सोमवार, 14 जून 2021

श्री हनुमत लीलाराधन 1 (ब्रजभाषा साहित्य)



आज से ब्रजभाषा की कुछ पंक्तियों (छंदों) के माध्यम से पवनतनय अंजनिनन्दन रुद्रावतार महावीर हनुमान जी की आराधना व लीलाओं का वर्णन प्रारम्भ कर रहे हैं। आशाहै धर्मप्राण मित्रवृन्द को यह श्रृंखला ब्रजभाषा की मधुरता का आस्वाद प्रदान करने में किंचित सफल रहेगी। 

जय श्री सीताराम-जय वीर बजरंगबली💐💐

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श्री हनुमत लीलाराधन- 1 (शुभारम्भ)💐💐

दिनांक 9.6.21 बुधवार

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💐श्री राम नाम वंदना💐

1.राम नाम मंत्र, राम नाम शक्ति तंत्र 

राम नाम कौ प्रताप,

राम नाम सों मिलावैगौ। 

राम नाम के जहाज 

कूँ,बनाय कै अधार 

राम नाम साधि 

राम रूप बन जावैगौ।। 

राम नाम सों विशेष, 

राम कौ प्रभाव नहीं,

राम कूँ उचारि,

अंत राम धाम पावैगौ।

बंधु सखा सुत दारा 

साथ छोड़ दिंगे यहीं,

राम नाम अंतकाल संग तेरे जावैगौ।। 


💐श्री हनुमंत वंदना💐


2.रुद्र अवतार आप 

स्वामी जग जंगम के,

रघुपति के प्यारे 

राम रूप बलवान हैं।


राम-सखा,राम-सचिव 

साथी साहूकार संगी 

 राम के सर्वस्व  सुहृद 

 सैनिक गुणवान हैं।। 

 

जानकी के नेह सों,

पले हैं कपि नायक जू, 

सिया रघुनंदन के 

जीवन धन प्राण हैं।


अंजनी के आनंद के 

वर्धक सुत केसरी के,

भक्त जनसहायक 

महावीर हनुमान हैं।। 


3.केसरी कौ कुल कृतार्थ 

कीन्हों निज जन्म लिए,

वायु-वेग जीत 

मान पवन कौ बढ़ाये हैं। 


कपि कुल केहरि किसोर, 

जाति कौ बढ़ायौ गर्व, 

कंदमूल खाय 

भगवंत गुण गाये हैं।। 


सूरज कूँ फल विचारि, 

दौरि परे भक्षण हित,

इंद्र वज्र चोट मारि, 

हिय में पछताये हैं। 


बुद्धि के विधाता 

सूर्य देव की कृपा सों भये,

कोटि बार बुद्धि 

चमत्कार हू दिखाये हैं।।

अशेष....💐


4.सामवेद ज्ञाता, गान कला के विशारद प्रभु,

नृत्य कला कौशल सों रघुवर रिझाये हैं।

मंत्री सुग्रीव के,मिलाये राम राघव सों,

राम सखा सेवक सुग्रीव हू बनाये हैं।। 


सिया जू की खोज खबर,लाये ढूंढ लंका सों, 

शत योजन सिंधु सहज पार करि आए हैं।

रघुवर कौ चरित गाय, सिया कूँ सुनायौ अरु,

मुद्रिका दिखाय शोक ताप हू मिटाए हैं।।

 

5.अक्षय कुमार हन्यौं हो यातुधान धरि पछारे, वाटिका अशोक हू उजारि आप आए हैं।

इंद्रजीत जोधा बलवान संग युद्ध कीन्हों, 

पराक्रम दिखाय ब्रह्मपाश सों बँधाए हैं।।


राक्षस बजमारे मूढ़, पूँछ कूँ पजारि रहे,  उलटि-पुलटि आप स्वर्ण लंक कूँ जराये हैं।

पवन हूं सहाय भये सिया ने मनौती मानी,

दाहक जो अनल,नाथ शीतल बनाए हैं।।


6.लंक कूँ जराय मातु सिया सों विदाई मांगि, चूड़ामणि पाय कपि मंडली में आए हैं।

अंगद सुग्रीव जामवंत कूँ अनंद भयौ,

मधुबन उजारि कै रघुवीर दरश पाये हैं।।


सीता सुधि सोधि समाचार दिए रघुवर कूँ, 

जन्म-जन्म हेतु रामजी ऋणी बनाए हैं। 

सेतुबंध अभियंता, वीर हनुमंत स्वामी,

राम की कृपा सों सैन्य पार उतराए हैं।।


7.रामादल हाँकि सेतुबंध सों उतारयौ पार, 

असुर दल बिदार दस सीस हू नचायौ है।

शक्ति लगी लछिमन कूँ संकट में पड़े प्रान, 

द्रोणगिरि उखारि ताकौ जीवन बचायौ है।। 


कोटि-कोटि सेनापति असुरन के नष्ट कीन्हे,

रावण कौ अनुज लाय राम सों मिलायौ है। 

रावण हराय सिया राम कूँ मिलाय,आप 

भक्त विभीषण कूँ लंक अधिपति बनायौ है।।


8.चुटकी बजाय आप सेवक सब चकित कीन्हे, 

प्रभु की जम्हाई होय पहरा सों दीन्हों है।

जानकी लडैते-लाल,काया पै सिंदूर पोति, 

रघुवर और सिय कौ हिय आनंदित कीन्हों है।। 


शिव के सेवक अनन्य ,रामेश्वर निकट आप,

हनुमतेश शिव कौ शुभ स्थापन कीन्हों है।

अश्वमेध अश्व रक्षा कीन्ही तुम दसों दिशा,

अद्भुत पुरुषारथ दिखरायौ अनचीन्हों है।।


9.कीर्तनप्रिय बजरंगी,रामकथा लिप्त सदा,

भक्तन कूँ पंथ अनुगमन कौ दिखायौ है।

राम कथा होय जहाँ,अँसुवन की चलै धार,

श्रोता कौ रीत भाव जगत कूँ सिखायौ है।।


जानकी के प्यारे रामद्वार रखवारे नाथ,

भक्तन सहारे,भव पार हू करायौ है।

शिव शंकर तनय, वायु पुत्र,अंजनी के सुत, कोटि-कोटि जीव रामचरण सों जुड़ायौ है।।


10.भक्तन के उपकारक दीनन के बंधु नाथ 

हम से अनाथन के सब विध रखवारे हौ।

कृपा करौ दया करौ अनुग्रह की दृष्टि राखि,

दासन के बहु अकाज आप ही संभारे हौ।। 


चरित सिंधु हैं अपार बिंदु मात्र जान सकें, 

आशिष जो चाहै ताहि आप दैन वारे हौ।

जग में निराट जहां काहू कौ सहारौ नांय, 

तहां दीन भक्तन के आखिरी सहारे हौ।। 


11.उत्तम बलधारी प्रभु राम की सवारी 

अरज सुनियो हमारी, द्वारे हाथ जोरि ठाढ़े हैं।

कोई चहै वस्त्र पुष्प चंदन भूषण सुगंध 

लंगोटा लगाय लाल, चोला चढ़ें गाढ़े हैं।।


पंचामृत दिव्यगन्ध औषधि अनेक भोग,

हनुमत कूँ सदा सिद्ध मेह, घाम जाड़े हैं।

आंगन निसानसज्यौ शिखर राम ध्वजा चढ़ै,

लडुअन के दौना, द्वार बजत नगाड़े हैं।।


12.बेसन के लडुअन कौ भोग लगै नित्य आप 

लडुअन के खायबे में गणपति के भैया हैं।

चोला  चढ़ै भौम वार,शनिवार भोग लगै,

नव ग्रह राहु-केतु कूँ करावें ततथैया हैं।। 


राम के विरोधी कौ महल हूं जराय देत,

मारुति मन रमै काहू भक्त की मढ़ैया हैं। 

राघव रघुनंदन की लीला भईं कोटि किंतु 

युग-युग  इन लीलन के आपु ही गढ़ैया हैं।।


13.शक्ति के निधान हनुमान हैं अनौखे देव 

इत्र फूल चंदन की रखें  नहीं चाह हैं।

पंचामृत गंध पुष्प दिव्य औषधी अनेक,

आन देवतान हेतु लगें ये प्रवाह हैं।।


बजरंगी ऐसे देव, कृपा कोर पायबे कूँ,

भक्तन हित दीन्ही प्रभु सरल सहज राह हैं।

राम नाम सुनि प्रसन्न, लडुअन सों तृप्त होंय

ऐसौ कौन देव? तीन लोकन के माहिं है।।




श्री हनुमत लीलाराधन-4

(जगन्नाथ पुरी के बेड़ी-हनुमान की कथा: 

