रविवार, 29 सितंबर 2024

(86-90) कई बार मन सोचता, हम दुर्गुण की खान ।

86.कई बार मन सोचता, 

हम दुर्गुण की खान । 

बढ़े खिन्नता हृदय की, 

गिर जाता अभिमान ।। 

स्वयं को नीच न माने, 

शक्ति अपनी पहिचाने ।। 


87.पूर्व जनों के कर्म जब, 

मिलते स्वयं समान। 

उनको खुद जैसा समझ, 

बढ़े आत्मसम्मान।। 

सभी हैं अपने जैसे, 

कहो हम छोटे कैसे।। 


88.रखें स्वयं को सामने, 

दें न अन्यपर ध्यान । 

तब सच्ची आधीनता, 

बन जाती वरदान ।। 

वही स्वाधीन जगत में, 

रहे जो अपने मत में ।। 


89.शिशु का मन उत्कृष्ट हो, 

बिना लिये निर्देश । 

अभिभावक ही दे सके, 

यह उत्तम सन्देश । । 

बड़ी यह जिम्मेदारी, 

प्रगति की हो तैयारी।। 


90.हटे गुलामी गैर की, 

बढ़े हृदय सम्वाद । 

जो आजादी बाँटता, 

वो सच में आजाद ।।

वही आजाद कहाए, 

गैर को मुक्त कराये।।

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