1.आज के युग में सभी
ज्यों डगमगाती नाव हैं।
हैं भँवर, लहरें प्रबल,
सब ओर तेज बहाव हैं।।
2.मित्र है ऐसा सहारा
जो टिकाता है हमें।
संकटों में भी सही
रस्ता दिखाता है हमें।।
3.शत्रु हों चहुँओर तो
बस मित्र ही अवलंब है।
संतुलन की साधना के
हेतु दृढ़ आलम्ब है।।
4.मित्र हों दस-बीस तो
निश्चय अनोखी शान है।
किंतु सच्चे मित्र की
मुश्किल बड़ी पहचान है।।
5.मित्र जो सच्चा,
तुम्हें गिरने नहीं देता कभी।
मित्र हित अपमान
या नुकसान सह लेता सभी।।
6.गुप्त रखता है
रहस्यों को प्रकट करता नहीं।
मित्र के हित मृत्यु तक से
भी कभी डरता नहीं।।
7.मित्र के गुण सामने ला
दोष दिखलाता नहीं।
समय पर सर्वस्व दे
एहसान जतलाता नहीं।।
8.दे विपद में साथ
तन मन धन वचन और कर्म से।
लाख हों शिकवे
मगर डिगता न बांधव धर्म से।।
9.बुद्धि तर्क विवेक से
वह मित्र का रक्षक सदा।
कुटिल कपटी मित्र घातक हेतु
है तक्षक सदा।।
10.कोटि पुण्य प्रताप से ही
मित्र मिलता एक है।
दो अगर मिल जायें तो
शुभ कर्म किए अनेक हैं।।
11.तीन मिलना तो असंभव
जो मिले सच्चे नहीं।
मित्रता असि-धार पर
टिकते कदम कच्चे नहीं।।
12.हृदय का संबंध है यह
पूर्णता पहचान लो।
मित्र के प्रति मित्र का
कर्तव्य भी तो जान लो।।
13.धैर्य हीनअशांत चित् में
मित्रता रुकती नहीं।
शत्रु है अभिमान की,
आगे कभी झुकती नहीं।।
14.दोष वर्णन भूल से भी
अन्य से करिए नहीं।
दोष से अवगत कराने से
कभी डरिये नहीं।।
15.मित्र के दुख को हृदय से ही
जुड़ा तुम जानकर।
खींच लो तत्काल
उसकी पीर को पहचान कर।।
16.मित्र की चिंता निजी
अस्तित्व से तुम छोड़ दो।
हो सके तो मित्र के हित
काल की गति मोड़ दो।।
17.हो स्वयं की हानि लेकिन
मित्र को सम्मान दो।
व्यस्तता के मध्य भी
उसको उचित स्थान दो।।
18.निज समस्याएं कभी
किंचित छुपानी है नहीं।
बंधु गुरु भ्राता सचिव
सब कुछ तुम्हारा है वही।
19.आत्मगत संबंध
जन्मो-जन्म यह चलता रहे।
नेह निर्मल वारि से
यह अनवरत खिलता रहे।।
20.अति निकटता,मित्रता रस
के लिए अभिशाप है।
दोष दर्शाती निकटता
मित्रता में पाप है।।
21.मित्रता की राह में
जो एक पग भी बढ़ गया।
लौटना होता कठिन
अंगद-चरण सा गड़ गया।।
22.अखिल जग की संपदा
एक मित्र से तुलती नहीं।
है कठिन यह गांठ,
जो लग जाए तो खुलती नहीं।।
23.एक शुभ संकल्प लेकर,
मित्रता का मान रख।
यह परम आनंद
योगी के लिए भी है अलख।।
24.पूर्ण जीवन में कभी
इक मित्र सच्चा पाओगे।
फिर किसी निर्णय पे
जीवन में नहीं पछताओगे।।
25.जान लो,वरदान ईश्वर ने
तुम्हीं को है दिया।
जानवर या आदमी में
ये बड़ा अंतर किया।।
26.एक अच्छा मित्र ही
देता प्रबल विश्वास है।
एक पल का साथ उसका
स्वर्ग का आभास है।।
27.कंटकों से युक्त जग में
मित्र है संजीवनी।
लाख रिश्तों से परे
इक मित्र की महिमा घनी।।
28.मित्र मानस का कमल है
मित्र सिर की पाग है।
निंदकों और घातियों को
मित्र जलती आग है।।
29.भाग्य से मिल जाए तो
देखो ना जाए वह फिसल।
आज मिलता है,ग्रहण कर लो
रखो उसको अटल ।।
30.सत्य पथ का दीप है,
गर हाथ वो लग जाएगा।
प्रेम का आलोक जीवन में
चतुर्दिक छाएगा।।
31.है परम 'कौशल' यही
सर्वस्व उस पर वार दो।
एक मूरत है मधुर
इसको सुगढ़ आकार दो।।
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-अपने मित्रों को सप्रेम समर्पित
कौशल किशोर भट्ट
वृन्दावन
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