विदुर नीति अध्याय 5-6
श्री विदुर नीति भावानुवाद (अध्याय 5- 89से103)
दिनांक 21.6.21 सोमवार 💐💐
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💐अध्याय 5 प्रारम्भ💐
89.कह रहे विदुर- राजेंद्र! सुनो-
स्वायम्भू मनु की वाणी है।
सत्रह प्रकार के लोगों की
यह अति स्पष्ट कहानी है।।
90.जैसे कोई नीले नभ को,
मुक्के मारे आघात करे।
जो झुका रहा हो इंद्र धनुष,
रवि किरण पकड़ निज हाथ करे।।
91.ऐसे ही कर्म असम्भव को,
करने की चाहत रखता हो।
अपने से अधिक शक्तिशाली से
अपनी शक्ति परखता हो।।
92.विद्या का दान अयोग्यों को,
देकर शिक्षक कहलाता हो।
रिपु का सेवक बन अल्पलाभ
में ही प्रसन्न हो जाता हो।।
93.नारी का सेवक हो,एवं
रिपु से चाहे कल्याण सदा।
याचना करे जो कृपणों से,
वह मोल ले रहा है विपदा।।
94.जो आत्म-प्रशंसा करता हो,
केवल वक्ता बकवादी हो।
उत्तम कुल का हो जन्म किंतु,
निंदित कर्मों का आदी हो।।
95.जो निर्बल हो कर, बलवानों से
वैर बांध कर रखता हो।
श्रद्धाहीनों से आदर की,
चाहत जो मूढ़ परखता हो।।
96.पर-दारा पर रखता कुदृष्टि,
परनारी से चर्चा असमय।
समधी की शरण मांगता जो,
जब आता खुद पर कोई भय।।
97.जिनसे संरक्षण मांगा हो,
उनसे आदर पाना चाहे।
परधन पर दृष्टि गड़ाता हो,
सम्मानित बन जाना चाहे।।
98.केवल वाणी से दान करे,
झूठा बखान ही करता है।
दुष्टों को देता संरक्षण,
झूठे को सच्चा कहता है।।
99.ऐसे मानव सारा जीवन,
केवल अपमान उठाते हैं।
यम के कराल अनुचर उनको,
फिर अंत, खींच ले जाते हैं।।
100.कपटी से कपटाचरण उचित,
सज्जन से सद व्यवहार करें।
शठ को शठता का दें उत्तर,
हर कार्य नीति अनुसार करें।।
101.वृद्धावस्था सुंदरता को,
आशा,धीरज हर लेती है।
प्राणों का हरण करे मृत्यु,
गुण में भी हो यदि दोष दृष्टि,
वह धर्म नष्ट कर देती है।।
102. लज्जा हर लेता काम,
कभी कामी को शर्म नहीं आती।
दुर्जन की सेवा सदाचार को,
सदा गर्त में पहुंचाती।।
103.क्रोधी मनुष्य पर जीवन में
लक्ष्मी की कृपा नहीं होती।
अभिमानी की फूटी किस्मत,
निज सर्वनाश को ही रोती।।
(....अशेष)💐💐
श्रीविदुरनीति भावानुवाद(अध्याय 5- 104से111 )
दिनांक 22.6.21 मंगलवार 💐💐
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104.अपने से उत्तम पर शासन
मर्याद तोड़ संतुष्ट रहे।
वैरी की सेवा करें मूढ़
वह वैतरणी की धार बहे।।
105.स्त्री-रक्षा जिस मानव का
जीवन यापन आधार बने।
याचना करे कंजूसों से,
अपनी स्तुति अपने मुखसे।।
106.उत्तम कुल में है जन्म मिला
और नीच कर्म करता रहता।
दुर्बल होकर भी सबलों से।
जो वैर बांधकर है रखता।।
107.पर राष्ट्र और पर-धन पाने को
गलत यत्न मत करना जी।
जीविका नष्ट हो जाने पर,
दीनों की आह से डरना जी।।
108.जीविका अगर छिन जाती तो,
सेवक भी रिपु बन जाता है।
मंत्री हो या कि हितैषी, वह
भीषण संकट ले आता है।।
109.अपने जो भी हैं कहलाते
वह साथ छोड़ सब जाते हैं।
जिनकी रोजी छिन जाती है
वह मित्र शत्रु हो जाते हैं।।
110.क्या करना है कि न करना है,
इसका हिसाब पहले रखकर।
है आय तथा व्यय भी कितना,
राजा!पहले यह निश्चय कर।।
111.वेतन सुविधा सुख निर्धारण,
फिर योग्य सहायक साथ रहैं।
यदि निकट सहायक है सच्चे,
राजा के संकट दूर बहैं।।
श्रीविदुरनीति भावानुवाद (अध्याय 5/111से125)
दिनांक 23.6.21 बुधवार 💐💐
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112. धृतराष्ट्र कहैं- हे विदुर! सुनो,
शुभ ग्रन्थ हमें बतलाते हैं।
इस जीव जगत में मानव,
सौ वर्षों की उम्र बिताते हैं।।
113.जब सभी शतायु बताए हैं,
क्यों बरस न सौ पूरे मिलते।
बगिया में फूल हज़ारों हैं,
पर क्यों न सहज सारे खिलते।।
114. किस कारण से यह पूर्ण आयु,
सबको न यहां मिल पाती है?
आधे रस्ते में जीवन की,
यात्रा पूरी हो जाती है।।
115.तब कहें विदुर- सुनिए राजन!
