श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 7 /336से 345)
दिनांक 12.7.21 सोमवार 💐
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💐 अध्याय सात प्रारंभ💐
336. विदुर सुनो मानव ब्रह्मा के
हाथों की कठपुतली है।
है प्रारब्ध अधीन,नचाती उसको
विधि की उंगली है।।
337.धन अर्जन या नाश हेतु,
मानव स्वतंत्र है कभी नहीं।
मैंने ध्यान दिया बातों पर,
जो भी तुमने अभी कहीं।।
338.विदुर कहे धृतराष्ट्र सुनो,
यदि समय न हो अपने अनुकूल।
देवों के गुरु भी सलाह दें,
तो उस पर पड़ती है धूल।।
339.गुरुजन का अपमान अवज्ञा,
इस कारण हो जाती है।
हितकर बातों को भी तब,
यह बुद्धि पकड़ ना पाती है।।
340.इस दुनिया में किसी जीव को,
करें प्रशंसित सर्वस दान।
मधुर वचन से यहां
जीत लेता है कोई जन सम्मान।।
341.कोई मंत्र विज्ञ होता तो
उसको सब देते आदर।
कोई औषध ज्ञाता बनकर
राज कर रहा हर दिल पर।।
342.किंतु सही अर्थों में मानव
प्रियकर वही कहाता है।
जो सारे गुण धारण करके भी,
सब का हो जाता है।।
343.गुण के धनी यहां कुछ हैं
लेकिन वह हैं धन से बेहाल।
कुछ होते हैं प्रचुर धनी,
पर उत्तम गुण से हैं कंगाल।।
344.गुणवानों का आदर करिए,
उन्हें बसाएं अपने पास।
केवल हो धनवान, न करिए
जीवन में उसका विश्वास।।
345.कहते हैं धृतराष्ट्र,विदुर तुम
वचन कह रहे हितकारी।
बुद्धिमान जन को यह बातें
लगती मधुर तथा प्यारी।।
346.यही सत्य है,धर्म जिधर है,
सदा सर्वदा उसकी जीत।
किंतु पुत्र का मोह प्रबल
इस कारण गाता उसके गीत।।
347.भले पुत्र मेरा अन्यायी
किंतु ना उसको तज पाऊं।
जैसा है,वह मेरा सुत है,
उस हित जग से लड़ जाऊं।।
अशेष💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 7 /348 से 357)
दिनांक 13.7.21 मंगलवार 💐
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348. विदुर कहैं सुनिए हे राजन!
जो है विनयशील गुणवान।।
जन-हिंसा पर दृष्टि पड़े तो
बने नहीं रहते अनजान।।
349.पर-निंदा रत सदा रहे,जो
सबको दुख पहुंचाते हैं।
फूट डालने में ही अपनी,
सारी शक्ति लगाते हैं।।
350. दोष-दृष्टि सब में रखते,
पर-पीड़ा में जिनका उत्साह।
अशुभ रूप ऐसे दुष्टों से,
मिलने की मत रखिए चाह।।
351. क्षुद्र हृदय लोगों से धन का,
करो नहीं आदान-प्रदान।।
उनको धन देने में भय है,
लेने में है दोष महान।।
352.कामुक,शठ,निर्लज्ज,भेद-कारी
है जिसका सहज स्वभाव।।
उस पापी को रखें दूर,
खुद पर उसका नहीं पड़े प्रभाव।।
353.निंदित पापी क्रूर कुटिल,
दुर्बुद्धि- न हों साथी अपने।
गुण से हीन और पाखंडी,
किंचित साथ नहीं रखने।।
354.घट जाए सौहार्द भाव तो,
घट जाता दुर्जन का प्यार।
प्रेम नष्ट हो, फिर न मिलेगा,
सुफल और सुख का उपहार।।
355.प्रेम घटे तो नीच पुरुष
सहसा निंदक बन जाता है।
तिल जैसे अपराधों को फिर
वह गिरि मेरु बनाता है।।
356.करने लगता है फिर अपने
बंधु जनों का घोर विनाश।
शांति ह्रदय की शेष न रहती,
मन को नहीं मिले अवकाश ।।
357.नीच क्रूर अजितेंद्रिय है जो
उन्हें रखो तुम खुद से दूर।
बुद्धिमान विद्वान वही है
उसको शांति मिले भरपूर
...अशेष💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 7 /358 से 367)
दिनांक 14.7.21 बुधवार 💐
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358. जो अपने परिवारी एवं
दीन दुखी का रखता ध्यान।
रोगी पर वह दया करे
अपनों का वह करता सम्मान।।
359.पशु पक्षी धन-धान्य पुत्र
रत्नादि वस्तु से हो समृद्ध।
पाता वह कल्याण तथा
सच्चे सुख से होता सम्बद्ध।।
360.भला चाहते हैं जो खुद का
एक बात का करें विचार।
मित्र बंधु का सुख आगे
पर सबसे आगे है परिवार।।
361.पांडव-जन के साथ करें यदि
कौरव सच्चा सद व्यवहार।
सदा सुरक्षित होंगे,उन पर
पड़े नहीं दुश्मन की मार।।
362.व्याध हाथ में रखे हुए हो,
तीखा क्रूर विषैला बाण।
मृग यदि पहुंचे निकट,
उसे कैसे मिल पाए भय से त्राण?
363.इसी तरह कोई निर्धन जब
धनी बंधु तक जाता है।
धन का मद हो बन्धु-शीश पर,
तब निर्धन दुख पाता है।।
364.निर्धन को दुख मिले,
पाप का भागी धनी बंधु होता।
बंधु द्वार पर आए तो वह
कभी न फिर जाए रोता।।
365.कौरव या पांडव कोई भी
भोगे महायुद्ध का शाप।
कोई भी हो नष्ट किंतु
राजन तुमको होगा परिताप।।
366.पूर्ण अनिश्चित एवं नश्वर
होता यह मानव जीवन।
कुटिल कर्म से पछता कर,
बीता करते हैं अंतिम दिन।।
367.अगर साधना चाहो अपना
यह जीवन एवं परलोक।
कोई कर्म न ऐसा हो,
जो मन को दे पछतावा शोक।।
(अशेष)💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 7 /368 से 377)
दिनांक 17.7.21 शनिवार 💐
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368. कोई मनुज नहीं जग में
जो सदा नीति पर चलता हो।
जिसका चिंतन नीतिपंथ से
पल भर कभी ना टलता हो।।
369.बीत गया जो समय,भुला कर उसे
करें कर्तव्य विचार।
बुद्धिमान हैं आप
न्याय पर ही भविष्य को दें विस्तार।।
370.पूर्वकाल पांडव जन के प्रति
किए सुयोधन ने अपराध।
आप वृद्ध हैं इस कुल के
परिमार्जित करिए अपने हाथ।।
371.करें राज्य यदि पांडव जन तो
धुलें आपके सभी कलंक।
देंगे फिर सम्मान सुधीजन
समय रखेगा पहला अंक।।
372.धीरे जनों की वाणी पर जो,
जन कर लेते हैं विश्वास।
यश भाजन बनने को, उनको
करना होता नहीं प्रयास।।
373.विद्वानों से मिला हुआ हो
चाहे हमको अनुपम ज्ञान।
सभी व्यर्थ है,अगर ना हमको
है निज कर्तव्यों का भान।।
374.जो विकास की चाहत रखते
एक बात पर रखें न ढील।
अपने कुल की वृद्धि तथा
निजबंधु जनों को उन्नति शील।।
375.जो करता अपने कुटुंब के
श्रेष्ठ वृद्धजन का सत्कार।
होता है कल्याण जगत में,
बंधुजनों से मिलता प्यार।।
376.रक्षणीय होते परिवारी
चाहे वे हों गुण से हीन।
उनकी रक्षा करें सतत
जो कृपाभिलाषी एवं दीन।।
377.पांडव-जन पर कृपा कीजिए
जग में व्याप्त रहेगा नाम।
उन्हें जीविका हेतु दीजिए,
मात्र पांच छोटे से गांव।।
378.जोर शुभ चाहो निज जीवन में
दूर कलह से रहे सदा।
बंधु जनों का साथ निभायें,
जब उन पर आए विपदा।।
अशेष💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 7 /379 से 388 )
दिनांक 19.7.21 सोमवार 💐
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379.बंधु जनों से कलह न कर के
करें साथ सुख का उपभोग।
स्वस्थ रहे मन चिंतन जिससे,
लगे नहीं तन मन को रोग।।
380.जो भी अपने जाति बंधु हैं,
उनसे है विरोध बेकार।
भोजन चर्चा साथ करें,सच्चे-
मन से रख उनसे प्यार।।
381.सज्जन जाति बंधु जितने हैं,
प्राणी का करते उद्धार।
दुष्ट दुराचारी जो अपने,
देते डुबा तुम्हें मझधार।।
382.जिसके प्रति हो द्वेष,
भले वह बुद्धिमान हो या विद्वान।
सद्गुण भी चुभने लगते हैं,
मन में शेष नहीं सम्मान।।
383.जो प्रिय लगता है, फिर उसके,
