गुरुवार, 19 अगस्त 2021

मानो तो मैं गंगा माँ हूँ...!!गंगा यात्रा के पंद्रह दिन

श्रावण मास में भोलेनाथ व माँ गंगा के दिव्य व अपूर्व सम्बन्ध का स्मरण करने के लिए आज से अगले पंद्रह दिवस तक माँ गंगा की यात्रा का काव्य सेवा द्वारा आराधन करने का लक्ष्य है। आशा है इसके माध्यम से गंगाजी के सम्पूर्ण यात्रा-मार्ग का चिंतन एवं मानसिक यात्रा हो सकेगी। 
💐जय माँ गंगा
💐जय भोले नाथ
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पहला दिन💐
(मंगल वार 3.8.21)

1.A.  पाप मुक्त हमको करें 
सो तीरथ कहलायँ। 
जीवन में सुख शांति दें,
अंतहु मुक्ति दिलायँ।।
अंतहु मुक्ति दिलायँ,
गंग की ऐसी निर्मल धारा। 
सगर सुतों को मुक्त किया, 
भूतल पर किया पसारा।। 
घोर तपस्या करी भगीरथ 
ने फिर भूमि उतारा।
आशुतोष भोले शिव जी ने 
निज मस्तक पर धारा।।

प्रवाहित हुई धरा पर, 
भ्रमी शिव जटा जूट पर
जा मिली गंगासागर।
परम् तीर्थ बन गया मार्ग वह 
आईं जिस पर चलकर।।

नित्य तीरथ हैं  गंगा जिसे छू लिया,
उसकी पावन यह काया अमर हो गई।
कोटि पापों को धो कर बहा ले गई,
आत्मा उसकी हरी-हर का घर हो गयी।।कितनी पीड़ा है जो गंगा अमृतमयी,
आज नालों के जल से जहर हो गई। गंगा शुद्धी की बातें ही होती रहीं,
शुद्ध करने की मुश्किल डगर हो गई।।
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1.गंगा की हर बूंद में संचित शक्ति अपार। गोमुख से आगे चले तीरथ की भरमार।। तीरथ की भरमार,कि 
गोमुख से निकली यह धारा। 
हिम शिखरों ने श्वेत आभ से,
इसका रूप निखारा।।
गंगोत्री तक लगता,
इसका अद्भुत भव्य नजारा।
सूर्य विष्णु और ब्रह्म कुंड का,
रूप बड़ा ही प्यारा।।

भागीरथ शिला यहां पर, 
तपोबल संयुत प्रस्तर,
शिखर पर चमकें दिनकर। 
रजत कणों सी जल बूंदों ने 
अमृत दिया जी भर कर।।

जाह्नवी में मिले धार भागीरथी,
जाड़-गंगा औ भैरव का मंदिर यहां। 
श्याम गंगा से मिलकर के भागीरथी,
ने छटा जो बिखेरी,मिलेगी कहाँ?

तीर्थ हरसिल धराली पे गंगा मिले,
दूध-गंगा का संगम दिखेगा वहां।
दिव्य मुखवा का मठ है कि गंगोत्री 
से रखाई हुई मूर्ति पुजती यहाँ।।

💐💐जारी

गंगा-यात्रा दूसरा दिन💐
(बुधवार 4.8.21)
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2. गर्म नीर का स्रोत है,
मिले यहां ऋषि कुंड।
गंगनानी के धाम में,
विचरें खग मृग झुंड।। 

विचारें खग मृग झुंड,
तीर्थ फिर मिलता उत्तरकाशी।
असि-वरुणा के बीच भागीरथि,
कभी न रहें उदासी।। 
विश्वनाथ एकादश शिव
और गोपेश्वर सुख राशी। 
परशुराम भैरव शिव दुर्गा 
दत्तात्रेय अविनाशी।।

जड़ भरत मंदिर सुंदर, 
पिंड भी चढ़ें पितर पर,
स्वर्ग आरोहण पथ पर। 
वसुधारा दुर्गम तीरथ,
फिर बद्रीनाथ दयाकर।। 

