अगर हम भारत के कई हिस्सों पर नजर डालें, जहाँ लाखों लोग झुग्गियों में रहते हैं, तो हमें इस बात का एहसास होगा कि उनकी अल्प वस्तुएँ ही उनके जीवन को सम्हाले रहती हैं। उनके जीवन भर की जमा पूँजी सूटकेस में तो क्या, एक ब्रीफकेस में समा सकती है। अपने दिमाग में उनकी और घूम- घूमकर तमाशा दिखानेवालों, भिखारियों, चाकू तेज करनेवालों और बाकी लोगों की कल्पना करें, जो हमारी सड़कों पर फिरते रहते हैं। क्या वे हमसे कम मनुष्य हैं? अपने आप को उनकी जगह पर रखना बहुत अच्छा अभ्यास है या मान लीजिए आप बहुत जल्दी में हैं और आपको सिर्फ एक बैग ले जाने की सहूलियत है। आप उसमें क्या-क्या भरेंगे? अपना बटुआ, अपने परिवार की तसवीरें, कुछ कपड़े, एक टूथब्रश... लेकिन निश्चित रूप से अपनी पार्टी शर्ट या फॉर्मल कपड़े नहीं। फिर हमारे पास इतनी वस्तुएँ क्यों हैं? क्या वाकई उनकी आवश्यकता है? क्या हम अपने उपभोग में कटौती नहीं कर सकते, चाहे हम किसी भी आर्थिक स्तर पर हों?
जिस तरह यह अपनी भौतिक संपदाओं की समय-समय पर समीक्षा करने का समय है, सालाना साफ-सफाई करने का समय है, अपनी गुणात्मक संपदाओं की भी समीक्षा करना जरूरी है। हम मानते हैं कि आध्यात्मिक विकास भी एक उपलब्धि है। यह विश्वास सच्चाई से परे है। हम जो परिवर्तन चाहते हैं, वह वास्तव में अपने मौलिक गुणों को छोडने का प्रयास है। जिस तरह हम अपनी भौतिक वस्तुओं को त्यागते हैं, ऐसे गुणों को त्यागते हुए हम हलके और प्रबुद्ध हो जाते हैं। आध्यात्मिक अर्थ में भी हमें भारहीन होकर बढना चाहिए। हमें सही मार्ग पर बढने के लिए, अपना क्रोध, अपना अहं, अपनी असत्यता, अपना छलावा, सब छोडना होगा। इन दुर्गुणों को छोड़ते हुए हम अपने आप के अधिक नजदीक आ जाते हैं। इस तरह हम उसे वापस जगाते और जलाते हैं जो हमारे अंदर था, लेकिन लंबे समय तक गलत बोझ एकत्रित करने से दफन हो गया था।
कहा जाता है कि जब ज्ञान प्राप्त करने के बाद बुद्ध से पूछा गया कि उन्होंने इतनी तपस्या और ध्यान से क्यापाया, तो उनका उत्तर था : 'कुछ नहीं, मैंने बस उसे जगा दिया, जो पहले से मेरे अंदर था...'
एक और ज्ञानी स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, 'जागो, उठो और तब तक न रुको जब तक कि आप लक्ष्य पर न पहुँच जाएँ।'
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