासना जो रखे,
ब्रहम हत्यारे जैसा नरक में पड़े।।
ज्वलित अग्नि से हो सदा सोने की पहचान। सदाचार से सत्पुरुष करवाता निज भान।।
करवाता निज भान, श्रेष्ठ व्यवहार संत बतलाते। कठिन समय में धैर्यवान झट से पहचाने जाते।।
भय में कायर-शूर, विपद में शत्रु-मित्र पहचानो।
जो संकट में खड़ा साथ,तुम मीत उसी को मानो।।
बुढ़ापा रूप मिटावै,
आस भी धैर्य नसावै,
प्राण को मृत्यु न भावै।
दोष लखै दूजों का,उसमें धर्म नहीं टिक पावै।।
60.क्रोध से लक्ष्मी नष्ट होती यहां,
नीच की सेवा से मान गिर जाएगा।
काम लज्जा हरे और अहंकार में,
मान यश कीर्ति चिंतन, न बच पाएगा।।
धन मिले श्रेष्ठ कर्मों से एवं कुशलता से,
बढ़ने लगे दोगुना चौगुना।
फिर चतुरता से उसकी जड़ें भी जमें,
धन सुरक्षित जो संयम की हो साधना।।
दान शील मितभाषिता बुद्धि शास्त्र का ज्ञान।
दम कुलीनता चित्त में उपकारी को मान।।
उपकारी को मान,तथा होते पराक्रमी जेता।
अष्ट-गुणों से युक्त मनुजही होता हृदय विजेता।। किंतु एक गुण ही सारे गुण पर अधिकार जमाता। राजा से सम्मान मिले,गुणवान वही कहलाता।।
आठ गुण स्वर्ग दिखाएं,
चार संतों में पायें,
चार सज्जन को भायें।
यज्ञ दान तप तथा अध्ययन को सज्जन अपनाएं।।
61.सत्य एवं सरलता औ कोमल हृदय,
इंद्रियों का दमन संत रखते सदा।
यज्ञ और तप, दया, दान,सतअध्ययन
धर्म के आठ पद मन में रखिए सदा।।
सातवां है 'क्षमा भाव' सबके लिए
आठवां है अलोभी,इसे जानिए।
धर्म के आठ पद हैं यही श्रेष्ठतम,
आप इनकी महत्ता को पहचानिए।।
वयोवृद्ध जिसमें न हों,वह समाज बेकार।
धर्म युक्त नहीं वृद्ध जो,उनको है धिक्कार।।
उनको है धिक्कार,सत्य से हीन,
न धर्म कहाता।
कपटपूर्ण हो सत्य अगर,
फिर सत्य नहीं रहजाता।।
सत्य विनय का भाव
शास्त्र का ज्ञान शील विद्याधन।
बल कुलीनता शूरवीरता
उत्तम वाणी चंदन।।
स्वर्ग सीढ़ी दस जानो,
पाप पापी में मानो,
पुण्य में पुण्य समानो।
जैसा करिए कर्म भाव फल भी वैसा ही जानो।।
62.करे प्रशंसित कर्म जो, रहे पाप से दूर।
बार-बार हो पाप तो,बुद्धि मोह-मद चूर।।
बुद्धि मोह-मद चूर, नष्ट वह दो पल में हो जाती।। पाप कर्म में लिप्त रहे तो कीर्ति नहीं मिल पाती पुण्यकर्म जब रुचें, पुण्य ही पल-पल बढ़ते जाएं। बुद्धिमान सन्मार्ग चुनें,फिर उसपर कदम बढ़ाएं।।गुणों में दोष लखे जो,
मर्म पर चोट करे जो,
दया नहीं रखे हृदय जो।
सर्व शत्रु शठ मनुज,कष्ट में डूबा सदा रहे जो।।
दोष दृष्टि रहित बुद्धि जिसकी सधे,
कर्म शुभ हों, उसी का तो सम्मान है।
बुद्धिमानों से जिस को मिली बुद्धि ,
वो धर्म युत श्रेष्ठ पंडित औ विद्वान है।।
63.दोष दृष्टि से मुक्त है,शुद्ध बुद्धि से युक्त।
मनुज करें शुभ कर्म तो,हो सुख से संयुक्त।।
हो सुख से संयुक्त सदा सम्मान सभी का पावे।
