बुराइयों को त्यागने का अमोघ उपाय यह है कि हम एकांत में अपने चरित्र, स्वभाव और शरीर की अच्छाइयों एवं श्रेष्ठ गुणों का ही चिंतन करें और दिव्यताओं की अभिवृद्धि करते रहें ।अपने लिए हमें वही मूल्य संसार और समाज से प्राप्त होता है, जिसका हम दृढ़ इच्छाशक्ति से दावा करते हैं । जो मूल्य निर्धारित करें, वैसी ही दिव्यताएँ और शक्तियाँ प्राप्त करने का प्रयत्न भी करें । मनुष्य अपने मन में स्वयं को जैसा मान बैठा है, वस्तुतः वह वैसा ही है।
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