गुरुवार, 24 जनवरी 2019

कैसे बनी भारत की पहली फीचर फिल्म.(भाग-2)

(.....भाग 1 से आगे)
दोपहर में मेरा घर का सारा काम खत्म हो जाता तब ये (दादा साहब) मुझे मराठी में डेवलपिंग की सारी जानकारी दिया करते थे। क्योंकि अंग्रेजी तो मुझे बिल्कुल नहीं आती थी। रसायनों की नाप-तोल 2-3बार देख लेने के बाद मुझे स्वतंत्र रूप से फ़िल्म डेवलप करना आ गया। कैमरे का डायाफ्राम कैसे बदलें, कैसी रोशनी में कैसा डायाफ्राम इस्तेमाल करें, ये सब ये मुझे धीरे- धीरे सिखाते गए।
अब जब इस पर विचार होने लगा कि कैसी और कौनसी फ़िल्म बनाएं तो ये बोले," पहले हम पेड़ पर फ़िल्म बनाएंगे।"
 इन्होंने पहले मिट्टी में मटर के बीज बोए। दूसरे दिन वहां कैमरा ला कर रख दिया। हर रोज ये 3-4 फ़ीट फिल्मांकन करते थे।इस तरह पौधे पर फलियों के आने तक पौधे के पूरे विकास को चित्रित किया गया।
फिर शुरू हुआ लेबोरेट्री का काम। हमारी लेबोरेटरी भी बिल्कुल छोटे से कमरे में थी। 5-6 टेबिल रख कर उन पर पोर्सलीन की  तश्तरियां रख दी गई थीं। इन तश्तरियों में फ़िल्म के फ्रेम्स रखे जाते थे।एक फ्रेम पर फ़िल्म लपेट कर उसे पहली तश्तरी में कुछ देर के लिए डुबो कर रखा जाता था।
इसी तरह बाकी की तश्तरियों में डुबा लेने के बाद उसे हाइपो में डुबो कर उसे अलम और ग्लिसरीन से नहलाया जाता और उसके बाद फ्रेश पानी से धोकर फ्रेम पर टांग कर सुखाया जाता था।
इसके बाद मैग्निफाइंग ग्लास से यह देखते थे कि डेन्सिटी पिनहोल आयी या नहीं। इस तरह फ़िल्म का निरीक्षण किया जाता। दूसरे दिन पोज़िटिव बनाया जाता था।उस समय ये सब काम हाथ से ही करने पड़ते थे।आजकल जैसी शानदार तकनीक वाली मशीनें उस समय नहीं थीं।
पॉजिटिव फ़िल्म तैयार हो जाती तब उसे मोमबत्ती की रौशनी में दीवार पर देखते थे।
इस तरह मटर के दाने की फ़िल्म बनाई गई। .........(जारी)


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