अभिमान तथा निष्ठुर वाणी।
क्रोधी स्वभाव अति कृपण वृत्ति,
और मित्र-द्रोह करता प्राणी।।
116.केवल अपना सुख प्रमुख रखें,
यह छह कृपाण मानव-घाती।
इनके कारण ही मृत्यु मनुज को,
आधे पथ से ले जाती।।
117.हे राजन,ध्यान लगा सुनिए
जीवन में हैं छह तलवारें।
जो सदा काटतीं जीवन को,
मानव को यह क्रमश: मारें।।
118.अभिमान भरा रहता मन में,
वाणी से जो बकवादी है।
जो त्याग नहीं करता किंचित,
और कठिन क्रोध का आदी है।
119.केवल निज पालन की चिंता,
हर पल जिसके मन चलती है।
जो है कृतघ्न और दुष्ट कुटिल,
भावना द्रोह की पलती है।।
120.मित्रों का जो होता द्रोही,
मित्रों पर शंका करता है।
इन छह तलवारों से मानव,
धीरे-धीरे नित मरता है।।
121.विश्वास करे जो तुम पर,
ऐसी नारी से करता व्यभिचार।
गुरुपत्नी से संग करे,
ब्राह्मण हो कर शूद्रा से प्यार।।
122.विश्वस्त मित्र की पत्नी से,
अनुचित सम्बन्ध बनाता है।
गुरु की शैय्या पर जा बैठे,
या फिर उस पर सो जाता है।।
123.जो द्विज, शूद्रा से गमन करे,
और मद्यपान जो करता है।
ब्राह्मण पर शासन करे,
जीविका विप्रों की जो हरता है।।
124.मद्यपान करता ,अपने से
गुरुजन को देता आदेश।
करे जीविका नष्ट तथा,
शरणागत-हिंसा करे विशेष।।
125.ब्राह्मण से सेवा लेता है,
शरणागत का वध कर देता।
'ब्राह्मण-हत्या' का पाप शीश पर,
अपने धारण कर लेता।।
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श्रीविदुरनीति भावानुवाद (अध्याय 5/126से140)
दिनांक 24.6.21 गुरुवार 💐💐
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126.निजी कार्य के हित ब्राह्मण को
जो देता यात्रा विस्तार।
उसे ब्रह्म हत्यारा कहिए,
प्रायश्चित ही है निस्तार।।
127.वेदों का आदेश यही है,
विप्र सदा ईश्वर का रूप।
ब्राह्मण शक्ति,ब्रह्म की शक्ती,
यही वेद का सत्य अनूप।।
128.जो वेद वाक्य का पालन कर,
नीतिज्ञ तथा उपकारी है।
जो शाश्वत सत्य अहिंसा का,
पोषक है प्रेम पुजारी है।।
129.जो अपने से बड़े वृद्ध-जन
सदा मानता उनकी बात।
जो नीतिज्ञ और दानी है,
हिंसा रहित करे जो बात।।
130.यज्ञ-शेष का भोजन करता
गलत कार्य से रहता दूर।
मृदु स्वभाव जो,है कृतज्ञता भाव युक्त
नहीं मद में चूर।।
131.जो अतिथि देव को तृप्त करे,
तब सम्यक भोजन पाता है।
निर्भीक यशस्वी धीर वीर,
वह स्वर्ग सुखों को पाता है।।
132.सत्य वचन जो कहे सदा,
वह स्वर्गलोक में करे निवास।
पुण्यकर्म है सत्य वचन,
जीवन में हो न असद आभास।।
133.सदा प्रियवचन कहने वाले,
मनुज सहज मिल जाते हैं।
वाणी की मृदुता से वे
अपने दिल में खिल जाते हैं।।
134.प्रिय वादी तो इस दुनिया में,
आसानी से मिल जाएंगे।
जो अप्रिय हितकर वचन कहे,
वह सहज नहीं मिल पाएंगे।।
135.अप्रिय किन्तु परम् हितकारी
ऐसा सच कहने वाले।
सच कहने सच सुनने वाले,
सहज कहाँ मिलने वाले!!
136.जो अप्रिय हितकर वचन,
सरलता से कर लेता है धारण।
ऐसा मानव है दुर्लभ, जो
कर ले कटु का भी पारायण।।
137.स्वामी का जो संकेत समझ,
आलस्य त्याग जुट जाता है।
कारज साधक सच्चा सेवक,
स्वामी का प्रिय बन जाता है।
138.जो सेवक, स्वामी के हित में,
अप्रिय भी कह देता है।
वह राजा के शक्ति तत्व का
होता सही प्रणेता है।।
139.हित की बातें जो कहता ,
राजा की शक्ति समझता है।
स्वामि-भक्त सज्जन सेवक,
स्वामी का हित ही भजता है।।
140.उसको अपने जैसा मानो,
अपना जैसा सम्मान उसे।
सहयोग करो उस सेवक का,
संकट में दो अनुदान उसे।।
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श्रीविदुरनीति भावानुवाद (अध्याय 5/141से155)
दिनांक 25.6.21 शुक्रवार 💐💐
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141.जो कुटिल भृत्य,स्वामी की
बातों को मन में सम्मान न दें।
आदर न करे अनुमति का जो,
कुछ काम मिले तो ध्यान ना दें।।
142.प्रतिकूल वचन बोले सेवक,
स्वामी-हित को अवदान न दे।
स्वामी का है कर्तव्य कि उस,
सेवक को प्रिय स्थान न दे।।
143.कुल का कल्याण अगर हो तो,
तुम एक व्यक्ति का त्याग करो।
कल्याण ग्राम का होता हो,
कुल-त्याग हेतु भी नहीं डरो।।
144.निज देश धर्म की सेवा को,
यदि गांव छूटता हो,छोड़ो।
और पूर्ण आत्म कल्याण हेतु,
धरती के सुख से मुंह मोड़ो।।
145. मन में न रखें जो अहंकार,
कायर का भाव न लाता है।
रखता है दया भरा दिल जो,
हर कार्य त्वरित कर जाता है।।
146.बहकावे में न कभी आता,
अति सुंदर देह निरोगी हो।
