भगवान् के दर्शन के लिए यों तो आप कभी भी मंदिर जा सकते हैं, पर आरती के समय देवताओं या दैविक शक्तियों का वहाँ आगमन अधिक रहता है, जिस कारण मंदिर में उस समय दैविक प्रभाव बहुत अधिक रहता है। अतः उस समय मंदिर की सात्त्विकता बढ़ जाती है, जिसके फलस्वरूप दर्शनार्थियों को लाभ मिलता है। इस कारण आरती के समय मंदिर, देवालय तथा अन्य पवित्र स्थलों पर उपस्थित रहने से अधिक पुण्य प्राप्त होता है।
इसके अतिरिक्त आरती उतारने के पीछे एक और कारण भी है, जिसका संबंध मनुष्यों से है। विवाह के दिन वर- वधू की, नामकरण के दिन नवजात शिशु की, जन्मदिन पर बच्चों की, करवाचौथ के दिन पति की, भैयादूज के दिन भाई की, विजयी वीर की या फिर किसी विशेष कारणों से किसी भी व्यक्ति की आरती उतारी जाती है। यह एक प्रतिपादित सत्य है कि हर व्यक्ति के चारों ओर एक आभामंडल होता है, जो नकारात्मक शक्तियों से उसकी रक्षा करता है। इस आभामंडल पर 'ईर्ष्या' (किसी की खुशी से जलन) का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। आरती उतारने के पीछे नकारात्मक भावना यानी ईर्ष्या के दुष्प्रभाव को दूर रखना है । भूत, काला जादू इत्यादि अनिष्ट शक्तियों के कष्ट से भी आरती उतारने से मनुष्य का रक्षण होता है।
आरती उतारने की सही पद्धति - आरती की थाली में हलदी- कुंकुम, पान-सुपारी, अष्टगंध, अक्षत, दूध से बनी मिठाई, मिसरी या शक्कर व दीया होना चाहिए। थाली भी कांस्य की होनी चाहिए। जिसकी आरती उतारनी है, उसे प्रथम कुंकुम, अष्ट गंध इत्यादि का तिलक लगाकर अक्षत तिलक पर लगाएँ और फिर कुछ अक्षत उसके स के चारों ओर बाईं से दाईं ओर (Clockwise) घुमाना चाहिए। यह क्रिया उस व्यक्ति के शरीर के चारों ओर किसी भी नकारात्मक शक्ति को अपने में समाविष्ट कर लेती है । फिर उसके सिर के चारों ओर घड़ी की दिशा में दीपक को तीन बार गोल-गोल घुमाएँ । यह उस व्यक्ति के आभामंडल को सशक्त बना देता है।
एक और ध्यान देनेवाली बात यह है कि देवी - देवताओं की आरती की थाली में घी का और मनुष्य की आरती की थाली में तेल का दीया होना चाहिए। आरती तीन बार करनी होती है और आरती का प्रारंभ उस व्यक्ति या देवता के दाएँ पाँव से होता है । यही बारीकियाँ है जो आरती के विज्ञान से जुड़ी हैं, जिनका पूर्ण पालन आज का आधुनिक मानव नहीं करता और फिर जब परिणाम ठीक नहीं मिलता तो इन मान्यताओं को ढकोसला व अंधविश्वास बता देता है, जबकि दोष उसकी अपनी अज्ञानता का होता है।
संसार में यों तो हजारों पदार्थ हैं, पर सनातन ऋषि-मुनियों ने कुछ गिने-चुने पदार्थ ही पूजा-पाठ के लिए उपयुक्त माने हैं। उनके चयन के पीछे वैज्ञानिक कारण व आधार था। जब कभी भी घर में पूजा-पाठ होता है तो पूजा के लिए पंडितजी आपसे हलदी की गाँठ, कुंकुम, चंदन (सफेद या रक्त), केसर, धूप, अगरबत्ती, पान-सुपरी, लौंग, कपूर, चावल, जौ, काले तिल, अष्टगंध, तुलसी, दूब, गंगाजल, नारियल, आम के नौ या ग्यारह पत्ते,गाय का घी आदिसामग्री मँगवाते हैं।
प्रश्न उठता है कि चावल की जगह गेहूँ, हलदी की गाँठ की बजाय जीरा, केसर के स्थान पर कुछ और, पान- सुपारी की जगह कत्था - चूना क्यों नहीं प्रयोग करते?
इन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि पूजा के हर पदार्थ की अपनी एक विशिष्टता होती है, जो वैज्ञानिक है। यहाँ सब पदार्थों पर विचार न करके कुछेक पर ही प्रकाश डालेंगे। सर्वप्रथम पान का विज्ञान समझने का प्रयत्न करते हैं। पान प्रकृति का एक अति संवेदनशील पदार्थ है । यह एक प्रमाणित सत्य है कि यदि कोई अशुद्ध व अस्वच्छ महिला पान की खेती में प्रवेश करे तो उस खेत के पान जल ( काले पड़ जाएँगे। इसी प्रकार, तुलसी का पौधा भी संवेदनशील है। पान और तुलसी के पत्तों में ईश्वरीय तरंगों को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता होती है। यही गुण सुपारी में भी है। तुलसी के पत्ते में सात्त्विकता बहुत होती है, जो दैविक शक्तियों को पसंद है। गंगाजल पूजा के स्थान को पवित्र करता है (Disinfect), इसीलिए गंगाजल छिड़का जाता है । अष्टगंध अपनी गंध से दैविक शक्तियों को पूजा स्थल पर आकर्षित करती है, क्योंकि सुगंध देवताओं को प्रिय है और वे उस ओर खिंचते हैं तथा हमारे द्वारा की जानेवाली पूजा में सूक्ष्म रूप से भाग लेते हैं ।
कुंकुम को हलदी से तैयार किया जाता है । हलदी को चूने के पानी में भिगोने से वह लाल बन जाती है, और इस प्रकार हलदी से कुंकुम तैयार होता है । हलदी जमीन के नीचे पैदा होती है, इस कारण जमीन के ऊपर उगनेवाली वस्तुओं की अपेक्षा हलदी में भूमि लहरियाँ अधिक मात्रा में होती है। जब हम देवी - देवताओं को हलदी - कुमकुम चढ़ाते हैं तो उससे प्रक्षेपित भूमि- लहरियाँ देवताओं की लहरियों के साथ सर्वत्र फैलती हैं। इस कारण, हम पृथ्वी की विविध लहरों को बिना किसी रुकावट के ग्रहण कर लेते हैं। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि पूजा-पाठ में प्रयोग आने-वाले सभी पदार्थों का कोई-न-कोई वैज्ञानिक आधार अवश्य है।
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