आज से एक नई सीरीज शुरू कर रहे हैं जिसमे विभिन्न उपयोगी वस्तुओं के बारे में बताया जाएगा। आशा है यह सीरीज़ आपका ज्ञान-वर्धन करने में सहायक होगी। ***!!!!
नमस्कार....!!
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हम अक्सर बच्चों को और बड़ों को भी चिंगम चबाते देखते हैं। इसके साथ ही बबलगम भी काफी लोकप्रिय हो गया है, और बच्चे इससे बड़े-बड़े गुब्बारे मुंह से निकालते हैं।एक ओर ये चीजें अत्यंत लोक प्रिय हैं पर बहुत से लोगों को यह अजीब सा लगता है।
दूसरी और उनके आविष्कारों की कहानी भी कम अजीबो गरीब नहीं है।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि च्विंगम सदियों से चबाया जाता रहा है।
मध्य अमेरिकी देशों में एक जंगली पेड़ से चिकली नामक सूखा फल मिलता है जो चबाने में आनंद दायक होता है।हालांकि इस में कोई विशेष स्वाद नहीं होता है।
जब बाहर के लोग अर्थात यूरोपीय अमेरिका पहुंचे तो पहले तो उन्होंने वहां के आदिवासियों द्वारा चवाई जाने वाली इस चिकली का काफी मजाक उड़ाया पर बाद में उन्हें भी इसे चबाने में आनंद आने लगा।
सन 1800ईस्वी के पहले दशक में अब तक मुफ्त में मिलने वाली चिकली दुकान पर बिकने लगी। अब इसमें अन्य प्रकार के स्वाद भी मिलाए जाने लगे और यह अनेक दुकानों पर बिकने लगी।
सन 1870 ईस्वी में चार्ल्स एडम्स नामक एक फोटोग्राफर ने रबर के स्थान पर चिकली को प्रयोग करना प्रारंभ किया।
वह चिकली से खिलौने मुखौटे और बरसाती जूते आदि बनाना चाहता था पर उसके प्रयोग लगातार असफल हो रहे थे।
एक दिन वह थका हारा निराश अपनी फैक्ट्री में बैठा था कि अचानक उसने बची हुई चिकली का एक टुकड़ा मुंह में डाल लिया।
वह उसे चबाने लगा।चबाते-चबाते उसके मन में विचार आया कि अगर वह इसमें बेहतर स्वाद मिला दे तो इसकी बिक्री असाधारण रूप से बढ़ जाएगी। ऐडम्स ने स्वादिष्ट च्युंगम बना कर लोगों को बेचना प्रारंभ कर दिया और 20 वर्ष में वह अमीर हो गया तथा विशाल च्युंगम फैक्ट्री का मालिक हो गया।
समय के साथ च्युंगम के साथ अनेक दास्तानें जुड़ती चली गई । इसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी बताया गया।
सन 1869 में एक दंत चिकित्सक ने एक लेख लिखा जिसमें चेतावनी दी गई थी कि लगातार चिंगम चबाने से मुंह की लार वाले ग्लैंड सूख जाएंगे तथा इसका बुरा असर आंतों पर भी पड़ेगा, तथा वे चिपक जाएंगे।
दूसरी ओर ऑहियो अमेरिका के एक दंत चिकित्सक ने इसे जबड़ों के व्यायाम के लिए अनुकूल माना तथा इसका पेटेंट भी करा लिया।
च्युंगम बेचने वाले चार्ल्स एडम्स ने इसे स्वास्थ्यवर्धक, दांतो के लिए लाभदायक,पाचन क्रिया को दुरुस्त करने वाला, दिमाग तेज करने वाला,और भी न जाने क्या-क्या मान लिया।
जो भी हो च्युंगम का प्रयोग अमेरिका में बढ़ता चला गया।अमेरिका में पहले औसत नागरिक साल में च्युंगम की 39 स्टिक चबा डालता था और यह संख्या बाद में बढ़ कर 200 स्टिक तक जा पहुंची और यह बढ़त अभी जारी है।
जापान में भी च्युंगम का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। इसमें हरी चाय का स्वाद भी डाला जाता है। अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले यात्रियों ने भी अंतरिक्ष में च्युंगम चबाया है।
आखिर चिंगम का प्रयोग क्यों बढ़ रहा है इस विषय पर मनोवैज्ञानिकों ने शोध किया है।
उनके अनुसार जो व्यक्ति नर्वस होता है तो च्युंगम चबाने से उसे राहत मिलती है। जब भी कभी कहीं कोई युद्ध छिड़ जाता है या कोई आपदा आती है तो इनकी बिक्री बढ़ जाती है।
आज दवा की दुकानों से लेकर सामान्य दुकानों तक च्युंगम की बिक्री अनवरत जारी है।
यदि अमेरिकी फैक्ट्रियों से निकलने वाले रोल्स की कुल लंबाई नापी जाए तो यह 24000000 मील होगी।
बच्चों को च्युंगम के लिए डांट पड़ती है पर फिर भी वे इसे खाते हैं और जब ज्यादा डांट पड़ती है तो निगल जाते हैं।
इसी तरह बबलगम की कहानी भी कम रोचक नहीं है। बीसवीं सदी के प्रारंभ में है फ्रैंक हेनरी फलीयर नामक अमेरिकी आविष्कारक ने लगातार प्रयोग करके नए फार्मूले आजमाएं और एक नया गम तैयार किया।इससे एक बबूला तैयार हो जाता था ।
पर इस फार्मूले में कुछ कमी थी और यह बबूला एक आकार लेने के बाद फूट जाता था। यह गम गीला भी होता था तथा बच्चों के मुंह से निकल कर चेहरे से टपकने लगता था।
इसे पौंछनाऔर साफ करना भी कठिन था।
बबलगम पहले बाजार में उतारा गया किंतु अपनी कमियों की वजह से शीघ्र वापस ले लिया गया। फ्लियर अपने प्रयोगों में जुटा रहा और 1928 ईस्वी में उसने एक नया गम तैयार किया जो 2 गुना मजबूत था और उसका नाम डबल बबल रखा गया।
इससे बडा बबूला तैयार होता था और वह फूटता भी नहीं था।नया गम उतना गीला भी नहीं था कि नीचे गिरने लगे।
गिरता भी था तो उसे छुटाना कठिन नहीं था।
नया बबलगम बाजार में आते ही लोकप्रिय हो गया पर फ्रैंक इतने से ही संतुष्ट नहीं हुआ। उसने एक बेंडिंग मशीन बनाई जिसमें एक सिक्का डालने से एक बबलगम निकलता था। मशीन के साथ इसकी लोकप्रियता और बढ़ती गई। फ्रैंक को वेंडिंग मशीन के जरिए इसे बेचने में संदेह था। वह सोचता था कि अगर मशीन के अंदर गम न होगा और ग्राहक सिक्का डालें तो कुछ नहीं निकलेगा, और मशीन की विश्वसनीयता कम हो जाएगी।
अपना विश्वास पक्का करने के लिए उसने न्यूयॉर्क शहर की एक व्यस्त बिल्डिंग के बाहर अपनी मशीन लगाई। यहां बहुत तेज हवा भी आती थी। फ्लियर के सेल्समैन ने तख्ती लगाई कि एक पेनी डालो और तेज हवा की आवाज सुनो। इत्तफाक से सैकड़ों लोग एकत्र हो गए और उन्होंने पैनी डाली।आखिर पुलिस को आकर मजमा हटाना पड़ा।
फ्रैंक फ्लियर के भाई हेनरी फ्लियर ने इस काम में बड़ा योगदान दिया।
हेनरी ने च्युंगम को स्वादिष्ट रस में लपेटकर लोकप्रिय बनाने में अपना योगदान दिया। उसने चिकलेट्स भी तैयार की जो काफी लोकप्रिय हुई।
बबलगम का इतना अधिक उत्पादन हुआ कि अगर इस के पैकेटों की कुल लंबाई नापी जाए तो यह पृथ्वी की परिधि से ज्यादा होगी। अब च्युंगम के लिए पुरानी चिकली का इस्तेमाल नहीं होता है, बल्कि पॉली फिनाइल एसीटेट का प्रयोग होता है, जो स्वादहीन गंधहीन प्लास्टिक जैसा है।
प्रारंभ में इसके लिए सिर्फ गुलाबी रंग उपलब्ध था इसलिए गुलाबी बबलगम ज्यादा लोकप्रिय हुआ।....( अगले एपिसोड में पढ़ें.....................................................................