मंगलमय हैं सारे कर्म।
प्रिय है अपना, शत्रु पराया
यह ही मानव-मन का धर्म।।
384.जन्म हुआ जब दुर्योधन का
तुमसे कहा पुकार-पुकार।
यह कपूत है, इसे त्यागने से ही
है कुल का निस्तार।।
385.शेष सभी सुत बचे रहेंगे
किया अगर जो इसका त्याग।
सारे पुत्र नष्ट होने हैं,
अगर रखा इससे अनुराग।।
386.उसे महत्व न दें किंचित,
जो वृद्धि, नाश का हो कारण।
दिखती है वह वृद्धि किंतु
आगत में वह संकट भीषण।।
387.जिस क्षय में अभ्युदय छिपा हो,
उस क्षय का भी है सम्मान।
है भविष्य में उन्नतिकारी,
यद्यपि अभी लगे नुकसान।।
388.जिस क्षय का परिणाम वृद्धि है
उसे नहीं क्षय माने आप।
किंतु लाभ वह क्षय से बढ़कर,
जो बहुतों का हो अभिशाप।।
अशेष💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 7 /389 से 400)
दिनांक 22.7.21 गुरुवार 💐
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389.पाप कर्म से दूर रहे जो
वह होता सच्चा विद्वान।
सदा अभ्युदय होता उसका
जग व्यापक होता सम्मान।।
390.पूर्व पापको याद न करके
बार-बार करता जो पाप।
दुष्ट बुद्धि वह नरक कुंड में,
गिरता जाता अपने आप
391.छह दरवाजे होते ऐसे
जो रहस्य का करते भेद।
गुप्त तभी रहता रहस्य
जब दूर रहेंगे यह छह छेद।।
392.नशा, नींद, अज्ञान, नेत्र
मुख का विकार,जो रखे उदास।
मूर्ख 'दूत' पर किया भरोसा,
दुष्ट मंत्रियों पर विश्वास।।
393.बंद रखे जो इन द्वारों को
करें शत्रुओं को आधीन।
अर्थ धर्म और काम
उचित सेवन पर रखता दृष्टि नवीन।।
394.गुरु बृहस्पती के समान भी,
धर्म कर्म युत और विद्वान।
शास्त्र ज्ञान गुरुजन सेवा बिन
धर्म अर्थ का रहे न ज्ञान।।
395.सागर में गिरकर हर वस्तू
शीघ्र नष्ट हो जाती है।
जो न ध्यान से सुने
बात फिर उसकी भी खो जाती है।।
396. इंद्रिय संयम हीन पुरुष की
ज्ञान शक्ति सो जाती है।
जो है इंद्रिय जयी उसी का
यह वसुधा गुण गाती है।।
397.राख ढेर में करें हवन तो
हो जाता है वह निष्फल।
सारा ज्ञान धूल में मिलता
अगर छिपा हो उसमें छल।।
398.बुद्धिमान है वही कि जो
अपने अनुभव से बारंबार।
करे योग्यता का निश्चय
फिर सोच समझ कर करे विचार।।
399. इसके बाद श्रेष्ठ गुणियों का
मित्र रूप में करें चयन।
एक वही सन्मित्र,कि जिससे
जुड़ जाए मन का चिंतन।।
400.विनय शीलता कर देती है
प्राणी के अपयश को नष्ट।
हर अनर्थ हो नष्ट
आपने किया पराक्रम यदि उत्कृष्ट।।
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 7 /401 से 410)
दिनांक 23.7.21 शुक्रवार 💐
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401.क्षमा क्रोध को करे नष्ट,
मानव भी बन जाता है संत।
सदाचार से कुलक्षणों का,
पल भर में होता है अंत।।
402.काम क्रोध के ग्राह भरे हैं
पांच इंद्रियों का जलयुक्त।
जन्म मरण का है नदिया में
जल प्रवाह पूरा उन्मुक्त।।
403.इस संसार नदी को केवल
