रविवार, 19 जनवरी 2025

(126 - 130) जितनी प्रतिभा आप में, उस पर दीजै ध्यान ।


126.जितनी प्रतिभा आप में, 

उस पर दीजै ध्यान । 

केवल बोलें कोकिला, 

वन भी लगै मसान ।। 

सभी अनमोल यहाँ पर, 

न किंचित हो मन में डर ।। 


127.मन के श्रेष्ठ विचार जो, 

बनें न सिर पर भार । 

नौका बन कर ले चलें, 

मोह द्वन्द्व के पार ।। 

विचारों की हो नौका, 

न चूके अच्छा मौका।। 


128.सूक्ष्म राह से ना खुलें, 

जीवन की हर गाँठ । 

आदि मध्य और अन्त तक, 

सदा अधूरा पाठ ।।

गाँठ मन की तुम खोलो, 

मधुर शुभ वाणि बोलो।। 


129.हँसना सीखो कष्ट में, 

रखों हृदय समझाय । 

चढ़े बुढ़ापे का जहर, 

फिर न जीव हँस पाय ।। 

हँसी में खिले जवानी, 

न फिर जो वापस आनी ।।


130.मन समझाने के लिये 

शत शत रचें विधान ।

फर्ज गुलामी को कहें, 

कितना है आसान ।। 

गुलामी कभी न करिए, 

फर्ज से कभी न डरिए । ।

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