वाणी उदार हो अष्ट गुणों युत
शासक का सहयोगी हो।।
147 उपरोक्त आठ गुण रखे,
वही तो शांति दूत बन पाता है।
संकट में बने सहायक वो,
बिछड़ों को सहज मिलाता है।।
148.असमय विश्वास न करो,
किसी अनजाने के घर मत जाओ।
यदि सावधान तुम रहते हो,
मुश्किल है जो धोखा खाओ।।
149.चौराहे पर छुपकर, रातों में,
खड़े रहो यह ठीक नहीं।
राजा की प्रिय नारी को,
मन में चाहो तुम, यह ठीक नहीं।।
150.ज्ञानी और वृद्ध निकट आऐं,
तब प्राण शक्ति बढ़ जाती है।
जब हम प्रणाम करते हैं तो,
वह ऊपर उठती जाती है।।
151.स्वागत में करें प्रणाम तथा,
अपने आसन से उठ जाएं।
आशीष मिले जो मंगलमय,
हम अंतर्मन तक हरषाएँ।।
152.जब साधु पुरुष घर आए तो,
आसन देकर सम्मान करें।
वह अतिथि देव सम पूजित हों,
चरणों पर जल आदान करें।।
153.फिर कुशल पूछ कर अतिथि देव से,
उनको दें पूरा आदर।
उच्चासन देकर उन्हें ,
परोसें स्वाद युक्त भोजन सत्वर।।
154.राजा के दुष्ट सहायक हों,
उनसे सलाह वह लेता हो।
खंडन न करो उन बातों का,
राजा जब प्रथम प्रणेता हो।
155."विश्वास न मैं करता तुम पर"
यह वचन न राजा से कहना।
हो बात नहीं मन के लायक,
चुपचाप वहां से हट लेना।।
(.....अशेष)💐💐
श्रीविदुरनीति भावानुवाद (अध्याय 5/156से172)
दिनांक 26.6.21 शनिवार 💐💐
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156.जो राजा अधिक दयालु हो,
व्यभिचार युक्त जो नारी हो।
अपना सुत या छोटा भाई,
सैनिक,कर्मी,अधिकारी हो।।
157.संतानवती विधवा एवं
अधिकार-हीन नर से डरिये।
इन सब से,बस व्यवहार रहे,
कुछ लेनदेन ना ही करिए।।
158.इंद्रिय निग्रह और शास्त्र ज्ञान,
मितभाषी बुद्धि विलासी हो।
कुल हो कुलीन और पराक्रमी,
दानी कृतज्ञ गुणराशि हो।।
159.इन अष्ट गुणों से युक्त मनुज,
सब जग में आदर पाता है।
सुखदायक जननायक वह नर
जग का भूषण बन जाता है
160. कोमलता बल रूप मधुर स्वर
उज्जवल वर्ण तथा सुकुमार।
पावनता शोभा सुगंध सँग
वनिताओं से मिलता प्यार।।
161.यह दस लाभ उसे मिल पाते,
जो करता नियमित स्नान।
तन पवित्र तो मन पवित्र है,
जीवन का यह पहला ज्ञान।
162.थोड़ा भोजन करने वाला,
काया कष्ट न पाता है।
छह गुण जो जीवन रक्षक हैं,
उनका सुख ले पाता है।।
163.दीर्घआयु नीरोगी काया,
तन मन से होता बलवान।
बहु-भोजी का व्यंग न होता,
पाता है सुंदर संतान।।
164.लोगों से आक्षेप न मिलता,
सुखमय जीवन हो जाता।
वही सुखी, जो दुनिया में
आवश्यकता से कम खाता।।
165.जो कामचोर बहुभोजी हो,
मायावी,घातक, विद्वेषी।
जो देशकाल नहीं रखे ज्ञान,
और सदा अमंगलमय वेशी।।
166.ऐसे मनुष्य को अपने गृह के,
निकट कभी भी वास न दे।
ना शत्रु बने, ना मित्र रहे,
अपने पन का आभास न दे।।
167.कंजूस तथा कटुवादी हो,
जो धूर्त,मूर्ख, वनवासी हो।
निष्ठुर हो,हिंसक भाव रखे,
जो मान-हीन को साथ रखे।।
168.जो कृत-उपकार नहीं माने,
उपकारी को नहिं पहचाने।
उससे न कभी याचना करो,
भीषण संकट में भले घिरो।।
169.जो आतताइ का भाव रखे,
एवं घनघोर प्रमादी हो।
जो भक्ति और निष्ठा को,
परिवर्तित करने का आदी हो।।
170.स्नेह भाव से हीन रहे,
सर्वदा असत का हो पोषक।
खुद को ही सर्वोत्तम माने,
निज अहंकार का हो तोषक।।
171.धन से सहायता मिलती है,
धन हेतु सहायक आवश्यक।
दोनों ही आश्रित हैं एवं,
हर एक, दूसरे का रक्षक।।
172.पुत्रों को ऋण मुक्त रखे,
जीविका व्यवस्थित हो उनकी।
कन्या, पति-आधीन करे,
तब राह पकड़,हरि चिंतन की।।
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद(अध्याय 5/173से190)
दिनांक 27.6.21 रविवार 💐💐
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173.करता है उपदेश उसे,
जो श्रोता है श्रद्धा से हीन।
प्राप्ति असम्भव हो जिसकी,
वह वस्तु चाहता बनकर दीन।।
174.ससुर जो कि निज पुत्र वधू से,
आगे बढ़ करता परिहास।
पर दारा अनुरक्ति रखे तो,
हो जीवन का सत्यानाश।।
175.स्त्री निंदा सदा करें,और
मांगे पर ही देता दान।
मिथ्या को जो सत्य बनाए,
उसे नहीं मिलता सम्मान।।
176.पास रखी हो अगर धरोहर,
उसे हड़प जो कर जाता।
दुख में ही जीवन काटे वह,
कभी नहीं आदर पाता।।
177.क्रूर कठिन कर्मों को करता,
मन में रखता घोर प्रमाद।
सदा असत्य कथन कहता है,
ईश्वर से मिथ्या संवाद।।
178.नेह रहित, जो खुद को माने
दुनिया में अति चतुर सुजान।
ऐसे मनुज अधम कहलाते,
इन्हें न दें सेवा सम्मान।।
179.बिना सहायक हो न सकेगा,
जीवन में धन का अर्जन।
धन के बिना नहीं हो पाए,
