.........(भाग -5 से आगे)
....बाहर के गांव से मुंबई में दो महिलाएं शूटिंग का मजा लेने के लिए आ गई। हरिश्चंद्र के दरबार में हमें कुछ नई बात पैदा करनी थी इसलिए उन्हें सीन में शामिल होने के लिए बुला लिया। उन्होंने दरबार में नाच गाना करके दिखाया। गाने वालियों के पीछे बैठे साजिंदे हमारी कंपनी के ही लोग थे।जिन्हें हमने इसके लिए तैयार किया था । हम ने इन महिलाओं को पैसे नहीं दिए क्योंकि वे तो वैसे भी मजे देखने के लिए ही तो आई थी। हां, उनके आने जाने पर करीब ₹100 खर्च हुए। दूसरी कंपनियों से हमने सामान लिया था औसत से भी कम दर्जे के कुछ लोगों की जरूरत पड़ी थी, उन्हें उतने समय के लिए बुलवा लिया था। उन्हें हमने पैसे नहीं दिए और उन्होंने भी हमारी परिस्थिति को देखते हुए किसी तरह की कोई मांग नहीं की। हां सबको 4- 5 सौ कप चाय दी गई। चाय अकेले मैंने बनाई थी। मुंबई में आउटडोर सीन के लिए कंपनी के लोग निकल पड़ते थे, तब एक कुली सामान लिए साथ चलता था। उस समय हमारे पास कोई गाड़ी - वाड़ी नहीं थी। मेकअप का सामान कपड़े आदि हर किसी के अपने अपने हुआ करते थे।हमारी पड़ोसन यह कहकर बुलाती थी कि देखिए काकी की नई खानाबदोश गृहस्थी चल दी। इस तरह लोग मेरा मजाक बनाते थे। काशी के आउटडोर सीन कहां लिए जाएं? काशी जाना तो संभव नहीं था, इसलिए तय हुआ कि काशी वाले सीन त्रयंबकेश्वर में ही लिए जाएं। इनका (दादा साहब) जन्म त्रिंबकेश्वर में ही हुआ था, इसलिए वहां रहने की कोई कठिनाई पेश नहीं आई । वहां एक महीना रह कर हम मुंबई लौट आए ।त्रिंबकेश्वर में लेबोरेटरी कैसे मिलती लिहाजा हमने थोड़ा डेवलपर साथ ले लिया 1-2 फिट डेवलप करके देखते थे नतीजा ठीक नहीं निकला तो वही सीन दूसरे दिन दोबारा लिया जाता था। हर रोज त्रयंबकेश्वर ले जाने के लिए हमारे पास पैसे थे कहां ?
मुंबई लौट कर इंटीरियर महल वाले सीन घर पर ले लिए। रोहिताश्व के कुछ सीन अभी बाकी थे।कल्याण के पास वांगणी गांव में उन्हें फिल्माना तय हुआ। कुछ लोग प्रबंध करने के लिए आगे चले गए। सारी तैयारी हो गई, मगर इधर 1 दिन पहले खेलते खेलते बाबा राय के सिर पर चोट लगी और खून बहने लगा। सब कहने लगे कि बहुत घायल हुआ है यह। इसकी शूटिंग मत कीजिए। उस पर कल जो सीन लेने हैं वह सारे चिता और शमशान वाले सीन है। कुछ दिन ठहर कर फिर शूटिंग करना। इधर हम तो पैसे खर्च कर चुके थे।दोबारा पैसे कहां से लगा दे, इसलिए मन कड़ा करके यह बोले," बाबा राय को एतराज नहीं होगा तो मैं सीन लूंगा, वह नहीं चाहेगा तो नहीं लूंगा।" फिर बाबा राय से उन्होंने पूछा - "बेटा क्या करें, कल बांगड़ी जाएं?? बाबा राय ने कहा- "हां क्यों नहीं, जरूर जाएंगे।" दूसरे दिन सिर पर पट्टी बांधे उसी घायल स्थिति में हम उसे वांगणी ले गए और सीन शूट किया ........(जारी)
....बाहर के गांव से मुंबई में दो महिलाएं शूटिंग का मजा लेने के लिए आ गई। हरिश्चंद्र के दरबार में हमें कुछ नई बात पैदा करनी थी इसलिए उन्हें सीन में शामिल होने के लिए बुला लिया। उन्होंने दरबार में नाच गाना करके दिखाया। गाने वालियों के पीछे बैठे साजिंदे हमारी कंपनी के ही लोग थे।जिन्हें हमने इसके लिए तैयार किया था । हम ने इन महिलाओं को पैसे नहीं दिए क्योंकि वे तो वैसे भी मजे देखने के लिए ही तो आई थी। हां, उनके आने जाने पर करीब ₹100 खर्च हुए। दूसरी कंपनियों से हमने सामान लिया था औसत से भी कम दर्जे के कुछ लोगों की जरूरत पड़ी थी, उन्हें उतने समय के लिए बुलवा लिया था। उन्हें हमने पैसे नहीं दिए और उन्होंने भी हमारी परिस्थिति को देखते हुए किसी तरह की कोई मांग नहीं की। हां सबको 4- 5 सौ कप चाय दी गई। चाय अकेले मैंने बनाई थी। मुंबई में आउटडोर सीन के लिए कंपनी के लोग निकल पड़ते थे, तब एक कुली सामान लिए साथ चलता था। उस समय हमारे पास कोई गाड़ी - वाड़ी नहीं थी। मेकअप का सामान कपड़े आदि हर किसी के अपने अपने हुआ करते थे।हमारी पड़ोसन यह कहकर बुलाती थी कि देखिए काकी की नई खानाबदोश गृहस्थी चल दी। इस तरह लोग मेरा मजाक बनाते थे। काशी के आउटडोर सीन कहां लिए जाएं? काशी जाना तो संभव नहीं था, इसलिए तय हुआ कि काशी वाले सीन त्रयंबकेश्वर में ही लिए जाएं। इनका (दादा साहब) जन्म त्रिंबकेश्वर में ही हुआ था, इसलिए वहां रहने की कोई कठिनाई पेश नहीं आई । वहां एक महीना रह कर हम मुंबई लौट आए ।त्रिंबकेश्वर में लेबोरेटरी कैसे मिलती लिहाजा हमने थोड़ा डेवलपर साथ ले लिया 1-2 फिट डेवलप करके देखते थे नतीजा ठीक नहीं निकला तो वही सीन दूसरे दिन दोबारा लिया जाता था। हर रोज त्रयंबकेश्वर ले जाने के लिए हमारे पास पैसे थे कहां ?
मुंबई लौट कर इंटीरियर महल वाले सीन घर पर ले लिए। रोहिताश्व के कुछ सीन अभी बाकी थे।कल्याण के पास वांगणी गांव में उन्हें फिल्माना तय हुआ। कुछ लोग प्रबंध करने के लिए आगे चले गए। सारी तैयारी हो गई, मगर इधर 1 दिन पहले खेलते खेलते बाबा राय के सिर पर चोट लगी और खून बहने लगा। सब कहने लगे कि बहुत घायल हुआ है यह। इसकी शूटिंग मत कीजिए। उस पर कल जो सीन लेने हैं वह सारे चिता और शमशान वाले सीन है। कुछ दिन ठहर कर फिर शूटिंग करना। इधर हम तो पैसे खर्च कर चुके थे।दोबारा पैसे कहां से लगा दे, इसलिए मन कड़ा करके यह बोले," बाबा राय को एतराज नहीं होगा तो मैं सीन लूंगा, वह नहीं चाहेगा तो नहीं लूंगा।" फिर बाबा राय से उन्होंने पूछा - "बेटा क्या करें, कल बांगड़ी जाएं?? बाबा राय ने कहा- "हां क्यों नहीं, जरूर जाएंगे।" दूसरे दिन सिर पर पट्टी बांधे उसी घायल स्थिति में हम उसे वांगणी ले गए और सीन शूट किया ........(जारी)


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