शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

थोड़ा सा आकाश नहीं है...!!

थोड़ा सा आकाश नहीं है।
किंचित भी अवकाश नहीं है।। 
तृषा मुक्ति हो पूर्ण, आज 
अन्तस्  में ऐसी प्यास नहीं है।। 

1.वर्षा में मेघों के जल से 
गर्त सदा होते परिपूरित।
किंतु उच्चता अहंकार में 
श्रृंग सदा रह जाते वंचित।। 

मुक्ति हेतु बाहर से ज्यादा,
अंदर का आकाश चाहिए।
नहीं पूर्णता अहं, हृदय में 
खालीपन का भास चाहिए।। 

अन्तस् के संगम से बढ़कर,
कहीं मुक्ति की आस नहीं है। 
थोड़ा सा आकाश नहीं है,
किंचित भी अवकाश नहीं है।। 

2.मंदिर की घंटी हों या फिर 
मस्जिद की हों रोज अजानें।
भरना है यदि परम ज्योति से,
पहले खुद को खाली माने।। 

वर्षा तो प्रतिपल होती है,
बदली हर कल्मष धोती है। 
अहंकार की नहीं, सत्य की ही 
अंतिम पूजा होती है।।

मिलता है सब कुछ, यदि सोचें, 
कुछ भी अपने पास नहीं है।
थोड़ा सा आकाश नहीं है,
किंचित भी अवकाश नहीं है।।

3.बजे बांसुरी का खालीपन,
स्वर में प्राणों का स्पंदन।
खाली गागर को ही मिलता 
सागर के जल का अभिनंदन।। 

गागर तो माटी है,उसके 
नहीं कलेवर का यह आदर।
खालीपन ले जाता उसको, 
अपने प्रियतम के अधरों पर।।

भरे हुए कोटर में स्वर्णिम 
पंछी का आवास नहीं है।
थोड़ा सा आकाश नहीं है,
किंचित भी अवकाश नहीं है।।

4.यही मनुज का मूल्य कि उसके, 
मन में कितनी रिक्ति शेष है।
किंतु स्वयं को आवृत करना,
हम सबका दुर्गुण विशेष है।। 

अग्रिम शून्य बढ़ाता दस गुण, 
पिछले का कुछ मोल न होता। 
ताल शून्य हो जाता वादक,
अगर वाद्य में पोल न होता।।

परम् रिक्त ही सदा मुक्त है, 
खो देने का त्रास नहीं है। 
थोड़ा सा आकाश नहीं है,
किंचित भी अवकाश नहीं है।।

-: स्वरचित रचना-सेवा
कौशल किशोर💐💐

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