फ्रैंच-फ्राइस ( तले आलू) , सैंडविच, पिज़्ज़ा, पोपकोर्न और गेटोरेड के बारे में...☺**!!
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दूसरी और उनके आविष्कारों की कहानी भी कम अजीबो गरीब नहीं है।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि च्विंगम सदियों से चबाया जाता रहा है।
मध्य अमेरिकी देशों में एक जंगली पेड़ से चिकली नामक सूखा फल मिलता है जो चबाने में आनंद दायक होता है।हालांकि इस में कोई विशेष स्वाद नहीं होता है।
जब बाहर के लोग अर्थात यूरोपीय अमेरिका पहुंचे तो पहले तो उन्होंने वहां के आदिवासियों द्वारा चवाई जाने वाली इस चिकली का काफी मजाक उड़ाया पर बाद में उन्हें भी इसे चबाने में आनंद आने लगा।
सन 1800ईस्वी के पहले दशक में अब तक मुफ्त में मिलने वाली चिकली दुकान पर बिकने लगी। अब इसमें अन्य प्रकार के स्वाद भी मिलाए जाने लगे और यह अनेक दुकानों पर बिकने लगी।
सन 1870 ईस्वी में चार्ल्स एडम्स नामक एक फोटोग्राफर ने रबर के स्थान पर चिकली को प्रयोग करना प्रारंभ किया।
वह चिकली से खिलौने मुखौटे और बरसाती जूते आदि बनाना चाहता था पर उसके प्रयोग लगातार असफल हो रहे थे।
एक दिन वह थका हारा निराश अपनी फैक्ट्री में बैठा था कि अचानक उसने बची हुई चिकली का एक टुकड़ा मुंह में डाल लिया।
वह उसे चबाने लगा।चबाते-चबाते उसके मन में विचार आया कि अगर वह इसमें बेहतर स्वाद मिला दे तो इसकी बिक्री असाधारण रूप से बढ़ जाएगी। ऐडम्स ने स्वादिष्ट च्युंगम बना कर लोगों को बेचना प्रारंभ कर दिया और 20 वर्ष में वह अमीर हो गया तथा विशाल च्युंगम फैक्ट्री का मालिक हो गया।
समय के साथ च्युंगम के साथ अनेक दास्तानें जुड़ती चली गई । इसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी बताया गया।
सन 1869 में एक दंत चिकित्सक ने एक लेख लिखा जिसमें चेतावनी दी गई थी कि लगातार चिंगम चबाने से मुंह की लार वाले ग्लैंड सूख जाएंगे तथा इसका बुरा असर आंतों पर भी पड़ेगा, तथा वे चिपक जाएंगे।
दूसरी ओर ऑहियो अमेरिका के एक दंत चिकित्सक ने इसे जबड़ों के व्यायाम के लिए अनुकूल माना तथा इसका पेटेंट भी करा लिया।
च्युंगम बेचने वाले चार्ल्स एडम्स ने इसे स्वास्थ्यवर्धक, दांतो के लिए लाभदायक,पाचन क्रिया को दुरुस्त करने वाला, दिमाग तेज करने वाला,और भी न जाने क्या-क्या मान लिया।
जो भी हो च्युंगम का प्रयोग अमेरिका में बढ़ता चला गया।अमेरिका में पहले औसत नागरिक साल में च्युंगम की 39 स्टिक चबा डालता था और यह संख्या बाद में बढ़ कर 200 स्टिक तक जा पहुंची और यह बढ़त अभी जारी है।
जापान में भी च्युंगम का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। इसमें हरी चाय का स्वाद भी डाला जाता है। अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले यात्रियों ने भी अंतरिक्ष में च्युंगम चबाया है।
आखिर चिंगम का प्रयोग क्यों बढ़ रहा है इस विषय पर मनोवैज्ञानिकों ने शोध किया है।