धैर्य तरणि कर सकती पार।
माया के फंदे में गहरी
नदी रूप दुस्तर संसार।।
404.बुद्धि धर्म अनुभव विद्या में,
अपने बंधु मिलें जो वृद्ध।
उनका अनुभव चिंतन उनको
रखता विद्या से समृद्ध।।
405.कर्तव्याकर्तव्य विषय में
उनसे करिए सदा विचार।
कभी मोह में पड़े न मानव
करे बुद्धि का जो सत्कार।।
406.शिश्नोदर की करें धैर्य से रक्षा
रुके काम आवेग।
सहें भूख को अति धीरज से
रोके सहज सभी संवेग।।
407.हाथ पैर की रक्षा करने में
नैनो का है उपयोग।
नेत्र और कानों की रक्षा,
मन से हो इसका संयोग।।
408.मन वाणी की सत कर्मों से
होती है प्रतिपल रक्षा।
सत कर्मों से सबकी रक्षा
यही सत्य की है शिक्षा।।
409.जो संध्या तर्पण करता है,
तथा करे जल से स्नान।
धारण कर यज्ञोपवीत को
सतत अध्ययन का रख ध्यान।।
410.पतित जनों का अन्न न लेता,
गुरु की सेवा सत्य वचन।
ब्रह्मलोक से भ्रष्ट ना होता,
मित्र वही होता पावन।।
(अशेष)💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 7 /411 से 425)
दिनांक 27.7.21 मंगलवार 💐
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411.जिस घर से वेदज्ञ विप्र
मधुपर्क धेनु न करे स्वीकार।
उस गृहस्थ के जीवन को,
गुणि जन भी देते हैं धिक्कार।।
412.वैद्य,शल्यकर्ता, मदमाता,
चोर, क्रूर नहीं आदर योग्य।
ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट,गर्भ हत्यारा
भी है सदा अयोग्य।।
413.सेना-जीवी,वेद-विक्रयी,
करें नहीं इनका आदर।
किन्तु अगर ये अतिथि रूप
आवें तो,बैठावें सादर।।
414.नमक दूध मधु दही तेल तिल
घी फल गुड़ और पक्का अन्न।
लाल वस्त्र और गंधमूल संग
शाक मांस की बिक्री न मन्य।।
415.मिट्टी पत्थर और सुवर्ण को
सदा एक सा जो माने।
क्रोध न करता शोकहीन वह
उदासीन जग को जाने।।
416.संधि शत्रुता रहित प्रशंसा,
निंदा प्रिय अप्रिय से मुक्त।
वही हृदय से सन्यासी है,
वीतराग एवं उन्मुक्त।।
417.कंद मूल नीवार लिसोड़ा से
करता जीवन निर्वाह।
मन वश रखकर अग्निहोत्र कर
सदा अतिथि सेवा की चाह।।
418.वन में रहकर इन्द्रियजित हो
पुण्य कर्म कर पाता है।
वही तपस्वी जग में
सच्चा वानप्रस्थ कहलाता है।।
419.बुद्धिमान की करे न निंदा
उसकी बांह पहुंचती दूर।
उसे सताया गया अगर तो,
बदला लेता वह भरपूर।।
420.जो विश्वास योग्य नहिं किंचित
करें नहीं उसका विश्वास।
नीति यही, विश्वास योग्य को भी
न बतावें बातें खास।।
421.करें अंधविश्वास अगर,
तो मन में भय हो जाता है।
भय होता उत्पन्न
मूल का भी उच्छेद कराता है।।
422.क्षमा क्रोध को करे नष्ट
मानव भी बन जाता है संत।
सदाचरण से कुलक्षणों का
पल भर में होता है अंत।।
423.कैसा कुल या चलन व्यक्ति का
निम्न बात से करें विचार।
कैसी माता...! कैसा भोजन...!!
कैसा है...! स्वागत सत्कार।।
424.कैसे वस्त्र किए हैं धारण..!!
कैसा उसका घर परिवार..!