सद्बुद्धि से युक्त जीव जग में पंडित कहलावे।।
धर्म अर्थ को पाकर जो शुभ मोक्ष-मार्ग तक जावे।
अनायास शुभ जीवन पाकर वह पंडित कहलावे।।
कार्य दिन में करें रात सुख से कटे,
और नए दिन में चिंतन नया ही रहे।
आठ महीने में वो काम करके रखे,
माह वर्षा के चारों खुशी से बहें।।
हम जवानी में जो भी करें,सोच लें,
इससे अपना बुढ़ापा, सजा हम सकें।
जिंदगी भर करें काम कुछ इस कदर,
दिल में लेकर खुशी, जग से जा हम सकें।।
जिंदगी मस्त बिताएं,
नाम यश खूब कमायें,
सभी सुख संपति पायें।
निर्भय मुख मुस्कान रहे,
जब हम दुनिया से जाएं।।
64.पच जाए यदि अन्न तो,
बड़ी प्रशंसा पाय।
निष्कलंक नारी अगर,
जीवन सहज बिताय।।
जीवन सहज बिताय,
शूर यदि युद्ध जीत जो जावै।
तत्वज्ञान जो पाय तपस्वी,
सबसे आदर पावै।।
धन मिलता जो बुरे काम से,
उससे दोष न छुपते।
नए दोष दुर्गुण मानव के,
मन में और उपजते।।
शिष्य के हैं गुरु शासक,
दुष्ट को नृप अनुशासक,
पाप जो करते नाहक।
छिपे पापियों हेतु सदा,
यमराज दंड के साधक।।
संत ऋषियों के कुल का पता ना लगे,
घोर सरिता का कुल भी अजाना रहे।
नारियों के चरित् का कहां मूल है,
कौन ज्ञानी, जो इसको बता के रहे।।
विप्र पूजक तथा दान करता सदा,
बंधुओं से रखे श्रेष्ठ बर्ताव जो।
शील एवं सरलता रखे चित्त में
दीर्घकालिक करेगा नृपति राज वो।।
65.सेवा धर्म सदा रखें शूर तथा विद्वान।
तीन मनुज को दे धरा, स्वर्ण पुष्प सम्मान।।
स्वर्ण पुष्प सम्मान,बुद्धिसे
कर्म श्रेष्ठ बन पाता।
बाहु-शक्ति से काम बने जो,
वह मध्यम कहलाता।।
चरण शक्ति से काम सधे
सो अधम कार्य तुम जानो।
भार उठाना अधम कर्म है,
इसे निम्नतम मानो।।
कुटिल मति है दुर्योधन,
मूढ़ मति खल दु:शासन,
कर्ण और शकुनि दुष्ट मन।
इन हाथों में सौंप,
आप चाहें उन्नति का शासन।।
पांडु पुत्रों में दुर्गुण मिलेंगे नहीं,
श्रेष्ठ सद्गुण का पांडव तो भंडार हैं।
आपको वह पिता मानते हैं सदा
जिंदगी वो जिये नीति अनुसार हैं।।
पांडवों ने पिता जैसा आदर दिया,
आप भी पुत्र जैसे ही अपनाइये।
भाव भाई के तनयों से रख नेह का,
अपनी छाया में उनको भी ले आइए।।
💐💐तृतीय अध्याय समाप्त💐💐
*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-* *-*-*-**-*-*-*-*-*-
💐💐चतुर्थ अध्याय प्रारम्भ💐💐
*************************************
66.साध्य-देवता गण तथा दत्तात्रेय संवाद।
यह इतिहास विचित्र है सुनकर रखिए याद।।
सुनकर रखिए याद-
हंस बन दत्तात्रेय विचरते।
साध्य देवता उन्हें देखकर
मन यह शंका करते।।
केवल दर्शन से हमको
अनुमान नहीं लग पाता।
शास्त्रज्ञानयुत दिव्य भाव
मुखमंडल भव्य दिखाता।।
सुनावें अनुपम बानी,
जगत ने सुनी न जानी
विद्वता सत्य दिखानी
ज्ञान चक्षु भक्तों के खोलें आप महा मुनि ज्ञानी।।
