किसी भी तरह की सफलता हासिल करनेवाला कोई भी व्यक्ति इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि बाहरी बाधाओं से लडने से पहले, सफलता की राह में अंदरूनी अवरोध पार करने पड़ते हैं। ये अवरोध आलस, भय, आत्मविश्वास की कमी, ध्यान बँटना, प्रलोभन, चिंता, पिछली विफलताएँ आदि के रूप में हो सकते हैं। जीवन में हमेशा हमारा आंतरिक व्यक्तित्व हमारे बाहरी व्यक्तित्व को आकार देता है।
क्या आपने कभी आत्म-ज्ञान की भाषा में 'इन' के महत्व पर विचार किया है? जैसे इंट्रोस्पेक्ट (आत्मविश्लेषण), इनट्यूशन (अंतर्ज्ञान), इनसाइट (अंतर्दृष्टि), इंस्पिरेशन (प्रेरणा), इंस्टिंक्ट ( सहज ज्ञान ) ? यह सूची और लंबी हो सकती है।
सभी महत्वपूर्ण खोजें हमारे विचारों से निकली हैं, जो अंदरूनी होते हैं, चाहे वह महान् ग्रीक गणितज्ञ, भौतिकविज्ञानी और खगोलविद आर्किमिडीज द्वारा फ्लोटेशन के सिद्धांत का आविष्कार हो, या इंग्लिश खगोलविद आइजेक न्यूटन द्वारा गुरुत्वाकर्षण था या जर्मनी में जन्मे सैद्धांतिक भौतिकविज्ञानी और नोबेल पुरस्कार विजेता अल्बर्ट आइंस्टीन द्वारा सापेक्षता के सिद्धांत का प्रतिपादन। अंतर्ज्ञान हमारे ऋषि-मुनियों का भी विषय रहा है, जिन्होंने हजारों वर्ष पहले उनका महत्व समझ लियाथा।
न्यूरोसाइंस जैसे उन्नत विषयों में वर्तमान शोध ने भी हमारे भीतर की शक्ति का अस्तित्व साबित किया है; कि सबसे प्रतिभाशाली लोग भी अपनी मानसिक क्षमता का सिर्फ 10 फीसदी इस्तेमाल करते हैं; और कि मस्तिष्क लगातार अपना नवीनीकरण करता रहता है और किसी भी आयु में नई चीजें सीखने में सक्षम है।
इसलिए आत्म-ज्ञान की राह पर अंदरूनी बाधाओं को पार करना आवश्यक है। आप जो काम कर रहे हैं, उस पर पूरा ध्यान लगाएँ और भटकते विचारों तथा आसान विकल्पों के आगे घुटने न टेकें।
आप किताब पढ़कर तैराकी नहीं सीख सकते; उसके लिए आपको पूल में कूदना पड़ेगा। इसलिए जीवन के तालाब में डुबकी लगाएँ। आप न सिर्फ अपने भीतर के परिवर्तन को महसूस कर पाएँगे; आप अपनी अंदरूनी शक्ति को भी उन्मुक्त कर पाएँगे।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें