गुरुवार, 24 जनवरी 2019

कैसे बनी भारत की पहली फीचर फिल्म..?( भाग-3)

(भाग-2 से आगे...)
हमारे बंगले के सामने वाली चॉल में बहुत सारे बच्चे थे। ये सारे बच्चे हमारे बेटे बाबा राय की ही उम्र के थे।
वे हमारे बगीचों में खेलने आते थे।ये (फाल्के सर) इन लड़कियों के खेलों और लड़कों की हाथापाईयों को फिल्माया करते और रात को टेस्ट के तौर पर उन्हें देखते।
आमतौर पर इनकी फ़िल्म कभी बेकार नहीं गयी। पूरा महीना ये प्रयोग जारी रहे, तब तय हुआ कि अब कोई बड़ा काम करना होगा।खुद इन्होंने कहानी लिखी-' भली खोड मोडली' (अच्छा सबक मिला'!) उर्फ 'पीठाचे पंजे' ( आटे के निशान')।
यहीं के बच्चे थे हमारे एक्टर। ये स्वयं, मैं (सरस्वती फाल्के) और बढई का बेटा मिल कर सेटिंग्स बनाया करते।
महिलाओ की भूमिका के लिये लड़कों को साड़ी ये (फाल्के सर) ही पहनाया करते थे।इस तरह हमने 500 फिट की वह फ़िल्म बनाई। फिर उसकी टिंटिंग वगैरह की। कार्बाइड के दिये पर हमने यह फ़िल्म देखी, लेकिन ये बिजली के दिये पर यह फ़िल्म देखना चाहते थे।
उस समय दादर में बिजली ट्राम वगैरह कुछ नहीं था। कोलाबा देवी में सेठना की दुकान थी जहाँ बिजली प्रॉजेक्टर वगैरह सब कुछ था। इन्होंने सेठना की अनुमति से पहली बार रुपहले पर्दे पर फ़िल्म देखी। उस समय हमारे साझेदार नाडकर्णी एवं अन्य कुछ मित्र उपस्थित थे।
फ़िल्म देख कर सब लोग दंग रह गए।खुद ये (फ़ाल्के सर) और नाडकर्णी तो मारे खुशी के नाचने ही लग गए।
सबने इन्हें शाबाशी दी, दिल से इनका धन्यवाद किया। ये भी बहुत खुश हुए क्योंकि इनकी मेहनत सफल हो गयी थी।

 ......(जारी है )

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