परंतु आत्म विकास के सभी प्रयासों का मूल सिद्धांत है, उनका अभ्यास तबतक करते रहना जबतक कि वह हमारे मानसिक साँचे का हिस्सा न बन जाए। यदि हमारे रिश्तों में समस्या है, तो हमें उनसे संबंधित दिशानिर्देशों को देखना और उनका अभ्यास करना चाहिए।
हमें तबतक प्रयास जारी रखना चाहिए जबतक कि हम जिन सकारात्मक चीजों को प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं, वे हमारे अंदर समाहित नहीं हो जातीं, और नकारात्मक चीजें फिर न उभरें।
हमदेखते हैं कि अनेक भिक्षु और कई बुजुर्ग लोग लंबे समय तक मंत्रों का उच्चारण करते हैं, क्यों? हमें लगता है कि आखिरकार, यदि वे इतने आध्यात्मिक हैं, तो कुछ समय का मंत्रोच्चारण पर्याप्त होगा। वर्षों बाद यह समझ आता है कि हमारा मन इतना अधिक चंचल होता है कि उसे पवित्र रखने के लिए हर समय मंत्र पर ध्यान लगाने की जरूरत होती है।
इस स्थिति को एक उदाहरण से अच्छी तरह समझाया जा सकता है।
एक नवभिक्षु को उसके गुरु ने लगातार कई घंटों तक ध्यान लगाने को कहा। एक दिन, जब वे एक नदी के तट पर थे, युवा भिक्षु ने तंग आकर अपने गुरु से पूछा कि बार-बार ध्यान करने का क्या लाभ है! गुरु मुसकराया और उसने युवक को मछुआरों द्वारा रेत पर छोड़ी गई एक टोकरी उठाने, नदी तक दौड़कर जाने और उसमें थोड़ा पानी भरकर पीने के लिए लाने को कहा। युवक चकित रह गया।
'मैं जालीदार टोकरी में पानी कैसे ला सकता हूँ?"
भिक्षु ने उसे कोशिश करने को कहा। युवक कुछ बूँदें भरकर लाया।
'और तेज दौड़ो,' उसके गुरु ने कहा।
कई कोशिशों के बाद, युवक सिर्फ आधा चम्मच पानी ला पाया । वह हैरत में था कि इस अभ्यास का उसके प्रश्न से क्या संबंध था। वरिष्ठ भिक्षु ने कहा, 'देखो, तुम मेरे पीने के लिए पर्याप्त पानी नहीं ला पाए। लेकिन क्या तुमने देखा कि बार-बार नदी में डुबोने के कारण वह गंदी टोकरी कितनी स्वच्छ हो गई ?'
शायद आपको कहानी का अभिप्राय समझ आ गया होगा!
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