"डॉक्टर !" आहत के साथ आये व्यक्ति जिसका नाम फोर्ट सैंपसन था, ने कहा-"आप अपनी ओर से पूरा प्रयत्न करें परंतु मैं नहीं सोचता कि मेरा मित्र मृत्यु के हाथों पराजित हो जाएगा क्योंकि घाव लगने के बाद लगभग वह एक सप्ताह तक कठोर परिश्रम करता रहा है ।" अच्छा"-आश्चर्य विस्फारित नेत्रों, से सर्जन ने सैंपसन और आरफंसन की ओर देखा । गोली आरफंसन के दिल से करीब एक इंच के फासले पर लगी थी । वह बांये फेफड़े से आरपार निकल गयी थी । लेकिन रीढ़ की हड्डी बची थी, जिसके सहारे आरफंसन काम करता रहा। फेंफड़े पर हल्का सा आघात भी व्यक्ति को निश्चेष्ट कर देने के लिए पर्याप्त है तो यह क्यों नहीं आश्चर्य की बात है कि घायल फेफड़े से आहत व्यक्ति एक सप्ताह तक श्रम करता रहा । कमाल है"-सर्जन ने मन ही मन कहा-“इसे तो गोली लगने के घंटे भर बाद ही मर जाना चाहिए था । इतने घातक घाव के बाद भी यह कैसे जिंदा रहा ।"
आरफंसन नाम का वह व्यक्ति एक शिकारी था । घटना सन् 1933 की है । फरवरी की बर्फानी हवाएं कलेजों को चीरती बह रही थीं । कनाडा की वल्वलेरू नदी का पानी इन हवाओं के कारण जम कर बर्फ हो गया था। ऐसे मौसम में शिकार आसानी से मिल सकता है, यह सोचकर आरफंसन अपने डेरे से निकला । कंधों पर भारी रायफल टांग कर । उस क्षेत्र में एक जंगली बिल्ली ने बड़ा उत्पात मचा रखा था। रात के अंधेरे में वह चुपके से आती और गांववासियों के घरों में घुस दूध मुँहे बच्चे ही प्रायः उसका शिकार बनते थे । माँ के आँचल में मुँह छुपाये सो रहे घुस जाती । बच्चों को वह इतनी चालाकी से उठाती कि बच्चे चीख भी न पाते । सुबह उठने पर या रात में ही कभी नींद खुलती तो उन्हें दीख पड़ती थीं खून की बूँदें, जो बच्चों के जख्मी हुए शरीर से टपक जाती थीं ।
आरंभ में तो लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि इस प्रकार कौन बच्चों को उठा ले जाता है । इसलिए उन्होंने निगरानी करना शुरू कर दिया । एक अवसर पर यह देख लिया गया कि बच्चे उठा ले जाने वाला जानवर एक जंगली बिलाव है । लोगों ने उस समय हल्ला भी मचाया परंतु बिल्ली किसी कुशल अपराधी की तरह बच भागी । उसके बाद उसने और भी सावधानी बरतना आरंभ कर दी। यही नहीं वह बड़े बालकों को भी नोंच भागती थी । तथा अपना कार्यक्षेत्र भी बढ़ा दिया । वह आसपास के गांवों में भी शिकार करने लगी थी । गांव वालों ने बड़ी हायतोबा मचायी । उसे मारने की तरह-तरह से कोशिशें भी की गयीं । परंतु बिल्ली भी हद चालाक निकली । सभी शिकारियों को उसने चकमा दे दिया और साफ-साफ बच निकली ।
पास ही के गाँव में शिकारी आरफंसन रहते थे जिन्होंने कई खतरनाक अभियानों में सफलता पायी थी । जब उन्हें यह पता चला तो वे अपने साथियों के साथ उस खतरनाक बिल्ली का शिकार करने को चल दिए । उस क्षेत्र के लोगों से उन्होंने तलाश की तो पता चला कि बिल्ली प्राय: इसी जंगल में भाग जाया करती है । आरफंसन तथा उसके सहयोगियों ने उसी जंगल के पास अपना डेरा डाल दिया । रात को योजना बनायी गयी कि एक एक शिकारी शिकार पर जाये । बिलाव ही तो है, साथ में विश्वासपात्र रायफल बंदूक भी है फिर डर किस बात का ।
