रविवार, 29 सितंबर 2024

(3) दीवारको पीटनेमें समय बरबाद नकरें..!

सकारात्मक बदलाव एक स्वाभाविक प्रक्रिया कैसे है?

आमतौर पर बदलाव स्पष्ट रूप से परिभाषित चरणोंमें आता है-

1. मूर्खता, जिसके पीछे आती है

2. असफलता और फिर

3. निराशा या अवसाद; और अंत में

4. बुद्धि !

जब लोग परेशान होते-होते थक जाते हैं तो वे बदल जाते हैं। हममें से अधिकांश को इनमें से प्रत्येक चरण से गुजरने की आवश्यकता होती है। भले ही इस प्रक्रिया में आपका सिर फूट जाए, लेकिन उपर्युक्त चार चरणों का उल्लंघन करके किसी को बदलना शायद संभव न हो। अधिकतर लोग बदलने के लिए तब तक इंतजार करते रहते हैं, जब तक वे कुछ विफलताओं का सामना करके निराश नहीं हो जाते।

जिस प्रकार हम घर से निकलने से पहले सारी ट्रैफिक लाइट्स के हरा होने का इंतजार नहीं कर सकते, उसी प्रकार हमें खुशी देनेवाली गतिविधियों को अपने आस-पास के लोगों के कारण टालना छोड़ देना चाहिए। उन्हें बदलने के लिए जितना समय चाहिए, लेने दें; लेकिन तब तक हमें अपने जीवन में चलते रहना चाहिए।

क्या होता है, जब आप किसी को बदलने का प्रयास करते हैं और सफल नहीं होते? आप निराश हो जाते हैं और वे आपसे नाराज हो जाते हैं- और फिर दोनों एक-दूसरे से नफरत करने लगते हैं। हम यहाँ युद्ध शुरू करने नहीं आए हैं। हम यहाँ हैं— जीवन के प्रवाह के साथ चलने के लिए और लोगों को उसी तरह स्वीकार करने के लिए, जैसे वे हैं। हमारे आस-पास लाखों लोग हैं और यदि वे सभी आपकी तरह होशियार, बुद्धिमान और अनुशासित होंगे, तो मजा क्या रहेगा ! सबकी अपनी गति और समझ का स्तर होता है और सबको बदलने के लिए अपने खुद के समय की आवश्यकता होती है। यदि उन्हें वास्तव में आपकी मदद की आवश्यकता होगी, तो वे आपसे अवश्य कहेंगे, और तब आपके लिए जीवन जीने के तरीकों के बारे में अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने का समय होगा। तब तक, उन्हें उनके तरीके से जीने दें और वे जैसे हैं, उन्हें उसी रूप में स्वीकार करें।

'दीवार को पीटने में समय बरबाद न करें, इस उम्मीद में कि वह दरवाजे में परिवर्तित हो जाएगी। '

- लॉरा श्लेसिंगेर

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