शुक्रवार, 24 मई 2024

मंदिर में नारियल और पूजा पाठ में चंदन का प्रयोग क्यों करते हैं

नारियल को सर्वाधिक शुभ फल माना जाता है, इसी कारण इसका एक नाम 'श्रीफल' है। नारियल में शिव, गणपति, श्रीराम व श्रीकृष्ण - इन पाँच देवताओं की दैविक तरंगों को अपनी ओर आकृष्ट करने और उन्हें आवश्यकतानुसार प्रक्षेपित करने की क्षमता है । इसे सर्वाधिक सात्त्विकता प्रदान करनेवाला फल कहा गया है।

नारियल के द्वारा हम अनिष्ट शक्तियों के कष्ट दूर कर सकते हैं । इसके द्वारा बुरी नजर भी उतारते हैं, क्योंकि नारियल में अनिष्टकारी तरंगों को खींचने की क्षमता है । अनिष्ट शक्ति से पीड़ित व्यक्ति के कष्ट दूर करने के लिए नारियल से उसकी नजर उतारी जाती है।

इसी प्रकार जब हम मंदिर में या किसी अन्य अवसर पर नारियल फोड़ते हैं, तो उस समय उसमें से मारक मंत्र ‘ॐ फट' जैसी ध्वनि निकलती है, जिससे अनिष्ट शक्तियाँ दूर भाग जाती हैं।

एक मत के अनुसार मानव खोपड़ी के सदृश्य 'नारियल' की रचना ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने लोक-कल्याण के लिए अपने संकल्प से की थी। जब हम नारियल किसी देव को अर्पित करते हैं तो हमारा यह कृत्य एक प्रकार से अपना मस्तक ही अर्पण करने के समान होता है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ऋषिवर विश्वामित्र ने इस फल की उत्त्पत्ति की थी। जिस प्रकार हमारे शरीर में तीन आँखें होती हैं (तीसरी आँख जो बाह्य रूप से नहीं दिखती, पर अदृश्य रूप में हमारे मस्तिष्क में होती है) वैसे ही नारियल में भी तीन आँखें होती हैं। और इसमें अंदर भरा जल हमारे सिर में विद्यमान रक्त के समान होता है। नारियल देवालयों में चढ़ाने के पीछे विज्ञान यही है कि जब हम किसी मंदिर में किसी देवी या देवता को नारियल चढ़ाते हैं तो एक प्रकार से हम अपना सिर, अपना अहंकार, अपना अस्तित्व इस नारियल के रूप में अर्पण करते हैं और बदले में सुबुद्धिवाला मस्तक माँगते हैं।

नारियल अर्पण करते समय उसका आँखवाला भाग देवता की तरफ होना चाहिए, जिसका विज्ञान यह है कि आँखवाली ओर से ही नारियल देवशक्ति ग्रहण करता है और हमें प्रदान करता है।

इसी प्रकार नारियल फोड़ते समय 'फट' की जो आवाज आती है, वह मंत्र के समान शक्तिशाली होती है, जिससे अनिष्ट शक्तियाँ दूर रहती हैं और हमारे आस-पास के वातावरण को निर्मल रखती हैं। इसके अतिरिक्त नारियल के पानी को गंगाजल और गौमूत्र के समान शुद्ध एवं पवित्र माना गया है। इस कारण फोड़े गए नारियल के जल को प्रवेश द्वार के दोनों ओर या जिस स्थल पर पूजा हो रही है, उस स्थान पर चढ़ाया जाता है, ताकि उस जगह की शुद्धि हो जाए। इसके उपरांत नारियल की गरी प्रसाद रूप में सबको बाँटी जाती है। गरी ग्रहण करने से सभी को दैविक आशीर्वाद प्राप्त होता है । इन्हीं कारणों से नारियल चढ़ाने और नारियल फोड़ने की प्रथा हमारे सनातन कर्मकांड में सम्मिलित है।