ध्यान मुद्रा में बद्री विराजे यहां,
हैं चतुर्भुज के दर्शन बड़े ही मधुर।
शंकराचार्य का मठ बना है सुगढ़, 
देख कर शांति करती,
है दिल पर असर।।

हाथ जोड़े खड़े हैं गरुड़जी तथा 
तप्त-कुंडों में सर्दी का लगता ना डर।
पास में ही अलकनंदा की धार है,
मन में श्रद्धा प्रखर तब ही पाते उतर।।

जारी💐💐

गंगा-यात्रा तीसरा दिन💐
(गुरुवार 5.8.21)
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3. तपोभूमि देवर्षि की सुंदर विष्णुप्रयाग।
पांडू सुतों की जन्म-भू,मन जागे बैराग।।

मन जागे बैराग,
योग बद्री सुख धाम निराला। 
पांडुकेश,जोशीमठ लखकर 
मन होता मतवाला।। 
बद्रीनाथ दिव्य मूरति की 
जले अखंडित ज्वाला। 
ज्योति पीठ ज्योतीश्वर और 
नरसिंह बने रखवाला।। 

अलकनंदा का संगम,
धार मंदाकिनि अनुपम,
धाम का दिव्य महातम। 
कोटेश्वर, कमलेश्वर,शंकर मठ 
न किसी से हैं कम।।

दिव्य मंदाकिनी के किनारे कई 
तीर्थ मठ कुंड मंदिर नजर आएंगे। 
गुप्तकाशी तथा कोटि माहेश्वरी, 
कालीमठ,ऊखीमठ का दरश पाएंगे।। 

त्रियुगीनारायण केदार राजा यहां,
कृष्ण अनिरुद्ध उषा भी मन भाएंगे। 
मां अलकनंदा भागीरथी आ मिलें,
राम राघव के चरणों से जुड़ जाएंगे।।

गंगा-यात्रा चौथा दिन💐
(शुक्रवार 6.8.21)
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4. त्यागें देवप्रयाग को,
आ पहुंचीं ऋषिकेश।
लक्ष्मण झूला पुल यहां, 
दिखता अलग विशेष।। 

दिखता अलग विशेष,
मार्ग गंगा का अब मैदानी। 
स्वर्गाश्रम मुनी की रेती में,
गंगधार तूफानी।। 
शिवानंद आश्रम की महिमा,
है जानी पहचानी।
मैदानों में बहे यहां से 
यह पहाड़ की रानी।। 

यही नौका लग जावें,
पार गंगा के जावें, 
पर्यटक जन को भावें। 
हों प्रसन्न, नौका विहार कर,
अपना मन बहलावें।। 

सात पुरियों में वर्णित है मायापुरी 
है महातीर्थ,कहते हरिद्वार हैं। 
कुंभ लगता है हर बारवें साल में,
जो नहावे, वो भव से सहज पार हैं।।

हर की पैडी कुशावर्त तीरथ यहां,
नीलधारा पे मां चंडी का द्वार है। 
अंजनी,मंसा देवी पे नवरात्र में,
मेला लगता है,भक्तों की भरमार है।।

अशेष💐💐

गंगा-यात्रा पांचवां दिन💐
(शनिवार 7.8.21)
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5. दक्षेश्वर का धाम है 
कनखल शुभ स्थान। 
दिव्य सप्तधारा जहां 
पूजित ऋषि विद्वान।।

पूजित ऋषि विद्वान 
रावली कण्वाश्रम है पावन।
है शुक-ताल जहां शुक मुनि ने,
कही कथा मनभावन।।

गढ़ मुक्तेश्वर शिव मंदिर पर,
रम जाता चंचल मन।
बूढ़ी गंगा और गंगा का 
संगम बड़ा सुहावन।। 

'पूठ' महाकाल विराजे,
'मंडपेश्वर' सुख साजे,
हृदय के संकट भाजे। 
और 'अहार' में नाग यज्ञ के,
अब भी किस्से बाजे।।

