💐अध्यात्म-चिंतन💐(1)
बन्धुवर….!!☺️हमारी संस्कृति में निरन्तर इस बात पर जोर दिया जाता रहा है कि
परमात्मा इस जगत का सृजन करता है। प्रश्न है कि यदि वह सृजन करता है तो कैसे करता है…? विज्ञान के अनुसार कुछ ऐसा भी सृजन है जब करने वाला कुछ भी नहीं करता केवल उसकी उपस्थिति मात्र से सृजन हो जाता है।
विज्ञान उसे 'कैटेलिटिक एजेंट' कहता है। उसके बिना घटना नहीं घटती बल्कि उसकी उपस्थिति से ही घटना घट जाती है। वह स्वयं कुछ नहीं करता, सब कुछ स्वतःहो जाता है अर्थात् परमात्मा की उपस्थिति से जगत निर्मित होता है। परमात्मा 'कैटालिटिक एजेंट' हैअतःपरमात्मा जगत का निर्माण नहीं करता बल्कि उसका उपस्थित होना ही सृजन का सूत्रपात है।
भगवान कृष्ण कहते हैं- "मेरी उपस्थिति से ही सृष्टि की रचना आरंभ हो जाती है।
मैं सृष्टि का निर्माण नहीं करता,यह मेरा 'कृत्य' नहीं है अपितु यह मेरी उपस्थिति मात्र है। मेरे उपस्थित होते ही जीवन चल पड़ता है।"
जैसे प्रातः काल सूर्योदय होता है तो फूल अपने आप खिल जाते हैं,पक्षी स्वयं से चहकने लगते हैं। सूर्य किसी फूल को खिलाता नहीं है और ना किसी पक्षी से चहचहाने को कहता है, केवल उसकी उपस्थिति इन सारे कार्यों को प्रारंभ करा देती है। सूर्य की उपस्थिति से ही जागरण हो जाता है।
इसीलिए हम निर्माण का कारण नहीं जान पाते और यही कारण है कि जगत में हम परमात्मा को कितना भी खोजते हैं वह हमें मिल नहीं पाता क्योंकि वह कभी मिल भी नहीं सकता। वजह है कि हम हर चीज को खोज लेते हैं, यदि वो है।
परमात्मा कहीं मिलता नहीं और अगर यह सब उसका सृजन है तो कहीं ना कहीं उसकी सृष्टि में उसको मिलना ही चाहिए।
लेकिन अगर भगवान कृष्ण का यह सूत्र याद रखा जाए तो विज्ञान की अधीरता समाप्त हो जाएगी कि- " हे अर्जुन! जहाँ जहाँ ऐश्वर्य की चरम सीमा दिखाई दे तो अगर ईश्वर दिखाई न भी देता हो तो उचित है कि तू ऐश्वर्य को ही देख,क्योंकि ऐश्वर्य भी मैं ही हूँ।
विज्ञान भली भांति जानता है कि
'केटेलिक एजेंट' भी होते हैं और उनकी उपस्थिति में भी घटनाएं घटती है। इसी संदर्भ में भारतीय अध्यात्म और योग में पंचकोश और षट चक्र का महत्वपूर्ण स्थान है। आध्यात्मिक एवं नैतिक चर्चा की इस लेख माला के अंतर्गत सर्वप्रथम पंचकोषों की विस्तृत व्याख्या प्रारंभ कर रहे हैं….!!