हंस कहने लगा देवताओं सुनो,
धैर्य धारण तथा मन नियंत्रण करें।
सत्य पालन सदा से महत् कर्म है,
आत्मवत् भाव जीवन में अपने भरें।।
प्रिय या अप्रिय सभी खुद के जैसे समझ,
गांठ अपने हृदय की जरा खोलिए।
सब से मिलकर रहें आत्मवत् यह जगत,
गालियों की जुबां आप मत बोलिए।।
67.क्षमाशील का क्रोध ही वज्रपात सम होय।
कटुवक्ता इस अग्नि से बच न सकेगा कोय।।
बच न सकेगा कोय,
पुण्य भी होंगे नष्ट तुम्हारे।
क्षमाशील सज्जन को,
यदि तुमने कटु वचन उचारे।।
मित्र द्रोह नहीं करें,
नीच पुरुषों की करें न सेवा।
सदाचार से हीन मनुज,
अपने प्राणों का लेवा।।
हृदय अभिमान ना राखै,
कटुक वच कभी न भाखै,
नए का ही फल चाखै।
समय बली,यह जान,
गर्वसे किंचित मन नहीं माखै।।
रूखी बातें हृदय को जलातीं सदा
धर्म प्रेमी, ये वाणी कभी ना कहे।
कोई बातें जो कटुता भरी बोल दे,
उसकी वाणी की चोटों को हंस के सहे।।
जिसकी वाणीहै रूखी औ पीड़क है जो,
घेर रखती गरीबी, जहां वो रहे।
मौत के पाश में बँध के वो जा रहा,
अपनी वाणी की ज्वाला में वो भी दहे।।
68.कोई हम पर छोड़ता,
कटु वचनों के बाण।
और जलाएं वो हमें,
भीषण अग्नि समान।।
भीषण अग्नि समान,
वचन हमको पीड़ा पहुंचाये।
सच्चा सज्जन वही
चोट खाकर भी जो मुस्काए।।
सोचें, हम पर छोड़ रहा जो,
ऐसी कड़वी वाणी।
पुण्य पुष्ट कर रहा हमारे,
वह उपकारी प्राणी।।
वस्त्र जिस रंग में रंगता,
उसी के जैसा बनता,
मनुज की उससे क्षमता,
खल सज्जन यति या कि चोर,
वो जिस संगत भी रमता।।
जो किसी को कभी बात,कटु ना कहे,
दूसरों से भी है जो, कहाता नहीं।
मार खाके भी जो मारता है नहीं,
दूसरों से भी हिंसा कराता नहीं।।
कष्ट पाता है पर कष्ट देता न जो,
मन में हिंसा की किंचित न इच्छा करे।
है दया और क्षमा प्रेम की मूर्ति वो,
देव भी आगमन की प्रतीक्षा करे।।
69.अधिक बोलने से भला
चुप ही रहिए मीत।
कई बार तो मौन ही,
लेता दुनिया जीत।।
लेता दुनिया जीत,
मौन से बढ़कर सच को जानो।
सत्य अगर प्रिय-कर हो तो,
उसको उत्तम पहचानो।।
सत्य प्रिय लगे किंतु अगर,
वह धर्म युक्त नहीं होता।
ऐसा सत्य हृदय से,
है विश्वास सदा को खोता।।
मनुज जो साथ बनाता,
जिन्हें वह सुख पहुंचाता,
कि जिनमें खुद सुख पाता।
जैसा भी बनना चाहे,
वह वैसा ही बन जाता।।
दुष्ट बातों से मन को हटाते रहो,
उनसे तुमको सहज मुक्ति मिल जाएगी।
मन का बंधन कहीं,शेष जो ना रहे,
आत्मा उसकी पीड़ा नहीं पाएगी।।
जो न जीता गया हो किसी से कभी,
जीत की मन में जिसके नहीं चाह है।
वैर करता नहीं,कष्ट देता नहीं,
निंदा स्तुति रखे एक ही राह है।।
70.जीवन में है चाहता
जो सबका कल्याण।
अकल्याण मन में नहीं,
सब हैं आप समान।।
सब हैं आप समान,
सत्यवादी कोमल मन वाला।
इंद्रिय निग्रह करे,मनुज
उत्तम,सब का रखवाला।।
झूठी आस न देता है,
