शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

कैसे बनी भारत की पहली फीचर फिल्म....!! (भाग-4)

(भाग- 3 से आगे )

.........यह सोच कर कि अब नौकरी के लिए विज्ञापन देने में कोई हर्ज नहीं, इन्होंने 'इंदु प्रकाश' एवं अन्य कुछ समाचार पत्रों में विज्ञापन दिया-" एक्टर चाहिए।बढ़ई, धोबी, नाई, पेंटर चाहिए।लेकिन लतखोर, आवारा, पिचके गालों वाले दोपाये आने की तकलीफ ना उठाएं। खूबसूरत, सेहतमंद- गूंगे हों तो भी चल जाएगा। एक्टिंग जानने वाले अच्छे कलाकार चाहिए।

इस विज्ञापन में भी इनके चुभते हुए व्यंग का परिचय मिलता है। रंगणेकर नामक एक पेंटर को सबसे पहले ₹60 माहवार वेतन पर रखा गया। सबसे पहले हमारे यहां आए थे गजानन वासुदेव साने, यह उर्दू नाटक कंपनी में काम किया करते थे।
हाव-भाव अच्छे किया करते थे इन्होंने उनकी परीक्षा ली और पहले ₹40 वेतन पर उन्हें नियुक्त कर लिया।
 उर्दू नाटक कंपनी में वे ₹30 तनख्वाह पाते थे। धीरे-धीरे लोग जमा होते गए।लेकिन औरतें कहां से लाएं?  यह खुद नाचने गाने वालियों  के यहां हो आये लेकिन एक भी औरत राजी नहीं हुई ।
कुछ औरतें हमारे घर आती थी। उनकी मेहमान नवाजी मुझको ही करनी पड़ती थी। उन्हें चाय-पानी खाना-पीना सब मुझको ही देना पड़ता था
मेरे जेठ जी को यह बिल्कुल पसंद नहीं था।वे कहते थे कि वह(दादा साहेब), जो करना चाहता है करने दो।
 तुम इन औरतों को मत परोसा करो, तुम इस काम के लिए नहीं बनी हो।
 मैं मन ही मन कहती थी कि इनके काम में इनकी मदद करना मेरा कर्तव्य  है। इन औरतों को खाना परोसने से मेरा क्या बिगड़ने वाला है।
 लेकिन इतना सब होने पर भी एक भी औरत काम को हाथ लगाने को तैयार नहीं थी। उस समय के दो-तीन जाने माने अभिनेताओं से भी इन्होंने फिल्म में काम करने की दरख्वास्त की। वे 200-300 ₹ वेतन की मांग करने लगे।
आखिर उन्होंने  बड़े अभिनेताओं को लेने का यह विचार छोड़ दिया और बोले- "मैं खुद ही अब युवा लोगों को तैयार करूंगा।" .................(जारी)

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