1.अन्नमय कोष💐
(क) मनुष्य का व्यक्तित्व अनेक परतों से बना है। योग तंत्र के अनुसार साधना की दृष्टि से इन परतों का सम्यक ज्ञान बहुत आवश्यक है, और उनके पार जाना भी आवश्यक है।
ऐसी ही 5 परतों में अर्थात पंचकोषों में पहला कोष है- अन्नमयकोष,और यह होता है हमारा भौतिक शरीर।
यह शरीर की पहली परत है जो हमें अपने माता पिता से उपलब्ध होती है। यह हमारा नहीं है, यह 'हम' नहीं हैं बल्कि यह एक लंबी परंपरा है। हजारों शरीरों ने इस शरीर को निर्मित किया है। माता-पिता से जो बीजाणु हमें प्राप्त होते हैं उनमें इस शरीर की सारी संभावनाएं छिपी होती हैं। इस शरीर की जो लंबी यात्रा है वह हमें अपने माता-पिता से मिला है और उन्हें उनके माता-पिता से मिला है। लंबी यात्रा है यह हजारों वर्ष की।
हम अपने शरीर के पीछे लौटें तो प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में इस जगत का पूरा इतिहास छिपा है। यह जगत पहले दिन जब बना होगा, उस दिन भी आपके और हमारे शरीर का कुछ भाग उपस्थित था और वही विकसित होकर आपका शरीर बना है। एक छोटे से बीज कोष में इस अस्तित्व की सारी कथा लिपिबद्ध है।इसकी लम्बी परम्परा है।
यह बीजकोश न जाने कितने मनुष्यों, से न जाने कितने पशुओं, न जाने कितने पेड़ पौधों से और न जाने कितने खनिजों से यात्रा करता हुआ आप तक आया है। यह आपकी पहली परत है। इसी परत को हमारे ऋषियों ने अन्न मय कोष कहा है। अन्नमय कोष क्यों कहा गया?? इसका उत्तर है इस कोष के निर्माण की जो प्रतिक्रिया है और प्रक्रिया है वह भोजन से होती है। इसका निर्माण भोजन से होता है। प्रत्येक व्यक्ति का शरीर 7 साल में बदल जाता है एक व्यक्ति यदि 70 साल जीता है तो 10 बार उसके शरीर का रूपांतरण हो चुका होता है। आप रोजाना जो भोजन ले रहे हैं वह आपके शरीर को बनाता है और रोजाना आप अपने शरीर से अपने ही मृत शरीर को बाहर फेंक देते हैं। जब हम यह कहते हैं कि अमुक व्यक्ति की मृत्यु हो गई तो उसे हम अंतिम मृत्यु कहते हैं,जब उसकी आत्मा शरीर को छोड़ देती है। किन्तु यदि देखा जाए तो व्यक्ति का नित्य देहावसान होता है। आपका शरीर मरे हुए को बाहर फेंक रहा है। आप नाखून और बाल काटते हैं, दर्द नहीं होता इसलिए कि वह शरीर का मरा हुआ हिस्सा है। शरीर को अन्नमय कोष इसीलिये कहा गया है क्योंकि वह अन्न से निर्मित है। इसलिए बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि हम भोजन कैसा करते हैं। हमारा भोजन और संपूर्ण आहार केवल जीवन चलाने के लिए नहीं है। यह हमारे संपूर्ण शरीर की हमारे समग्र व्यक्तित्व की पहली परत निर्मित करता है और उसके ऊपर बहुत कुछ निर्भर करेगा कि हम अपनी अंतर यात्रा कैसे करते हैं, या नहीं कर सकते, क्योंकि सभी भोजन एक जैसे नहीं होते। भोजन वही उचित व उपादेय है जो हमारी अंतर यात्रा में बाधक नहीं बनता। अंतर यात्रा का मतलब है ध्यान धारणा आदि।
कुछ भोजन ऐसे होते हैं जो आपको अंतर जगत में प्रवेश करने ही नहीं देंगे, वह आपको बाहर ही दौड़ाते रहेंगे जबकि कुछ भोजन ऐसे हैं जो आपके भीतर चैतन्य को जन्म ही नहीं देंगे,वह आपको निरंतर मूर्छा में ही रखे रहेंगे। कुछ भोजन ऐसे हैं जो कभी आपको शांत नहीं होने देंगे क्योंकि उस भोजन की प्रक्रिया में ही आपके शरीर में एक बेचैनी उत्पन्न हो जाएगी।
इसलिए हमारे प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में भोजन चार प्रकार का बताया गया है- पहला रुग्ण भोजन, दूसरा स्वस्थ भोजन,तीसरा शुद्ध भोजन, तथा चौथा अशुद्ध भोजन।
शुद्ध भोजन उसे ही कहा गया है जिससे आपकी साधना में आपकी अंतर यात्रा में कोई बाधा उत्पन्न हो। शुद्ध भोजन का यही अर्थ है जिस भोजन से आपको अपने भीतर की झलक मिले। वही शुद्ध भोजन है।
अन्नमय कोष के अंतर्गत अगले अंक में सात्विक और असात्विक आहार पर चर्चा करेंगे…(जारी)
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