दे दे तो पूरी करता।
दोष-दृष्टि रखता वह मानव,
मध्यम मार्ग ठहरता।।
दुष्ट का जीवन फीका,
मीत वह नहीं किसी का,
भाग्य से टूटे छीका।
अधम पुरुष वह मात-पिता को
है कलंक का टीका।।
खुद पे शंका जिसे,डर के जीता वही,
दूसरों पे न करता वो विश्वास है।
भाई बंधु स्वजन,सब ही छूटें तथा,
एक भी मित्र सच्चा नहीं पास है।।
सर्वदा सज्जनों की ही सेवा करे,
मध्यमों की भी सेवा,तो करता रहे।
किंतु जो है अधम,उनकी सेवा नहीं,
दुष्ट संगत से हर पल ही डरता रहे।।
71.या तो धन की प्राप्ति में दुष्टों का सहयोग।
बुद्धि तथा पुरुषार्थ सँग, या होता उद्योग।।
या होता उद्योग,
प्राप्त होता धन,कई कला से।
असद वृत्ति के धन के संग,
अपमान मिले वसुधा से।।
उत्तम कुल के पुरुषों सा
सम्मान न धन से मिलता।
सदाचार से हीन लक्ष्मी
देती बहु व्याकुलता।।
तपस्या इंद्रिय संयम,
यज्ञ स्वाध्याय न हों कम,
सदाचारी यम नीयम।
अन्नदान सँग सात गुणों से,
है उत्तम कुल अनुपम।।
आचरण श्रेष्ठ रखते हैं जीवन में जो,
माँ,पिता, बंधुजन को सताते नहीं।
चित्त रखते सदा नेह से जो भरा,
धर्म नीति को मन से हटाते नहीं।।
कुल की कीरत सदा सबसे ऊंची रखें,
झूठ का आचरण मन में लाते नहीं।
कीर्ति पाते यहां जिंदा जब तक रहें,
मर के भी वो कहीं,दिल से जाते नहीं।।
72.यज्ञ कर्म से हैं विरत
निंदित कुल संबंध।
वेद पठन का त्याग कर
रखते मन में द्वंद।
रखते मन में द्वंद,
धर्म का करते हैं उल्लंघन।
दैवी धन पर रख कुदृष्टि,
जो हरते ब्राह्मण का धन।।
विप्रों का जो करें अनादर
करते हरि गुरु निंदा।
कब्जा करे धरोहर पर,
अति निंदनीय वह बंदा।।
गाय पशुधन है पाया,
मिला है धन और माया,
भूमि गृह भवन सजाया।
किंतु उच्च कुल नहीं कि जिसको
सद आचरण भाया।।
धन नहीं है मगर आचरण श्रेष्ठ है,
यह जमाने में उसका सदा ही रहे।
आचरण को जतन से बचाए रहो,
धन तो ऐसा है जो आता-जाता रहे।।
धन नहीं भी रहे तो कोई गम नहीं,
धन बिना जीव निर्धन ही कहलाएगा
आचरण से गिरा,कितना भी हो धनी
मृत्यु से भी बुरी मौत हो पाएगा।
73.धन से बड़ा है आचरण
धन का होय विनाश।
धर्म रहे किंचित मगर
सच हो अपने पास।।
सच हो अपने पास
सदाचारी को न्यून न जानो।
सदाचरण से युक्त व्यक्ति को,
देवरूप पहचानो।।
गो-धन गज-धन पूजन एवं
संपति खूब कमावें।
सदाचरण से हीन व्यक्ति
सम्मान कभी ना पावें।।
वैर से मुक्त रहे कुल,
नव पर-धन पर, मन चंचल,
न रखता कोई छल बल।
प्रजा जनों का धन हरने वाला
नृप होता निष्फल।।
मित्र-द्रोही तथा जो कपट से भरा,
ऐसा कोई भी प्राणी ना घर में रहे।
गुरुजनों से भी पहले जो भोजन करे,
ऐसे मूरख को घर भी कभी ना सहे।।
पहले अतिथि की सेवा तथा देवपूजा,
हो, तब जाके भोजन को आगे बढें।
सब की सेवा व सत्कार हो सर्वदा,
