संकट ते हनुमान छुड़ावै ।
राघव नाम सदा मन भावै।।
सुरसा का शक दूर किया मैनाक हराया।मुख में जा सुरसाके आकर शीश नवाया।
मिला दिव्यवरदान गये लंका के अन्दर ।शत्रु पक्ष बलवान नहीं तुमको कोई डर।।
आम्र वृक्ष के तले राम सियके गुण गावैं। जन पर संकटपड़ै आय हनुमान छुड़ावै।।
दैहिक संकटहोय पवन सुतके गुणगाओ। भौतिक संकटमें मारुतिको सदा मनाओ।
दैव न हो अनुकूल दशा कुग्रहकी भारी ।
मुक्तहोय जो आजाऐ हरि शरण तुम्हारी।।
संकट में प्रभु राम फँसे तुम जाए बचाये। लक्ष्मणको जब लगीशक्ति तुम गिरि ले आए।।
शनिका ढैया होय याकि सिर साढ़ेसाती। शक्ति आपकी राहु केतु सबपर छाजाती।
विपद् व्यथा में याद हमेशा तुम ही आते। भय संकट में सभी वीर हनुमान मनाते।।
जिस मस्तकपर रखोहाथ वह प्रभु मन भावै ।
संकटसे तिहुँकाल सदा हनुमान छुड़ावै।।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै।।
सुख सम्पदा भक्ति वर पावै ।
मनमें चिन्तन रहे सदा हनुमन्त बली का ।
आत्मा शक्ति जब जगे, पड़े हर संकट फीका।
भटके मन को खींच आप प्रभु तक पहुँचायें।
सफल मनोरथ सभी तुम्हारे तक जो आवै।।
दृष्टि तुम्हारी शाप ताप शंका हर लेती।
दुर्जन पाते दंड,भक्त को सन्मति देती।।
मन मारुतिके चरणों में वाणी गुणगाए।
कर्म स्वार्थ से मुक्त, राम का दास बनाए।।
जो हनुमत के चरण कमल निज मन में
धारे।
दिव्य रूप पर जो भी अपना तन मन वारे।।
हनुमत कृपा अहैतुक वह साधक ले पाता।
जो मारुति को रामकथा रस सिंधु पिलाता।।
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