जल धाराएँ सूखतीं नदी सिकुड़ती जाएँ /.
धरा चटकती प्यास से जन जन त्राहि मचाय//
जन जन त्राहि मचाय चतुर्दिक आग बरसती /
बूँद बूँद पानी को धरती आज तरसती //
अँधा मानव भोग रहा निज करनी का फल /
किया प्रदूषित धरा , वायु , नभ , और नदी जल //
मेरे मोहल्ले के कुछ 'महारथी' दस आदमी के नहाने लायक पानी से अकेले अपनी मूंछें ही भिगा पाते हैं ..... टोकने पर ज्ञान गंगा बहा देते हैं कि पानी तो "भगवान क़ी देन" है / क्या फर्क पड़ जायेगा ... इसे वीरों को ये पंक्तियाँ समर्पित हैं....
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