संत-सत्संग के आधार पर)-1

दिनांक 13.6.21 रविवार

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14. पुरी कौ समुद्र अहंकारी मदमातौ भयौ

जगन्नाथ मंदिर कूँ नित प्रति डुबामतौ।

काहू सों न डरै, भयौ ऐसौ उग्र सिंधु तहां,

देव दनुज मनुज काहू काबू में न आमतौ।।


सगर के सपूतन कौ ऐसौ पूत भयौ सिंधु,

जगन्नाथ जगपति कूँ ऐंठ सी दिखामतौ।

है तौ रघुवंसी,द्वेष मानै जगन्नाथ जू सों

सोचें जगदीश, या कूँ कौन समझामतौ??


15.राघव उचारें, यह सागर जड़ मूढ़ यानें,

मोसों तीन दिना उपवास हू कराए हैं।

मान्यौ नांय मूढ़,उपवास प्रार्थना सों,तभी

कोपे रघुराज धनु बान हूं चढ़ाए हैं।।


जरे जीव-जंतु, हाथ पांय फुले सागर के,

हाथन में थार भेंट पूजा के लाये हैं।

ये हैं जड़ जीव, विनय प्रेम कौ न जानें मोल

दंड लेउ हाथ, तबई काबू ये आये हैं।।


16.राघव ने सागर समुझायौ पुचकारि कैं तौ,

द्वै दिन कूँ मान्यौ फेरि पहलें सौ हाल है।

दुष्ट को सुभाव नांय बदलै सरलता सों,

दंड बिना मानै नांय, मौटी भई खाल है।।


फिर-फिर सोई बात कहें,जगन्नाथ राघव सों,

रघुवर कूँ आयौ तब हनुमत को ख्याल है।

जइयो हनुमंत, सिंधु भयौ है बिगड़ैल-घोड़ा,

काबू नांय आवै, जौं लौं ठुकै नांय नाल है।।


श्री हनुमत लीलाराधन-4

(जगन्नाथ पुरी के बेड़ी-हनुमान की कथा: 

संत-सत्संग के आधार पर)-2

दिनांक 14.6.21 सोमवार

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17.जगन्नाथपुरी कूँ,बचायवे कौ लक्ष्य लिए,

सागर तट आसन पै,हनुमत विराजे हैं।

वीरासन लग्यौ भव्य,कांधे पै गदा सोहै,

केसर सौ वर्ण,स्वर्ण आभूषण साजे हैं।।


पहरा पै बैठ गए,कांधे पे गदाधारि ,

रघुपति के काज सदा हनुमत कूँ छाजे हैं।

सागर ने जैसे तोड़ी,अपनी मरजाद कभू, 

हाथन सम्हारि गदा,ताके पीछै  भाजे हैं।। 


18.कपिसुत की टेक देखि सिंधु भयौ सूधौ तहां,

जब ते तहां आये, नगर सिंधु नहिं डुबायौ है।

जगन्नाथ स्वामी नित भात के खवैया रहे,

हनुमत ने भक्ति सों प्रसाद यही पायौ है।।


मनचाहौ स्वाद नांय मिल्यौ जो पवनसुत कूँ,

अवधपुरी दरसन हित, जियरा अकुलायौ है।

अवधनाथ महलनि के भोग याद आवें दिव्य,

जब ते यहां आए एक लडुआ न पायौ है।।


19.भात खात-खात जिया अतिही अकुताय गयौ

हनुमत कूँ अवध पूरी नित्य याद आवै है।

सिया की रसोई में विविध भांति व्यंजन,जो

निकट ही बिठाय मैया प्रेम सों खवावै है।।


जगत पसारै हाथ, भात जगन्नाथ जू कौ,

मोदक प्रिय हनुमत कूँ तनिक नांय भावै है।

स्वामी कूँ दियौ वचन,लडुअन कौ मोह बढ्यौ

हनुमत कौ हियरा नित अवध हेतु धावै है।।


श्री हनुमत लीलाराधन-4

(जगन्नाथ पुरी के बेड़ी-हनुमान की कथा: 

संत-सत्संग के आधार पर)-3

दिनांक 15.6.21 मंगलवार

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20.रात्रि भई एक दिना मान्यौ नांय मन,तासों

औचक ही अवधपुरी हनुमत पधारे हैं।

मन में भय मानैं सो दरसन हू कीन्हे नांय,

भोग लगाय लडुअन कौ पुरी कूँ सिधारे हैं।।


नियम बनायौ, आप दिन भर रहें सिंधु तीर,

रात्रि अवध आवें, अठवारे पखवारे हैं।

मोदक प्रिय महाबली कौतुकी कृपानिधान,

महावीर मारुति निज भक्तन दुलारे हैं।।


21.सागर हू जानि गयौ चतुराई हनुमत की,

जानि कें रहस्य उदधि मन में मुसिक्यायौ है।

हनुमत ने अर्धरात्रि अवध कूँ उछारि भरी,

सागर ने लहर-लहर पुरी कूँ डुबायौ है।।


जगन्नाथ स्वामी ने देख्यौ जाय सिंधु तीर,

बजरँग बली कौ ओर-छोर हू न पायौ है।

अवधनाथ द्वारे पै पुकार भई, न्याय करौ,

सिगरौ यह खेल राजा राम कूँ बतायौ है।।


22.सागर डुबावै नहीं जगन्नाथ पुरी कबहुँ,

याही हित सेवा सिंधु तीर पै लगाई है।

कैसें आये आप,पुरी छाँड़ि कै,बताए बिना,

सेवा में ढील आज,  कैसें ये दिखाई है??


आप ही बताऔ दण्ड, सेवा में प्रमाद कीन्हों,

हनुमत ने चरण पकरि दीन्ही ये दुहाई है।

भात खाय मेरौ मन अकुतायौ यहां, यासों,

मोदक के मोह में ही, भई ये ढिठाई है।।


श्री हनुमत लीलाराधन-4

(जगन्नाथ पुरी के बेड़ी-हनुमान की कथा: 

संत-सत्संग के आधार पर)-4

दिनांक 16.6.21 बुधवार

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23.अवधपुरी आये नित्य मोदक उड़ाए किंतु कनक भवन दरसन कूँ आप क्यों न आये जी।

चोरी छिपे आये,आज्ञा मानी नांय सेवा की

याही सों, न नाथ निज आनन दिखाए जी।।


जगन्नाथ स्वामी भातखावें और खिलावें नित्य,

खाय-खाय भात, नाथ हम हूँ अकुलाए जी।

लडुआ न मिलें तहां, लडुअन के प्रेमी हम,

लडुअनकौ लोभ जग्यौ, अवध भाजि आये जी।।


24.रघुपति मुसिक्याय कहें, हे प्रभु जगनाथ सुनौ

हनुमत कूँ लडुअन कौ भोग नित लगाऔ जी।

पास इन्हें राखौ कहूँ और भाजि पावें नहीं,

सागर तट राखि इन्हें बेड़िन बँधाऔ जी।।


हाथन हथकड़ी और पायन में बेड़ी पड़ीं,

कहें जगन्नाथ यहीं आसन जमाऔ जी।

भक्तन के काज सदा साधे हनुमंत आप,

बेड़ी हनुमान नाम आज सों धराऔ जी।।


25.जगन्नाथ पुरी दिव्य धाम सिंधुतीर बसै,

बेड़ी हनुमान तहां आज हूँ विराजे है।

भात भोग संग नित्य लडुअन कौ भोग लगै,

द्वार पै नगारे शंख घण्टा नित्य बाजे हैं।


सिंधु हू न आवै,हनुमंत हूँ न जावें कहीं,

लडुअन के भोग भक्त लावें यहां ताजे हैं।

मोदक मन ऐसौ रुच्यौ,बेड़ी डरवाईं पांय,

मारुति कौ नाम लियें,  भूत प्रेत भाजे हैं।।


श्री हनुमत लीलाराधन-5

(हनुमान जी के अवतार की कथा)-1

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 17.6.21 गुरुवार

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26.अंजनी हैं मातु,रुद्र केसरी पवन हैं पिता

एक माय तीन बाप,कैसें तौ बताइए।

भिन्न कल्प भिन्न कथा भिन्न रूप काया भिन्न

हनुमत की लीला दिव्य सुनि कैं न अघाइये।।


पावन चरित्र लोक मंगल करै जु सदा

अंजनि सुत की पवित्र लीला नित गाइये।

बतावें विशेष कथा हनुमत बलधारी की तौ,

सारे कामकाज छाँड़ि सुनिवे कूँ आइए।।


27.इंद्र लोक भव्य जहाँ नितनव रस रंग जमै,

नाचत नवेली दिव्य अप्सरा प्रधान हैं।

सप्तसुर त्रिताल नृत्य सुर लय की बूंद झरें,

बाजत मृदंग औ गन्धर्व करैं गान हैं।।


पुंजिकस्थला तहाँ, दिखावै नृत्य कला,

नारि चंचला स्वभाव,कियौ ऋषि कौ अपमान है।

बन्दरिया सी उछलकूद करै साधु संत बीच,

वानरी कौ रूप तेरे दंड कौ विधान है।।


28.पायौ घोर श्राप पुंजिकस्थला विनीत भई,

मुनिवर के चरनन में शीश जाय नवायौ है।

ऋषि हूं नवनीत हृदय,क्रोध में जु शाप दीन्हों,

ताकूँ शाप मुक्ति कौ उपाय हूं बतायौ है।।


कह्यौ ना असत्य कबहुँ,श्राप होय सांचौ,किंतु

श्राप मत मानै,तैनें दिव्य वर पायौ है।

इच्छारूप धारिणी तू मेरु पै निवास कीजो,

महा काज हेतु विधि-विधान ये बनायौ है।।


(...अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन-5

(हनुमान जी के अवतार की कथा)-2

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 18.6.21 शुक्रवार

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29.शाप सत्य भयौ पुंजिकस्थला विराजीं मेरु,

साधारण वानरी सौ, रूप नांय पायौ है।

वानर की जाति किंतु रूप अप्सरा कौ मिल्यौ,

पूंछ के निसान ही सों वानरी बनायौ है।।


अंजना मिल्यौ है नाम केसरी सौं भयौ ब्याह,

सुत की रखि चाह,  भोलेनाथ कूँ मनायौ है।

शिव शंकर त्रिपुरारी,शूलपाणि की कृपा सों,

तेजवान रुद्र रूप अनुपम सुत जायौ है।।


30.भूमि भार तारन कूँ, हरि कौ अवतार भयौ,

शिव भोले चाहें, कछू सेवा हम हूँ करें।

एकादश रुद्र रूप,शिव शंकर महादेव,

एक अंश तेज अंजनी की कोख में धरें।।


पवन के प्रताप सों भयौ है जन्म मारुति कौ,

पवन तनय आंजनेय,दास पै कृपा करें।

शंकरसुत,केसरी के नंदन हनुमंत मेरे,

पाप-ताप-मोह-कष्ट शाप चित्त सों हरें।।


31.रघुनंदन कहैं भैया,भरत सौ सनेही मेरौ,

मैया कहै मेरौ नैन तारौ हनुमान है।

भरत सत्रुहन विनीत,लखन मेरौ हृदय अंस,

हनुमत अति प्यारौ, मोय भरत के समान है।।


राघवेंद्र ने सरीर राख्यौ है मानुस कौ,

हनुमत कपि काया में लीला कौ विधान है।

हनुमत कपिनायक, क्यों राघव के भैया भये,

कल्प भेद लीला के नित नव अनुमान हैं।।


(.....अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन-5

(हनुमान जी के अवतार की कथा)-3

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 19.6.21 शनिवार

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32.अवध के नरेश महाबली राज राजेश्वर,

दसरथ भये वृद्ध,नांय एक हु सन्तान है।

होय नहीं पूत,वंश कैसे बढ़ै दसरथ कौ,

पूत के बिना न होय,मुक्ति को विधान है।।


ऋष्यश्रृंग मुनि ने करायौ पुत्र काम जग्य,

कर्म में पधारे कोटि मुनिवर विद्वान हैं।

अग्नि देव खीर कौ प्रसाद लै कैं प्रगट भये,

बाँटत वशिष्ठ, होय उत्तम सन्तान है।।


33.तीनभाग बंटी खीर,बड़ौमिल्यौ कौसिला कूँ,

मंझलौ सुमित्रा,छोटौ कैकई ने पायौ है।

छोटौ भाग देखि छोटी रानी भईं अनमनी सी,

मोकूँ छोटी जानि, अल्पभाग ये रखायौ है।।


खीर कूँ हथेरी पै राखि कै विवाद करै,

कैकई के कारण एक संकट नयौ आयौ है।

एक गगन-चारी चील दौना कूँ झपटि परी,

दौना गयौ, कैकयी कौ धैर्य हूँ छुटायौ है।।


34.रोवत कैकयी रानी, कौसिला ने धर्यौ हाथ,

एक भाग स्वयं और सुमित्रा सों बनायौ है।

अग्नि कौ प्रसाद यों खवायौ कैकयी कूँ पुनि,

आपनौ चरू हू दोऊ, प्रेम भाव पायौ है।।


चरु भक्षण कीन्हों,तीनों गर्भ सों भईं सुकाल,

कौसिला ने राम,भरत कैकयी ने जायौ है।

लखन सत्रुसूदन सुमित्रा के लाल दोऊ,

तीन लोक त्राता, मनुज रूप लियें आयौ है।।


(.....अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन-5

(हनुमान जी के अवतार की कथा)-4

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 20.6.21 रविवार

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35.चील उड़ी कैकई के हाथ सों छिनाय दौना,

