पवन तनय का मिले सहारा।।
सतयुगत्रेता द्वापरकलियुग प्रमुख कहाये। हर युग में संसार आपके ही गुण गाये ।।
चारयुगों का सहस बार जब लगता फेरा। एक कल्प में ब्रह्मा करते दूर अन्धेरा ।।
युगोंयुगों तक तीनलोक तव गुणविस्तारा। चारोंयुग व्यापक हनुमत परतापतुम्हारा।।
नए कल्प में नव ब्रह्मा जब जब हैं आते। हनुमत ब्रह्मा बनकर अगलीसृष्टि कराते।।
चारों युग रूपक हैं प्रभु के चारों भाई । समयसमय पर सिद्धहुई सबकीचतुराई।।
राघवके बहु कामसम्हाले लखन जिलाए। भरत खिन्नथे समाचार उनतक ले आए।।
राम राज्य में शत्रु हनन के बने सहाई । भक्तराज तुम भक्तिकीर्ति जगमें फैलाई।।
भक्तविभीषण घिरेहुए निशिचर कुसंगसे। बढ़ामनोबल उनका,इनके दिव्य संग से।।
नाम जपै जो उसे काल भी नहीं सतावै ।
मन वाणी से तुम्हें ध्यान मेंजो भी लावै।।
तीन लोक का जयी दशानन जैसा भाई ।
भरीसभा में उसको हितकी बात बताई।।
चारसचिव ले लंकत्याग चरणोंमें आया।
राघव ने दे अभय उसे लंकेश बनाया ।।
जगने अपनानाम विभीषणनहीं रखाया। प्रभुने आदर दिया जगतने है ठुकराया ।।
सेवाकर्म बिना मनचिन्तन के यदि होता। निष्फल है वह कर्म सभी आशीषें खोता ।
वाणीमें हरिनाम हृदय मेंहो हरि चिन्तन । पूर्णप्रेम के भावलिए अर्पित हो तन मन।।
पूजनीय, यद्यपि भाई का भेद बतावै ।
हनुमतकी हो कृपा दोषभी गुण बनजावै।
रावण चारहुए जयविजय भानु जालंधर । शिवगण शापित किन्तु पवन सुत एक रूपवर ।।
युगोंयुगों तक सृष्टिसहायक नाम तुम्हारा।
तिहुँ काल चारों युग सिद्ध प्रताप तुम्हारा।।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।
रघुवर भक्त तुम्हें अति प्यारा।।
आप पंच मुख पवन पुत्र भक्तों के प्यारे।
हयग्रीव,वाराह,सिंह,कपि, मनुज सम्हारे।।
प्रतिमुख राम चरितके तुमहो अनुपम श्रोता।
राम भक्तिमें हृदय आपका सुधबुधखोता।
जनपालक करुणानिधान है नाम तुम्हारा। है प्रसिद्ध तिहुँकाल दिव्यतेरा उजियारा।।
परमप्रचण्ड भानु सा अनुपमतेज तुम्हारा। यश कीरतिका कलियुगमें घर घर विस्तारा।
मंगलकारी रूप भक्तजन को सुख देता ।
राम कथाके हनुमत जगमें प्रथम प्रणेता।
बलअपार विद्याअपार तुमअतिशयज्ञानी। राम भक्त के लिये न कुछ इसमें हैरानी ।।
विश्वनाथ के प्रकट रूप हे हरि हनुमन्ता। मन में रखविश्वास पूजते ऋषिमुनि संता।
सूर्यशिष्य बन तुमनेसीखीं सहस कलाऐं।
तुमसेरहतीं सदा परे कलिकलुष बलाऐं।।
अन्तकाल तक एकलक्ष्य हरिभक्तिप्रचारा
परमसुखद जगपावनहै यह चरित तुम्हारा
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें