गुरुवार, 18 जुलाई 2024

पुनर्विचार करें और सीखें।

अब समय है कि हम समझें कि हमारी प्रतिक्रियाएँ बेहतर या बदतर नतीजों को प्रेरित करती हैं। वे हमारा जीवन बना सकती हैं; या बिगाड़ सकती हैं। इसी कारण अब लोग मानने लगे हैं कि हमारी नियति अकसर हमारे ही हाथों में होती है।

अकसर आपकी प्रतिक्रिया का तरीका घटनाओं के नतीजे को आकार देता है।हम इस बात को समझ नहीं पाते और हममें से अधिकतर लोग खुशी-खुशी अपना जीवन उसी तरह व्यतीत करते रहते हैं, जैसा हमेशा से करते रहे होते हैं और कभी अपने कार्यों पर पुनर्विचार करने या उससे सीखने का प्रयास नहीं करते। और दीर्घकाल में हमारे कार्य हमारी नियति को भी प्रभावित करते हैं।

प्रख्यात फिल्म अभिनेता अनुपमखेर  एक स्थान पर अपने पिता से संबंधित एक घटना के बारे में बताते हैं ,जिसने उन्हें क्रिया और प्रतिक्रिया के बारे में बहुत कुछ सिखाया।

उन्हीं के शब्दों में …….………

“मैं एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार से संबंध रखता हूँ। मेरे पिताजी हिमाचल प्रदेश सरकार में सरकारी कर्मचारी थे और हम लोग शिमला में रहते थे । उनकी आय से बहुत मुश्किल से परिवार की जरूरतें पूरी हो पाती थीं और इसका नतीजा यह था कि किसी रेस्तराँ में भोजन के लिए जाना शायद ही कभी हो पाता था।

सरकारी सेवा में रहने के कारण, उन्हें एक-दो दिन पहले सेकेंडरी स्कूल नतीजों के बारे में पता चल जाता था। मैं बहुत होशियार छात्र नहीं था। इसलिए, जब दसवीं के नतीजों की संभावित घोषणा से दो दिन पहले मेरे पिता ने मुझे एक रेस्तराँ चलने को कहा, तो मुझे इस बात की बहुत उत्सुकता थी कि आखिर मौका किस बारे में है। कचौड़ी और समोसे खाने के बाद भी मैं उस दावत की वजह के बारे में सोच रहा था, तभी मेरे पिता ने कहा : 'बेटा, मुझे तुम हें एक बुरी खबर देनी है; तुम दसवीं की परीक्षा में फेल हो गए हो। '

मैंने अपने पिता से बहुत सी चीजें सीखी हैं, लेकिन इनमें सबसे यादगार यह घटना थी, जब उन्होंने मेरे फेल होने की निंदा नहीं की। बल्कि, उन्होंने इसे बहुत बढिय़ा तरीके से और सावधानी से सँभाला। आज के परिदृश्य में, जब आप नतीजे आने के बाद फेल होने पर बहुत सी दु:खद घटनाओं के बारे में सुनते हैं, मैं अपने पिता की असाधारण भावनात्मक बुद्धि को महसूस करता हूँ। मुझे नहीं लगता कि कोई अन्य पिता उनकी तरह इस स्थिति को सँभालता। आज भी, मुझे लगता है कि चंद ऐसे पिता होंगे, जो मेरे पिता की तरह सोचते होंगे।”

यहां अंतरराष्ट्रीय बेस्टसेलर 'द सेवन हैबिट्स ऑफ हाइली इफेक्टिव पीपुल' के लेखक और सबसे प्रसिद्ध प्रबंधन विचारकों में एक स्टीफन कोवे के 90:10 सिद्धांत में ऐसा ही दृष्टिकोण दिखाई देता है। कोवे का कहना है कि मूल रूप से 10 फीसदी जीवन ही आपके साथ होनेवाली घटनाओं लिए कई नियम बताती है। इसमें जीवन के लिए आदर्श और सूक्तियाँ निहित हैं, और यह व्यक्तिगत निष्ठा, व्यवहार और आत्म-विकास के लिए एक रूपरेखा प्रदान करती है। 

लोकाचार और व्यक्तिगत दर्शन के रूप में रूडयार्ड किपलिंग की कविता 'इफ' उसके लिखे जाने के काल के मुकाबले वर्तमान कार्मिक काल में और भी अधिक प्रासंगिक है। इसलिए इस कविता की पंक्तियाँ विंबलडन टेनिस के सेंटर कोर्ट के प्लेयर्स एंट्रेंस पर देखकर कोई हैरत नहीं होती, यह उसके शाश्वत और प्रेरणास्पद गुण का एक प्रभाव शाली उदाहरण है। 

इस कविता 'इफ' का सौंदर्य और लालित्य, रुडयार्ड किपलिंग के अधिकांशत: दु:खद और त्रासदीपूर्ण जीवन के अत्यंत विरोधाभास में है। उन्हें अपने माता-पिता द्वारा कभी प्रेम और सम्मान नहीं मिला और उन्हें बाहर भेज दिया गया; उनकी पालक माता ने उन्हें शारीरिक और मानसिक प्रताडऩा दी; एक पब्लिक स्कूल में वह फेल हो गए। बाद के जीवन में, उनके दो बच्चों की मृत्यु ने भी किपलिंग को बहुत गहरे व्यथित किया।संभवत: इस कविता की गहराई इन घटनाओं का प्रतिफल हो….

'यदि तुम सपने देख सकते हो—और सपनों को अपना स्वामी नहीं बनाते, 

यदि तुम सोच सकते हो—और विचारों को अपना लक्ष्य नहीं बनाते;

यदि तुम विजय और विपत्ति का सामना कर सकते हो और इन दोनों ठगों को समान रूप से देख सकते हो.... 

यदि तुम एक निर्मम मिनट को साठ सेकेंड के फासले से भर सकते हो…

…..तो यह धरती और इसकी हर चीज तुम्हारी है…….और—इससे भी अधिक —तुम ' मानव ' हो जाओगे पुत्र !'

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