विगत कुछ दिनों से यह श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही थी..."कैसे बनी भारत की पहली फीचर फिल्म...?" यह आलेख श्री गंगाधर महाम्ब्रे की पुस्तक 'फ़िल्म उद्योगी दादा साहब फाल्के' से उधृत है।.....😊😊!! प्रस्तुत है अंतिम कड़ी...!!😊😊******************************************
.....( भाग-7 से आगे)
हमने और हमारे साझीदार नाडकर्णी ने तय किया कि ओलंपिया थिएटर में ट्रेड शो का आयोजन करें।
तारीख भी पक्की हो गई लेकिन उसी समय मेरी दूध पीती बच्ची मंदाकिनी को टाइफाइड हो गया।
जेठ जी बोले बिटिया बहुत बीमार है अतः ऐसे समय तारीख पक्की मत करना ।
यह बोले," मुझे ईश्वर पर पूरा भरोसा है।मैंने तो आप सबको निमंत्रण पत्र भी भेज दिए हैं। इसके अलावा थिएटर भी उसी तारीख को मिलने वाला है। फिल्म इसी दिन दिखाई जाएगी।"
इन्होंने अपना प्रण पूरा किया।
बेटी की तबीयत की पूछताछ करने जाऊंगा तो निर्ममता का चढ़ाया हुआ मुखौटा गिर पड़ेगा और मन भावुक हो जाएगा।इस डर से इन्होंने उसकी तबीयत की पूछताछ भी नहीं की।अपने आप को काम में उलझा लिया और लक्ष्य से बिल्कुल नहीं टले।
शो का दिन निकला।
शो का समय था 7:30 बजे का, घर के सब लोग थिएटर चले गए।
बिटिया के पास सिर्फ मेरे जेठ-जेठानी, मैं खुद और हमारा भतीजा चार जन थे।
जेठ जी बोले आज के दिन दरअसल घर के बड़ों को चाहिए कि वे थिएटर जाकर उसका हौसला बढ़ाएं लेकिन बिटिया की खातिर हम दोनों घर पर रह जाते हैं।
हम पर भरोसा हो तो तुम थिएटर चली जाना।
मैं दुविधा में पड़ गई। जाने से इंकार कर देने का मतलब बड़ों का अपमान हो सकता था और अगर चली जाती तो मन बच्चे की ओर खींचता ही रहता। आखिर मन कड़ा करके मैं थिएटर चली गई।
लोग आ पहुंचे थे,कार्यक्रम के अध्यक्ष सर भालचंद्र भाट वाडेकर के हाथों ओपनिंग सेरिमनी संपन्न हुई।
फिल्म निर्माण को लेकर जो अनिश्चय और संदेह की काली रात छाई हुई थी ढल गई और सम्पूर्ण आनंद व इच्छापूर्ति का सवेरा हुआ।
हिंदुस्तान में पहली बार फिल्म-सूर्य का उदय हुआ।
साड़ी चोली पहने नारी और अंगरखा पगड़ी पहने पुरुष के दर्शन पर्दे पर पहली बार हुए।
तालियां गूंजी, फूल की मालाओं और गुलदस्तों का ढेर लग गया।
लोगों की तरह तरह की टीका टिप्पणियां सुन कर मैं अक्सर निराश हो जाती थी, इसलिए मैंने वहीं पर भगवान से मन्नत मांगी कि इस कार्य में पूरी सफलता मिलने पर मैं पांच गुरुवार का व्रत रखूंगी और इनकी आमदनी में से ₹5 के पेड़े बाटूंगी। यह मन्नत मैंने वहीं के वहीं मांग रखी थी।
बच्चे का बुखार उतर चला था। घर आकर सबसे पहले इन्होंने बच्ची की पूछताछ की।
इसके बाद कोरोनेशन थिएटर में पहला व्यवसाय खेल हुआ। आमदनी में सबसे पहले ₹5 के पेड़े ले आइये,तब जाकर बाकी पैसों को हाथ लगाना।
हमारे साझीदार नाडकर्णी बोले- "भाभी आपने ₹5 के पेड़ों की बात की, मैं आपको ₹100 के पेड़े ला दूंगा।"
उन दिनों दादर में पेड़े नहीं मिलते थे इसलिए उन्होंने मुंबई से मंगवा कर सबका मुंह मीठा करवाया।
