हिंदू अपने शव क्यों जलाते हैं-:
मृत्यु जीवन का एक कटु सत्य है। जो जनमा है, उसकी मृत्यु भी होगी। हर धर्म में शवों की अंत्येष्टि करने की अपनी-अपनी प्रथाएँ हैं। हिंदू धर्म में शवों का अग्निदाह किया जाता है। प्राचीन मनीषियों ने बहुत सोच-समझकर इस प्रथा को जन्म दिया। उनका यह मानना था कि मनुष्य का शरीर, जो पाँच तत्त्वों से बना है, अग्निदाह करने से शीघ्रतम पाँचों तत्त्वों में विलीन हो जाता है। मनुष्य के पंचतत्त्वों का प्रकृति के तत्त्वों में विलय होना प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में सहायक होता है।दूसरा एक कारण यह भी है कि अग्निदाह से मृतक शरीर के घातक जीवाणु जलकर नष्ट हो जाते हैं और इस प्रकार वातावरण शुद्ध रहता है। एक और कारण यह भी है कि अग्निदाह के लिए शव को अलग से जमीन की जरूरत भी नहीं होती। विदेशों में बसे हिंदुओं को देखकर कुछ पाश्चात्य लोगों ने भी अग्निदाह को स्वीकार किया है। एक अनुमान के अनुसार अमेरिका में 2010 तक अग्निदाह 40 प्रतिशत तक हो जाएगा। भारत में ईसाई धर्म के अनुयायियों में भी अब यह प्रथा देखी जा रही है।
हिंदुओं में चौदह मास के बालक की मृत्यु पर उसे जलप्रवाह करते हैं। भारत में भी सिंधु सभ्यता के दौरान शवों को भूमिगत ही करते थे। पर बाद में अग्निदाह किया जाने लगा। महानगरों में विद्युतदाह भी होता है। विद्युतदाह अग्निदाह का आधुनिक रूप है।विद्युतदाह में हिंदुओं में प्रचलित 'कपालक्रिया' नहीं हो सकती । कपालक्रिया के लिए जो व्यक्ति शव को अग्नि देता है, वह शव के आंशिक जल जाने पर बाँस द्वारा शव की खोपड़ी को तोड़ता है। इसके पीछे यह विज्ञान है कि मनुष्य के मस्तिष्क में रहनेवाला जीवाणु पूर्णतया समाप्त हो जाए और उसमें से उपप्राण निकलकर पंचतत्त्व में शीघ्र विलीन हो जाए।
आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि मरने के बाद भी मनुष्य का मस्तिष्क कुछ समय तक जीवित रहता है। यह सत्य हिंदू मनीषियों ने हजारों वर्ष पूर्व जान लिया था, इसीलिए 'कपालक्रिया' की प्रथा को उन्होंने जन्म दिया। खेद है, धर्म की यह बारीकी श्मशान घाट पर क्रिया-कर्म करनेवाले आचार्य भी नहीं जानते, जिसके परिणामस्वरूप हम इन सब बातों को व्यर्थ की बात मानते हैं, क्योंकि हम इन सब बातों के पीछे के विज्ञान से अनभिज्ञ हैं।
जीवन की अंतिम यात्रा से जुड़ी कुछ और सनातन बातें भी ध्यान देने योग्य हैं। पहले समय में जब यह लगने लगता था कि अब मरनेवाला अधिक समय और जीवित नहीं रहेगा तो यह प्रथा थी कि उस व्यक्ति को चारपाई से उतारकर जमीन पर लिटा देते थे, जिसके पीछे यह विज्ञान था कि जमीन पर उतार लेने से बीमार के प्राण आसानी से निकल जाते हैं, क्योंकि जमीन प्राणशक्ति को अपने में शीघ्र प्रवाहित कर लेती है । चारपाई के पाए क्योंकि उन दिनों लकड़ी के होते थे, इसलिए प्राण निकलने में कठिनाई होती थी, क्योंकि लकड़ी से विद्युत् (प्राण भी एक प्रकार की विद्युत् होते हैं) प्रवाहित नहीं होती; जबकि जमीन से एकदम हो जाती है। इसी कारण बीमार को जमीन पर उतारलेते थे।
शवयात्रा के दौरान हिंदू शव को शांत या मौन रहकर श्मशान नहीं ले जाते हैं, अपितु उस अवसर पर समाज के लोगों को संदेश देते हैं कि सिवाय 'रामनाम' के इस मिथ्या संसार में कुछ और 'सत्य' नहीं है । इसीलिए शवयात्रा में ‘श्रीराम नाम सत्य है' कहा जाता है । सनातन धर्म इस प्रकार मृत्यु में भी जीवन को संदेश देता है।
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