बुधवार, 15 सितंबर 2021

कुछ अपनी..कुछ तुम्हारी सी....!!

1.सरपट दौड़े जिंदगी 
नित नव आविष्कार। 
प्रकृति सुरक्षा के बिना,
है हर सांस उधार।। 

है हर सांस उधार 
दिखें पत्थर के जंगल।
मानवता मिट गई 
बढ़ा चिंतन में छल बल।। 

बहरा मानव सुन न सके 
संकट की आहट। 
लक्ष्य हीन सा जीवन ले,
बस दौडे सरपट।। 
1.सरपट दौड़े जिंदगी 
नित नव आविष्कार। 
प्रकृति सुरक्षा के बिना,
है हर सांस उधार।। 

है हर सांस उधार 
दिखें पत्थर के जंगल।
मानवता मिट गई 
बढ़ा चिंतन में छल बल।। 

बहरा मानव सुन न सके 
संकट की आहट। 
लक्ष्य हीन सा जीवन ले,
बस दौडे सरपट।। 

2.बुझा न पाए हम अभी 
अपने घर की आग।
मानव मन का जोश है 
ज्यों सोड़े का झाग। 

ज्यों सोड़े का झाग 
उफ़न कर ऊपर आता।
दो पल चढ़े उफ़ान,
अंत फिर नीचे जाता।। 

मंगल ग्रह पर रहने को 
जियरा ललचाए।
अपने घर की आग 
जबकि हम बुझा न पाए।। 

3.छाया ग्रसे अतीत की,
मन अंधियारा छाय। 
वर्तमान की धूप में,
हृदय नहा ना पाय।। 

हृदय नहा ना पाय 
खोजता नित नव राहें। 
सोच न पाता 
कैसे निज-संबंध निबाहें।। 

अपने भय को 
अपना कारागार बनाया।
मुक्ति मिले जब 
मिटे, हृदय से 
भ्रम की छाया।। 

4.पृथ्वी पर दीपक बना 
पूंजी का व्यापार।
चारों ओर लगे हुए 
नए नए बाजार।।

नए नए बाजार 
बिकीं हर ओर व्यवस्था।
चिंतन होता शून्य,
अहो! कैसी दुरवस्था।। 

ऊपर सतही चमक 
किंतु कचरा है भीतर।
घुटती सांसों में 
मुस्कान बिके पृथ्वी पर।।

5.सहने हैं कब तक हमें,
बस केवल अनुमान।
तम से बाहर चाहिए,
मंगल मूल विहान।

मंगल मूल विहान, 
रात्रि को कौन हटाए।
बनकर ज्योति मशाल, 
सामने बढ़ कर आए।।

बिखरे सुर-लय-ताल 
विकृति पर पूरा सप्तक।
अभी और, यह दृश्य 
दिखेंगे जाने कब तक।। 

6.कथनी करनी में यहां,
किंचित भी ना साम्य। 
कैसे हमको मिल सके,
जीवन का जो काम्य।। 

जीवन का जो काम्य, 
भटकना ही है निश्चय।
कर्म कथन में एक रहें, 
उनको न कहीं भय।। 

हाल यही यदि रहा 
न हालत कभी सुधरनी।
जब तक अलग रहे,
मानव की कथनी करनी।।

7.कुर्सी का यह खेल भी
प्रकटे कितने रूप।
छाया की छाया दिखे,
अर्धरात्रि को धूप।। 

अर्धरात्रि को धूप 
कड़कती सिर पर फैले। 
किसको थामें यहां, 
सभी आंचल हैं मैले।। 

दरक रहा विश्वास 
मनुजता है बे-घर सी। 
मन की अंतिम आस 
मिले कैसे ये कुर्सी।।

8.बांट रहे हैं देश को 
सत्ता के धृतराष्ट्र।
कैसे होगा राष्ट्र-हित?
जब न बचेगा राष्ट्र।।

जब न बचेगा राष्ट्र 
भक्ति आकर्षण जन में। 
सत्ता सुख की चाह,
नियंताओं के मन में।।

व्यर्थ हुए संबंध,
अर्थ को काट रहे हैं।
अपनों को धृतराष्ट्र,
रेवड़ी बांट रहे हैं।।

9.गंगाजल ले हाथ में 
पवित्रता का दंभ।
ज्यों गणिका ने कर लिए,
तीर्थ भजन प्रारंभ।।

तीर्थ भजन प्रारंभ,
भावभीने मनभावन।
ज्यों कुछ घंटों की 
होली दीवाली सावन।। 

बीत रहा यूं ही धीरे से 
जीवन प्रतिपल।
भीतर है वारुणी 
किंतु ऊपर गंगाजल।। 

10.भोगवाद की धूल में,
धूमिल है परिवार।
मतलब से मन से जुड़ा,
अब सारा व्यवहार।

अब सारा व्यवहार, 
दिया,उतना ही पाओ।
सीमित हैं अधिकार 
लाख तुम प्यार लुटाओ।। 

खिलें हवा में फूल,
जरूरत नहीं खाद की।
सुलग रहा घर बार,
आग है भोग-वाद की।।

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