मेरु सिखर केसरी औ अंजना निवास है।

घोर तप निभावें करें भक्ति भूत-भावन की,

गुणनिधि सन्तान मिलै हृदय यही आस है।।


शिव प्रसन्न भये, बोले-पुत्र होय मेरौ रूप,

पवन हू सहाय करें, मन्त्र लेउ खास है।

करतल पसारे मन्त्र जपैं अंजनी सुमेरु,

करैं ध्यान योग सिद्धि,  रोकें निज स्वास हैं।।


36.चील चरू लैके उड़ी , अंधड़ घनघोर चल्यौ,

सिकुड़न लगी चील,छुट्यौ चौंच, खीर दौना है।

वायु देव पहलें ही मुग्ध भये अंजना पै,

खीर कूँ उड़ायौ मिल्यौ अवसर सलोना है।।


पायस गिर्यौ आय माता अंजनी के करतल पै,

शिव कौ प्रसाद मानि, लीन्हौ खीर दौना है।

गर्भ धर्यौ अंजनी ने लीला ये विचित्र भई,

रुद्र अंश रूप पायौ मारुति सौ छौना है।।


37.शंका मन होय, चील खाई क्यों न पायस कूँ,

लिए लिए फिरी, याकी कथा यौं बतावें हैं।

ब्रह्मलोक माहिं दिव्य अप्सरा दिखावै नृत्य,

चंचला सुवर्चसा कौ चित्त विचलावै है।


काम भाव जग्यौ सोई भूली सुर ताल तहाँ,

ब्रह्मा कहैं चील जैसे भाव तू दिखावै है।

मर्त्य लोक जाय, निज जीवन बितावै, 

सोई अप्सरा सुवर्चसा ही चील बनि आवै है।।


38.छिमा मांगै अप्सरा,तौ ब्रह्मा कहैं सांचौ श्राप,

चील तौ बनैगी किंतु मुक्ति वहीं पावैगी।

पुत्रकाम जग्य करैं अवध के नरेश जबै,

जग्य पूर्ण होय तू प्रसाद लै उड़ जावेगी।


खीर लिए उड़ी फिरै किंतु खाय पावै नहीं,

अंजना के करतल में,ताहि तू गिरावैगी।

चरु कौ स्पर्श पाय चील कौ सरीर त्यागि,

अप्सरा कौ रूप लैकें ब्रह्म लोक आवैगी।।


(....अशेष)💐💐




श्री हनुमत लीलाराधन-5

(हनुमान जी के अवतार की कथा)-5

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 21.6.21 सोमवार

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39.कातिक कृष्ण चौदस कूँ,

शुभ तिथी महूरत में,

केसरी के सदन, रुद्र

हनुमत ह्वै आये हैं।

रुद्र अंश,पवन कौ प्रयास,

केसरी कौ नाम,

याही हेतु भिन्न पिता,

भिन्न नाम पाए हैं।।


अग्नि कौ प्रसाद 

अंजनी कूँ मिल्यौ याही हेतु,

भरत जैसौ भ्राता कहि,

राघव उर लाये हैं।

कोई कहें, चैत्र पूर्णिमा कूँ

अवतार लीन्हों,

हनुमत चरित्र,भक्त

कोटि भांति गाये हैं।।


40. मंगल निधान

हनुमान ज्ञानवान धीर,

संकट के मोचक,

प्रभु, संकट विदारिये।

भक्तन प्रतिपाल प्रेमी,

राघव के कृपापात्र,

सेवक कूँ एक बेर

दृष्टि भरि निहारिये।।


जग में जंजाल कोटि,

बाधक हैं भक्ति हेतु,

कृपानाथ ऐसे,

जंजाल कूँ निवारिये।

सेवक अनुगामी,

सारे कारज करैगौ स्वामी,

मेरे आगें गदाधारी,

आप ही पधारिये।।


41.आंजनेय पवनपुत्र

धीर वीर महावीर,

सीतापति चरनन के,

सेवक हनुमान हैं।

गिरिवर धारी विशाल,

काया में स्वर्ण-आभ,

वेद शास्त्र ग्रंथ अरु

पुराणन विद्वान हैं।


भक्तन की भीर हरें

दीनन की पीर हरें,

सरल शीलवान

कोटि कोटि गुण निधान हैं।

माया की जड़ता कूँ

मन सों मिटाए देत,

साधु संत भक्तन कूँ

जीवन धन प्रान हैं।।


42.सीता सुधि लाये 

प्रभु लंक हू जराय आये,

भक्तवर विभीषण

प्रभु राम सों मिलाए हैं।

संजीवन बूटी कूँ

लाये सहजहिं उखारि

संग-संग कालनेमि

हू कूँ मारि आये हैं।।


भ्राता सों भीत भयौ,

रघुपति कौ मीत बन्यौ,

राम काज हेतु रीछ 

वानर लगाए हैं।

ऐसे हनुमंत ज्ञानवंत,

एक काज मिल्यौ,

ता कारज संग,

कोटि कारज सधाए हैं।।


(.....अशेष)💐💐


इससे आगे बालक हनुमानजी की लीलाएं

पठन कीजिये।-जय बजरंग बली💐☺️ 

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श्री हनुमत लीलाराधन-6

(बाल-हनुमान जी की लीला कथा)-1

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 22.6.21 मंगलवार💐💐

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43. हनुमत निष्काम भाव सेवा सों प्रसन्न होयँ,

झूठे ढोल डम्बर कूँ नैक ना बजाइयो।

कपिसुत हुंकारै,कष्ट मोह काम छारि करै,

राघव जो रूठें, एक हनुमत मनाइयो।।


पिंगली विशाल स्वर्ण शैल सी है काया याकी,

रूद्र-रूप, राघव-प्रिय मारुति गुण गाइयो।

चित्त न भटकावै, निज भक्ति फल पावै,

कहूँ और मति जइयो एक मालिक बनाइयो।।


44.रत्न जड़ित कुंडल,धारे हैं जन्मजात आप,

टोपी मणि जड़ित आप मस्तक पै धारे हैं।

कछनी काछे नवीन,मूंज मेखला लगाया,

हाथ वज्र लिए,भक्त कोटिक उधारे हैं।।


काँधे यज्ञोपवीत शोभा मुख की अनूप,

एक पल निहारें ताहि लगें अति प्यारे हैं।

अंजनी के लाल,वीर मारुती दयाल प्रभू,

भक्तन के रक्षक हनुमान जी हमारे हैं।।


45.पालने पौढ़ाय मैया वन कूँ गईं हैं आज,

जागे हनुमान कछू खायबे की आस में।

खीर पूड़ी मालपूआ लडुआ और दूध नहीं,

कोई फल मिठाई आज दीखै नहीं पास में।


दृष्टि पड़ी बाल सूर्य, उगे हैं अकास मध्य,

फल ये चमकीलौ जानि उडि चले अकास में।

भूखे हनुमंत भानु लीलबें कूँ चले तहाँ,

सुंदर से या फल कूँ खायबे एक सांस में।।


(.....अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन-6

(बाल-हनुमान जी की लीला कथा)-2

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 23.6.21 बुधवार💐💐

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46.मूसेन के पूत भिटे खोदिबौ न सीखें कहूँ,

हिरन के छौना हू जनम ते मारें चौकड़ी।

पवन के सपूत अनायास उड़े व्योम बीच,

संग में न रुद्र चले और न पिता केसरी।।


पुत्र चल्यौ पूर्व दिशा,रक्षा हित पवन चले,

मावस तिथि सूर्य ग्रहण पर्व ह हूँ विशेष री।

राहु चल्यौ ग्रसन हेतु सूरज कूँ ताकि रह्यौ,

दानव वह अमर मात्र मस्तक अवशेष री।।


47.राहु ने निहारयौ पूर्व दिशा में बढ्यौ प्रकाश,

एक सूर्य संग दूजौ सूर्य कहाँ आयौ जी।

मारुति ने जान्यौ कोउ बालक फल खायबे कूँ,

मेरे ही समान फल हेतु यहां धायौ जी।।


पूँछ में लपेट्यौ राहु पटक्यौ घुमाय नीचें,

गेंद सो उछारि ताकूँ कोसन लुढ़कायौ जी।

चीख मारि भाग्यौ गयौ,इंद्र की सभा में,इंद्र

सोचें यह महाबली वीर कौन आयौ जी??