यह उत्तम, तो व्यक्ति श्रेष्ठ है,
जीवन है इसके अनुसार।।
425.उत्तम भावों से संयुत है,
नहीं देह का है अभिमान।
न्याय युक्त जो भी मिल जाए,
वह करता उसका सम्मान।।
अशेष💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 7 /426 से 440)
दिनांक 29.7.21 गुरुवार 💐
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426.कामवासना में जो डूबा
इच्छाओं का रहे गुलाम।
उसे वस्तु यदि मिले कहीं,
निश्चय पाए वह सुख अभिराम।।
427.विद्वानों की सेवा करता,
धर्म युक्त हो मन के भाव।
सुंदर मृदुभाषी सु-मित्र से
युक्त रखे जो मृदुल स्वभाव।।
428.कुशल चिकित्सक हो
तो ऐसा सुहृद सदा रक्षा के योग्य।
ऐसे मित्र सहज नहीं मिलते,
जो हों सुंदर तथा सुयोग्य।।
429.उत्तम या कि अधम कुल हो,
पर करता मर्यादा पालन।
नियम नीति निर्देश आदि का
कभी न करता उल्लंघन।।
430.धर्म युक्त मानवता एवं
जिसका होता सरल स्वभाव।
उच्च कुलीनों से बढ़कर है
ऐसे मनुज रत्न का भाव।।
431.जिनका हर चिंतन, रहस्य, मन
आपस में मिल जाता है।
मित्र भाव उनका इस जग में,
युग युग गाया जाता है।।
432.घास ढेर से ढका कूप,
जैसे धोखा दे जाएगा।
बुद्धिहीन जो मित्र,
कहां संकट में साथ निभाएगा??
433.उस कु-मित्र का त्याग करें
जो है विचार शक्ति से हीन।
मैत्री अखंडित रहे ना उसकी
लेगा शांति ह्रदय की छीन।।
434.दुस्साहसी मूर्ख क्रोधी और
धर्महीन अति अभिमानी।
कभी मित्रता करें न उस से
दीर्घकाल नहीं टिक पानी।।
435.हो कृतज्ञ सत्पथ अनुयायी
दृढ़ अनुरागी तथा उदार।
मर्यादित जीवन जीता हो,
नित्य नियम विधि के अनुसार।।
436.इंद्रिय जयी सत्यवादी हो
करे मित्र का कभी न त्याग।
ऐसा मित्र चुने अपना,
जीवन भर हो जिससे अनुराग।।
437.इंद्रिय संयम बड़ा कठिन है
मृत्यु सरल उसके आगे।
देव नष्ट हो जाते हैं यदि,
यदि वह इंद्रिय संयम त्यागें।।
438.गुण में दोष न तकें किसी के,
क्षमा धैर्य युत सरल स्वभाव।
मित्रों का सम्मान तथा,
सब के प्रति कोमलता का भाव।।
439.सब के प्रति अपनापन एवं,
करे न मित्रों का अपमान।
यह गुण आयु बढ़ाने वाले,
ऐसा कहते हैं विद्वान।।
440.नष्ट हुई हो अर्थ संपदा,
किया किसी ने हो अन्याय।
वीर वही,जो नीति नियम से,
खोए धन को वापस लाय।।
अशेष💐💐
श्रीविदुरनीतिभावानुवाद
(अध्याय 7 /441से 450)
दिनांक 1.8.21 रविवार 💐
441.आगत का दुख हटे,
जानता जो नर इसका उचित उपाय।
वर्तमान कर्तव्यों के पालन में
अपना चित्त लगाय।।
442.जो अतीत में छूटा उसको
कुशल रूप पूरा कर जाय।
धीर वीर वह पुरुष अर्थ से हीन
कभी फिर ना रह पाय।।
443.मन वाणी और कर्म लगाकर
जिसका सेवन करें निरंतर।
वही कर्म,कर्ता के मन से
जोड़े अपना भी अभ्यंतर।।
444.इसीलिए हम कार्य करें वह,
जिससे हो जीवन कल्याण।
कार्य वही शुभ होते जिन से
जुड़ जाते हैं नीति विधान।।
445.चित्त वृत्तियों का निरोध हो,
सदा शास्त्र का हो अभ्यास।
उद्योगी जीवन हो एवं,
हृदय सरलता करे निवास।।