श्रेष्ठ सहायक का चिंतन।।
180.साथ सहायक हों सच्चे तो,
धन की प्राप्ति सहज होती।
धन से हीन ज़िंदगी, अपने
मित्र सहायक खो देती।।
181.ऋण से मुक्त जिंदगी देना,
तभी सुखी होगी संतान।
उचित समय वर को ढूंढें और,
सही समय पर कन्यादान।।
182.संतानों को उचित जीविका,
पिता रखें ना ऋण का भार।
कन्याओं का कर विवाह,
उनको देवें उत्तम परिवार।।
183.शुभ दायित्व निभा कर अपने,
साथ रखें मुनि-वृत्ति विधान।
वन में रहकर आत्म-सत्य का
चिंतन रखते हैं विद्वान।।
184.सभी प्राणियों को हितकर हो
और स्वयं को सुखदाई।
ईश्वर अर्पित कार्य करे जो,
सकल सिद्धि उसने पाई।।
185.आगे बढ़ने को तत्पर हो,
शक्ति तेज उद्योग प्रभाव।
प्रबल-पराक्रम,दृढ़ निश्चय हो,
फिर मन में क्यों भय का भाव।।
186.उद्योगी दृढ़ विश्वासी की,
सदा जीविका है चलती।
पुरुष उद्यमी हो तो, उसके
चरणों में निधियां पलतीं।।
187.खुद के प्रति जैसा चाहो,
वैसा ही दूजों से बर्ताव।
यही धर्म है, नीति यही है,
और यही है साधु स्वभाव।।
188.कपटी से तुम कपट करो, और
कपट पूर्ण रखना व्यवहार।
अच्छे के संग अच्छे होकर,
जियें नीति विधि के अनुसार।।
189.घोर बुढ़ापा,शत्रु रूप का,
आशा धैर्य विनाशक है।
मृत्यु प्राण को हर लेती,
निंदा शुभ की संहारक है।।
190.शीश चढ़े वासना-प्रेत ,
लज्जा पल में खो जाती है।
नीच पुरुष की टहल,
सदाचारी का शीश झुकाती है।।
191.क्रोधी से लक्ष्मी रूठे,
अभिमान सर्वनाशी होता।
अविवेकी अपने जीवन भर,
किस्मत को ही है रोता।।
192.कुल की रक्षा हेतु
एक का त्याग किया जा सकता है।
किंतु ग्राम के हित में,
कुल भी निष्कासन पा सकता है।
193.अगर देश हित लगे दांव पर
वहां गांव का मोल नहीं।
किंतु आत्म-कल्याण हेतु,
पृथ्वी का भी कुछ तोल नहीं।।
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद(अध्याय 5/194से208)
दिनांक 28.6.21 सोमवार 💐
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194.धन की रक्षा करें कि जब
आपदा पड़े उपयोगी हो।
धन देकर स्त्री की रक्षा करें,
भले वह रोगी हो।।
195.किंतु जहां अपना हित बिगड़े
धन-दारा का भी बलिदान।
सदा आत्म कल्याण प्रमुख सुख,
यही ईश का एक विधान।।
196.जूआ दो मित्रों में भी
पड़वा देता है गहरा वैर।
हंसी हंसी में भी मत खेलो,
जुआ किसी की करे न खैर।।
197.कौरव हैं वन के समान तो
पांडव है उस वन के बाघ।
व्याघ्र बिना वन रहे अरक्षित,
वन के बिना भटकते बाघ।।
198.वन से बाघ हटेंगे तो फिर
पूर्ण अरक्षित होंगे वन।
वन न रहेंगे दुनिया में तो
दुखमय बाघों का जीवन।।
199.शत कौरव के संग कर्ण और
पांडव भी मिल जाएंगे।
सिन्ध तलक सारी वसुधा पर,
वह शासन कर पाएंगे।।
200.धूमकेतु तिरछा उगता तो
प्रलय जगत में लाता है।
यह सारा संसार उपद्रव,
वर्षा में बह जाता है।।
201.द्रोण भीष्म और कर्ण युधिष्ठिर,
का यह संचित क्रोध अपार।
एक साथ जो हुआ प्रकट तो
क्षण में राख बने संसार।।
202. आग लगाता,विष देता
शस्त्रों को जो धारण करता।
वही आतताई है जो,
पर-दारा,धन,धरती हरता।।
203.कर्म वही करिए जो होवे
अर्थ सिद्धि और सुख का मूल।
सब को सुख देने वाला,
शुभ कर्म नहीं कहलाता भूल।।
204.जिसकी बुद्धि प्रभावी हो
सत-मार्ग परायण हो व्यवसाय।
तेजवान उत्थान करे
रोजी रोटी का भय क्यों पाय।।
205.पांडवगण से वैर हुआ तो
चार हानि निश्चय हैं नाथ।
इंद्र आदि सुरगण भी उनसे
कर विरोध, देंगे ना साथ।।
206.सदा सदा भयभीत रहेंगे,
पुत्रों से शत्रुता कलेश।
होगा यश का नाश,शत्रु भी
सुख का अनुभव करें विशेष।।
207.पापी केवल दोष देखते
गुण को कभी न करते याद।
गुण दर्शन से पीड़ा होती,
सुख पाते जब छिड़े विवाद।।
208.धन और धर्म साथ रहते हैं,
स्वर्ग-सुधा हैं जैसे संग।
धन की सिद्धि चाहने वाला,
पहले ग्रहण करे सत्संग।।
(.....अशेष)💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 5/208से223)
दिनांक 29.6.21 मंगलवार 💐
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209. चित्त पाप से विरत रहे
कल्याण कार्य में रहता लीन।
त्रिगुण प्रकृति का रूप और,
महदादि विकृति से रहे विहीन।
210.यथा समय जो धर्म अर्थ और,
काम भाव करते सेवन।
उनका हो परलोक सुखी,
इहलोक करें जैसा चिंतन।।
211.क्रोध हर्ष के आवेगों से,
नहीं प्रभावित रखता मन।
मोह ग्रसित नहीं हो विपत्ति में,
लक्ष्मी देतीं अतुलित धन।।
212. पांच प्रकार बताए बल के,
पहला सुनें भुजा का बल।
