नाम हरे भय संकट त्रासा।।
काम क्रोध द्वेषादिक रोग भरे जीवनमें ।
लोभ-मोह का कलुष क्लेश
छाया तन मन में।।
मन के रोग जगतमें हमको रहते घेरे। हिंसा मत्सर मोह जमाए मनमें डेरे।।
गहन निराशाभरे हृदयकी अन्तिमआशा। जीवन दायक राम रसायन तुम्हरे पासा।।
राम कृपा की संजीवनि के तुम हो दाता । स्वस्थचित्त होता पल में जो तुमको ध्याता।।
लक्ष्मणको जब लगीशक्ति संजीवनि लाए।
दिव्यौषधि में राम नाम के गुण प्रविशाए।।
राम नाम की शक्ति चली जब तुम से आगे।
सारेसंकट टले लखन फिर रण में जागे ।।
दिव्य शक्ति राघव की उनके नाम समाई। पवन पुत्र की महिमा जग को पड़ी दिखाई।।
अनुजों से बढ़कर रघुनन्दन के तुम प्यारे। जनकसुता के पुत्र बने तुम परम दुलारे ।।
अन्तकाल हो कृपा यही अन्तिम अभिलाषा ।
राम रसायन सुखदायक है तुम्हरे पासा ।।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
पूरी करो दरश की आसा ।।
रघुपति की सेवा पहला अधिकार तुम्हारा।
प्रभु चरणों में अपना तन मन जीवन वारा।।
सेवक सच्चा वही स्वामी को जो सुख देता ।
स्वामीका हरसंकट अपने सिर ले लेता।।
मुखरित होती राम नाम की सुरुचि सुवासा ।
सदा सर्वदा आप राम रघुवर के दासा ।।
राम दुःखी थे जब सीता के विरह सताये ऋष्यमूक पर संकट मोचक बन तुम आये ।।
बलशाली सुग्रीव सखा प्रिय उसे बनाया। वानरदल को प्रभुसेवा में आप लगाया ।।
एककार्य को चले किन्तु बहुकाज सँवारे। इसकारण तुम रघुवर सेवक सबसेन्यारे।
सेवक धर्म कठोर बहुत यह लोग बताते। सेवक के अपने सुख दुःख सब हैं खो जाते । ।
ऐसा सेवा धर्म आपने सदा निबाहा।
रैन दिवस केवल प्रभु के चरणों को चाहा।।
रामचरित तुमको लगताहै सदा नया सा।
राघव के चरणारविन्द के तुम हो दासा।।
....(क्रमश:)
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