रॉबर्ट गाउची 39 वर्षीय विमान चालक था, जो अपनी पत्नी फ्रांसिस और तीन पुत्रियों के साथ कनाडा के उत्तरी-पश्चिमी सीमांत पर बसे फोर्टस्मिथ नामक कस्बे में रहता था । दस वर्ष में उसने 6000 से भी अधिक घंटों की कठिनतम उड़ानें भरी थीं । उसका अपना छोटा सा विमान इस भयंकर शीत और तूफानों से भरे इस विस्तृत वीरान भू-भाग में किसी भी स्थान की उड़ान के लिए शिकारियों, अन्वेषकों या साहसिक यात्रियों के लिए सदा तैयार रहता था ।आज वह जब सरकारी निरीक्षकों की टोली को अपने गंतव्य पर पहुँचा कर लौट रहा था तो दोपहर के बाद ही उसका वायुयान तूफान में फँस गया । जब उसने देखा कि उसके वायुयान के निर्देशक उपकरण उसकी सहायता करने में असमर्थ हैं तो वह 200 फीट नीचे उतर आया । उसे ऐसे वृक्ष रहित समतल मैदान की खोज थी जहाँ वह रुककर तूफान थमने की प्रतीक्षा कर सके । उसने एक नजर नीचे फैली हुई विस्तृत हिमावृत्त धरती की ओर डाली । उपयुक्त स्थल देखकर उसने अपना यान नीचे उतार लिया ।
शीत बड़ी भयंकर थी । उसने पैरों में सील मछली की चमड़ी से बने जूते पहने हुए थे । उनके भीतर मोटे-मोटे चार जोड़ी मोजे पहने थे, शरीर पर कमीज के ऊपर दो स्वेटर और उसके ऊपर फर का कोट पहन रखा था । किंतु वह शीत के मारे काँप रहा था । उसने सोने के लिए प्रयुक्त होने वाले गर्म थैले के ऊपर तीन वैसे गर्म थैले और रख लिए तब भी वह सारी रात बुरी तरह से काँपता रहा ।
दूसरे दिन सबेरे जब उसने अपने इंजिन को पुनः गर्म करके दक्षिण की ओर उड़ान भरी तो उसका दिशा सूचक यंत्र खराब हो गया । मौसम भी क्षण-क्षण में खराब होता जा रहा था । हवा में बर्फ के कण उड़ने लगे थे और कोहरे ने धरती और क्षितिज को ढक लिया था । ऐसी स्थिति में उसने अपने रेडियो यंत्र द्वारा मार्गदर्शन व सहायता के लिए संबंध स्थापित करने का प्रयास किया पर उधर से कोई उत्तर नहीं मिल रहा था। बड़ी देर के बाद कनाडियन एयर फोर्स के यलोनायक केंद्र से क्षीण सी सूचना मिली-"हाँ, हमें पता चल गया है। हम सहायता का प्रयास कर रहे हैं।" कुछ ही घंटों में यह तुम तक पहुँच जाएगी । इस आवाज के बाद उसे अट्ठावन दिनों में अन्य कोई मानवी आवाज सुनने को नहीं मिली ।
जल्दी ही उसे एक झील के किनारे यान उतारने का उपयुक्त स्थान मिल गया । उसने वहाँ यान उतार कर 'सराह' और सी० पी० आई० से बेतार संबंध स्थापित करना चाहा पर उसे कोई सफलता नहीं मिल सकी । वहाँ तो हवा की सनसनाहट के अतिरिक्त कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था । इन दोनों इमरजेंसी स्टेशनों तक उसकी बेतार पुकार पहुँच नहीं रही थी । उसने अपनी ओर से संदेश भेजने के लिए जितनी तिकड़में वह लगा सकता था, लगायीं पर वह सफल नहीं हो सका । उसने अधिकतम फ्रीक्वेंसी पर संदेश संप्रेषण का प्रयास किया पर व्यर्थ । उसके स्विच बोर्ड पर जितने भी बेतार के साधन थे सभी बेकार सिद्ध हुए ।
अब उसने अपनी खाद्य सामग्री को टटोला । उसके पास सूखे भोजन के कुछ पैकेट, थोड़े से चाकलेट, एक पौंड के करीब शक्कर थी । बड़ी सावधानी से काम में लाने पर भी यह खाद्य सामग्री दस या बारह दिन ही चल सकती थी । यों वह अपनी पत्नी के लिए अस्सी पौंड मछली लाया था आर्कटिक वृत से, पर वह तो कच्ची थी फिर जमकर पत्थर बन चुकी थी । इसके अतिरिक्त उसके पास एक राइफल, माचिस के पाँच पुड़े, एक कुल्हाड़ी और चमक उत्पन्न करने वाले थोड़े से गोले थे ।
उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि 'सी० पी० आई०' और 'सराह' जैसे इमरजेंसी रेडियो केन्द्रों तक उसकी बेतार की पुकार नहीं पहुँच सकी है । पर निराश होने से क्या बनता ? वह फिर सो गया ।
दूसरे दिन भी तापमान शून्य से 54 अंश नीचे था । वह सोच रहा था कि ऊपर से उड़ने वाले वायुयान उसे देख सकते हैं पर उसके इस सोचने का कोई अर्थ नहीं था क्योंकि वह स्थान वायुमार्ग पर तो था नहीं । उसने बचे हुए पेट्रोल से एक बार पुन: बैट्री को गर्म करके बेतार से संबंध बनाने की कोशिश की पर कुछ न हो सका ।
ऐसी भयंकर शीत में भी वह बाहर निकला और एक पेड़ की लंबी सी टहनी काटकर लाया उससे एरियल को बाँधकर ऊँचा किया। किंतु फिर भी वह जो संदेश भेजा उन्हें कोई स्टेशन पकड़ने में असमर्थ रहा । इसके बाद दो दिन तक उसने रहे सहे पेट्रोल से बैट्री गर्म करके संदेश भेजे पर उनका भी कुछ परिणाम नहीं हुआ । उसने झील के बर्फ पर 150 फीट बड़े-बड़े एस० ओ० एस o साइन (सेव-अवर-सोल, हमारी रक्षा करो) बनाए पर वे तो आध घंटे में ही मिट गए।
इधर वायु सेना ने उसकी खोज का अथक प्रयास किया । उसी दिन एक दो इंजिन का एलबाट्रोस, दूसरे दिन एक ओर एलबाट्रोस और एक डी० सी० 3 भेजा गया । कुछ निजी यानों ने भी उनकी सहायता की । बारह दिन तक वायु सेना ने खोज जारी रखी। तापमान वही शून्य से साठ अंश नीचे था । पन्द्रह दिन तक वायुसेना के यानों ने 29200 मील की उड़ानें भरीं । सोलहवें दिन यह सोचकर खोज बन्द कर दी कि इतनी शीत में कोई आदमी इतने दिन जीवित नहीं रह सकता ।
राबर्ट बॉब गाउची की पत्नी को फिर भी आशा थी उसने निजी वायुयानों द्वारा कुछ दिनों तक और खोज जारी रखाई । उस क्षेत्र के लोगों ने भी इस खोज में हर प्रकार की सहायता दी पर छब्बीसवें दिन उनकी खोज भी बन्द कर दी गई । गाउची की ईश्वर विश्वासी पत्नी अभी भी ईश्वर की सहायता का विश्वास संजोये अपने पति के लौटने के बारे में क्षीण सी आशा रखती थी ।राबर्ट बॉब गाउची के बाँये पाँव की तीन उँगलियाँ और दाहिने पाँव की दो उँगलियाँ बेकार हो चली थीं। उनमें गेंगरिन होने का भय था । यदि ऐसा हो गया तो उसका प्राणान्त निश्चित था । अतः वह उनका नित्य निरीक्षण किया करता था । वह इसके प्रति सचेत था कि यदि रक्त में जहर फैलने का जरा सा भी खतरा होगा तो वह कुल्हाडी से उन्हें काट देगा ।
शीत इतनी भयंकर थी कि रक्त को जमा दे, ऊपर से मृत्यु का भय, अकेलापन, खाने के लिये सामग्री का अभाव, इन सबको झेलता हुआ भी बॉब गाउची निराश नहीं हुआ । उसने देखा कि मृत्यु आती है तभी तो आयेगी उसके पहले जीवन की आशा क्यों छोडी जाय । वह अभी भी जीवन के प्रति आशावान था जब कि दुनियाँ के लोग तो उसे मरा हुआ मान चुके थे । मानते क्यों नहीं ? ऐसे मौसम में भला कोई जीवित रह सकता है ।वह अपना अधिकांश समय सोने में ही बिताता । वायुयान का केबिन उसकी शीत से तो क्या रक्षा करता पर हाँ वह हवा से बचाव अवश्य करता था । उसने अपनी खाद्य सामग्री को खूब लम्बा खींचा फिर भी वह चौदह दिन से अधिक नहीं चल सकी । अब उसके सामने जमी हुई कच्ची मछली खाकर पेट की आग बुझाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था। वह ऐसा करता तो पेट विद्रोह कर उठता था । यह भी एक विकट समस्या थी ।