ऐसे जन श्रेष्ठ लोगों की सीढ़ी चढें।।
74. ब्राह्मण की हत्या करे
इससे बड़ा न पाप।
विप्रों के प्रति दोष है,
सृष्टि का अभिशाप।
सृष्टि का अभिशाप पाप ऐसे जो करता प्राणी। पिंडदान ना करें तथा पितरों को ना दे पानी।।
ऐसा पापी जीव सभा में कभी न आदर पाए।
सज्जन मंडल में से,ऐसा दुष्ट भगाया जाए।।
घास तिनके का आसन,
वचन मधुमय सुंदर मन,
भूमि एवं मीठा जल,
चार वस्तु समृद्ध रखें,
सज्जन का घर और आंगन।।
पुण्यशाली के घर में समादर सहित,
पीने को जल तथा भूमि मिलती सदा।
हैअतिथि देवता,उसका आदर करें,
खुद पे चाहे पड़ी हो बड़ी आपदा।।
भार ढोता है रथ चाहे छोटा ही हो,
काट का इक तना,काम आता नहीं।
साहसी कार्य का भार ढोता सहज,
काम का बोझ उसको डराता नहीं।।
75. जिससे अपना मन डरे
शंका हृदय समाय।
जिसकी सेवा नहिं रुचे
वो न मित्र कहलाय।।
वो न मित्र कहलाय
मित्र तो सच्चा वो कहलाता।
जीत लेय विश्वास,
मित्र का परम हितू बन जाता।।
मतलब के साथी दुनिया में
जगह जगह मिल जाते।
सच्चा मित्र न मिलता,
वह हम बड़े भाग्य से पाते।।
न हो पहले का परिचय,
नहीं हो लालच या भय,
मित्र सच्चा वह निश्चय।
वही बंधु है वही सहारा
वह ही जीवन आश्रय।।
चित्त चंचल रखे, बुद्धि स्थिर रहे,
वृद्ध गुरुजन की सेवा जो करता नहीं।
मित्र सच्चे उसे मिल न पाते कभी,
बुद्धि अपनी ठिकाने पे रखता नहीं।।
स्वर्ग का सुख भी मिलता इसी भूमि पर,
उसको पाने की कोशिश तू करता नहीं।
सत्य की राह से जो भटक कर चला,
बिगड़ा रस्ता तो फिर,वो संवरता नहीं।।
76.चंचल-मन जिसका रहे,सेवा से जो दूर।
खालीपन उसका बढे,मित्र न हों भरपूर।।
मित्र न हों भरपूर,
वृद्धजन से जो रखता दूरी।
उसके मन की अभिलाषाऐं,
होतीं कभी न पूरी।।
मति अस्थिर जब रहे,
न मिलती उसको कभी सफलता।
उसका जीवन मित्रहीन रह कर ,
तिल-तिल कर जलता।।
मित्र है सबसे प्यारा,
दूर करता अँधियारा,
कि जीवन उस पर वारा।
सच्चा सेवा धर्म सजे
बनता है मीत सहारा।।
हो सरोवर जो सूखा,तो उसके निकट,
हंस के झुंड जल हेतु जाते नहीं।
तटके तरुवर भी सूखे खड़े दीखते,
उन पे पंछी मधुर गीत गाते नहीं।।
ज्ञान से हीन और दास इंद्रिय के जो,
मार्ग ईश्वर भी उनको दिखाते नहीं।
चित्त चंचल भटकता हुआ सा रहे,
लक्ष्य अपना कभी जीत पाते नहीं।।
77. मेघों सा चंचल,सदा होता दुष्ट स्वभाव।
एक पल बांटे प्रेम तो,दूजे पल दे घाव।
दूजे पल दे घाव,
क्रोध भी एक पल में चढ़ जाता।
कब कैसा व्यवहार करें,
यह उनको समझ ना आता।।
चंचल मन से शीघ्र बिगड़ने
लगते, काम हमारे।
बंद तरक्की के हो जाते,
जीवन के सब द्वारे।।
दुष्ट का नहीं भरोसा,
लाभ लेकर भी कोसा,
सर्प को पाला पोसा।
जो मित्रों का नहीं,
जगत में उसका नहीं भरोसा।।
अपने मित्रों से सत्कार पा के भी जो
काम उनके कभी दिल से आते नहीं।