446.मंगलकारी शुभ पदार्थ का
भाव सहित होवे स्पर्श।
सत पुरुषों के दर्शन करके
प्राणी का होता उत्कर्ष।।
447.करें सतत उद्योग,
न उससे करें स्वयं को कभी विरक्त।
धन यश लाभ प्राप्ति हो एवं
हृदय धर्म में हो अनुरक्त।।
448.उद्योगी होता महान
करता अनंत सुख का उपभोग।
चाह रहे कल्याण, करें
अपने हर पल का सद उपयोग।।
449.सभी जगह सब काल
क्षमा होती समर्थ को हितकारी।
श्री संपन्न रहे, जो रखता
क्षमा भाव को बलधारी।।
450.शक्तिहीन का क्षमा भाव तो
होता उसकी मजबूरी।
शक्तिमान जो करे क्षमा तो
शक्ति नजर आती पूरी।।
श्री विदुर नीति भावानुवाद
अध्याय 7/451से 460)
दि.3/8/21 मंगलवार💐
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451.अर्थ-अनर्थ समान दृष्टि हो,
क्षमा सदा ही हितकारी।
धर्म हेतु भी क्षमा भाव की,
रखें हृदय में तैयारी।।
452.जिस सुख के सेवन से मानव
धर्म अर्थ से रहे न भ्रष्ट।
दूर रखे आसक्ति मोह अन्याय,
वही नर है उत्कृष्ट।।
453.दुख से पीड़ित तथा प्रमादी,
अजितेंद्रिय और हत उत्साह।
नास्तिक तथा आलसी के घर
नहीं लक्ष्मी रखे प्रवाह।।
454. लज्जाशील मनुष्य सरल है,
रखे सरलता गुण अनुसार।
दुष्ट मानते कमजोरी
देते अपमान तथा धिक्कार।।
455.अतिशय दानी अधिक घमंडी,
करे अधिक व्रत का पालन।
शूरवीर अतिश्रेष्ठ मनुज
कर सके न धन का संचालन।।
456.दानी धर्मी शूरवीर से
लक्ष्मी भी घबराती है।
अपव्यय के भय से ही लक्ष्मी,
उनके निकट न जाती है।।
457.राजलक्ष्मी वहां न टिकती,
जो हो बहुत अधिक गुणवान।
धीर वीर कवि ज्ञानी चिंतक
या फिर उच्च कोटि विद्वान।।
458.जो है गुण से हीन, लक्ष्मी
नहीं फटकती उनके पास।
ज्यों उन्मत्त तथा अंधी गौ
रखे भ्रमण का ही अभ्यास।।
459.यह न अधिक गुण चाहे एवं
नहीं निर्गुणी से अनुराग।
लक्ष्मी होती परम चंचला,
पल में दे दोनों को त्याग।।
460.अग्निहोत्र अधिकार प्राप्ति है,
वेद अध्ययन का परिणाम।
शास्त्र अध्ययन से सुशीलता,
सदाचार का मन में धाम।।
अशेष💐💐
श्री विदुर नीति भावानुवाद
अध्याय 7/461से 470)
दि.4/8/21 बुधवार💐
*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*
461. स्त्री का फल पुत्र प्राप्ति
एवं रति सुख का है संयोग।
धन अर्जन का यही सुफल है
दान करें या हो उपभोग।।
462.गलत राह से अर्जित धन से
कोई करता यदि सत्कर्म।
सत कर्मों का फल न मिलेगा,
सूक्ष्म धर्म का है यह मर्म।।
463. बुरी राह पर चलकर
जो भी अर्थ कमाया जाएगा।
दान धर्म सब व्यर्थ और
कर्ता भी सुफल न पायेगा।।
464.वन दुर्गम पथ कठिन आपदा,
चाहे सिर पर शस्त्र प्रहार।
श्रेष्ठ मनोबल युक्त पुरुष को
भय का किंचित नहीं विचार।।
465.धैर्य दक्षता संयम स्मृति
सतत सजगता और उद्योग।
सोच विचार कर्म करलें तो,
उन्नति का हो शुभ संयोग।।
466.जल फल-मूल दूध घी औषधि,
गुरु के वचनों पर विश्वास।
विप्र तुष्टि इन आठ कर्म से,
व्रत का होता नहीं विनाश।।
467.कर्म करें जो सुखदायक हो,
