भगवान कृष्ण ने जब यह देखा कि उनका शिष्य अभिमान के मद में चूर होता जा रहा है तो उनसे यह सहन न हुआ । भगवान प्रणत जनों की सब ओर से रक्षा करने वाले हैं, उन्हें यह सहन भी कैसे होता कि एक साधारण सी बात उनके शिष्य के पतन का कारण बने । उनकी दृष्टि में अक्षय पात्र और सोलह हजार ब्राह्मणों को प्रतिदिन भोजन कराना तो साधारण सी बात है । कई बार भगवान ने उन्हें परोक्ष रूप से समझाया भी सही परंतु युधिष्ठिर समझने में असमर्थ ही रहे । एक बार अवसर देखकर श्रीकृष्ण ने प्रत्यक्षत: भी कहा-“धर्मराज ! मैं मानता हूँ कि ब्राह्मणों के लिए तुम भोजन की व्यवस्था कर पुण्य कार्य में संलग्र हो परंतु उसके लिए अभिमान नहीं करना चाहिए ।"
"परंतु प्रभु मैंने तो ऐसी कोई बात नहीं की जिससे अभिमान टपकता हो"- युधिष्ठिर ने कहा ।
अभिमान बातों से नहीं क्रियाओं से व्यक्त होता है"-भगवान ने कहा और युधिष्ठिर को लेकर महाराज बलि के पास पहुँचे । बलि को युधिष्ठिर का परिचय देते हुए उन्होंने कहा- "दैत्यराज ये हैं पांडवों में अग्रज महादानी युधिष्ठिर । इनके दान से मृत्युलोक के प्राणी इस तरह उपकृत हो रहे हैं कि वे तुम्हारा स्मरण भी नहीं करते । “परंतु मैंने स्मरण किए जाने जैसा कार्य भी क्या किया था”-बलि ने कहा- "मैंने वामन को केवल तीन पग जमीन देने का वचन दिया था और वह पूरा किया भी । अब यह बात अलग है कि वह वामन विराट् बन गया ।"
"महाबली ! तुमने सब कुछ खोकर भी अपना वचन पूरा किया । इसलिए तुम्हारी ख्याति अमर हुई । धर्मराज की कीर्ति भी तुम्हारे यश की होड़ कर रही है । तुम दोनों पुण्यात्माओं का मिलन निश्चय ही सौभाग्यपूर्ण है ।"
बलि ने युधिष्ठिर की कोई पुण्य गाथा सुनाने के लिए कहा । भगवान कृष्ण ने उनके पूर्व जीवन का संपूर्ण विवरण क्रमवार सुनाया और अक्षय पात्र, सोलह हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने की नियम-परंपरा का भी उल्लेख किया । यह सब सुनते हुए युधिष्ठिर के चेहरे पर दर्प भरी मुस्कान खिलती जा रही थी । लेकिन वह तब विलुप्त हो गयी जब दानवेन्द्र ने कहा-"आप इसे दान कहते हैं, लेकिन यह तो पाप है ।"
महाबलि ने कहा-"धर्मराज ! केवल अपने दान के दंभ को पूरा करने के लिए किसी ब्राह्मण को आलसी बनाना पाप ही है । मेरे राज्य में तो किसी याचक को नित्य भोजन की सुविधा दी जाय तो भी वह स्वीकार नहीं करेगा ।"
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