पूजा-पाठ में चंदन का प्रयोग क्यों करते हैं

पूजा-पाठ में देवताओं को तिलक लगाने के लिए विविध प्रकार के द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है, उनमें से अष्टगंध व चंदन सबसे अधिक सात्त्विक हैं । देव के माथे पर तिलक लगाने के पीछे यह विज्ञान है कि देवता की सुषुम्ना नाड़ी सक्रिय होकर मनुष्य यानी पूजक की आध्यात्मिक व भौतिक उन्नति करें।

कर्मकांड के अनुसार, सकाम साधना में दोनों हाथों से चंदन घिसने की प्रक्रिया को महत्त्व दिया है। किसी भी कार्य की संपूर्ण सिद्धि के लिए उस शिव (बाएँ) व शक्ति (दाएँ) को जोड़ना आवश्यक है । जब हम दोनों हाथों से चंदन घिसते हैं तो शिव व शक्ति दोनों के तत्त्व अपने में जाग्रत् कर लेते हैं। दोनों हाथों से चंदन घिसने पर शरीर की सुषुम्ना नाड़ी सक्रिय हो जाती है, जो मनुष्य के लिए हितकर है।

इसके विपरीत, मृत व्यक्ति के लिए दाएँ हाथ से चंदन घिसने का विधान है। दाएँ हाथ से चंदन घिसकर दाहिनी नाड़ी (पिंगला नाड़ी) द्वारा मृत शरीर की लिंगदेह को क्रियाशक्ति प्रदान कर उसकी आगे की अनंत यात्रा के लिए गति देना है। हमारे प्राचीन शरीर - विज्ञान के अनुसार प्राण निकल जाने के बाद भी मृत शरीर में कुछ मात्रा में सुप्त उपप्राण कुछ समय तक शेष रहते हैं । आधुनिक वैज्ञानिक भी अब यह मानते हैं कि मरने के बाद कुछ समय तक मनुष्य का मस्तिष्क जीवित रहता है । यही कारण है कि हिंदुओं में मृतक को चिता पर अग्निदाह के समय कपाल- क्रिया की जाती है, ताकि उसकी खोपड़ी में स्थित उपप्राण शीघ्र मुक्त होकर पंचतत्त्व में विलीन हो जाएँ। चंदन के इस गुण के कारण चिता पर चंदन की लकड़ी के टुकड़े चढ़ाए जाते हैं । दाएँ हाथ से चंदन घिसनेवाले व्यक्ति की सूर्यनाड़ी (दाईं) सक्रिय होती है और इस प्रकार उसके शरीर से रजोगुणी तरंगें निकलकर मृत व्यक्ति की देह को प्राप्त होती हैं, जो उसके उपप्राण को शीघ्र उसके मृत शरीर से निकलने में सहायक बनती हैं।

चंदन में सात्त्विकता होती है, जो मनुष्य की आध्यात्मिकता के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसीलिए दोनों भृकुटि के बीच माथे पर चंदन का तिलक लगाने की प्रथा है। परंतु यदि हम सफेद चंदन में हलदी या कुंकुम मिलाकर घिसें तो उसकी सात्त्विकता कम हो जाती है, क्योंकि हलदी व कुंकुम में रजोगुणी तरंगें होती हैं, जो चंदन के सत्त्वकणों का विघटन कर देती हैं । इसलिए चंदन घिसते समय उसमें हलदी या कुमकुम नहीं मिलाना चाहिए।

जब हम किसी देव प्रतिमा या चित्र पर देव की भ्रूमध्य में चंदन का तिलक लगाते हैं तो उस देवता की सूर्यनाड़ी जाग्रत् हो जाती है। इससे देवता का तत्त्व उस प्रतिमा अथवा चित्र की ओर आकृष्ट होता है और वे जाग्रत् हो जाते हैं तथा आस-पास के वातावरण को आध्यात्मिक बनाते हैं। चंदन के प्रयोग के पीछे यही विज्ञान है।



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