मंगलवार, 29 जनवरी 2019

कैसे बनी भारत की पहली फीचर फिल्म...??😊( भाग-7)

वागणी में भी एक मजेदार घटना घटी।
सब लोगों के हाथों में तलवार और बर्छियां आदि देख कर गांव के मुखिया को लगा कि यह लोग अंग्रेजों के खिलाफ बगावत करने वाले क्रांतिकारी वगैरह हैं।
उस समय हथियार रखने की कानूनन मनाही थी।गांव का  मुखिया दौड़कर आया और डांट डपट कर पूछने लगा कि माजरा क्या है??
 इन्होंने (फ़ाल्के सर ने) शांतिपूर्वक जवाब दिया," मुखिया जी हम लोग क्रांतिकारी नहीं फिल्म वाले लोग हैं।"
 फिर इन्होंने उन सबको कैमरा चलाकर पूरा सीन शूट करके दिखाया। हां, कैमरे में फिल्म नहीं थी। तो इस तरह से राजा हरिश्चंद्र की नेगेटिव बन गई। इन्हीं लोगों ने पॉजिटिव भी बना डाली।
 फिल्म की टचिंग कलरिंग जॉइनिंग मैनडिंग और टाइटल आदि सारे काम इन्होंने खुद ही किए।  पुराने जमाने के रिवाज के अनुसार शुरू में नटी -सूत्रधार का सीन होता था।
सब लोग कहने लगे,"दादा साहब आप खुद सूत्रधार बन जाइए, काकी नटी बन जाएंगी और आप के दोनों बेटे परिपार्श्वक बनेंगे।" 
 यह (दादा साहब)  मान गए और बोले," काकी मान जाएंगी?"  इन्होंने मुझसे पूछा तो मैंने साफ इंकार कर दिया। ये बोले," मेरे साथ खड़े होने में तुम्हें क्या एतराज है ? कैमरा मैन भी हमारे तैलंग जी ही तो है।
 तुम्हारे ही दोनों बेटे हमारे आसपास होंगे फिर एतराज किस बात का??
मैंने कहा," मैं पर्दे के पीछे से आपकी सारी मदद करूंगी, चाहे तो कुली बन कर बोझ भी उठाऊंगी, लेकिन पर्दे पर आना  मुझसे नहीं होगा,और ना ही मुझे पसंद आएगा।
बाकी लोगों ने भी मुझे समझाने की बहुत कोशिश की, कहा-" आप दोनों ने मिलकर इस उद्योग की नींव रखी है इसलिए इस फिल्म की शुरुआत भी आप ही पर, यानी 'धुंडीराज सरस्वती' पर ही होनी चाहिए। लेकिन संस्कार इस तरह आसानी से थोड़े मिटाए जा सकते हैं।
आखिरकार नटी की भूमिका.  स्त्री भूमिकाएं  करने वाले पांडुरंग ने ही निभाई।
 हरिश्चंद्र में बहुत सारे ट्रिक्स सीन थे। सब तो याद नहीं, कुछ थोड़े से याद हैं जैसे- 
1.शिव जी प्रकट होकर हरिश्चंद्र के हादसे हाथ से तलवार ले लेते हैं।
2. पूरा का पूरा तालाब गायब हो जाता है।
3. यज्ञ कुंड से अप्सरा निकलती है आदि कुछ ट्रिक सीन मुझे अभी भी  याद है।
मुंबई में अंग्रेजी फिल्में दिखाने वाले दो-तीन थिएटर थे।
 उनमें से ओलंपिया थिएटर में निजी तौर पर  ट्रायल किया गया,वह सफल रहा।
कुछ लोग कहते थे यह दाल भात खाने वाले 'बम्मन' क्या फिल्म बनाएंगे। 
 कुछ न कुछ खोट जरूर रह गई होगी। थोड़ी भी खोट नजर आई तो हम लोग पर्दे पर पकोड़े दे मारेंगे, मूंगफली दे मारेंगे।इनकी फिल्म अच्छी बनी हो  ऐसा  हो ही नहीं सकता।
 एक धारणा यह थी हिंदुस्तान की आबोहवा में  फ़िल्म की फोटोग्राफी हो ही नहीं सकती, लेकिन इन्होंने यह कर दिखाया
........….........(जारी)



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