शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

अनासक्त रहें

बदले में किसी चीज की अपेक्षा न करते हुए, हम किसी संभावित दुःख को कम कर देते हैं। यह सबसे विनम्र और सबसे स्पष्ट अनुकरणीय उदाहरण है।

एक सवाल है जो प्रायः मन को उद्वेलित करता है - : 'यदि हमें सिर्फ सुख की तलाश न करनी हो, तो जीवन में हमारा दृष्टिकोण क्या होना चाहिए ?"

इसका उत्तर है कि हमारा दृष्टिकोण अनासक्त होना चाहिए। यह एक संन्यासी होने जैसा है : अच्छे या बुरे अनुभवों से अप्रभावित । यह किसी राजनयिक कार्यक्रम में एक सरकारी पर्यवेक्षक होने की स्थिति की तरह है। वह निरपेक्ष भाव से सिर्फ देखता है। वह कार्यवाही में भाग नहीं लेता या उससे प्रभावित नहीं होता।

हम भावनाओं से प्रभावित हो जाते हैं, क्योंकि हम घटनाओं का हिस्सा बन जाते हैं और उनमें उलझ जाते हैं। हमें असली संन्यासियों की तरह बनना चाहिए, जो प्रेम या घृणा, खुशी या दु:ख, सभी भावनाओं से ऊपर होते हैं। संक्षेप में, हमें अनासक्त बन जाना चाहिए।

बहुत से लोगों को इस विचार में बौद्ध धर्म और कई भारतीय धर्मों जैसे हिंदू और जैन धर्म का सार दिखेगा। ये धर्म जीवन के प्रति ऐसे ही अनासक्त दृष्टिकोण की बात करते हैं।

लगाव या आसक्ति के अलावा, अपूर्ण उम्मीदें भी दुःख को प्रेरित करती हैं। इसलिए, हम खुद को एक कर्मयोगी की भूमिका में रख सकते हैं, जिसमें हम लाभ के बारे में सोचे बिना अपना काम करते हैं। हमें अपना काम अच्छी तरह किसी विशेष पहचान के लिए नहीं, बल्कि इसलिए करना चाहिए, क्योंकि वह हमारा कर्म है। इसी प्रकार हमें अच्छे काम किसी का आभार लेने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए करना चाहिए, क्योंकि वह हमारा धर्म है। बदले में किसी चीज की अपेक्षा न करते हुए, हम किसी संभावित दुःख को कम कर देते हैं। यह सबसे विनम्र और सबसे स्पष्ट अनुकरणीय उदाहरण है।


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