खाद्य पदार्थों में ऐसा चमत्कारी गुण शहद या मधु में है । आश्चर्य की बात है कि यह न तो बासी होता है, न सड़ता है और न इस पर अन्य पदार्थों की तरह फफूँद लगती है। बरतन में रखा हुआ शहद जब एक पिरामिड में से निकाला गया तब उसके स्वाद व गुणों में कोई परिवर्तन नहीं आया था और वह पूर्णतया शुद्ध व खाने योग्य था। शुद्ध शहद कीटाणु-रहित होता है।
शहद के इन्हीं गुणों के कारण इसे पूजा-पाठ की सामग्री में शामिल किया गया है। किसी देव-देवी की प्रतिमा के अभिषेक के समय उस पर शहद चढ़ाया जाता है। घी, दूध, दही के साथ शहद एक अनिवार्य पदार्थ है, यह इसकी शुद्धता का परिचायक है। इस शुद्धता का कारण है प्रकृति का वह ढंग, जिसके द्वारा शहद का निर्माण होता है। स तो यह है कि शहद-निर्माण में मनुष्य का कोई हाथ नहीं होता, इसे प्रकृति स्वयं मधुमक्खियों की विलक्षण तकनीक द्वारा निर्माण करती है। इसीलिए यह इतना शुद्ध और पवित्र होता है।
मधुमक्खियाँ नाना प्रकार के फूलों के पराग और मकरंद को चूसकर, छत्ते में अपनी रानी के यौवन एवं मद को बनाए रखने के उद्देश्य से, निष्ठापूर्वक एकत्रित करती हैं। ऋषियों ने इस चिरयौवनदायी रस को भगवान् को अर्पण करने हेतु पंचामृत निर्माण में तथा नवयुवक वर की वीर्य वृद्धि हेतु मधुपर्क तैयार करने में प्रधानता दी है। आयुर्वेदिक ही नहीं, एलोपैथिक चिकित्सा में भी इसके उपयोग तथा सेवन को शक्तिवर्धक माना गया है। इसमें अनेक विशेषताएँ हैं । । वैदिक काल के प्रसिद्ध चिकित्सक अश्विनीकुमार रोगों के निदान के लिए शहद का प्रचुरता से प्रयोग करते थे। उसी काल में कृषि में भी शहद का उपयोग होता था। खेतों में बीज बोने से पहले किसान उन्हें शहद और दूध में भिगोता था, जिसमें उनसे उपजा अन्न मधुर व पौष्टिक होता था।
नीम के फूलों से तैयार किया गया शहद रोगी के लिए सुपाच्य व शक्ति वर्धक होता है। सफेद फूलों से प्राप्त शहद का रंग सफेदी लिये रहता है। सरसों, केसर, आम आदि फूलों से एकत्रित शहद सुनहरा रंग लिये होता है। शहद जिन फूलों की अधिकता से निर्मित होता है, उनकी गंध तथा स्वाद भी देता है ।
रासायनिक दृष्टि से शहद में ५० प्रतिशत ग्लूकोज तथा अल्प मात्रा में फ्रक्टोज, सूक्रोज, माल्टोज आदि मिठास होती हैं। इसमें विटामिन ए, बी तथा ई प्रचुर मात्रा में होते हैं। विटामिन 'डी' भी कुछ अंश में रहता है। इसके अतिरिक्त लोहा, कैल्सियम, चूना, मैगनीज, गंधक, फास्फोरस, सोडियम तथा आयोडीन भी इसमें पाया जाता है। रोग निवारण की क्षमतायुक्त ताँबा भी होता है। शुद्ध शहद कीटाणु रहित होता है।
शरीर की सभी नाड़ियों में रक्त के साथ प्रवाहित होते रहने के कारण यह शरीर को सशक्त एवं सक्षम बनाता है। हृदय रोगियों के लिए यह संजीवनी जैसा है।
दिमागी काम करनेवाले लोगों को सुबह-शाम शहद का सेवन अवश्य करना चाहिए। शहद से स्मरण शक्ति तेज होती है। परंतु शहद को कभी गरम नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से उसमें विषैले लक्षण पैदा हो जाते हैं। इसी
प्रकार समान मात्रा में शहद व घी का मिश्रण भी उसे विषैला बना देता है।
शुद्ध शहद की पहचान हेतु
1.पानी से भरे गिलास में एक बूँद शहद टपकाएँ । यदि बिना घुले बूँद नीचे तक जाए तो शुद्ध, अगर बीच में ही घुल जाए तो मिलावटी समझें ।
2.शुद्ध शहद को कुत्ता नहीं चाटता । यह भी शहद की शुद्धता की पहचान की एक कसौटी है ।
भारत की सनातन मान्यताओं के अनुसार ईश्वर व देवों को सर्वश्रेष्ठ पदार्थ ही अर्पण करने चाहिए। इसी कारण हम मंदिर व देवालयों में मूल्यवान् -से-मूल्यवान् वस्तुएँ तथा शुद्ध-से-शुद्ध पदार्थ ही अर्पण करते हैं। शहद की शुद्धता इस कसौटी पर पूर्णरूप से खरी उतरती है। इसी कारण इसका प्रयोग देवालयों में तथा पूजा-पाठ में होता है।
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