वो कृतघ्नी तथा दिल के काले,
मरें, मांस भोजी भी मांस उनका
खाते नहीं।।
हों वो निर्धन, तो सत्कार दिल से करें,
जिंदगी में कभी कष्ट पाते नहीं।
मित्र से याचना जो कभी ना करें,
मुफ्त का,फिर वो अहसां उठाते नहीं।।
78. मन में हो संताप तो ज्ञान नष्ट हो जाए।
काया हो बल हीन और रूप कुरूप दिखाय।।
रूप कुरूप दिखाय,
जगत का हर सुख लगता फीका।
दिव्य अमर फल मिल जाए तो
वह भी लगे न नीका।।
हर उपदेश विषैला एवं
ज्ञान ध्यान सब खाली।
मन में दुख होता तो
काली लगती है दीवाली।।
हृदय को कुछ नहीं भाए,
रंग रस नहीं सुहाये,
दु:ख जब हमें सताए।
मन में पीर घनी हो,
मानव जीते जी मर जाए।।
घाव मन में लगे पीर गहरी बड़ी
दीन दुनिया से फिर बेखबर वो रहे।
अपनी पीड़ा छुपाकर हृदय में रखे,
ताप हिय का यहां किस से जाकर कहे।।।
दु:ख ने घेरा जिसे, ना कहीं का रहा,
दु:ख की धारा में ता-जिंदगी वो बहे।
या तो खुद को खतम करके छुट्टी मिले,
या कि पीड़ा हृदय में वो चुप से सहे।।
79. मन में है संताप तो धूमिल होता रूप।
ज्ञान नष्ट होता तथा बिगड़े रूप स्वरूप।।
बिगड़े रूप स्वरूप,
शक्ति काया की है जल जाती।
रोग घेर लेते हैं
मन की शक्ति निचुड़ती जाती।।
शोक करें मन में तो
इच्छा पूर्ण न कोई होती।
हम रोते हैं इकले ,
दुनिया अपने संग न रोती।।
शोक से मन हो व्याकुल,
शत्रु मुख जाते हैं खिल,
टूटता है अपना दिल।
रोग ग्रस्त मन फिर रह जाता,
नहीं किसी भी काबिल।।
शोक से शत्रुओं को खुशी मिल रही,
शोक अपने हृदय से हटा दीजिए।
शोक से हार कर आप टूटो नहीं,
अपनी ताकत सभी को बता दीजिए।।
जिसको पाने की इच्छा रहे चित्त में,
अपनी इच्छा स्वयं को जता दीजिए।
कार्य की सिद्धि दुख से नहीं हो सके,
शोक की झाड़ियों को कटा दीजिए।।
80. मानव लेता जन्म इस,जग में बारंबार।
बार-बार जीवन तथा मृत्यु मिले हर बार।।
मृत्यु मिले हर बार,
याचना बार-बार वह करता।।
हानि उठाता गिरता,
फिर भी आगे को चल पड़ता।।
कभी याचना पूरी करता,
दूजों की हर संभव।
परहित हेतु शोक करता,
वह ही कहलाता मानव।।
पराए हित में रोता,
दया में नयन भिगोता,
बीज खुशियों के बोता।
श्रेष्ठ पुरुष अपने जीवन को,
परहित हेतु संजोता।।
सुख मिला है यहां जिंदगीमें तुम्हें,
दुख की रातें भी एक दिन नजर आएंगी।
कलियां जो भी खिली हैं यहां बाग में,
शाम आएगी तो वो भी मुरझायेंगी।।
लाभ के पुष्प चाहे हैं व्यापार में,
हानि की तितलियां फिर किधर जाएंगी।
हर्ष के रवि सुहाने उदय जो हुए,
शोक की बदलियाँ भी बरस जाएंगी।।
81. छह इंद्रिय चंचल बहुत,विषयों की यहदास। इंद्रिय काबू में रहे, रखे नियंत्रण पास।।
रखें नियंत्रण पास,
विषय सुख हेतु दौड़ कर जातीं।
बुद्धि घटे,ज्यों फूटे घट से,
जल बूंदे गिर जाती।।
पछताते धृतराष्ट्र
कर्म मैंने यह क्या कर डाला?