लेकिन भुजबल सबसे छोटा,
इसको पाना बहुत सरल।
213.तथा दूसरा बल है, ऐसा
सचिव, जो कि दे उचित सलाह।
धन का लाभ तीसरा बल है,
देता जो जीवन को राह।।
214.कुल का बल चौथा बल होता,
मानव कहलाता अभिजात।
पंचम बल है बुद्धि शक्ति का,
सभी बलों को रखता साथ।।
215.जो सब के प्रति अपकारी है,
उससे कभी न ठानो वैर।
हम कितने भी दूर रहें,
पर इसमें नहीं हमारी खैर।।
216.स्त्री राजा सर्प स्वामि और
शत्रु आयु एवं स्वाध्याय।
इन पर ना विश्वास करें ,
कब कौन कहां पर 'ठग' ले जाए।।
217.कुशल चिकित्सक उत्तम औषधि,
होम हवन और मंत्र विधान।
मंत्र तंत्र रक्षा नहीं करते,
जिसको लगे बुद्धि का बाण।।
218.सर्प, अग्नि, मृगराज तथा
उत्तम कुल,चारों तेज निधान।
इन्हें न छोटा करके आंकें,
नहीं करें इनका अपमान।।
219.पावक का बल काष्ठ-आवरण में,
छुपकर ही करें निवास।
अन्य काष्ठ से हो प्रदीप,
तो क्रमशः पाता पूर्ण विकास।।
220.इसी काष्ठ को मथ अरणी से,
अग्नि प्रकट होती तत्काल।
सारे वन के लिए अग्नि,
क्षण भर में बन जाती विकराल।।
221.काष्ठ अग्नि सम क्षमाशील
होकर रहते हैं पुरुष कुलीन।
चिंगारी भी शक्तिपुंज है,
दिखती मलिन तथा बल हीन।।
222.पांडु पुत्र हैं शाल वृक्ष तो,
सुत सँग आप लता का रूप।
मिले ना आश्रय वृक्षों का तो,
लता नष्ट हो, पी कर धूप।।
223.पुत्र आपके वन हैं तो
पांडवगण को समझो वनराज।
सिंह करें रक्षा वन की तो
वन से रक्षित सिंह समाज।।
(अध्याय 5 समाप्त)💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 6 /224से238)
दिनांक 30.6.21 बुधवार 💐
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💐अध्याय 6 प्रारम्भ💐
224. पापों में मन रमा रहे,
वह कर न सकें जग का कल्याण।
गुणों को ग्रहण न करे कभी,
जो बस अवगुण पर देता ध्यान।।
225.औरों के गुण का जो मानव,
करता नहीं कभी सम्मान।
अवगुण का चिंतक जो प्राणी,
उसका होता है अपमान।।
226.जिसे अर्थ की सिद्धि चाहना,
पहले चले धर्म की चाल।
अर्थ धर्म पर हो आधारित,
धर्म अर्थ का रखे ख्याल।।
227.धर्म अर्थ से विलग न किंचित
जैसे सुधा, स्वर्ग के साथ।
अपना चिंतन शुद्ध रहे तो
अपना सुख है, अपने हाथ।।
228.जिसकी बुद्धि पाप से हटकर,
सदा सोचती जनकल्याण।
जग की प्रकृति और विकृति पर,
उनका सदा रहेगा ध्यान।।
229.करें समय चिंतन के द्वारा,
सेवन धर्म अर्थ और काम।
मंगलमय परलोक सुधारें,
प्रभु के चरणों में विश्राम।।
230.क्रोध हर्ष के उठे वेग को,
आत्मशक्ति से ले जो रोक।
धैर्य नहीं खोता आपद में,
राज्य करे धरती को ठोक।।
231.मानव के अंदर स्थित
इस बल के होते पांच प्रकार।
पहला प्रमुख भुजा का बल है,
देता यह समुचित आधार।।
232.दूजा बल मंत्री का बल है
जो देता है सही सलाह।
परामर्श यदि सही मिले तो
शासन का नहीं रुके प्रवाह।।
233.और तीसरा बल है पैसा
रहता है यह जिसके पास।
सिर ऊंचा करके जीता वह
अपनों में बन जाता खास।।
234.चौथा बल होता मानव कुल,
स्वाभाविक बल है परिवार।
पूर्वज गण से मिलता है यह
शक्ति बढ़ाता इसका प्यार।।
235.कहलाता 'अभिजात शक्ति'
मानव में इससे आती शक्ति।
स्वाभाविक परिवार रखे
परिवारी से पूरी अनुरक्ति।।
236.पंचम बल है श्रेष्ठ बुद्धि बल
इसका है पहला स्थान।
एक अकेलापन मानव की,
बन जाता पूरी पहचान।।
237.अपकारी पर नहीं भरोसा
करें,भले वो खुद से दूर।
वैरी से हम रहें सजग
पहुंचाता हानि, हमें भरपूर।।
238.शत्रु सदा से शत्रु रहेगा,
करो नहीं किंचित विश्वास।
अति विश्वास सदा से घातक,
करे व्यक्ति का पूर्ण विनाश।।
(....अशेष)💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 6 /239से---)
दिनांक 1.7.21 गुरुवार 💐
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239. स्त्री, शासक, शत्रु ,भोग,
निज आयु सर्व विद्या का पाठ।
शक्तिवान,विश्वास योग्य,
किंचित भी ना होते यह आठ।।
240.कुटिल तिया धोखा दे सकती,
धोखा देता शासक क्रूर।
पढ़ा पाठ भी याद न रहता,
शत्रु घात दे, चाहे दूर।।
241.आयु नष्ट दो पल में होती,
सर्प कभी भी देता दंश।
भोग वासना साथ न देती,
इन सब में धोखे का अंश।।
242.जिसमें है सामर्थ्य,कभी भी-
करें नहीं इनका विश्वास।
नीति यही,इसको जो माने,
कभी ना होता दुखी उदास।।
243.मंत्र होम और वैद्य चिकित्सा,
तंत्र जड़ी से मिले न प्राण।
वेद यजन असफल हों सारे,
जिसको लगे बुद्धि का बाण।।
244.विषधर सर्प धधकती ज्वाला,
शक्तिपुंज होता वनराज।
अपने कुल में जन्मा है जो,