सारे जंगल में एक साथ तलाश भी हो जाएगी और बिल्ली को इधर-उधर भाग कर बचने का अवसर भी नहीं मिलेगा ।
सबके बाद में आरफंसन निकला । रायफल अपने कंधे पर रखकर । कुछ दूर जंगल में निकल जाने के बाद घास की झाड़ी से पत्तों की खड़खड़ाहट सुनाई दी । आरफंसन ने जगह का परीक्षण करने के लिए आसपास देखा भी सही । वहाँ छोटे-छोटे ताजे पैरों के निशान थे । कुछ सोचकर आरफंसन ने कंधे पर टंगी रायफल उतारी और आवाज की ओर निशाना साधकर गोली दाग दी । तुरंत फड़फड़ाहट सुनाई दी । आरफंसन ने जाकर टटोला वहाँ पर एक जंगली बिल्ली अपनी आखरी सांसे गिन रही थी । शायद यह वही थी जिसने आसपास के गाँवों मेंउत्पात मचा रखा था ।
संतोष और चैन की सांस लेकर आरफंसन मृतप्राय बिल्ली के पास पहुँचा और उसने वह देह उठा कर अपने कंधों पर टांग ली। रायफल में अभी एक गोली और बची थी । वह भी ज्यों की त्यों कंधे पर टांग ली । सहज ही मिल गयी अपनी इस सफलता पर और गर्व से फूला न समाता था । वह सोचता जा रहा था, लोग उसे कितना सराहेंगे जन-जीवन का यह कंटक निकल जाने का समाचार सुनकर कितना प्रसन्न होंगे इस क्षेत्र के निवासी लोग । थोड़ी देर तक चलते चलते उसे अपना डेरा पेड़ों के झुरमुट में से साफ दिखाई देने लगा । घर नजदीक आया देखकर उसकी भूख तेज हो गयी ।
दरवाजे पर पहुँचते ही उसने बिल्ली की लाश को कंधे से उतारने के लिए हाथ पीछे की ओर किये । 'धांय'-वातावरण को भेदती हुई रायफल की एक गोली उसकी पीठ को छेद गयी । वह हक्का-बक्का रह गया । इस सुनसान में ऐसा कौनसा दुश्मन है जिसने अपना बैर निकालने का यह उपयुक्त अवसर निकाला । कहीं मेरा ही तो कोई साथी नहीं । नहीं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी प्रकार अपनी जानकारी में मैंने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया । मेरा तो सभी से अच्छा व्यवहार है । गोली इतनी निकट से चली थी कि लगता था किसी ने उसकी पीठ पर ही रायफल की नाल टिका कर फायर किया है । इतनी सारी बातें उसने क्षण भर में सोच डाली और तेजी से अपने स्थान से हट कर दरवाजे की ओट में आ गया। पीछे मुड़कर देखा तो एकदम सन्नाटा कोई नहीं । रायफल की आवाज अभी भी दूर पहाड़ियों से टकराकर गूंज रही थी । असमंजस की स्थिति में उसने बिल्ली को झटके से नीचे उतारा तो साथ में कंधे पर टंगी हुई रायफल भी खिसक गयी । देखकर आरफंसन को सारी स्थिति समझ में आ गयी। घायल बिल्ली के पंजों में रायफल का घोड़ा दबा हुआ था और जब वह मृतप्राय बिल्ली को कंधे से उतार रहा था तब किसी तरह घोड़ा दब गया और रायफल चल गयी ।
आरफंसन अभी यहाँ अकेला ही था । साथ के शिकारी साथी पता नहीं कब लौटें। उनके आने का इंतजार किया जाय तो पता नहीं शरीर में गोली का कितना विष फैल चुकेगा । मृत्यु की कामना उसे अभी थी नहीं फिर भी उसे भय भी नहीं था । आरफंसन को बड़ा विश्वास था अपने आप पर, अपने सुदृढ़ शरीर पर कि यह गोली उसका अंत नहीं कर सकती ।