48.सूर्य लोक चले इंद्र संग लिए राहु,तहाँ

ठाढ़े हनुमंत सूर्यदेव कूँ निहारते।

हनुमत ललकारें युद्ध छिड़यौ घमासान,पूँछ-

में लपेटि ऐरावत-पटकि पटकि मारते।।


जान्यौ कोउ श्वेत फल, झपटे ऐरावत पै,

इंद्र ने निकार्यौ वज्र, हाथन सम्हारते।

वज्र है अमोघ अस्त्र,इंद्र कौ प्रहार कठिन,

ठोड़ी लग्यौ वज्र गिरे,मैया कूँ पुकारते।।


(....अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन-6

(बाल-हनुमान जी की लीला कथा)-3

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 24.6.21 गुरुवार💐💐

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49.मूर्छित हनुमंत देखि

पवन भये रूष्ट,

गोद राखे हनुमान

बैठे कंदरा में जाय कें।


रोकी गति पवन,

तीन लोक जीवजन्तु,

देव दानव दनुज

भाजें इत-उत अकुलाय कें।।


ब्रह्मा विष्णु रुद्र योगी

ऋषि मुनि गन्धर्व सभी

पहुंचे समुझायबे हरि,

अगुआ बनाय कें।


पवन देव बैठे मिले,

गिरिवर की गुफा मध्य

रोवैं बाल मारुति कूँ 

हिय सों लिपटाय कें।।


50. समुझाए पवन देव

चिंता नहीं कीजै आप,

बालक तिहारौ

महाबली बनि जावैगौ।


वायु अग्नि जल रक्षित

बाल हूँ न बाँको होय,

अंजनी कौ लाल 

वंश कीरति बढावैगौ।।


नवनिधि वरदान पाय

अष्ट सिद्धि दाता बनि,

काल कौ हू काल

दीर्घ जीवन यह पावैगौ।


हनु पै पड़ी है चोट,

वज्र की कठोर तासौं,

सिगरौ जग याकूँ

हनुमान कहि बुलावैगौ।।


51.वायुदेव ह्वै प्रसन्न

हनुमत कूँ अंक लाय,

अंजनी की गोद में,

निशंक डारि आये हैं।


मैया मन मुदित होय,

फूली न समाय द्वार,

दान पुण्य कीन्हे,

कोटि बाम्हन जिमाये हैं।।


सबसों वरदान पाय,

हृष्ट पुष्ट काया भई,

माता पिता बन्धु,

तीनों लोक सुख पाए हैं।


आंजनेय पवनपुत्र

मारुति बजरंग वीर,

भक्तन में प्यारौ 

हनुमंत नाम पाए हैं।।


(......अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन-6

(बाल-हनुमान जी की लीला कथा)-4

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 25.6.21 शुक्रवार💐💐

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52.सूरज के निकट जाय विविध भांति विद्या पढ़ीं,

अल्पकाल वेद शास्त्र पंडित भये मारुती।

रण विजयी महाबली अजर अमर गुण निधान

तनय देखि मैया तापै, तन मन धन वारती।


कबहुँ करै राई नौन माथे पै दिठौना देय

कबहुँ धेनु पुच्छ सों अमंगल कूँ झारती।

सुंदर सुत पाय माता अंजनी निहाल रहै,

लग न जाय  नज़र सो उतारै वाकी आरती।।


53.वानर की चपल देह इत उत उत्पात करै

ऋषि मुनि ज़न मध्य जाय करत ये धमाल हैं।

दाढ़ी कूँ हलावें और जटा कूँ बिखरावै,पात्र

इत उत लुढ़कावें फारि डारें मृग छाल हैं।।


काहू के कमंडल सों जल पीवैं फल खावें,

वरदानी शक्ति पाय बने ये बवाल हैं।

'शक्ति भूल जाओ' यह शाप जो मुनिवृन्द दीन्हों,

आश्रम निवासिन कूँ शाप बन्यौ ढाल है।।


54.भूले निज शक्ति कौ प्रवाह, भाव सरल भयौ,

बालक हनुमान घूमें ग्राम भवन बाग में।

राम नाम कौ प्रकाश अंतर्मन मध्य जग्यौ,

डूबे रहें बजरंगी,राघव के राग में।।


वरदानी काया कूँ किंचित भय रह्यौ नांय,

आंधी बरसात वज्र अस्त्र शस्त्र आग में।

बदल गए पवनपुत्र जग कूँ सुखदायक भये,

संकट मोचक कहाए, प्रभु के अनुराग में।।


(....अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन-6

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-5

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 26.6.21 शनिवार💐💐

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55.स्वामिभक्त सेवक की टेक हू बनाय राखी

स्वामी की रक्षा करी, रक्षक कहाए हैं।

साँचे तुम सखा और सचिव हू अनौखे भये,

स्वामी सुग्रीव सदा विपति सों बचाये हैं।।


बाली से बलधर ने बल कौ सम्मान कीन्हों,

'रावण के विजेता' नांय तुम सों टकराये हैं।

स्वारथ विहीन सेवा सिद्धि के प्रणेता आप,

मित्र सचिव सेवा धर्म आपने निभाये हैं।।


56.वानर प्रजाति बलवान भीम काया धारी

कपिन्ह के यूथपति केसरी बनाये हैं।

राजा ऋक्षराज कीन्हों,गए परलोक

श्रेष्ठ वाली किष्किंधा  सिंहासन पै बिठाए हैं।।


सुग्रीव भ्राता सों प्रेम राखैं आत्म हू सों बढ्यौ,

सचिव के रूप हनुमंत पधराये हैं।

दानव असुर नाग किन्नर अनेक जाति,

वालि ने बिना प्रयास सेवक रखाये हैं।।


57.वाली सुग्रीव में विवाद भयौ जब बिसेस,

संग में सुग्रीव लिए मित्रता निभाई है।

वाली सों भयौ भीत, भ्राता सुग्रीव ताकूँ

प्रानन की रक्षा हेतु युक्ति हूँ बताई है।।


त्रेता युग मध्य राम रूप धरि पधारे नाथ ,

ऋष्यमूक पर्वत पै पड़े जो दिखाई हैं।

राघव सुग्रीव दोऊ आपकी कृपा सों मिले,

अग्नि कूँ समक्ष राखि मित्रता कराई है।।


(...अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन-6

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 27.6.21 रविवार💐💐

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58.वाली मदमातौ राज पाय अहंकारी भयौ,

भ्राता की तिया पै नीच दृष्टि हूँ उठायी है।

मारि कै भगायौ भ्रात, घात करै प्राण हेतु,

ऋष्यमूक गिरि निवास योजना बनाई है।।


ऋषि मतंग श्राप दियौ,यासों वहां आवै नहीं,

यहां ना दिखावै,कपिराज कुटिलाई है।

शाप कौ कवच पाय बचायौ सुग्रीव मीत,

रक्षक यहां पै मारुती की सचिवाई है।।


59.राघव सिय लखन संग पायौ वनवास

पंचवटी दिव्य लीलाभूमि अनुपम सुखपायौ है।

स्वर्ण मृग दिखायौ,सीता राघव पठाये,पर्ण-

कुटी भई सूनी दम्भ रावण रचायौ है।।


जनक दुलारी कूं उठाय चल्यौ दश-आनन,

वाटिका अशोक माहिं तिनकूँ बसायौ है।

मार्यौ मारीच, राम लौटे जब पर्णकुटी,

सिया कूँ न पायौ,राम जियरा अकुलायौ है।।


60.संग लखन लिए राम,सीता की करें खोज,

वन-परबत,नदी आप खोजि-खोजि हारे हैं।

ऋष्यमूक पम्पासर, वानर-पति करें वास,

शबरी पै कृपा करी, राघव पधारे हैं।।


हनुमत अति बुद्धिमान ब्राह्मण को वेश धरे,

रघुवर के चरनन में सरवस निज वारे हैं।

राघव और लखन आप काँधे पै राखे अरु,

सम्मुख सुग्रीव आय,खोले हिय द्वारे हैं।।


(....अशेष)💐💐

श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 28.6.21 सोमवार💐💐

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61.कपिवर सुग्रीव शक्ति बुद्धि के निधान इन्हें,