इनको करें नहीं नाराज।।
245.अग्नि छिपाए रहे तेज को,
आश्रय उसको देता काठ।
संघर्षण दूजा देता, तब जले,
यही जीवन का पाठ।।
246.कितना भी कोई उक़साये,
छिपा रखो तुम अपना तेज।
किंतु प्रज्वलित हो जाओ तो,
फिर न दाह से करो गुरेज।।
247.अग्नि काष्ठ से पैदा हो कर,
लेती है जब रूप प्रचंड।
निज आश्रयदाता के सँग, वह
सारे जग को देती दंड।।
248.छिपी अग्नि हैं पांडव सारे,
इन्हें न घिस कर उकसाएं।
अगर जल उठी अग्नि यही तो,
कौरव फिर ना बच पायें।।
(......अशेष)💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 6 /249 से 255 )
दिनांक 2.7.21 शुक्रवार 💐
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249. पांडव रूपी अग्नि प्रखर है
जब तक यह घर्षण से दूर।
तब तक कौरव निर्भय होकर,
जी लें जीवन को भरपूर।।
250.अत्याचारों के घर्षण से,
अग्नि ज्वलित हो जाएगी।
फिर न रुके यह कौरव गण से,
सारे कुल को खाएगी।।
251.बिना सहारे लता न बढ़तीं,
उसे सहारे की है चाह।
बड़े वृक्ष के आश्रय से ही,
बढ़ता उसका शक्ति प्रवाह।।
252.कौरव छोटी लता सरीखे,
पांडव सेमल वृक्ष विशाल।
पांडव-जन का आश्रय तज कर,
कौरव-गण होंगे बेहाल।।
253.सिंह बिना वन सूना होता,
उससे शोभा है वन की।
वन भी रक्षक रहे सिंह का,
रक्षा करता है तन की।।
254.कौरवगण निर्जन वन जैसे,
पांडव हैं उस वन के शेर।
जब तक वन में रहें विचरते,
कोई कर न सके अंधेर।।
255.जिस दिन वन को सूना कर के,
सिंह चले जाएंगे दूर।
सारे वृक्ष कटेंगे वन के,
अहंकार होगा सब चूर।।
(.....अशेष)💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 6 /256 से 266)
दिनांक 3.7.21 शनिवार 💐
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256.वन जो होगा नष्ट पूर्ण,
तो सिंह कहां बच पाएंगे।
वे भी फिर भटकेंगे दर-दर,
कहीं ना आश्रय पाएंगे।।
257.बना संतुलन रहे अगर तो,
सबका होगा वृद्धि विकास।
इस कारण कौरव पांडव,
दोनों को रखिए अपने पास।।
258.पहले भी तो कहा कि-किंचित
उचित नहीं जुए का खेल।
आप लगा सकते थे राजन,
इस जुए पर वहीं नकेल।।
259.किंतु समय विपरीत चला था,
तुम्हें ना भायी मेरी बात।
उचित धर्म की बात वहां,
सब को लगती थी वज्राघात।।
260.उचित पथ्य या कड़वी औषध
रोगी को कब है भाती।
रोग वृद्धि करने वाली,
हर चीज उसे है ललचाती।।
261.द्यूत क्रीडा में राजभवन में,
सबका विचलित था चिंतन।
इस कारण मेरी बातों का,
नहीं हुआ तब अभिनंदन।।
262.कौए सारे मिल जाएं तो,
नहीं मोर का बने शिकार।
मोर,मोर ही रहता,सारे
कौए हो जाते बेकार
263.एक सिंह का पीछा करने,
निकलें सौ से अधिक सियार।
कुछ बिगाड़ न सकते उसका
सिंह करें वन पर अधिकार।।
264.सिंहों का कर त्याग, आप
करते सियार दल का रक्षण।
पछतावा ही शेष रहेगा,
सिंह करेगा जब भक्षण।।
265.स्वामी करता निज सेवक पर
खुद से भी बढ़ कर विश्वास।
सेवक भी फिर ऐसे स्वामी की,
बन जाते अंतिम आस।।
266.हर संकट में साथ रहें फिर,
देते अंतिम क्षण तक संग।
स्वामी का विश्वास स्वयं पर,
कभी न होने देते भंग।।
(.....अशेष)💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 6 /267 से )
दिनांक 4.7.21 रविवार 💐
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267. ईर्ष्या रहित भावना एवं
संरक्षक अबलाओं का।
प्रियवादी और स्वच्छ रहे,
सच्चा हो अपने भावों का।।
268.नारी का सहयोग करे पर,
कभी न हो उनके वश में।
न्याय सत्य विश्वास
सदाशयता बसती हो नस-नस में।।
269.नारी घर की लक्ष्मी
पावन पूजा योग्य।
जीवन का सौभाग्य यह,
मत समझो तुम भोग्य।।
मत समझो तुम भोग्य,
घरों की इनसे होती शोभा।
इनकी रक्षा करो
हृदय में रखो मोह और लोभा।
अंत:पुर की रक्षा के हित
पिता श्रेष्ठ हैं रहते।
स्वाद मिले मां से,
तो भोजनशाला उनको देते।।
रसोई दे माता को,
तथा गौ सेवा खुद को,
या कि खुद के जैसे को।
खेती खुद ही करें,
न देवें इसे कभी जिस-तिस को।।
करना व्यापार, तो सेवकों को रखें,
पुत्र से ब्राह्मणों को सदा पूजिये।
जल से पैदा है अग्नि तथा
ब्राह्मणों से सदा क्षत्रियों को
जुड़ा खोजिए।।
पत्थरों से ही लोहा जनम ले रहा,
तेज इनका इन्हीं में मिलेगा सदा।
सर्वव्यापक है शक्ति जो इसकी यहां,
ये हैं पैदा वहीं पे ढलेगा सदा।।
(...अशेष)💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 6 /270 से 280)
दिनांक 4.7.21 रविवार 💐
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270.क्षमाशील उत्तम कुल जन्मे