..........................................और इस तरह पहली फिल्म 'सत्य हरिशचंद्र' अपने अस्तित्व में आई।
.....( भाग-7 से आगे)
हमने और हमारे साझीदार नाडकर्णी ने तय किया कि ओलंपिया थिएटर में ट्रेड शो का आयोजन करें।
तारीख भी पक्की हो गई लेकिन उसी समय मेरी दूध पीती बच्ची मंदाकिनी को टाइफाइड हो गया।
जेठ जी बोले बिटिया बहुत बीमार है अतः ऐसे समय तारीख पक्की मत करना ।
यह बोले," मुझे ईश्वर पर पूरा भरोसा है।मैंने तो आप सबको निमंत्रण पत्र भी भेज दिए हैं। इसके अलावा थिएटर भी उसी तारीख को मिलने वाला है। फिल्म इसी दिन दिखाई जाएगी।"
इन्होंने अपना प्रण पूरा किया।
बेटी की तबीयत की पूछताछ करने जाऊंगा तो निर्ममता का चढ़ाया हुआ मुखौटा गिर पड़ेगा और मन भावुक हो जाएगा।इस डर से इन्होंने उसकी तबीयत की पूछताछ भी नहीं की।अपने आप को काम में उलझा लिया और लक्ष्य से बिल्कुल नहीं टले।
शो का दिन निकला।
शो का समय था 7:30 बजे का, घर के सब लोग थिएटर चले गए।
बिटिया के पास सिर्फ मेरे जेठ-जेठानी, मैं खुद और हमारा भतीजा चार जन थे।
जेठ जी बोले आज के दिन दरअसल घर के बड़ों को चाहिए कि वे थिएटर जाकर उसका हौसला बढ़ाएं लेकिन बिटिया की खातिर हम दोनों घर पर रह जाते हैं।
हम पर भरोसा हो तो तुम थिएटर चली जाना।
मैं दुविधा में पड़ गई। जाने से इंकार कर देने का मतलब बड़ों का अपमान हो सकता था और अगर चली जाती तो मन बच्चे की ओर खींचता ही रहता। आखिर मन कड़ा करके मैं थिएटर चली गई।
लोग आ पहुंचे थे,कार्यक्रम के अध्यक्ष सर भालचंद्र भाट वाडेकर के हाथों ओपनिंग सेरिमनी संपन्न हुई।
फिल्म निर्माण को लेकर जो अनिश्चय और संदेह की काली रात छाई हुई थी ढल गई और सम्पूर्ण आनंद व इच्छापूर्ति का सवेरा हुआ।
हिंदुस्तान में पहली बार फिल्म-सूर्य का उदय हुआ।
साड़ी चोली पहने नारी और अंगरखा पगड़ी पहने पुरुष के दर्शन पर्दे पर पहली बार हुए।
तालियां गूंजी, फूल की मालाओं और गुलदस्तों का ढेर लग गया।
लोगों की तरह तरह की टीका टिप्पणियां सुन कर मैं अक्सर निराश हो जाती थी, इसलिए मैंने वहीं पर भगवान से मन्नत मांगी कि इस कार्य में पूरी सफलता मिलने पर मैं पांच गुरुवार का व्रत रखूंगी और इनकी आमदनी में से ₹5 के पेड़े बाटूंगी। यह मन्नत मैंने वहीं के वहीं मांग रखी थी।
बच्चे का बुखार उतर चला था। घर आकर सबसे पहले इन्होंने बच्ची की पूछताछ की।
इसके बाद कोरोनेशन थिएटर में पहला व्यवसाय खेल हुआ। आमदनी में सबसे पहले ₹5 के पेड़े ले आइये,तब जाकर बाकी पैसों को हाथ लगाना।
हमारे साझीदार नाडकर्णी बोले- "भाभी आपने ₹5 के पेड़ों की बात की, मैं आपको ₹100 के पेड़े ला दूंगा।"
उन दिनों दादर में पेड़े नहीं मिलते थे इसलिए उन्होंने मुंबई से मंगवा कर सबका मुंह मीठा करवाया।
..........................................और इस तरह पहली फिल्म 'सत्य हरिशचंद्र' अपने अस्तित्व में आई।


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