'यदि आप खुद नहीं बदलते हैं, तो अंत में वास्तविकता आप पर वह बदलाव थोप देती है। '
जरा सोचें। आप अपनी खाने की आदतें बदलकर व्यायाम करना कब आरंभ करते हैं? जब डॉक्टर आपको बताता है कि आपका कॉलेस्ट्रोल का स्तर बहुत बढ़ गया है और जल्दी ही आपको गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं। अचानक आप अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग हो जाते हैं! जल्दी ही आप खुद को दिन भर कच्ची सब्जियाँ खाते हुए और मुँह में पानी लानेवाले स्वादिष्ट खाने की ओर से आँखें फेरते हुए पाते हैं।
आप समय निकालकर योग और ध्यान की कक्षाओं में जाने लगते हैं और बाद में एक ऐसी आंतरिक शांति पाते हैं, जो आपने पहले महसूस नहीं की थी और जिससे आपको परमानंद प्राप्त होता है। इस प्रकार, कॉलेस्ट्रोल वह संकट था, जिसने आपको आंतरिक शांति प्राप्त करने पर विवश किया। अन्यथा आपने अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकाल कर अपनी आंतरिक शांति की तलाश करने के बारे में सोचा भी नहीं होता।
एक व्यवसायी अपने उत्पाद को उत्कृष्टता प्रदान करने के लिए गंभीर शोध कब करता है? जब वह अपने नए प्रतिस्पर्धियों को विद्युत् गति से आगे बढ़ता देखता है, तो व्यवसाय में टिके रहने के लिए वह तुरंत एक बेहतर उत्पाद के निर्माण के लिए नए और अनोखे तरीके सोचने लगता है। जितने अधिक नए तरीके और उत्पाद वह व्यवसायी ला पाएगा, उतनी जल्दी वह आगे बढ़ पाएगा। बदलाव हर एक चीज में आवश्यक है।
हम जीवन में तभी बदलते, बढ़ते और कार्रवाई करते हैं, हम हमारे सामने कोई बड़ा संकट होता है। हम तब तक नहीं बदलना चाहते, जब हमारे जीवन को दुःख पर्याप्त रूप से नहीं छू लेता और हमें कष्ट व दर्द की अच्छी-खासी खुराक नहीं मिल जाती। एक मशहूर वैज्ञानिक ने भी बहुत निराले ढंग से कहा है कि 'दर्द नहीं तो लाभ नहीं' (नो पेन, नो गेन)।
हम खुद को बदलकर कुछ मुश्किल निर्णय तभी लेते हैं, जब हम दुःखी और निराश बने रहने से परेशान हो जाते हैं, थक जाते हैं। लेकिन दिमाग में एक बात रखें कि अंत में सबकुछ ठीक हो जाएगा। अगर ठीक नहीं होता. तो ये अंत नहीं है।
आप यहाँ शिक्षित होने के लिए आए हैं, सजा पाने के लिए नहीं । और आपके पाठ तब तक चलते रहते हैं, जब तक आप इस पृथ्वी पर रहते हैं। इसलिए जीवन को उसी रूप में लें, जिसमें वह आपको मिल रहा है, एक हलके दिन के साथ। आप आगे बढ़ेंगे, भले ही आप एक दिन में सिर्फ एक कदम बढ़ाएँ ।
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