तेजवान जो अग्नि समान।
काष्ठ अग्नि सम है
विकार से हीन संत,उनका सम्मान।।
271.जो राजा अपनी सलाह को
गुप्त हमेशा रखता है।
केवल रिपु से नहीं,
मित्र से भी रहस्य रख लेता है।।
272.दृष्टि चतुर्दिक रखे,
वही ऐश्वर्य भोग कर पाता है।
जो रहस्य को रखे छुपा,
वह राजा कुशल कहाता है।।
273.धर्म अर्थ और काम सभी को
छुपा नजर से रख पाए।
धर्म कृत्य और अर्थ स्रोत,
ना कभी किसी से बतलाए।।
274.काम कृत्य अंत:पुर तक,
सीमित जो नृप रख पाता है।
हर रहस्य को रखे छुपा,
वह राजा कुशल कहाता है।।
275.करनी हो मंत्रणा गुप्त तो
देखे कुछ ऐसा स्थल।
हो पर्वत का उच्च शिखर
या हो फिर अपना राज महल।।
276.या जंगल में गुफा कंदरा में
सलाह करने जाए।
यदि रहस्य खुल जाए किसी पर,
तो नृप अतिशय पछताए।।
277.मित्र न हो जो अपना तो,
उसको रहस्य मत बतलाना।
मित्र,किंतु जो पंडित ना हो,
उसे निकट तुम मत लाना।।
278.पंडित होकर मन वश ना हो,
मंत्र न उसको बतलाओ।
कभी रहस्य न दो इनको,
केवल बातों से बहलाओ।।
279.क्रूर कठिन कर्मों को करता,
मन में रखता घोर प्रमाद।
सदा असत्य कथन कहता है,
ईश्वर से मिथ्या संवाद।।
280.नेह रहित,जो खुद को माने,
दुनिया में अति चतुर सुजान।
ऐसे मनुज अधम कहलाते,
इन्हें न दें सेवा सम्मान।।
(अशेष)💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 6 /280 से )
दिनांक 6.7.21 मंगलवार 💐
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281.खूब परीक्षण करो तब कहीं,
अपना सचिव बनाओ तुम।
विश्वासी यदि सचिव रहे तो,
जग-जेता कहलाओ तुम।।
282.हर रहस्य को गुप्त रखे,
धन के आगम का करे विचार।
धन रहस्य और गुप्त मंत्रणा,
रक्षा का मंत्री पर भार।।
283.जिस राजा का कर्म अंत तक,
गुप्त बना रह पाता है।
धर्म अर्थ और काम अंत तक
कोई जान न पाता है।।
284.वही सिद्ध है वही कुशल,
जो मंत्र गुप्त रख पाता है।
वही योग्य चिंतक साधक नृप,
परम कुशल कहलाता है।।
285.मोह-फन्द में फंस कर
जो मानव करता है निंदित काम।
प्राण गंवा देता पल भर में,
आता जब उनका परिणाम।।
286.कर्म अगर विपरीत किया तो,
उत्तम फल ना मिल पाए।
मोह महा अजगर है,
जिसका निगला हुआ न बच पाये।।
287.उत्तम कर्म करें जीवन में,
वह होते हैं सुखदाई।
अनुष्ठान शुभ हो जीवन में,
खिलती सुख की अमराई।।
288.किंतु मोहवश कर्म अनुत्तम,
यदि मानव से हो जाता।
अनुष्ठान या अशुभ,
मनुज जो करता, वह है पछताता।।
289.मृग मरीचिका में पशु भटके,
जल की आशा से संपृक्त।
मानव भी मृग के जैसा ही,
सुत दारा धन में आसक्त।।
290.दोनों की है दौड़ अधूरी,
तृष्णा उनको भटकाती।
ऐसा लगता हाथ लगी,
पर हाथ न वो लगने पाती।।
(अशेष..)💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 6 /290 से300 )
दिनांक 7.7.21 बुधवार 💐
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291. स्त्री में सुख धन में सुख है
मान प्रतिष्ठा सुख का कोष।
कहीं व्यसन का सुख मिलता,
कोई पद के मद में मदहोश।।
292.यह सब सुख की मृग मरीचिका
ज्यों मरुथल आभासी नीर।
कोई मन से मुक्त हो रहा,
कोई पोषित करे शरीर।।
293.मरुस्थल की तपती धरती,
रजनी में शीतल हो जाती।
किंतु भोग की ज्वाला
जल जाए तो शांत न रह पाती।।
294.वेद न पढ़ता अगर विप्र तो
नहीं श्राद्ध का अधिकारी।
संधि और विग्रह से पहले
कर लें पूरी तैयारी।।
295.आसन यान समाश्रय द्वैधीभाव
जान जो पाता है।
गुप्त-मंत्रणा और रहस्य को
वही बचा ले जाता है।।
296.स्थिति वृद्धि ह्रास का ज्ञाता,
सबका आदर पाता है।
पृथ्वी उसकी होती और वह
पृथ्वी का हो जाता है।।
297.अपने क्रोध-हर्ष,दोनों को
व्यर्थ न जाने देता है।
अपने कार्य स्वयं करता है,
अपना स्वयं प्रणेता है।।
298.देश कोश का ध्यान रखे जो
उसकी होती है धरती।
अन्न वस्त्र धन रत्न कीर्ति से
घर आंगन वह है भरती।।
299.भूपति सिर पर छत्र रखे
'राजा' कहकर जाना जाए।
सेवक को संतुष्ट रखे,
उसका धन स्वयं न खा जाए।।
300.ब्राह्मण को ब्राह्मण ही जाने
स्त्री को पति ही जाने।
मंत्री को राजा समझे,
राजा को मंत्री पहचाने।।
(अशेष...)💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 6 /301 से 310)
दिनांक 8.7.21 गुरुवार 💐
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301.वश में आया शत्रु न छोड़ें
जो हो वध के लायक।
शत्रु किया यदि क्षमा,
बनेगा तुमको ही भयदायक।।
302.अपना बल कमजोर पड़े तो