कर्ण करते थे दान और पूजन यहां,
दिव्य तीरथ यहां पे करण वास है।
शुम्भ का वध किया,
चंडिका थक गईं, 
मारकर के निशुंभ को
लईं सांस है।।

इसके आगे नरोरा में निकली नहर 
बिजली घर भी यहां का बड़ा खास है। 
सोरों भूमि से मानस कथा है जुड़ी
जागे मानस का मन में भी एहसास है।।

अशेष💐💐

गंगा-यात्रा छठा दिन💐
(रविवार 8.8.21)
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6. कम्पिल, सिंधी रामपुर 
गौरवमय  कन्नौज।
है बिठूर की भूमि में,
तेज शक्ति दृढ़ ओज।। 

तेज शक्ति दृढ़ ओज 
पुराणों ने भी गाथा गाई।
कम्पिल महानगर 
श्रृंगी ऋषि का मंदिर सुखदाई।। 

ऋषि ऋचीक ने गाधि नृपति की 
सुता यहीं पर ब्याही।
ध्रुव जन्म स्थल इस बिठूर ने 
झेली क्रांति तबाही।।

कानपुर महानगर है, 
बकासुर का बकसर है,
जानकी जी मंदिर है।
लव कुश ने पकड़ा मख-घोड़ा,
यही तीर्थ 'परियर' है।। 

नृप सुरथ और समाधी की तपभूमि है 
बालकानेश, वागीश पुजते यहां। 
आइए अब चले तीर्थ राजा के घर,
दिव्य अनुपम त्रिवेणी का संगम जहाँ। 

माघ में कल्पवासी,यहां कुंभ में,
संत दिखते जहां- जनता जाती वहां।
वेणी माधव यहां, अक्षय वट के तले,
बिंदु माधव कृपा भी बरसती यहां।।

....अशेष💐💐

गंगा-यात्रा सातवां दिन💐
(सोमवार 9.8.21)
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7. प्रतिष्ठान पुर को कहें 
झूँसी गंगा पार। 
मिर्जापुर प्राचीन है 
विंध्याचल का द्वार 
विंध्याचल का द्वार, 
तारकेश्वर का धाम निराला। 
विंध्यवासिनी अष्टभुजा,
दर्शन कर दे मतवाला।

चामुंडा भैरव मंदिर 
गेरू तालाब निराला। 
सीताकुंड दिव्य तीरथ का
जल है रस का प्याला।। 

भर्तृहरि थे तपयोगी,
दृष्टि श्री हरि की होगी,
योग से बचते भोगी। 
गंगेश्वर कामाक्षा जरगो 
संगम चर्चा होगी।

शेरशाह और हुमायूं के किस्से जहां 
है किला वो चुनार खुद में न्यारा बड़ा। 
बीतीं सदियां,कई पीढ़ियां चुक गईं,
शान से आज भी सर उठाए खड़ा।।

राजा बलि का महायज्ञ खंडित किया,
विष्णु वामन का पहला चरण भी पड़ा। 
नाम चरणाद्रि से ये चुनार हो गया 
बीती सदियों का वैभव यहां है गड़ा।।

अशेष💐💐

गंगा-यात्रा आठवां दिन💐
(मंगलवार 10.8.21)
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8. काशी की महिमा अमित 
वर्णित शास्त्र पुराण। 
शिव त्रिशूल पर राजती, 
कहते ऋषि विद्वान।।

कहते ऋषि विद्वान,
सप्तपुरियों की निर्मल धारा। 
अवंतिका, द्वारिका अवध,
मथुरा पावन हरिद्वारा।।
काशी,कांची सप्तपुरी का,
भारत भर विस्तारा।।

द्वादश ज्योतिर्लिंग शंकर 
प्रभु विश्वनाथ का द्वारा।

विशालाक्षी सुख धामा, 
गंग धारा अभिरामा,
घाट पर मन विश्रामा। 
संकट मोचन बजरंगी 
वरुणा असि संगम नामा।। 

बुद्ध की भूमि है 
ज्ञान जग को दिया,
सारनाथ एक पावन यहां धाम है।
रामलीला बड़ी जानी-मानी है 
दुनिया में रामनगर का बड़ा नाम है। 

