बुधवार, 22 मई 2024

दान क्यों देना चाहिए

विश्व के सभी धर्मों में दान देने पर जोर दिया गया है। वैदिक धर्म में 'दान' पर बहुत कुछ लिखा व कहा गया है। दान देना एक ऐसा धार्मिक कृत्य है, जिसमें मनुष्य और समाज दोनों का हित निहित है । व्यक्तिगत स्तर पर दान देने से मनुष्य आध्यात्मिक दृष्टि से ऊपर उठता है, जबकि सामाजिक दृष्टि से वह सामाजिक विषमता को दूर करने में समाज की सहायता करता है ।

दान देने के पीछे प्रकृति का जो विज्ञान काम करता है, वह बड़ा सरल है । जब कोई व्यक्ति दान देता है तो वह ईश्वर का कार्य करता है, क्योंकि ईश्वर का काम देना है। प्रकृति का सहज स्वभाव भी देना है। सूर्य हमें बिना माँगे प्रतिदिन प्रकाश व ताप देता है । नदी, तालाब, कूप आदि हमें बिना मूल्य के जल देते हैं और वायु हमें निःशुल्क प्राणदायिनी हवा देती है, वृक्ष बिना कुछ माँगे हमारे वातावरण को स्वच्छ बनाते हैं और फल देते हैं। धर्मग्रंथों में लिखा है कि हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होकर उसकी सेवा करनी चाहिए। वृक्षारोपण, पेड़-पौधों को जल देना, नदी, तालाब, कूप आदि को साफ रखना प्रकृति सेवा है और उसे दान देने के समान है। दान देने में प्रकृति का एक और नियम कार्यरत होता है- ' जितना दोगे, उससे अधिक पाओगे ।' मनुष्य द्वारा किया गया कोई भी कार्य नष्ट नहीं होता, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। उस कार्य की तरंगें ऊपर आकाश तत्त्व में विलीन होकर कालचक्र के साथ परिवर्तित होकर फिर पृथ्वी पर लौटती हैं और उस कार्य को करनेवाले को प्रभावित कर दंडित या सम्मानित करती हैं। ‘ऋग्वेद' में लगभग चालीस 'गानमंत्र' हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से 'दानश्रुति' कहते हैं, जिनमें दान की महिमा का वर्णन है। उपनिषदों में अनेक दानवीर राजाओं के नामों की सूची है । 'छांदोग्योपनिषद्' में धर्म की तीन शाखाएँ बताई गई हैं, जिनमें से दान एक है। इन धर्म ग्रंथों के अनुसार जो व्यक्ति दान देता है, उसे कभी भौतिक पदार्थों की कमी नहीं होती, क्योंकि प्रकृति अपने सूक्ष्म नियम के अनुसार उसके द्वारा दिए गए दान को किसी-न-किसी रूप में वापस कर देती है।

'गीता' में भी इसी सत्य का प्रतिपादन किया गया है और साथ ही दान के तीन स्वरूपों का वर्णन भी किया है। गीता के अनुसार दान तीन प्रकार के होते हैं - सात्त्विक, राजस व तामसिक । सात्त्विक दान वह होता है जो सहज भाव से बिना किसी फल की अपेक्षा किए दिया जाता है। इसका एक आधुनिक रूप 'गुप्तदान' कहलाता है। राजस- दान वह जो किसी फल ( नाम, यश, धन, पुत्र- प्राप्ति आदि की कामना) की इच्छा से दिया जाता है। तामस-दान वह दान है जो किसी कुपात्र को तिरष्कृत करते हुए दिया जाता है। गीता के अनुसार सात्त्विक - दान श्रेष्ठ है, पर आधुनिक युग में राजस - दान का ही बोलबाला है।

कूर्मपुराण में दान की चार श्रेणियाँ हैं— नित्य दान, नैमित्य दान, काम्य दान और विमल दान । नित्य दान वह अल्पदान है जो हम प्रतिदिन जाने-अनजाने में करते हैं, जैसे पक्षियों को दाना देना, पेड़-पौधों को जल देना या फिर घर के नौकर को चाय-पानी देना आदि । नैमित्य दान वह दान है जो हम अपने पूर्वजन्म के पापों से मुक्ति पाने के लिए करते है, जैसे—बीमार होने पर किसी मंदिर में 'तुला - दान' करना (बीमार के शरीर के वजन के बराबर सात प्रकार का अन्न तौलकर दान करना) या फिर शनिग्रह दोष निवारण के लिए शनिवार के दिन स्टील या लोहे की कटोरी में उड़द की काली दाल, एक सिक्का और सरसों या तिल अपनी छाया उसमें देखकर शनिदेव की प्रतिमा पर चढ़ाना आदि। काम्य दान वह दान है जो किसी कामना की पूर्ति के लिए किया जाता है, जैसे – धन प्राप्ति के लिए, पुत्र- प्राप्ति के लिए, पुत्री के विवाह के लिए या फिर मृत्यु के बाद स्वर्ग-प्राप्ति के लिए; परंतु विमल-दान सर्वश्रेष्ठ है। यह वह दान है जो निर्मल मन से बिना किसी इच्छा या कामना से परोपकार के लिए किया जाता है। 

विमल-दान और गीता में बताया सात्त्विक - दान दोनों श्रेष्ठ हैं। इन दोनों में मनुष्य अपना धन, सुख, सामर्थ्य व संपदा परोपकार की दृष्टि से ईश्वर की तरह दूसरों में बाँटता है। चूँकि मनुष्य का यह कर्म इच्छा-रहित है, इसलिए यह प्रकृति के सूक्ष्म स्तर पर कार्यरत होता है, जिसका फल कालांतर में प्रकृति कई गुना उस व्यक्ति को लौटाती है। इस कारण यह दान देना अधिक हितकर है।

‘महाभारत' के अनुशासनपर्व के कई अध्यायों में दान पर चर्चा है। इसी पर्व में सूतपुत्र कर्ण को निम्न जाति का होने के बावजूद ‘दानवीर' की संज्ञा से संबोधित किया गया है। इसी पर्व में कहा गया है कि मनुष्य को वृक्षों का पालन अपनी संतान की तरह करना चाहिए । महाभारत के शांतिपर्व में कहा गया है कि मनुष्य को अपनी पहली आय का दसवाँ भाग दान देने से उसकी आय सदा बनी रहती है।

चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण के अवसर पर दान देने का बड़ा महत्त्व है । उस समय दिया दान अधिक फलदायी होता है, क्योंकि आकाशमंडल में पृथ्वी का संबंध सूर्य-चंद्रमा से विशिष्ट होने के कारण मनुष्य द्वारा किए कर्मों का सूक्ष्म प्रभाव अधिक व अल्पकाल में कार्यरत हो जाता है । ऐसा प्रकृति के सूक्ष्म अदृश्य नियमों के कारण होता है।

कर्मकांड की पूजा के उपरांत जो दान पूजा करानेवाले पंडित को दिया जाता है, उसे दक्षिणा कहते हैं। इस दान के पीछे त्याग व कृतज्ञता का भाव होता है, जिसमें पूजा करवानेवाले की श्रद्धा व सामर्थ्य दोनों होती हैं। परंतु आजकल तो पंडितजी माँग कर दक्षिणा लेते हैं। ऐसा करने से दक्षिणा दान न होकर कर्मकांड की 'फीस' बनकर रह जाती है। इस प्रकार के पंडित दक्षिणा लेकर पूजा करानेवाले को आशीर्वाद भी नहीं देते और न ही पूजा करानेवाला दक्षिणा देकर पंडित के चरण ही छूता है । यह युग का प्रभाव है।

इसलाम धर्म में भी 'जकात' (दान) पर जोर दिया गया है। रमजान के महीने में मुसलमानों को उदारता से दान देने की हिदायत दी गई है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

विशिष्ट पोस्ट

समाचार का व्रत रखिए

आजकल नकारात्मक समाचार ज्यादा बिकते हैं। हमारे समाज में ज्यादातर लोग एक प्रसिद्ध इन्सान के जुर्म का मुकदमा देखना किसी वास्तव में ...