नम्र भाव अपनाएं।
धीरे-धीरे कूटनीति से,
अपनी शक्ति बढ़ाएं।।
303.बल अर्जित हो जाने पर
फिर शत्रु न बचने पाए।
शत्रु बचा रह जाए तो
नृप का संकट बन जाए।।
304.राजा वृद्ध विप्र बालक
रोगी पर क्रोध न करिये।
देवों पर श्रद्धा रखिए,
अपने गुस्से से डरिए।।
305.कला निरर्थक होती
यह केवल मूढ़ों का बल है।
बुद्धिमान नहिं कलह करें,
मेधा उनका संबल है।।
306.कलह मुक्त रहता है
उसको यश मिलता है जग में।
हर अनर्थ खुद खो जाता
अवरोध न आते मग में।।
307.जो राजा होकर प्रसन्न,
कुछ लाभ न दे पाता है।
जिसका क्रोध व्यर्थ होता,
बस यूं ही खो जाता है।।
308.उस राजा को प्रजा कभी
अपना न बना पाती है।
जैसे क्लीव पुरुष को स्त्री
नहिं अपना पाती है।।
309.बुद्धि शक्ति से धन मिलता
या दरिद्रता शठता से।
ऐसा कोई नियम न निश्चित
बनता इस वसुधा से।।
310.यह संसार चक्र टेढ़ा है
इसे समझता ज्ञानी।
नियमों को स्थिर जो माने
वह वह करता नादानी।।
(...अशेष)💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 6 /310 से 323)
दिनांक 9.7.21 शुक्रवार 💐
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311.विद्या शील बुद्धि धनकुल और
आयु न किंचित माने।
मूर्ख अनादर करे
स्वयं को मूर्ख नहीं पहचाने।।
312.निंदनीय जिसका चरित्र है
मूरख और कटुवादी।
गुण में भी दोषों को देखे,
क्रोधी और बकवादी।।
313.ईश्वर पर नहीं करें भरोसा,
रहता अपने हठ में।
ऐसा मूरख घिर सकता है,
किसी बड़े संकट में।।
314.अकर्मण्य बहुभोजी एवं,
मायावी जिसका व्यवहार।
सबसे रखे शत्रुता एवं
कभी न माने पर उपकार।।
315.देश काल का ज्ञान न जिसको,
निंदित वेश हृदय का क्रूर।
ऐसा व्यक्ति करेगा धोखा,
रखें सदा निज गृह से दूर।।
316.बात बात गाली देता जो,
मूर्ख धूर्त एवं कंजूस।
मित्रों की सेवा करता है,
निर्दयी है पूरा मनहूस।।
317.वनवासी है,वैर रखे वह,
है कृतज्ञ जिसका व्यवहार।
कितना भी दुख सिर पर आए,
उन से लें ना कभी उधार।।
318.ठगी न करना,दानी होना,
बातों पर कायम होना।
हितकर वचन बोलता जो,
उसको सब प्राणी लें अपना।।
319.जो धोखा देता ना किसी को,
चतुर कृतज्ञ तथा मतिमान।
वह शासक निर्धन हो तब भी
सेवक से पाता सम्मान।।
320.धैर्य दया पावनता संयम
मन निग्रह, कोमल वाणी।
मित्रों से ना द्रोह रखे तो
लक्ष्मी कहीं नहीं जानी।।
321.सात गुणों को धारण करता
उसे मिले सब से सम्मान।
सदा सदा उन्नति पाते हैं ,
देश कोश यश कीर्ति विधान।।
322.अपने आश्रित जन को धन का,
करे न जो समुचित वितरण।
वह शासक हैं दुष्ट तथा
निर्लज्ज कुटिल है उसका मन।।
323.जैसे घर में सर्प छुपा हो,
नींद चैन उड़ जाता है।
घर का स्वामी सब सुख होने पर भी
ना सो पाता है।।
(...अशेष)💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 6 /324से 335)
दिनांक 11.7.21 रविवार 💐
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324. बंधु जनों को पीड़ा देता
वह भी दुख ही पाता है।
दोष रहित को कुपित करे
सुख उसको नहीं सजाता है।।
325.जिन पर दोष लगाने से
निज योग क्षेम बाधा पाए।
दोष रहित को दोष लगे तो,
केवल पीड़ा ही पाए।।
326.ऐसे लोगों को, देवों के जैसा,
रखिए सदा प्रसन्न।
जीवन खुलकर जियें सदा,
ना हो रहस्य कोई प्रच्छन्न।।
327.जो धन आदि पदार्थ
पतित जन के हाथों पड़ जाते हैं।
नीच प्रमादी पतित और
नारी ही लाभ उठाते हैं।।
328.धन की रक्षा करें,
गलत हाथों से उसे बचाते हैं।
ऐसे लोग हमेशा
धन से पूरा लाभ उठाते हैं।।
329.जिस धरती पर शासक
बालक अबला या कि जुआरी हो।
वह पत्थर-नौका, बैठे तो
मरने की तैयारी हो।।
330.ज्यों पत्थर की नाव
सवारी को भी गहन डुबाती है।
शासक श्रेष्ठ न हो
शासन की बत्ती गुल हो जाती है।।
331.जितना आवश्यक हो
करते हैं वो केवल उतना काम।
व्यर्थ काम जो कभी न करते,
उन्हें मिले पंडित का नाम।।
332.अधिक कार्य जो करता
उसका जीवन बन जाता संघर्ष।
मन विचलित होता है, हर पल
स्थिर नहीं रहेगा हर्ष।।
333.चारण वेश्या और जुआरी
करें प्रशंसा बढ़-चढ़कर।
मुर्दे जैसा है वह मानव,
उसका नाश हुआ सत्वर।।
334.जैसे दानव राजा बलि ने
त्रिभुवन का पाया था राज।
किंतु राज से भ्रष्ट हुए
जब भाग्य हुआ उनसे नाराज।।
335.श्रेष्ठ पांडवों को तज कर
यह राज्य भार दुर्योधन को।
हे राजा धृतराष्ट्र!!
बदल दें,इस अन्यायी चिंतन को।।
💐💐अध्याय 6 समाप्त💐💐
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