साक्षी रखि अग्नि, मित्र आपुनौ बनाइये।

वाली मदमातौ त्रास दाता भयौ सज्जन कौ,

किष्किंधा नगर ताके त्रास सों बचाइए।।


मित्र की सहाय मिलै, सीता सुधि पायबे में,

वाली कूँ मारि नृप सुग्रीव कूँ रखाइये।

वानर अरु रीछ जन्म जन्म सों प्रतीच्छा करें,

रामादल मध्य तिन्हें जोरि अपनाइए।।


62.सीता सुधि लाइबे कूँ वानर दल फैलि गयौ,

दक्खिन दिसि राघव,हनुमंत कूँ पठायौ है।

अंगद अरु जामवंत महाबली वीर चले,

सम्पाती गीध इन्हें खायबे कूँ धायौ है।।


वीर पवन पुत्र बुद्धिमान चतुर ज्ञानवान,

जटायु की कथा कह,सम्पाती समुझायौ है।

संकट परे पै नाम सुमिरै बजरंगी कौ,

वानर दल वीरन कौ जीवन बचायौ है।।


63.कहैं जामवन्त मैंने सात परिकम्मा दयीं,

जब श्री हरि विष्णु ने विराट रूप धार्यौ है।

अंगद उचारें पार जाय सकूं सिंधुतीर,

लौट कै जो आऊं सो सामर्थ्य ना सम्हारयौ है।।


विविध भांति योजना बनावें सिन्धु पार हेतु,

भये सब निरास प्रान संकट में डारयौ है।

जागे हनुमंत जामवंत ने करायौ बोध,

एक गर्जना ने सिगरौ संकट संहारयौ है।।


(......अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 29.6.21 मंगलवार💐💐

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64.श्राप के प्रभाव सों सुभाव सांत भयौ,आज

शक्ति के निधान मौन धारि कै विराजे हैं।

भूले पुरुसारथ निज सक्ति हूँ भुलाय बैठे

राम नाम रटें बैठि खावें फल ताजे हैं।।


वायु पुत्र रुद्र अंश वरदानी कपिवर कूँ,

ठाढ़े देखि भय भ्रम संदेह दूरि भाजे हैं।

राम दूत पवन पूत मारुति बलवीर आज,

चले सिंधु नाघिबे कूँ रामजी के काजे हैं।।


65.कहैं हनुमंत बलवंत जामवंत सुनौ,

करनौ मोय कौन काज आप ही बताइए।

सिंधु कूँ सुखाय सुगम मारग बनाऊं,जाय

लंक कूँ उखारि डारूँ आपु ही समझाइए।।


सिया मातु तीन लोक कहूँ पै छिपाई होंय,

निश्चय सुधि लाऊँ आपु धीरज न डिगाइये।

लौटि कै न आऊं सिया सुधी ना सुनाऊं,आप

ता दिन तक बैठि राम राघव गुन गाइये।।


66.ब्रह्मचारी तेजपुंज राम के दुलारे वीर,

अंजनि सुत मारुति कौ व्यापक यश गान है।

इन्द्रिय कौ दमन त्यागि प्रज्ञा शम नियम संग

रघुवर वश कीन्हे,आप ज्ञान के निधान हैं।।


सीता सुधि ल्याइबे कूँ बुद्धि की परिच्छा दीन्ही,

सुरसा ने ह्वै प्रसन्न दीन्हों वरदान है।

दसमुख कौ अहंकार राक्षस कुल नासक भयौ,

ताहि लीलिबे कूँ चल दीन्हे हनुमान हैं।।


(.......अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 30.6.21 बुधवार💐💐

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67.एक ही छलांग मारि बैठे जाय वृक्ष पै,

करी है राम नाम की त्रिलोक व्यापी गर्जना।

भूधर विकराल काया स्वर्ग छुअन लगी मानों,

राम काज हेतु कीन्ही वपु की नव सर्जना।।

स्वर्ण शैल देह लिए लंक कूँ प्रयाण कीन्हों

रोक नांय पावें याकूँ काल हूँ की वर्जना।

राम काज हृदय धारि सिंहिका पछारि

आय गए लंक द्वार,करें देव पुष्प अर्चना।।


68.सह न सकें वृक्ष भार गति कौ नहिं

लगै पार, महा वृक्ष टूट टूट सिंधु में समाए हैं।

पुष्पित और फलित डाल,रूप धरे महाकाल

गर्जना कराल सुनी, गर्भ हूँ गिराए हैं।।

अद्भुत पुरुषार्थ भयौ विस्मय चरित्र देखि,

सागर जल जंतु सिंधु गोद में छिपाए हैं।

पंछी जाय छिपे नीड़ नभ मंडल भई भीड़

लंक में अमंगल लखि दानव अकुलाए हैं।।


(...अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 1.7.21 गुरुवार💐💐

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69. वायु वेग लिए उड़े जावें हनुमंत धीर

हिमसुत मैनाक मेरु सेवा कूँ ठाढ़ो है।

बिनती कर जोर कहै,पल भर विश्राम कीजै,

सिंधु नाघिबे में आप कीन्हों श्रम गाढ्यौ है।।


रामकाज कीन्हे बिना मोकूँ विसराम कहाँ,

धन्यवाद दीन्हों और हृदय प्रेम बाढ्यौ है।

नागमातु सुरसा तहाँ आयी जो परिच्छा लैन

बुद्धि के निधान ने निज कौसल सों पछार्यौ है।।


70.ठाड़ी भई सुरसा कपीस आगें मग रोक्यौ,

भूख लगी मोकूँ आज तोही कूँ खानौ है।

सुर गण की प्रेरणा सों आयी हूँ यहां पैआज

मोसों बचिबे कूँ चलै एक ना बहानों है।।


कहाँ जाय रह्यौ वायु कौ प्रचंड बेग लिये

कहूँ खोय गयौ तेरौ माल और खजानों है।

कहत यों कपीस मैया रस्ता न रोकि आज

सिया सुधि हेतु मोकूँ घनी दूर जानौ है।।


(....अशेष)💐💐



श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 2.7.21 शुक्रवार💐💐

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71. हृष्ट-पुष्ट काया तेरी बात तौ बनावे मती 

कहैं  हनुमंत मैया मुख तौ उघारिये।

चार कोस मुख फ़ारयौ,कपि ने बढाई काया

बार बार उकसावें, नैंक और फारिये।।


मुख जो बढायौ शत योजन कौ सुरसा ने,

लघु रूप राख्यौ,बोले- "और ना पसारिये।

उगल्यौ नहिं चखै कोउ,भोजन असुद्ध भयौ,

मेरौ मग रोकि राम काज ना बिगारिये।।


72.कारज होंय सफल सुरसा दैकें आशीष चली

राहु मातु सिंहिका ने छाया रोकि लीन्हों है।

छाया रोकि यातुधानी जीव जंतु भक्षण करै,

दीर्घ छाया देखि कोई बड़ौ जीव चीन्हों है।।


मुक्का मुख दियौ तानि, बिखरि गयी ऐंचतान,

कृपासिंधु हनुमत ताहि दिव्य लोक दीन्हों है।

सिंधु पार भये ठाढ़े कीन्ही घोर गर्जना, सो

राम कृपा पाय आज महाकाज कीन्हों है।।


(.....अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 3.7.21 शनिवार💐💐

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73.सागर कीन्हों है पार हनुमत कौ बल अपार

लंक की धरा पै उतरि आये छाती तान कै।

लंकिनी है ठाड़ी लंका नगर की रखवारी करै,

पावै ना प्रवेश,बिना ताके संज्ञान के।।


लघु स्वरूप धरि कै हनुमंत जो घुसन लागे,

बाट रोकि ठाढ़ी भई,आगें हनुमान के।

कह्यौ अपशब्द,कुपित ह्वै कै तब हनुमत ने

मारी एक मुठिका,  तारे दीखे आसमान के।।


74. रावण के भवन बीच सीता कूँ खोजि रहे

नारिन के झुंड देखि हनुमत चकराए हैं।

भांति भांति रूप वेशभूषा हू अनन्त देखीं,

जनक नंदिनी के कहूँ दरशन नांय पाए हैं।।


देख्यौ एक तरुवर,शांत योगिनी सी बैठी नारि

मारुति के नैन ताकूँ देखि भरि आये हैं।

देखि कै भरोसौ भयौ,सिया जू पहिचान लईं

दर्शन सों शक्ति पाय,हिय में हरषाये हैं।।


(.....अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 4.7.21 रविवार💐💐

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75. मन मैं विचार कीन्हों, मैं हूँ बाल ब्रह्मचारी

 नारिन कूँ देखि, तप आपुनौ गँवायौ है!

