इसका दावा संभवतः नहीं किया जा सकता। जहाँ अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा की पूर्ण परिक्रमा उनके चारों ओर घूमकर पूरी की जाती है, वहीं शिवपिंडी की प्रदक्षिणा केवल आधी (अपूर्ण) ही की जाती है, जिसका विधान इस प्रकार है - प्रदक्षिणा करते समय बाईं ओर से जाएँ और जहाँ तक अभिषेक की जल-प्रणालिका (शिवपिंडी का आगे निकला हुआ भाग) होती है, वहाँ तक जाकर उसे न लाँघते हुए पुन: लौटना चाहिए तथा पुनः प्रणालिका तक उलटे आकर प्रदक्षिणा पूर्ण करनी चाहिए।
यह नियम केवल मानव स्थापित अथवा मानव निर्मित शिवलिंग पर ही लागू होता है; स्वयंभू लिंग या चल-लिंग (घर में स्थापित लिंग) पर नहीं । शालुंका के स्रोत को लाँघते नहीं, क्योंकि वहाँ शक्ति स्रोत होता है। पिंडी लाँघ समय पैरों को फैलाना पड़ता है, अतः वीर्य निर्माण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे शरीर की देवदत्त व धनंजय वायु के प्रवाह में भी बाधा पैदा हो जाती है, जो शरीर के लिए कष्टदायी है।
भारतीय मान्यता के अनुसार मनुष्य के शरीर में कई प्रकार की वायु होती हैं, जिनका अपना-अपना कार्य होता है । देवदत्त व धनंजय वायु मनुष्य की यौन इंद्रियों से संबंध रखती है। पिंडी लाँघने पर मनुष्य को शक्तिपात के कारण शारीरिक कष्ट हो सकता है। इसलिए शिवपिंडी की पूर्ण प्रदक्षिणा नहीं की जाती और यही इसका विज्ञान है।
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