गंगा और गोमती 
मिलती आकर जहां 
धाम रजवानी में 
मिलता विश्राम है।

संत जमदग्नि की भूमि  
जमनिया 
भक्त करते भजन 
यहां पर निष्काम हैं।।

अशेष💐💐

गंगा-यात्रा नौंवा दिन💐
(बुध वार 11.8.21)
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9. बलिया में गंगा मिले 
सरयू के संग आय।
वृद्धाश्रम कार्तिक यहां, 
मेला बड़ा लगाय।।

मेला बड़ा लगाय 
निकट बक्सर सिद्धाश्रम पावन।
विश्वामित्र यज्ञ रक्षण हित,
राम लखन आवाहन।।

यज्ञ कुंड प्राचीन 
सोनपुर में हरिहर के दर्शन। 
गंडक गंगा संगम संग 
गज ग्राह युद्ध का कण कण।।

पाटलिपुत्र निहारे,
शक्ति पर तन मन वारे,
बाढ़ उत्तर दिश धारे ।
गोविंद सिंह दशमेश जन्म थल
की आरती उतारे।।

बूढ़ी गंडक है मुंगेर में मिल रही,
पांच जलकुंड जिनके अजब नाम हैं। 
सीता लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न कुंड है,
 पांचवें से जुड़ा नाम श्री राम है।। 
 
कष्ट हरणी करण राजधानी रही 
जन्म आश्रम महादेव का ग्राम है।
अजगैबीनाथ से गंगाजल ले चले 
बैद्यनाथ पे जलधार अविराम है।।

गंगा-यात्रा दसवां दिन💐
(गुरुवार 12.8.21)
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10. मौर्य काल विक्रमशिला 
निकट बटेश्वर नाथ।
बंग-भूमि भागीरथी 
पदमा रख सिर-माथ। 

पदमा रख सिर माथ 
बड़नगर शिवा भवानी राजे। 
गंगा अंजय संगम कटवा 
केतु-ग्राम में साजे।।

अग्र द्वीप मोग्राम तीर्थ
गौरांग हुए सन्यासी।
नवदीप चैतन्य जन्म-भू 
दिव्य भाव हरिदासी।।

निकट दर्शन मायापुर,
शंभु राजे सिद्धेश्वर, 
गंग-तट दिव्य शांतिपुर।
गुप्तीपाड़ा कलना बालागढ़ 
हरिदर्शन सुंदर ।।

गंग-धारा बढ़े कोलकाता निकट,
आदि काली का मंगलमयी धाम है।
दक्षिणेश्वर विवेकानंद काली मां औ 
राम-कृष्ण की कृपा दिव्य निष्काम है।।

फिर यहां से त्रिवेणी की धारा बंटे,
गंगासागर का संगम भी अभिराम है।
चल के गोमुख से गंगा यहां सिंधु तक 
आ के मिलतीं, यहीं उनका विश्राम है।।
 अशेष💐💐


गंगा-यात्रा ग्यारहवां दिन💐
(शुक्रवार 13.8.21)
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11. संस्कृति की पहचान है 
मां गंगा की धार।
धर्म शक्ति तप चेतना,
ज्ञान भक्ति आधार।।

ज्ञान भक्ति आधार 
परा प्रकृति अनुपम वरदानी। 
ब्रह्म विष्णु अरु रुद्र रूप, 
भगवती मातु कल्याणी।।

हरि चरणों से प्रकट हुई 
वैष्णवी नाम जग जानी। 
सकल जगत की मातु 
देव सरिता हे गंग भवानी।। 

नित्य गंगाजल सेवन,
दिव्य गंगा कलि-पावन, 
परम पावन हो तन मन।
करें लोक कल्याण गंग की 
शुभ तरंग मनभावन।।

नाम गंगा का लेके मिले मुक्ति पथ 
मन को निर्मल सुधा-सम बनाती हैं ये। 
भव से मिलती है मुक्ति जो दो बूंद भी,
जीभ से हो के अंतस में जाती हैं ये।।