अपने प्रिय बेटों के,
प्राणों को संकट में डाला।
युद्ध का दौर चलेगा,
देश चहुँ ओर जलेगा,
ना कोई अब सम्हलेगा।
युद्ध हेतु इतिहास,
मुझी पर,कालिख खूब मलेगा।।
भय से व्याकुल हूं मैं,चित्त आकुल हुआ,
शांति हित क्या करूं?यह बता दीजिए।
मन का उद्वेग कम हो,मिले शांति सुख,
मार्गदर्शक विदुर-कुछ दया कीजिए।।
कह रहे हैं विदुर- आप राजा बड़े,
इस तरह से ना खुद को सज़ा दीजिए।
इंद्रियों पर हो काबू तपस्या बढ़े,
लोभ दुश्मन है,मन से हटा दीजिए।।
82. बुद्धि मनुज का शस्त्र है जोकरती भय दूर। तप से मिलता उच्च पद,आदर भी भरपूर।।
आदर भी भरपूर,
करें हम यदि सेवा गुरुजन की।
ज्ञान शक्ति भी बढे,
योग से शांति मिले तन-मन की।।
जिनको निज जीवन में होती
महा-मोक्ष की इच्छा।
दान पुण्य के शुभ-फल की,
वह करते नहीं प्रतीक्षा।।
वेद का नहीं सहारा,
भाव निष्काम उतारा,
द्वेष नहीं मन में धारा।
सकल कामना हीन हृदय से
परउपकार विचारा।।
बुद्धि को रख प्रबल काम करते हैं जो,
जिंदगी में कभी मात खाते नहीं।
फल की आसक्ति बिन कर्म करते रहें,
राग और द्वेष को मन में लाते नहीं।।
युद्ध में जीत और वेद का अध्ययन,
पुण्य के कर्म सुख की ही वृद्धि करें।
भेद एवं कलह यदि रखें जाति से,
नींद सुख की न पायें,हमेशा डरें।।
83. सम्यक विद्या पाइए न्यायोचित हो युद्ध। पुण्य कर्म ही कीजिए काम न जगत विरुद्ध।। काम न जगत विरुद्ध
तपस्या सुख की वृद्धि कराये।
फूट रखे जो आपस में
वो सुख की नींद न पाए।।
रमणी जन का संग,
सूतजन की स्तुति नहीं भाये।
भेदभाव जो रखे
धर्म आचरण न वो कर पाए।।
सुख उसे मिल नहीं पाता,
कथन सच्चा न सुहाता,
आत्म गौरव छँट जाता।
द्वेष भाव से भरा हृदय,
बस,पीछे ही रह जाता।।
बात हित की अगर आप समझाएंगे,
मूढ़ को वो जरा भी सुहाती नहीं।
सत्य चर्चा तथा प्रेम उपदेश की,
प्रेरणा उसके मन को लुभाती नहीं।।
योग और क्षेम उसके अधूरे रहें,
सिद्धि उनकी यहां होने पाती नहीं।
भेद भावों भरा,जो जगत में जिये,
नाश से उसको सृष्टि बचाती नहीं।।
84. ब्राह्मण में तप शक्ति है गऊओं में है दुग्ध।
ज्यों नारी की चपलता मन को करे विमुग्ध।।
मन को करे विमुग्ध,कि इनमें
यह गुण बहुत जरूरी।
इसी तरह निज जाति बंधु,
में आ जाती है दूरी।
नित्य सींच कर बढ़ी लताएं,
बरसो झोंके सहतीं।
सज्जन संगति संकट में,
ऐसे ही मिलकर रहतीं।।
अग्नि लकड़ी में पलती,
अलग हो,धुआं उगलती,
एकजुट हों, तब जलतीं।
राष्ट्र एक हो रहे,वहां पर भी
यह बातें फलतीं।।
फूट आपस में हो, दुख उठाना पड़े,
एकता में बंधा, वो सुखी सर्वदा।
साथ मिलकर चलें,कष्ट कोसों भगें,
छाया भी छू सके ना,कोई आपदा।।
विप्र,नारी तथा जाति बंधू स्वजन,
गाय माता पे जो भी करे क्रूरता।
इससे बढ़कर यहां कापुरुषता नहीं
मत समझना इसे तुम कभी शूरता।।
85. वृक्ष अकेला है अगर बद्धमूल बलवान।
सहज धराशायी बने चलें घोर तूफान।।
चलें घोर तूफान,
अकेला वृक्ष नष्ट हो जाता।
किंतु वृक्ष के झुंड खड़े,
तो तूफ़ां सिर टकराता।।
बड़ी-बड़ी आंधी के आगे
जंगल हैं लहराते।
कितने भी हों बड़े,
अकेले हों तो, उड़ ही जाते।।
रहे गुणवान अकेला,
शत्रु समझेंगे खेला,
उसे घेरेगा रेला।
महाबली भी हारेगा,
फस जाए अगर अकेला।।
पांडवों ने परिश्रम का जीवन जिया,
आपसे उनको आश्रय मिला है सदा।
वन में ऋषियों की संगति उन्हें है मिली,
सर्वदा कष्ट ही क्यों उन्हें है बदा??