जूते के फीते खोलने के लिए वह जैसे ही नीचे झुका-पीठ से रक्त का फोव्वारा फूट निकला । पहने हुए सब कपड़े खून से तर हो उठे । साथ ही जोरों की खाँसी भी आने लगी । उसने जूते उतारे, कमर सीधी की और गोली के घाव को हाथ से दबा कर अंदर तक घुस गया । दर्पण निकाला और पीठ की तरफ उसे रखकर पीछे मुड़कर देखा तो एक बड़ा सा सूराख ज्वालामुखी की तरह गर्म रक्त उगल रहा था । खाँसी आई और मुँह से झाग गिरने लगे । यह निश्चित पता चल गया था कि गोली पीठ से बाँये फेफड़े को चीरती हुई सीने से पार निकल गयी है । इसी प्रकार दर्पण में घाव देखते हुए खून को बहते रहने दिया गया तो जीवन लीला देखते ही देखते समाप्त हो जायेगी । यह सोचकर कुछ उपाय करने के लिए वह उद्यत हुआ ।
साथ में सामान में से एक तोलिया ढूँढ़ निकाला और उसे फाड़ कर फोये बनाने लगा । दर्पण में देखकर उसने घाव में तौलिया के टुकड़े भरे और खून का बहना बंद किया । फिर उसने तौलिये की ही पट्टी ऊपर से कसकर बाँध ली ।
खेमे में कोई कीटाणु नाशक औषधि तो थी नहीं । थोड़ी देर में ही पूरे शरीर में जहर फैल सकता था । इसलिए घाव को पानी से धोना उचित जँचा । परंतु पानी भी तो नहीं था, बाहर सर्द हवा बह रही थी । तंबू से बाहर निकलते ही बर्फीली हवाएं जख्मी घाव को और भी नुकसान पहुँचा सकती है । परंतु काम तो सब अपने ही हाथों से करना था । ठंडी हवा की परवाह किए बिना ही वह एक हाथ में वाल्टी और दूसरे में कुल्हाड़ी लिए वह चल पड़ा । नदी की सतह पर जमी कठोर बर्फ को दाँये हाथ से कुल्हाड़ी चला कर तोड़ा और उसे वाल्टी में भर कर ले आया ।
डेरे में आकर आग जलायी, पानी गर्म किया और गर्म पानी से अपना बाद धोया । काफी समय तक धोते रहने के कारण शरीर के जख्म में तनाव पैदा हुआ और घाव दर्द करने लगा । आरफंसन ने इसके बाद घाव को अच्छी तरह से बाँध लिया । इसके बाद उसे खाने की याद आई ।
तंबू में तैयार बना खाना तो था नहीं अतः उसने स्वयं खाना बनाया । खाने के बाद वह अपनी स्थितिपर विचार करने लगा । बार बार उसके विचार इसी केन्द्र बिंदु पर पहुँचते कि कुछ भी हो मैं मरूँगा नहीं । यह सोचते सोचते ही उसे नींद आ गयी शाम हुई, रात गहराई और सुबह भी हो गयी। साथी नहीं आए। शायद किसी शिकार के पीछे दूर तक निकल गए हों । पूरा दिन और पूरी रात गुजर गयी । दूसरे दिन आरफंसन के तीनों साथी शिकार से लौटे । कई बार ऐसा होता था । सप्ताहों तक वे लोग अपने शिकार का पीछा करते हुए वे दूर तक निकल जाया करते थे आरफंसन ने उनके लौटने पर सारा घटनाक्रम कह सुनाया । आश्चर्य तो उसके साथियों को भी हुआ । गोली के आरपार हो जाने के बाद भी कैसे वह सामान्य दिनचर्या में व्यस्त रहा ।
तुरंत आरफंसन को निकट के अस्पताल में भर्ती करवाने का विचार किया गया । आसपास दूर मीलों दूर तक कोई कस्बा नहीं था । सबसे नजदीक के नगर तक पहुँचने के लिए भी कम से कम दो दिन का समय चाहिए । कुछ भी हो, चलना निश्चित हो गया । पैदल ही आरफंसन अपने साथियों के साथ अस्पतालतक गया ।
दो दिन तक चलते रहने के कारण वह थक गया था । इसलिए अस्पताल में जाकर वह बेहोश हो गया। डॉक्टर ने उसकी पूरी चिकित्सा की और वह बच गया । अन्य कोई और सामान्य मनोबल का व्यक्ति होता तो अवश्य ही मर जाता परंतु आरफंसन के पास आत्मविश्वास की अपार मूल्यवान सम्पदा थी और उसी के बल पर वह मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सका
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