मंगलवार, 2 अगस्त 2011

ज्वाला मुख सी तप रही धरती माता हाय /
लावे सी लगती हवा गगन आग बरसाय //
गगन आग बरसाय थपेड़े चलते लू के /
छिपते फिरते मोर कोकिला कैसे कूके //
जड़ा बादलों ने मुहँ पर मोटा सा ताला /
 पेड़ सूखते जाएँ निकलती तन से ज्वाला // 

आज वृन्दाबन में बहुत गर्मी पड़ रही है..... उसी सन्दर्भ में कुछ विचार आ गए.. आपके साथ बाँट रहा हूँ  

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