अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि सबसे आसान सवालों के उत्तर सबसे मुश्किल होते हैं। हमारे विचार और विचलन उस स्तर तक पहुँच गए हैं, जब हम शाश्वत आध्यात्मिक प्रश्न में एक नई सिलवट डाल सकते हैं! सवाल है : मैं कौन हूँ?
इसका दिलचस्प जवाब होगा, 'मैं स्मृतियों का एक संग्रह हूँ।' वास्तव में वह इस सदियों पुराने प्रश्न की एक बहुत असामान्य व्याख्या है, क्योंकि प्रत्येक अर्थ में, हम अपनी स्मृतियों से बने हैं।
हम इस विचार का तात्पर्य तभी समझ पाते हैं जब हम बुजुर्गों में वृद्धावस्था के कारण मानसिक दुर्बलता के लक्षण देखते हैं। वह पुरुष या स्त्री शारीरिक रूप से वही व्यक्ति होता है, परंतु वास्तव में वह व्यक्ति कौन है, जब उसे यह भी याद नहीं कि वह कौन है? ऐसे लोगों को कानूनी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने की अनुमति भी नहीं होती; तो वे कौन हैं?
यथार्थ के इस रूप का एक और पक्ष है। इसे कैटरपिलर और तितली के संदर्भ में बहुत खूबसूरती से स्पष्ट किया गया है, जो बौद्ध दर्शन का एक पसंदीदा प्रतीक है। 'सिर्फ इसलिए कि तितली को याद नहीं कि वह एक कैटरपिलर थी, क्या इसका यह अर्थ है कि वह कैटरपिलर नहीं थी?' इसी प्रकार, हम अकसर सोचते हैं कि क्या हम भी कभी शिशु थे। हमें उस समय की कोई स्मृति नहीं होती, जब हम घुटनों के बल चलते थे और अपने पहले लडख़ड़ाते कदम उठाए थे। इसलिए हमें यह समझने के लिए अपने बड़ों और तसवीरों पर भरोसा करना होता है कि हम वास्तव में कभी बच्चे थे।
तितली का एक और दार्शनिक संदर्भ है। यह एक जापानी हाइकु (कविता) है, जिसमें कहा गया है : 'पिछली रात मैंने एक सपना देखा कि मैं एक तितली था। अब मैं यह कैसे जान सकता हूँ कि मैं आदमी होने का सपना देख रही तितली नहीं हूँ?' इस अत्यंत सरल प्रश्न की पहेली मुझे हतप्रभ कर देती है।
कभी-कभी मूल प्रश्न की ओर वापस जाने का लाभ यह है कि यह एक अभिमान मिटानेवाला विचार है और यह हमें जमीनी हकीकत के करीब ले आता है। भाव यह है कि हम सभी दिन भर में अपने विभिन्न चोलों में होते हैं। एक अभिभावक के रूप में, एक जीवनसाथी के रूप में, अपने माता-पिता के पुत्र या पुत्री के रूप में, ऑफिस में एक कर्मचारी के रूप में या समाज में एक व्यक्ति के रूप में, हम इन व्यक्तित्वों में सहजता से घुसते और निकलते रहते हैं।
परंतु कभी कभार सब घालमेल हो जाता है। हम ऑफिस में दबाए गए गुस्से को अपने बच्चों पर निकालते हैं। या हम अपने किशोरवय बच्चों के साथ अपनी समस्याओं का गुबार अपने असहाय और बूढ़े माँ-बाप पर निकालते हैं।
ऐसे समय में हम विचार कर सकते हैं : मैं वास्तव में कौन हूँ?
इसके अलावा हमें प्रत्येक सप्ताह एक अधिक विस्तृत समीक्षा; एक प्रकार से अपने कार्यों की परीक्षा करनी चाहिए, जो हमें सही राह पर आने में मदद करेगी। हम समय-समय पर ऐसे चिंतन से लाभ प्राप्त कर सकते हैं। यह हमें बता पाएगा कि हम वास्तव में कौन हैं।
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