उनके अनुसार जो व्यक्ति नर्वस होता है तो च्युंगम चबाने से उसे राहत मिलती है। जब भी कभी कहीं कोई युद्ध छिड़ जाता है या कोई आपदा आती है तो इनकी बिक्री बढ़ जाती है।
आज दवा की दुकानों से लेकर सामान्य दुकानों तक च्युंगम की बिक्री अनवरत जारी है।
यदि अमेरिकी फैक्ट्रियों से निकलने वाले रोल्स की कुल लंबाई नापी जाए तो यह 24000000 मील होगी।
बच्चों को च्युंगम के लिए डांट पड़ती है पर फिर भी वे इसे खाते हैं और जब ज्यादा डांट पड़ती है तो निगल जाते हैं।
इसी तरह बबलगम की कहानी भी कम रोचक नहीं है। बीसवीं सदी के प्रारंभ में है फ्रैंक हेनरी फलीयर नामक अमेरिकी आविष्कारक ने लगातार प्रयोग करके नए फार्मूले आजमाएं और एक नया गम तैयार किया।इससे एक बबूला तैयार हो जाता था ।
पर इस फार्मूले में कुछ कमी थी और यह बबूला एक आकार लेने के बाद फूट जाता था। यह गम गीला भी होता था तथा बच्चों के मुंह से निकल कर चेहरे से टपकने लगता था।
इसे पौंछनाऔर साफ करना भी कठिन था।
बबलगम पहले बाजार में उतारा गया किंतु अपनी कमियों की वजह से शीघ्र वापस ले लिया गया। फ्लियर अपने प्रयोगों में जुटा रहा और 1928 ईस्वी में उसने एक नया गम तैयार किया जो 2 गुना मजबूत था और उसका नाम डबल बबल रखा गया।
इससे बडा बबूला तैयार होता था और वह फूटता भी नहीं था।नया गम उतना गीला भी नहीं था कि नीचे गिरने लगे।
गिरता भी था तो उसे छुटाना कठिन नहीं था।
नया बबलगम बाजार में आते ही लोकप्रिय हो गया पर फ्रैंक इतने से ही संतुष्ट नहीं हुआ। उसने एक बेंडिंग मशीन बनाई जिसमें एक सिक्का डालने से एक बबलगम निकलता था। मशीन के साथ इसकी लोकप्रियता और बढ़ती गई। फ्रैंक को वेंडिंग मशीन के जरिए इसे बेचने में संदेह था। वह सोचता था कि अगर मशीन के अंदर गम न होगा और ग्राहक सिक्का डालें तो कुछ नहीं निकलेगा, और मशीन की विश्वसनीयता कम हो जाएगी।
अपना विश्वास पक्का करने के लिए उसने न्यूयॉर्क शहर की एक व्यस्त बिल्डिंग के बाहर अपनी मशीन लगाई। यहां बहुत तेज हवा भी आती थी। फ्लियर के सेल्समैन ने तख्ती लगाई कि एक पेनी डालो और तेज हवा की आवाज सुनो। इत्तफाक से सैकड़ों लोग एकत्र हो गए और उन्होंने पैनी डाली।आखिर पुलिस को आकर मजमा हटाना पड़ा।
फ्रैंक फ्लियर के भाई हेनरी फ्लियर ने इस काम में बड़ा योगदान दिया।
हेनरी ने च्युंगम को स्वादिष्ट रस में लपेटकर लोकप्रिय बनाने में अपना योगदान दिया। उसने चिकलेट्स भी तैयार की जो काफी लोकप्रिय हुई।
बबलगम का इतना अधिक उत्पादन हुआ कि अगर इस के पैकेटों की कुल लंबाई नापी जाए तो यह पृथ्वी की परिधि से ज्यादा होगी। अब च्युंगम के लिए पुरानी चिकली का इस्तेमाल नहीं होता है, बल्कि पॉली फिनाइल एसीटेट का प्रयोग होता है, जो स्वादहीन गंधहीन प्लास्टिक जैसा है।
प्रारंभ में इसके लिए सिर्फ गुलाबी रंग उपलब्ध था इसलिए गुलाबी बबलगम ज्यादा लोकप्रिय हुआ।....( अगले एपिसोड में पढ़ें.....................................................................
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