गैरों को भी हो अनुकूल।
ऐसा कार्य कभी मत करिए
जो विवेक पर डाले धूल।।
468.मन में कोई इच्छा लेकर
किया हुआ हर कर्म अधर्म।
चिंतन है निष्काम अगर तो,
धर्म युक्त बन जाता कर्म।।
469.क्रोध क्षमा के बल पर जीतें,
और असाधु से सद व्यवहार।
सत्य अनृत पर विजयी,
जीता जाए कृपण, रख भाव उदार।।
470.धूर्त आलसी क्रोधी और,
अभिमानी चोर तथा डरपोक।
नास्तिक नारी और कृतघ्न पर,
कर विश्वास मिले भय शोक।।
अशेष💐💐
श्री विदुर नीति भावानुवाद
अध्याय 7/471से 480)
दि.5/8/21 गुरुवार💐
*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*
471.गुरुजन का अभिवादन एवं
वृद्धों का सेवा-सम्मान।
यश बल आयु कीर्ति बढ़ते हैं,
जो रखता गुरुजन का मान।।
472.कष्ट उठाकर अवनत होकर
धर्म विरुद्ध मिले यदि अर्थ।
कभी न स्वीकारें उस धन को
वह होता है निष्फल व्यर्थ।।
473. स्त्री का संसर्ग मिले पर,
प्राप्त न हो उस से संतान।
विद्या हीन पुरुष और भूखी प्रजा
मानिये मृतक समान।।
474.राजा से विहीन हो धरती
उसका होता शीघ्र विनाश।
ये सब शोक प्राप्ति के कारण,
इन्हें न रखिए अपने पास।।
475.अधिक भ्रमण ही देह धारियों
का दुख रूप बुढ़ापा है।
बार-बार जलधार पड़े
पर्वत ने नभ कब नापा है।।
476.भोगों से वंचित नारी भी
वृद्धा ही कहलाती है।
वचन बाण आघात लगे
चेतना वृद्ध हो जाती है।।
477.वेदों का मल अनभ्यास है
नियम भंग ब्राह्मण का मल।
बलख-बुखारा मल पृथ्वी का,
अनृत वचन पुरुषों का मल।।
478.क्रीड़ा और परिहास हेतु उत्सुकता
पतिव्रता का मल।
पति के बिन परदेसी होकर रहना
हर नारी का मल।।
अशेष💐💐
श्री विदुर नीति भावानुवाद
अध्याय 7/479 से 487 )
दि.9/8/21 सोमवार💐
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479.सोने का मल चांदी है तो
रांगा है चांदी का मल।
रांगे का मल सीसा होता,
सीसा तो खुद में ही मल।।
480.सोकर नींद न जीती जाए,
काम भोग से नहीं नारी।
काष्ठ डालकर अग्नि जीतना,
महा-नाश की तैयारी।।
481.मदिरा की आदत मदिरा से
कभी नहीं जीती जाए।
प्रकृति विरुद्ध कर्म करता जो
वही अंत में पछताए।।
482.जिसके मित्र सदा हों वश में
जिसने शत्रु लिए हैं जीत।
खानपान से वश हो नारी,
उसका जीवन सफल गृहीत।।
483.वे जीवित हैं जिन पर सौ हैं,
वे भी जीवित जहां हजार।
हे नृप-श्रेष्ठ लोभ को त्यागें,
होगा यह जीवन भी पार।।
484.पशु धन धान्य नारियां जग में
एक पुरुष को रहें अपूर्ण।
फिर क्यों व्यर्थ आप करते हैं
खुद को मोह गर्व में चूर्ण।।
485.धान्य स्वर्ण पशु और स्त्री की,
चाह नहीं होती पूरी।
एक व्यक्ति संतुष्ट न हो तो,
बढ़ती जाती है दूरी।।
486.वीतराग मन यह विचार कर
कभी न करता किंचित मोह।
उसका मन संलिप्त न होता,
चाहे जब हो उसे बिछोह।।
487.पांडू तनय और निज पुत्रों में,
अगर आपका है तम-भाव।
हे राजन! मैं फिर कहता हूं,
रखें एक सा ही बर्ताव।।
【अध्याय 7 समाप्त】
अशेष💐💐
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