हमारे जीवन में पहला बदलाव तब आता है जब हमारी स्कूली शिक्षा समाप्त होती है और हम कॉलेज जाते हैं। हम अपने मित्रों के समूह से बाहर आ जाते हैं, जिनके साथ हम एक दशक से अधिक समय बिता चुके होते हैं। हमें नई जान पहचान बनानी होती है और नए वातावरण में खुद को ढालना होता है। अगला परिवर्तन तब होता है, जब हम रोजगार के क्षेत्र में उतरते हैं; वह क्रम फिर से दुहराया जाता है।
आखिरकार, हम अपने-अपने व्यवसाय रम जाते हैं और फिर हम बस प्रवाह के साथ बहते रहते हैं। हालाँकि यह एक आदर्श स्थिति प्रतीत होती है, लेकिन वास्तव में यह ठहराव और धीमी मृत्यु से संबंधित होती है। इस दु:खद स्थिति को मध्य जीवन संकट (मिड लाइफ क्राइसिस) का नाम दिया गया है।
यह कोई असामान्य बात नहीं है कि यह स्थिति महिलाओं से अधिक पुरुषों को प्रभावित करती है, क्योंकि महिलाएँ परिवार और बच्चों के साथ अपने मजबूत संबंधों को देखते हुए बदलाव से अधिक जुड़ी रहती हैं। अधिकतर पुरुष अपनी नौकरियों में वही रोजमर्रा के काम करते हैं और नया सीखना बंद कर देते हैं, जल्दी ही उन्हें पता चल जाता है कि उनके युवा सहकर्मी उनसे अधिक प्रतिभाशाली और तेज हैं। और वे इसे स्वीकार नहीं कर पाते।
उनकी पत्नियाँ अब राय के लिए उन पर निर्भर नहीं होतीं; समय के साथ उनकी सोच भी विकसित होती है और अब वे स्वतंत्र, साहसी महिलाएँ होती हैं। पति इस बात को सहन नहीं कर पाते। उन्हें लगता है कि उनके बच्चे अब उनके नियंत्रण में नहीं रहे; बच्चे प्रोफेशनल जीवन में उतर चुके होते हैं और उन्हें पिता के परामर्श की जरूरत नहीं होती। पिता को यह बात समझ नहीं आती।
इस सब का सिर्फ यही उपचार है कि बदलाव के साथ चलें और लगातार अपने आप को नया रूप देते रहें। कॉरपोरेट इस सिंड्रोम को पहचानते हैं, इसलिए उनके पास सुंदर नामोंवाले प्रबंधन - शिक्षा कार्यक्रम होते हैं। थके एक्जीक्यूटिव स्वास्थ्यप्रद वातावरण में ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होते हैं और ताजगी के साथ लौटकर नए दृष्टिकोण के साथ अपने जूनियरों को प्रभावित करते हैं।
जिन लोगों के पास प्रायोजक नहीं हैं, उन्हें लाइफ कोचिंग कार्यक्रमों के द्वारा अपने आप को नया रूप देना चाहिए और अपना फिर से मूल्यांकन करना चाहिए, कोई नई चुनौती तलाश करनी चाहिए और फिर अपनी ऊर्जा को नई दिशा देनी चाहिए। अधिक साहसी लोग अपने ऊपर छा रही ऊब को पहचान लेते हैं और अपनी नौकरी पूरी तरह छोड़कर किसी बिलकुल असंबद्ध क्षेत्र में नया काम हाथ में ले लेते हैं।
हम कुछ भी अलग करें....महत्वपूर्ण बात है, नई चुनौती तलाश करना। फोटोग्राफी करें और आप रोशनी एवं छाया तथा रंगों की दुनिया में खो जाएँगे। या फ्रेंच या जर्मन जैसी कोई नई भाषा सीखें। या किसी डांस क्लास अथवा अभिनय कार्यशाला में शामिल हो जाएँ। ऐसे कार्यकलाप आपके व्यक्तित्व को नया आकार दे सकते हैं।
इसलिए जब आप स्थितियों का सामना न कर पाएँ और दुनिया आपको पीछे छोड़कर आगे बढने लगे, तो आप गुस्से में न आएँ। बस को रोकें और उस से उतर लें। अपने जीवनसाथी के साथ एक छुट्टी पर जाएँ एवं अपने आप को ढूँढें। और एक नई चुनौती तलाश करें...।
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