सोचन लगे हैं कपिराज राम काज हित

महलन में घूम्यो, चित्त नैक ना लुभायौ है!!


जानकी कूँ देख्यौ दीन दसा में विराजे भये

मारुति कौ हृदय करुणा सों अकुलायौ है,

रामकाज पूरन कियौ,सिया जु की खबर पाई 

'चार राच्छसी' बिलोकि,पाप नांय कमायौ है।।


76.मच्छर सौ रूप लैकै लंक में प्रबेस कीन्हों

राम नाम धुनी आकें स्रवन में समाई है।

मन में विचारें यहां राम बोला भयौ कौन

रावण ने कीन्ही यामे कोउ चतुराई है।।


राघव शर चाप कौ निसान लग्यौ द्वारन पै

अंगना में तुलसी की वेदिका सुहाई है।

मारुति नहीं जानै यहां बस्यौ परम् रामभक्त

यानें लंक मध्य इक अयोध्या सी बसाई है।।


(*****अशेष)💐💐

श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 5.7.21 सोमवार💐💐

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77.सिया कूँ न पायौ,ठाढ़े मारुती विचार करें

बिना सुधी लाये मैं हूँ लौट कै न जाउंगो।

बन में रहूँगो जैसें साधु-संत कुटिया पै,

आजीवन राघव कूँ मुँह ना दिखाउंगो।।


राम नाम पावन त्रिलोक कूँ करै है सोई,

नाम  मैं रटूङ्गो जन्म यहीं पै बिताऊँगो।

राघव ने क्रोध करि प्राण हूँ समेटे मेरे,

तनिक नांय चिंता,भव-सिंधु पार जाउंगो।।



78.देखि कै विभीषण कूँ हिय में परतीत भई

सज्जन यह लगै मेरौ काज बनि जावैगौ।

राम कौ उपासी यह लंक में निवास करै,

मैं हू रामभक्त मेरौ संग यह निभावैगौ।।


लंका पति रावण करैगौ अपमान तबई

लंक त्यागि राम की अनी में मिल जावैगौ।

शत्रुन के झुंड बीच साँचो हितकारी मिल्यौ,

सिया सुधी हेतु यही मातु सों मिलावैगौ।।


(अशेष....)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 6.7.21 मंगलवार💐💐

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79.विभीषण ने बताई वाटिका अशोक जहां,

रावण ने मातु सिया लाय कै बिठाईं हैं।

मोह में पड्यौ ये मूढ़ जान नहीं पायौ,

सिया,रावण कूँ नांय लंका कूँ हूं दुखदायी हैं।।


देखी जो दसा तौ भरि आये मारुती के नैन,

ऐसौ है प्रतीत, मीन नीर सों हटाई है।

अंत काल आयौ दुष्ट रावण कौ,सिया सुधी

मिलते ही राघव कूँ करनी चढ़ाई है।।


80.देखीं माय जानकी जो अति कृश-गात

मुख सूखन लग्यौ है,शीश केश उरझाने हैं।

सोचें हनुमंत,कैसें बात मैं बनाऊं,

मातु समझैगी माया,वाकूं लगें ये बहाने हैं।।


राघव की लीला गुणगान यशगान अब

सिया समुझायबे कूँ,गाय कै सुनाने हैं।

विरह व्यथा में डूबीं जानकी यहां पै और

वहां राम विरह सिंधु गहरे उतराने हैं।।


(..अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 7.7.21 बुधवार💐💐

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81.जानकी कौ दिव्य रूप शील औ सुभाव देख

वीर हनुमंत भाव सिंधु में डुबायौ है।

मंदोदरी आदि बहु रानी यातुधानी संग,

सिया कूँ लुभायबे रावन तहाँ आयौ है।।


रावण ने भोली सीता मैया कूँ अनेक भांति,

डाँट फटकार कै डरायौ धमकायौ है।

रावन जो गयौ लौटि, मारुति ने साधे सुर,

सिया कूँ राघव लीलागान हू सुनायौ है।।


82.सिया पहचानी सुनी राम की कहानी,

कहूँ रावन माया सों कपि रूप लै कें आयौ है।

कपि ने बतायौ लायौ मुद्रिका सम्हारि, राम

राघव कौ समाचार सिय कूँ बतायौ है।।


सिय ने आसीस दीन्ही,बुद्धि के निधान बनौ

मारुति ने मातु कौ असीस सीस लायौ है।

मैया कौ आदेस पाय मारुति ने वाटिका में,

फल खाय वृक्ष तोरि द्वंद ही मचायौ है। 


(...अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 8.7.21 गुरुवार💐💐

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83.छोटी सी है काया,औ निशाचरी है माया,तुम

नैक सौ सरीर लै कें कैसें लड़ पावौगे।

सुनि कै कपीस ने बिसालता बढ़ाई, भयौ

सिया कूँ भरोसौ, बोलीं-जीति कै ही जावौगे।।


सागर कूँ पार करि प्रभु कौ बढायौ जस,

वीर महावीर याकूँ ऊँचौ ही उठावौगे।

लंका के बिनास हेतु राघव कूँ संग लै कें,

मोकूँ है भरोसौ,पुनि लौट यहां आवौगे।।


84.सिया कौ आसीस पाय वाटिका में आये

और फल खाय वृच्छन उजारिबे लगे हैं जी।

वानर बिसाल देख्यौ वृच्छन गिरांतौ भयौ,

रच्छक बचावें प्रान भाजिबे लगे हैं जी।।


वानर की प्रकृति सहज उतपाती होय

कपि हनुमान अब जागिबे लगे हैं जी।

कपि की हुंकार घोर गर्जना सुनी तौ,

कमजोर जातुधान मल त्यागिबे लगे हैं जी।।


(....अशेष)💐💐



श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 9.7.21 शुक्रवार💐💐

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85.एक फल खावें चार कुतरि गिरावें,शाखा

जोर ते हिलावें और मारत उछार हैं।

दाँत किटकावें औ भृकुटि चमकावें,पूँछ

ऊँची लहरावें करें खूब तकरार हैं।।


द्वार पाल शस्त्र लै कें मारन जो धाये,टांग

पकरि उठाये दीन्हे भूमि पै पछार हैं।

वाटिका अशोक नाक बनी है लंकेश की सो,

मारुति 'कृपा' सों बनी जंगल उजार है।।


86.काहू कूँ तमाचे चार कहूँ मुक्का लात मार

नाक-कान, दाँतन सों काटि कै पठाये हैं।

भूमि पै पछारे द्वारपाल घबराए,और

रावन की सभा बीच ठाढ़े अकुलाए हैं।।


एक महाबली औ विशाल कपि आयौ, वानै

वाटिका उजारी हम मारि कै भगाए हैं।

रावन विचारै ऐसौ वीर कौन आयौ जानै

रच्छक समूह कूँ दिखाये दिन-तारे हैं।।


(...अशेष)💐💐



श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 11.7.21 रविवार💐💐

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87. रावण ने भेजी सेन कपि कूँ भगायबे,सो

