बुधवार, 22 मई 2024

प्रभात किरण (16 ) प्रत्येक परिस्थिति में स्वयं को शान्त रखिए

"कोई भी गुस्सा हो सकता है क्योंकि गुस्सा होना सबसे आसान चीज़ है। परन्तु नाराज़ होने के लिए सही व्यक्ति, सही मात्रा, सही उद्देश्य और सही तरीका निर्धारित करना आसान नहीं है, " ऐसा अरस्तू का कहना था। 

जीवन की परेशानियां और तनावों को मद्देनजर रखते हुए हम थोड़ी सी उत्तेजना से भी क्रोधित होकर गुस्से के आवेग में आ सकते हैं। हम जब थकान से भरे हुए दिन के बाद घर जाने की जल्दी में होते हैं तो कई बार अपने सामने धीमे गाड़ी चलाने वाले पर चिल्लाते हैं क्योंकि उसके पास समय की कोई कमी नहीं है। जब हम किराने की दुकान पर किसी खास ब्रांड के मसाले ढूंढ रहे होते हैं और विक्रेता हमें दुकान के किसी और भाग में भेज देता है तो हम उस पर क्रोधित हो उठते हैं। 

जब हम रात का खाना खा रहे होते हैं और फोन पर कोई बिक्री प्रचारक शान्ति को भंग करके अपनी नवीनतम वस्तुओं की जानकारी देने की कोशिश करता है तो भी हम अपना आपा खो देते हैं।

असली समस्या यह है कि हर बात पर गुस्सा होना हमारी आदत बन जाती है। और बाकी आदतों की तरह यह हमारा दूसरा अस्तित्व बन जाती है। निजी सम्बन्ध उलझने लगते हैं, व्यापार की साझेदारी टूटने लगते हैं। 

प्रभावशाली लोग सन्तुलित और विश्वसनीय होते हैं। संघर्ष के समय शान्त इन्सान की आवश्यकता होती है और ऐसे लोग हमें निश्चल और तटस्थ रहते हैं चाहे कितनी भी चिन्ता क्यों न हो। अपने आपको परेशानी के समय में शान्त रखना हमें आगे लाने वाले दर्द और सुख से बचाता है। 

क्रुद्ध अवस्था में अपनी जबान पर लगाम दिए बिना प्रयुक्त किए गए दुखदायक शब्द अनेकों टूटे हुए रिश्तों का कारण बने हैं। शब्द तीर की तरह होते हैं जो एक बार मुंह से निकल गए तो उनको वापस लेना असंभव है। अत: अपने शब्दों का बहुत सावधानी से चुनाव करिए ।

अपने गुस्से पर नियन्त्रण रखने का सबसे अच्छा तरीका है कि जिस इन्सान ने आपको क्रोधित किया है उस पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करने से पहले सौ तक की गिनती गिनें। दूसरी पद्धति को प्राचीन दार्शनिक 'तीन दरवाजों की विधि' कहते हैं, इसको भी प्रयुक्त किया जा सकता है। प्राचीन साधु-महात्मा अपने शब्द तब तक नहीं बोलते थे जब तक वे उन्हें तीन दरवाजों से बाहर नहीं निकाल लेते थे। 

पहले प्रवेश द्वार की अवस्था में वे अपने आपसे पूछते थे कि क्या वे शब्द सच्चाई पर आधारित हैं? अगर हां तो वे दूसरे द्वार पर जाते थे और पूछते थे कि क्या वे शब्द सही में आवश्यक हैं?अगर हां तो फिर तीसरे द्वार पर वे अपने आपसे पूछते थे कि वे शब्द नम्रतापूर्ण हैं अगर हां में जवाब मिलता था तब ही वे अपने होंठों से उन शब्दों को निकाल कर दुनिया तक पहुंचने देते थे। 

“लोगों के साथ यह समझ कर व्यवहार कीजिए कि वे वैसे ही हैं जैसा उन्हें होना चाहिए था। उनकी सिर्फ मदद कीजिए कि वे अपनी काबिलियत के अनुसार अपनी सही जगह हासिल कर सकें।” 

ऐसा जर्मन कवि जोहान वूल्फ गैंग फॉन गोयथे ने कहा था। ये वे विवेकपूर्ण शब्द है जो हमेशा जिन्दा रहेंगे।


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