समय बिताने के लिए उसने अपनी लॉग बुक के एक पन्ने से डायरी का काम लेना चाहा पर पेन की स्याही भी जम गयी थी सो वह डायरी भी नहीं लिखसका ।
भूख, प्यास, पांव का दर्द और निराशा इन सबसे भयंकर थी वहाँ की निस्तब्धता । उसने बाद में जब मौसम में कुछ सुधार हुआ तब अपनी डायरी में लिखा-"मैंने इससे पहले ऐसा निस्तब्धतायुक्त स्थान नहीं देखा था । कोई आवाज नहीं, न चिड़ियों की, न भेड़ियों की, न लोमड़ियों की अथवा किसी वस्तु की ।” ऐसी स्थिति में ही पता चल पाता है कि प्रकृति के प्रत्येक प्राणी का अपना एक महत्व है । ऐसी स्थिति में एक आत्मा का दूसरी आत्मा के प्रति सहज स्वाभाविक दुलार और आकर्षण का पता चलता है ।
उसने कितने ही भटके हुए विमान चालकों की सहायता की थी पर आज स्वयं असहाय स्थिति में फँसा हुआ था । गजब की प्राण शक्ति थी इस व्यक्ति में । भूख, प्यास और एकांत भी उसकी जीवन आशा को समाप्त नहीं कर सका था । 28 फरवरी को उसने एक वायुयान की मद्धिम सी गरगराहट सुनी । वह अपने स्लीपिंग बेग में से बाहर निकला । उसने देखा एक 'बीबर' था जो दो हजार फीट की ऊँचाई पर उड़ रहा था । गाउची ने उसके चालक का ध्यान अपनी ओर दिलाने के लिए अपनी बंदूक द्वारा चमकने वाला गोला छोड़ा पर चालक का ध्यान उधर नहीं जा सका अब भी उसे आशा थी कि वह बच सकेगा । वह रात भर स्लीपिंग बेग में सोया रहता और दिन को झील की बर्फ पर 'एस ओ एस' व 'हेल्प' के संकेत अंकित करता । कभी-कभी उसकी उंगलियाँ बहुत दर्द करने लगती थीं । भूख और ठंड भी कम परेशान नहीं करती थी । 5 मार्च को उसने अपनी डायरी में लिखा-" भयंकर शीत सप्ताह था यह । मैं सोचता हूँ अब अधिक दिनों में इससे बच नहीं सकूँगा ।"
12 मार्च को उसके ऊपर से दो वायुयान गुजरे पर वह उनके चालकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में असफल ही रहा । अब तो वह उंगलियों के दर्द के मारे झील तक जाकर संकेत भी नहीं बना सकता था । उसने सोलह मार्च को डायरी में लिखा-"आज मैंने भोजन के नाम पर प्याज के शोरबे का थेला गले के नीचे उतारा है ।"
अब मौसम बदल रहा था । तीस मार्च को दिन का तापमान शून्य तक ऊपर उठ चुका था । उसने आज यान के लेंडिंग गियर में से से थोड़ा सा तेल निकालने की हिम्मत की । उसे जलाकर जमी हुई मछली को सेक कर उदरस्थ किया ।
अट्ठावनवें दिन 1 अप्रैल को शाम छः बजे उसने फिर वही आशा भरी विमान की गरगराहट सुनी । उसके चमक संकेत को इस 'बीवर' के चालक रोनाल्ड शीयर डाउन ने पकड़ा। उसने विमान नीचे उतारा । जब उसने और उसके सह चालक ग्लेन स्टिबेंस ने बॉब गाउची को देखा तो आश्चर्य से चिल्ला उठे-"हे भगवान ! बॉब अभी तक जीवित है ।" सचमुच बॉब जीवित था, मानव की अदम्य जीवनेच्छा और साहस के प्रतीक रूप में ।
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