स्वर्ग गंगा अलकनंदा मंदाकिनी 
सिद्धिगा विष्णु तनया कहाती हैं ये। 
गंगा तट पर 'पितर-श्राद्ध' करते हैं जो, 
उनके पितरों को तृप्ति दिलाती हैं ये।।

अशेष💐💐



गंगा-यात्रा बारहवां दिन💐
(शनिवार 14.8.21)
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12. गंगा रहती ब्रह्म-गृह 
हरि पद जन्म स्थान।
हुआ अवतरण किस लिए, 
हैं रुचिकर आख्यान।।

हैं रुचिकर आख्यान 
लोककल्याण हेतु तुम आईं। 
ब्रह्म कमंडल त्याग, 
शंभु की जटा तुम्हें मन-भाई।। 

गौतम ऋषि आराधन के फल 
भूतल पर पधराई। 
मातु गौतमी गंगा ने 
जन जन को मुक्ति दिलाई।।

हुई गौरा को शंका,
गंग भी हर के अंका,
बनी हैं परम प्रियंका। 
शिव शंकर संग माँ गौरा ने, 
दिया कोप का डंका।।

गौरी कहने लगी 
पुत्र गणपति से तब,
शिव ने गंगा जटा से 
हटाई नहीं।

साथ गंगा के मैं, 
रह सकूंगी नहीं,
घोर तप के लिए,
जाऊंगी मैं कहीं।। 

सोचते गज वदन 
माँ हैं करुणामयी,
भू पे संकट जहां,
ये भी जाऐं वहीं। 

शिव की शक्ती हैं ये,
भू पे जावें भले,
किंतु शिव जी के संग भी 
रहेंगी यहीं।।

अशेष💐💐

गंगा-यात्रा तेरहवां दिन💐
(रविवार 15.8.21)
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13. भूतल पर था पड़ रहा 
बारह बरस अकाल।
एकदंत गज-वदन ने,
समझ लिया यह हाल।
समझ लिया यह हाल,
बुद्धि निज, गणपति ने दौड़ाई। 
जग जननी को संतानों पर,
जाग उठी करुणाई।।

चाह रहीं गंगा,धरती पर
मनुज हेतु यदि आईं।
जीव जगत और तीन लोक को 
होंगी अति सुखदाई।।

शंभू अर्धांगिनि माता,
देव मुनि जन सुखदाता, 
भुवन चौदह है ध्याता।
गंगाजल का बिंदु मात्र,
मानव को अमर बनाता।।

ब्रह्म-गिरि पर गए,
संग कार्तिक लिए, 
जिस पे गौतम हैं 
धूनी रमाए हुए। 

गाय बनकर जया भी चलीं,गणपति 
ब्राह्मणों में चले रूप लाए हुए। 
एक लीला विनायकने सुंदर रची 
सैकड़ों विप्र थे जहां पे आए हुए।
सोच कल्याणकारी रखी आपने,
भू पे संकट के बादल थे छाए हुए।।

अशेष💐💐

गंगा-यात्रा चौदहवां दिन💐
(सोमवार 16.8.21)
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14. गौतम ऋषि के खेत में,
गाय चर रही घास।
तिनका लेकर हांकते, 
जो था ऋषि के पास।।

जो था ऋषि के पास,
गाय के तन से जरा छुआया।
गाय गिरी मरकर धरती पर,
खेली प्रभु ने माया।।

हाहाकार किया विप्रों ने,
गौतम को ठुकराया।
अब न रहें आश्रम में,
गौ हत्या का पाप चढ़ाया।।

विप्र गणपति यों बोले,
गाय तो हिले ना डोले, 
मुक्तिपथ कैसे खोले।
कार्य सिद्धि हो धरती पर,
यदि गंगा लें हिचकोले।। 

शिव जटा में रहें गंग 
होके मगन, 
उनको धरती के तल पर 
बुला लीजिए।
गाय उस जल की बूंदों से,
होगी खड़ी 
इस बहाने सभी का, 
भला कीजिए।।