ये प्रजा आपकी,उनको साधू कहे,
उनके कष्टों का बोझा तुम्हीं पे लदा।
वे सरल चित्त हैं,उनको ठगना नहीं,
अन्यथा देश पर ,आ गिरे आपदा।।
86. कमल खिले तालाब में,
जब मिल जाता साथ।
होता सहज विकास,
जब मिले स्वजन का हाथ।।
मिले स्वजन का हाथ,
शक्ति फिर कई गुना बढ़ जात।
उन्नति विजय विभूति,
सभी पर एक साथ नहीं आती।।
ब्राह्मण,गाय,कुटुंबी, बालक
और अन्न के दाता।
शरणागत,अबला को
मारक दंड दिया नहीं जाता।।
बड़ी है धन की ताकत,
स्वास्थ्य देता है हिम्मत,
उसी को माने जीवित।
मुरदे जैसा ही मानो,
जो रोगी हो या आहत।।
मूर्ख की जिंदगी भूमि पर बोझ है,
मूर्ख को मां भी अपना बताती नहीं।
सारी दुनिया सदा ज्ञान को पूजती,
मूढ़ के आगे मस्तक झुकाती नहीं।।
क्रोध को रोक लें,शांति मन में रखें,
क्रोध के बाद मन में बढ़े दीनता।
पाप से इसका,सीधा ही सम्बन्ध है,
क्रोध के साथ चलती हृदय-हीनता।।
87. पैदा होता क्रोध जब,
मन को करे कठोर।
मन विचलित होता तथा,
पीड़ा होती घोर।।
पीड़ा होती घोर
किंतु इसको सज्जन ही सहते।
दुर्जन अपने संग,
दूसरों को भी लेकर बहते।।
इस अमर्ष को सहन करें,
और करें शांति को धारण।
थोड़ा करें विचार
आप खुद ही हैं इसका कारण।।
क्रोध पर करें नियंत्रण,
क्रोध है इसका कारण,
आपका खुद से ही रण।
और अगर आए भी तो,
मत करें देर तक धारण।।
रोग जिसको हुआ है जरा सा अगर,
मीठा फल उसको किंचित भी भाता नहीं।
इंद्रियां उसके काबू में रहती नहीं,
और विषय सुख भी वो उनसे पाता नहीं।।
धन से पूरित हों भंडार उसके मगर,
धन से किंचित भी सुख वह उठाता नहीं।
उसको कितना भी कोई उचित ज्ञान दे,
दुख का चिंतन कहीं मन से जाता नहीं।।
88. बलशाली यदि बन गए,
रखिए मृदुल स्वभाव।
मृदु स्वभाव युत शक्ति का
पड़ता गहन प्रभाव।
पड़ता गहन प्रभाव,
धर्म का करें सत्य संग चिंतन।
धन नश्वर है,
अगर क्रूरता से है इसका अर्जन।।
किंतु अगर धन के अर्जन में
धर्म बना हो साथी।
वह लक्ष्मी पीढ़ी दर पीढ़ी,
निश्चय साथ निभाती।।
पांडु-सुत छोटे बालक,
सुयोधन उनका घालक,
आप बनिए प्रतिपालक।
संधि पांडवों से करिए,
हे कौरव कुल संचालक!!
आपके पुत्र पांडव जनों से मिलें,
एक दूजे कि दोनों ही रक्षा करें।
शत्रु और मित्र के संग रखें भाव सम,
ये अकारण परस्पर में ही क्यों डरें??
एक कर्तव्य हो,सुख सभी को मिले,
कीर्ति श्री युत ये जीवन बिताते चलें।
आप कौरव के स्वामी हैं कुरुराज हैं,
पांडु तनयों को भी संग मिलाकर चलें।।
💐विदुर नीति भावानुवाद 💐
चतुर्थ अध्याय समाप्त
(पंचम अध्याय से आगे जारी है )
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें