गुरुवार, 23 मई 2024

सांध्य दीप -12(द्वितीय) मेरी आत्मा की पवित्रता मुझे स्वर्ग ले जायेगी

(प्रथम भाग से आगे क्रमश:)...!!

दिन-रात लड़ाई, रक्तपात, छल-कपट और अभियान प्रयाण । न कोई शांति और न कोई सकून । 

लाखों कटते, हजारों भूखों मरते और न जाने कितने रोगी हो जाते । किंतु कोई सुनने वाला नहीं । लोग त्रस्त, क्लांत तथा असंतुष्ट थे । किंतु तब तक शक्ति-मंत की भुजामें बल, वाणी में तेज और विस्तार पर नियंत्रण था। समय पूरा न हुआ था ।

किंतु आज जबकि सिकंदर रोग से विवश तथा असहाय हो गया कौन कह सकता है कि उसके अपनों के हृदयों में वे सब त्रास और कष्ट न कसक उठे हों जो उनमें बलात् इसलिए उठवाये कि सिकंदर अपने  दंभ को तुष्ट करना चाहता था, जिसका कोई लाभ, कोई श्रेय उनमें से किसी को न होना था । 

बहुत संभव था कि हकीमों और सरदारों के असहयोग के पीछे यह भाव काम कर रहा था कि यह एक मौत के आँचल बँधे और हम सब को सुख-चैन की सांस लेना नसीब हो । क्या उनमें से बहुतों को यह याद न आया होगा कि कब-कब सिकंदर ने कहाँ, कारण और अकारण ही उन्हें दलित, तिरस्कृत अथवा ताड़ित किया है । क्या उस समुदाय में ऐसे लोग न होंगे जिन्हें यूनान के उन लाखों घरों की याद आती हो जहाँ उस समय पुत्र और पति के वियोग में माताएं और पत्नियाँ आँसू बहा रही होंगी और उन पिताओं की जो पुत्र के हाथ में हल और पतवार सौंपकर निश्चिंत हो चुके थे किंतु उन्हें फिर वह भार इसलिए लेना पड़ा होगा कि उनके कर्णधारों को सिकंदर ने विदेशों के मोर्चों पर कटवा डाला है । 

शक्ति-मंत, सिकंदर इस समय विवश और असहाय था, सबके मन और विचारकोण बदल चुके थे और पहले जहाँ लोगों को उसके गुण ही गुण दिखलाई देते थे, अब दोष ही दोष दृष्टिगोचर होने लगे ।

यदि सिकंदर ने अपनी शक्ति जनहित और संसार में सुख-शांति को वृद्धि में लगाई होती तो उसकी सहायता की जोखिम से लोग डरते नहीं बल्कि अपने प्राण देकर भी बचाने का प्रयत्न करते । राज-पद और उस पर भी अनीति तथा आतंक से दूषित राज-पद ऐसा ही प्रताड़णापूर्ण होता है कि लोग न तो उस पर स्वयं विश्वास. करते हैं और न यही विश्वास रखते हैं कि वह उन पर विश्वास कर रहा होगा। सिकंदर संसार से जा रहा था और उसके पार्श्ववर्ती उसकी सहायता से मुँह चुरा रहे थे ।

फिर भी जहाँ प्रतिशोधी, स्वार्थी तथा अवसरवादियों की कमी नहीं होती वहाँ विशुद्ध मनुष्य भी होते हैं, जो आपत्ति तथा पीड़ा में देखकर शत्रु का भी अपकार भूल जाते हैं और मनुष्यता के नाते उसकी सहायता में तत्पर हो जाते हैं । सिकंदर के एक फिलिप नाम के सेवक से उसकी पीड़ा न देखी गई । 

वह बड़ा विश्वासी व्यक्ति था और उसे यह भी विश्वास था कि सिकंदर उस पर विश्वास रखता है । वह पीड़ा से तड़पते सिकंदर के पास आया और बोला- "स्वामी ! आप धीरज रखिये । मैं अभी आपके लिए दवा तैयार करके लाता हूँ, आप शीघ्र ही अच्छे हो जाएंगे ।" फिलिप दवा बनाने चला गया । 

अनेक लोग फिलिप के पास पहुँचे और उसे समझाते हुए बोले-“फिलिप, क्या मूर्खता करने जा रहे हो । सिकंदर अब किसी प्रकार बच नहीं सकता । यदि वह तुम्हारी दवा पीने के बाद मर गया तो लोग यही समझेंगे कि तुमने उसे विष देकर मार डाला है । इसलिए तुम उसे दवा देने की गलती न करो, नहीं तो तुम्हारी जान संकट में पड़ जायेगी ।"

फिलिप दवा बनाता हुआ साधारण वाणी में बोला- “मेरी आत्मा शुद्ध है, मैं उनके लिए अच्छी से अच्छी दवा तैयार कर रहा हूँ । मुझे पूरा विश्वास है कि वे मेरी दवा से शीघ्र ही अच्छे हो जायेंगे और यदि वे परमात्मा की इच्छा से मेरी दवा पीकर भी न रहे और मुझे उन्हें मार डालने की शंका में प्राण-दंड भी दे दिया गया तो भी मुझे कोई असंतोष न होगा । 

मेरी आत्मा की पवित्रता मुझे स्वर्ग ले जायेगी और फिर बहुत से मनुष्य मनुष्य की जान बचाने में, किसी का उपकार करने में स्पष्ट मौत आलिंगन कर लेते हैं, तो क्या मैं इस विश्वास के साथ उनकी मदद नहीं कर सकता कि वे अवश्य बच जायेंगे, अप्रत्याशित मृत्यु के भय से मैं मानवीयकर्तव्य से क्यों विमुख होजाऊँ?"

फिलिप के पास अनेक अपरिचित ऐसे भी आए जिन्होंने उसके जुल्म, शोषण तथा अत्याचार का चित्र दिखाते हुए उसे मनुष्यों का शत्रु और उसका दासकर्ता सिद्ध करने का प्रयत्न किया । किंतु फिलिप पर इसका भी कोई प्रभाव न पड़ा

और वह यह कहकर दवा बनाता रहा कि सिकंदर इस समय केवल एक पीड़ित तथा असहाय मनुष्य है, न वह राजा है, न जालिम और न मुझको गुलाम बनाने वाला आततायी ।

जिस समय फिलिप दवा बना रहा था उस समय सिकंदर के पास अधिकारी का पत्र आया । सिकंदर ने जैसे-तैसे पत्र खोलकर पढ़ा । उसमें लिखा था-"आप फिलिप से सावधान रहें । फारस के राजा ने आपको विष दिलाकर मार डालने का षड़यंत्र किया है । इस कार्य के लिए उसने अपार धनराशि और अपनी बेटी का विवाह कर देने का लालच देकर फिलिप को नियुक्त किया है ।" 

सिकंदर ने पत्र पढ़कर अपनी तकिया के नीचे रख लिया । फिलिप दवा लेकर आया । सिकंदर ने एक हाथ से प्याला लिया और दूसरे हाथ से वह पत्र निकाल कर फिलिप को दे दिया । उधर फिलिप ने पत्र पढ़ना शुरू किया और इधर सिकंदर ने प्रेमपूर्वक दवा पीना शुरू किया । फिलिप ने जब उस पत्र से आँखें उठा कर कातर दृष्टि से सिकंदर की ओर देखा तब वह प्याला खाली कर चुका था । दवा ने तीव्र प्रभाव किया, सिकंदर अचेत हो गया । 

सरदारों ने मृत्यु दृष्टि से फिलिप की ओर देखा और फिलिप आत्मा की सच्चाई पकड़े साहस पूर्वक खड़ा रहा । कुछ देर बाद सिकंदर सचेत हुआ और उठ कर बैठ गया । उसकी सारी पीड़ा जा चुकी थी, वह बिल्कुल ठीक हो गया था ।

उसने उठकर फिलिप को गले लगाया और धन्यवाद दिया । किंतु फिलिप आँसुओं से उसे तर करता हुआ बोला- “स्वामी ! ऐसा पत्र पाकर भी आपने मुझ पर विश्वास कैसे कर लिया ।" सिकंदर मुस्कराता हुआ बोला-“प्यारे फिलिप ! मुझे आदमियों की बहुत कुछ पहचान है । मुझे पूरा विश्वास था कि तुम्हारा जैसा सज्जन व्यक्ति कभी विश्वासघात नहीं कर सकता । और फिर यदि तुम वैसा करते भी तो मैंने संशयपूर्ण निकृष्ट मृत्यु मरने की अपेक्षा विश्वासपूर्ण मृत्यु मरना अच्छा समझा ।"

सिकंदर ने फिलिप को बहुत सा पुरस्कार देना चाहा किंतु फिलिप ने उसे न लेते हुए कहा-"ऐसे अवसर पर आपने मुझ पर विश्वास करने की महानता तथा आदर दिया है, वही ही बहुत है मेरे स्वामी !" (इति शुभम्)


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