शनिवार, 1 जून 2024

सांध्य दीप (13)निर्धनता में पल भी धन के प्रति आकर्षण नहीं

बंगाल के प्रसिद्ध विद्वान पं० ईश्वरचंद्र विद्यासागर का शैशव से लेकर विद्यार्थी काल तक बहुत निर्धनता में बीता । उनके पिता इतने निर्धन थे कि पुत्र को एक कक्षा तक भी नहीं पढ़ा सकते थे । विद्यासागर को पढने की बड़ी चाह थी । उन्होंने अपने व्यक्तिगत अध्यवसाय के बल पर इतनी विद्या प्राप्त कर ली कि तात्कालिक विद्वानों ने उन्हें विद्यासागर की उपाधि दी । उन्नीस वर्ष की अवस्था में जब उन्हें 'विद्यासागर' की उपाधि से विभूषित किया गया, उसी समय फोर्ट विलियम कालेज में प्रधान पंडित का पद रिक्त हुआ । प्रिंसिपल तथा अन्य अध्यापकों ने उन्हें अनुरोधपूर्वक उस पद पर नियुक्त कर दिया । अपनी नियुक्ति से पूर्व विद्यासागर ने नौकरी करने से इन्कार करते हुए कहा-“मेरा विचार कर्मचारी बनने का नहीं है । मैं स्वतंत्र रहकर समाज की सेवा करना चाहता हूँ ।"

कालेज के प्रधान पंडित का सम्मानपूर्ण पद का त्याग करते देखकर उनके अनेक मित्रों ने समझाया-"विद्यासागर ! इस अवसर को खोना ठीक न होगा । जीवन में अवसर बार-बार नहीं आते । आपने अपार कष्ट उठा कर विद्या प्राप्त की है, अब उसके द्वारा होने वाले लाभ से विमुख होकर आप से आप जीवन को अभावपूर्ण बनाये रहना बुद्धिमानी नहीं है । समाज सेवा और लोक-सेवा के लिए संसार में हजारों सुविधा सम्पन्न लोग पड़े हैं । समाज ने आपको क्या दे दिया था, क्या सहायता की जो आप उसकी कृतज्ञता का पालन करने के लिए सेवा करने को उद्यत हैं और प्रधान पंडित का अच्छा-खासा पद छोड़ रहे हैं ?"पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अपने मित्रों की बात को ध्यान से सुना और कहा-“आप लोग ठीक कहते हैं कि अवसर बार-बार नहीं आते । मुझे उसका उपयोग करना चाहिए । यह मनुष्य जीवन संसार के सारे अवसरों से विरल एवं बहुमूल्य है । इसका सदुपयोग एकमात्र जन-सेवा के पुण्यपूर्ण कार्य करने से हो सकता है । कमाने को मैं पैसा भी कमाऊँगा और प्रयत्न करूँगा कि इस प्रकार अभाव की स्थिति न रहे, फिर भी मैं केवल अपने जीवन को सुख-सुविधा देने के लिए ही धन कमाना नहीं चाहता । जहाँ तक समाज सेवा तथा लोक-सेवा के लिए 

हजारों आदमी होने का प्रश्न है, उसके लिए निवेदन है कि इस प्रकार कोई भी व्यक्ति अपने तथा दूसरों के विषय में विचार बना सकता है । ऐसी दशा में समाज सेवा की ओर कोई भी न बढ़ेगा और समाज यों ही अज्ञान, अविद्या तथा कुरीतियों एवं अंधविश्वासों की चक्की में पिसता रहेगा । समाज ने मेरे साथ कोई उपकार नहीं किया इसलिए मैं भी क्यों उसका कोई हित करूं, इस प्रकार के विचारों तथा भावनाओं में मेरा विश्वास नहीं है । हम आज जो कुछ दिखाई दे रहे हैं । वह सब समाज की सहायता से ही संभव हो सकता है।

एक साधारण सी शिक्षा संस्था स्थापित कर विद्या प्रचार का विचार रखने वाले पं० ईश्वरचंद्र विद्यासागर को बुला कर प्रिंसिपल ने कहा-“पंडितजी ! मैं आपके विचारों का सम्मान करता हूँ और मानता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति को समाज की कुछ न कुछ सेवा करनी चाहिए किंतु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि कोई नौकरी कर लेने पर समाज की सेवा हो ही नहीं सकती । आप वेतन के रूप में जीविका संबंधी चिंता से मुक्त रहकर समाज की जो भी सेवा करना चाहेंगे वह अधिक निःस्वार्थ भाव से कर सकेंगे । मुझे आपके विचारों का पता है और मैं अवश्य ही आप जैसे महानुभावों से अपने कालेज को गौरवान्वित करना चाहता हूँ ।" प्रिंसिपल की बात सुनकर पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने नौकरी न करने का हठ छोड़ दिया । उन्होंने प्रधान पंडित का पद स्वीकार कर लिया और उसी के माध्यम से लोक हित के ऐसे ऐसे कार्य किये हैं कि जिससे वह आज बंगाल के ही नहीं संपूर्ण भारत का श्रद्धा भाजन बने हुए हैं ।

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