शिव की पूजा से गौतम को 
गंगा मिली, 
जल का संकट धरा से 
मिटा दीजिए। 
गौतमी नाम गंगा का 
दर्शन मिले, 
मन से पापों के भय को 
हटा दीजिए।।

15. नृपति महाभिष नाम के, 
राजा थे मशहूर।
अश्वमेध शुभ यज्ञ भी,
किए कई भरपूर।। 

किए कई भरपूर 
स्वर्ग के बने सहज अधिकारी।
परम यशस्वी दयावान 
दानी शुभमति बलधारी।।

ब्रह्मदेव की सेवा हित नृप 
ब्रह्मलोक को आये।
कोटि देव विद्वान राजऋषि 
भी थे वहां बुलाए।।

देवनदि वहां पधारी,
सकल जन को सुख कारी,
गंग जन-जन की प्यारी।
तेज हवा में उड़ी 
मातु गंगा के तन की साड़ी।। 

देवताओं ने मस्तक झुकाये मगर,
राजा गंगा को अपलक 
निहारा किए।
गंगा मोहित हुई जो महाभिष पे तो 
नैन दोनों ने आपस में टकरा लिए।। 

टूटी मर्याद तो ब्रह्मा क्रोधित हुए,
बोले- धरती पे जाके जनम लीजिए।
राजा शांतनु हुए 
गंगा वनिता बनीं 
गंगावतरण को चिंतन में 
रख लीजिए।।

अशेष💐💐

गंगा-यात्रा पंद्रहवां दिन💐
(मंगलवार 17.8.21)
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16. गंग सरस्वति लक्ष्मी,
हरिप्रिया यह तीन।
तीन लोक त्राता हरी,
हैं इनके आधीन। 
हैं इनके आधीन 
सरस्वती हिय में शंका धारे। 
करें गंग को अधिक प्रेम 
जो प्रियतम सदा हमारे।।

मातु लक्ष्मी सरस्वती को 
जब समझाने आईं।
सरस्वती ने दोनों को ही,
दिया शाप दुखदाई।।

गंग धरती पर जाएं,
पाप सबके धुलवाएं, 
नदी बन समय बिताएं।
कहा गंग ने सरस्वती भी 
नदिया बन लहरायें।। 

श्री हरी ने कहा 
भू पे जा करके तुम 
पापियों को भी मुक्ति 
दिलाया करो।
नाम भागीरथी 
भक्त जानें तुम्हें,
हरि के चरणों से उनको 
मिलाया करो।। 

तट पे कल-कल ध्वनी 
जो सुनें भक्तजन,
राम का नाम उनको 
सुनाया करो।
हो के जग से विरत,
जो शरण में पड़े, 
अपनी गोदी में उनको 
सुलाया करो।।

17. दानव बलि ने जब किया 
उत्तम यज्ञ विचार।
यज्ञ भूमि में ही लिया,
हरि वामन अवतार।।

हरि वामन अवतार 
नृपति से भूमि तीन पग चाहें। 
देव दनुज का है विरोध,
हरि दैवी प्रेम निबाहें।। 

स्वर्ग भूमि पाताल सिंधु,
ऋषि मुनि सब जाय समाये।
वामन रूप त्याग श्रीहरि जब 
रूप विराट बनाये।। 

एक पग नापी धरती,
एक पग स्वर्ग पकड़ती,
तृतीय पग जगह न मिलती। 
सत्यलोक हरि चरण पड़े 
चरणों से गंग उतरती।। 

दिव्य पूजन 
श्री हरि के चरण का किया 
और कमंडल में 
जल को रखा भक्ति से। 
दिव्य जल 
गंगाजल रूप माना गया,
जिसने जग को संवारा है 
निज शक्ति से।। 

विष्णु चरणों से अमृत 
मिला विश्व को,
जो मिलाता मनुज को,
सदा मुक्ति से। 
भूमि पर आ गिरा 
विष्णु चरणों का जल,
जीव सत से जुड़े 
इसकी अनुरक्ति से।।

अशेष💐💐

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