मारुति ने सारी सेन मारि कै भगायी है।

एक सुत अक्ष आयौ,जम लोक कूँ पठायौ,

इंद्रजीत संग महा सेन तब आयी है।।


ब्रह्मपाश कीन्हों जो संधान इंद्रजीत ने

तौ मारुति ने जान लीन्ही वाकी चतुराई है।

बांधे हनुमंत सभा मध्य चल्यौ इंद्रजीत,

ताकूँ भय कैसौ जाके स्वामी रघुराई हैं।।


88.पूत वायुदेव के भगत सांचे राघव के,

विघ्न के विनासी हनुमंत बलधारी हैं।

सिया कौ मिटायौ सोक,विघ्न कौ बिनास कीन्हों,

दीन के दयालु रुद्र रूप अवतारी हैं।।


राम की प्रसन्नता कूँ एक पांय ठाढ़े रहें

लंक में भ्रमत एक योजना विचारी है।

आये दरबार मध्य,सिंह से बिलोकें,

सोईरूप लैकें नाथ,रच्छा कीजिये हमारी है।।



श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 12.7.21 सोमवार💐💐

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89.कोप्यो दससीस, कहै-कहाँ सों तू आयौ?

और कौन माय-बाप?काहे उपवन उजारयौ है?

शक्ति कौ अपार स्रोत पायौ है कहाँ सों? और,

कैसें करि अक्ष महाबली तैं  सँहारौ है??


तेरौ कहा काम यहां असुरन में आयबे कौ?

बड़ौ भागसाली जो तू असुरन नहीं मार्यौ है।

डरपत हैं तीन लोक,देव दनुज मनुज मोसों

तू नांय भय मानै? ऐसौ कौन सौ सहारौ है??


90. बोले हनुमंत, मैया अंजनी कौ जायौ वीर, केसरी कौ पूत तुच्छ सेवक प्रभु राम कौ।

जगजननी सीता कौ समाचार लाइबे कूँ,

सिंधु नाघि आयौ लै सहारौ हरिनाम कौ।। 


भूख लगी खाए फल,मारिबे लगे जो मोकूँ,

तिनकूँ मैंने हूं पथ दिखायौ यम धाम कौ। 

चरण पकड़ प्रभु की,करुणानिधान करें कृपा 

लडिबे जो गयौ तौ रहै न  काहू काम कौ।।


अशेष💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 13.7.21 मंगलवार💐💐

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91.चोरन की भांति आयौ लंका नगरी में यातें,

सुनि लै तू दण्ड पायबे कौ अधिकारी है।

कहैं हनुमान मैं तौ वृच्छन पै सदा रहूं,

कहै मोकूँ चोर?बड़ी चोरी तौ तिहारी है।।


अक्ष ने बिगारयौ कहा?प्राण हरण कीन्हे ताके

मृत्यु दंड दऊँ यही योजना हमारी है।

जान कै न मार्यौ, बेटा दुर्बल तिहारौ हतो,

मैंने वाकूं एक लात धीरै ही तौ मारी है?


92.क्रोध में जरे जो गात रावण दहाड़ पड्यौ

वानर कूँ टांग पकरि भूमि पै पछारिये।

सुनि कै ये,हाथ जोरि विभीषण ठाढ़े भये,

नीति के विरुद्ध नाथ दूत कूँ न मारिये।।


छोटौ सौ बानर ये,महाबली लंकधीश,

अपनौ ये क्रोध नाथ या पै न उतारिये।

बोल्यौ दससीस पूँछ कपि कूँ अति प्यारी लगै,

तेल में डुबाय याकी पूँछ कूँ पजारिये।।


(अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 14.7.21 बुधवार💐💐

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93.रावण ने आज्ञा दयी पूँछ कूँ जरायबे की

सिगरे जातुधान याकौ उद्यम करिबे लगे।

तेल वस्त्र रुई लाख चर्बी घृत ढोय ढोय,

हनुमत जहां ठाढ़े तहाँ लाय धरिबे लगे।।


कपिवर ने काया तब भूधर समान कीन्हीं

स्त्री बाल वृद्ध,ताकूँ देखि कै डरिबे लगे।

पूँछ लगी आग,सारे बन्ध तोरि त्याग

मारी एक जो उछार शंका हिय में भरिबे लगे।।


94.लंका की गली गली बालक किलोल करें

बांधे हनुमान कोउ जीभ कूँ बिलामतौ।

कोउ धूरि फैंक रह्यौ कोउ लात मारै, कोउ

पूँछ कान खैंचें कोउ मोहड़ौ मटकामतौ।।


कोई देय गारी घूंसा लात कहूँ मारी,कोउ

बातन कौ बीर, बीस बातन बनामतौ।

लंक लगी आग सिगरे असुर गए भाग,रोय

पीटत हैं झाग,कोउ आय कै बचामतौ।।


(अशेष)💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 17.7.21 शनिवार💐💐

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95.सिया कूँ बतायौ कपि लंका में जो आयौ,वाकूं

लंका के निवासी गांव गली में घुमावें हैं।

पूँछ में लगाई आग पत्थर चलावें खूब,

ऊधम मचावें ढोल तासे हू बजावें हैं।।


सिया अकुलाई कहें,सुनौ महामाई,मैं हूँ

शरण में आई क्यों न कृपा बरसावै हैं

राघव के काज में जो पल हूँ बितावै,ताकूँ

वायु न सुखावै,और अग्नि न जरावै है।।


96.लंका की गली महल हाट औ बजार धाम,

दृष्टि परै जित कूँ तित दीखै बस आग है।

कहूँ दाढ़ी मूंछ जरैं, आंख नाक धुंध भरें,

लगी घोर आग चले इत उत सब भाग हैं।।


वृच्छ जरैं वस्त्र जरैं अस्त्र और सस्त्र जरैं

ऐसौ भय बस्यौ काम धाम दीन्हे त्याग हैं।

हनुमत की पूंछ में लगाई आग दुष्टन ने

अग्नि की फुहार उड़ें मानो खेलें फाग हैं।।


अशेष💐💐


श्री हनुमत लीलाराधन

(श्री रामसेवक हनुमान जी की विभिन्न लीलाऐं )-6

(संत-सत्संग के आधार पर)

दिनांक 19.7.21 सोमवार💐💐

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97.सागर में पूँछ कूँ बुझाय हनुमान फिर

जानकी के जौरें बिदा माँगिबे कूँ आये हैं।

चूड़ामणि राखी हनुमान जू के हाथन पै

आँसुन सों सिया के नयन भरि आये हैं।


द्वै दिन सहारौ रह्यौ पूत तेरी बातन कौ

लौटि कै पुराने दुःख भरे दिन आये हैं।

एक मास बीते मेरे प्राण न रहेंगे यदि

तारिबे कूँ मोकूँ मेरे राम नहीं आये हैं।।


98.आशीष मिल्यौ जो माय तेरौ हाथ सीस मेरे

एक ही छलांग सिंधु पार करि जाउंगो।

मन की व्यथा जो तेरे हिय में दबी है,राम 

राघव कूँ तेरी व्यथा मैया मैं सुनाऊँगो।।


तेरे चरणन की सपथ लऊँ मैया,कोटि

कष्ट हूँ उठाय तो कूँ प्रभु सों मिलाउंगो।

राखियो भरोसौ कपि रूप पै न जइयो माय

सैन संग स्वामी कूँ यहीं पै लैकें आऊंगो।।

अशेष💐💐



























































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