बुधवार, 31 जुलाई 2024

प्रभात रश्मि (8)क्या प्रेम और अनासक्ति एक साथ हो सकते हैं?

क्या प्रेम और अनासक्ति एक साथ हो सकते हैं?

ऐसा संभव है। और क्यों नहीं? यह याद रखना चाहिए कि अनासक्ति का अर्थ उपेक्षा नहीं है, उसका अर्थ है, यथास्थिति को स्वीकार करना ।

एकअमर अंग्रेजी गीत में है— लव मेक्स दि वल्ड गो राउंड (प्रेम दुनिया को गोल बना देता है।) निश्चित रूप से प्रेम एक महान् अभिप्रेरक है और सारी दुनिया एक प्रेमी से प्यार करती है। लेकिन प्रेम हमारी बहुत सी समस्याओं का कारण भी है।

सही सही कहें तो हमारी समस्याएँ प्रेम में या प्रेम करने से संबंधित नहीं होतीं । प्रेम एक अत्यंत नि:स्वार्थ मानसिक अवस्था है और यह हमारे जीवन के उन चंद पलों में से एक होता है, जब हम लेने में नहीं, देने में सुख का अनुभव करते हैं। जब आप किसी से प्रेम करते हैं, तो आप कॉफी शॉप या मॉल में लगातार कई घंटों उसका इंतजार कर सकते हैं...

परंतु ऐसे प्रेम का विपरीत पक्ष अपेक्षाओं में निहित होता है, जो समय के साथ हमारे अंदर उभरती हैं। हम अपने साथी और दूसरों से भी उब्मीदें रखना शुरू कर देते हैं— वफादारी की, हमें समझने की। कभी-कभार ये अपेक्षाएँ बहुत नासमझी भरी होती हैं या उनसे निपटना बहुत मुश्किल होता है। हम अपने प्रियजनों, अपने रिश्तेदारों से उब्मीद करते हैं कि वे हमारी कमजोरियों को माफ कर दें और जब प्रेम में कुछ समय बाद निराशा उत्पन्न होती है, तो वह खौलने लगता है।

प्रेम आसक्ति या मोह को भी प्रेरित करता है । और वह मोह वास्तव में एक सुकून देनेवाला भ्रम होता है, क्योंकि हर जुड़ाव एक दिन समाप्त होता है और वह खो देने की भावना को प्रेरित करता है। 

यदि किसी वस्तु, जैसे किसी पेंटिंग या किसी दुर्लभ घड़ी के प्रति मोह है, तो वह हमारे भीतर एक भौतिक लालसा उत्पन्न करता है, फिर उस चीज पर गर्व और आखिर में चिंता — कि यदि वह खो जाए या समय के साथ खराब हो जाए, तो क्या होगा। आप जिन संग्रहकर्ताओं के बारे में पढ़ते हैं, वे अधिकतर ऐसे लोग होते हैं जो खुश से अधिक चिंताग्रस्त होते हैं!

तो, ऐसी वस्तुओं को प्राप्त करने का क्या मतलब है? यही वजह है कि सभी महान् ऋषियों ने आध्यात्मिकता के मार्ग पर विरक्त जीवन की सलाह दी है।

बहस करनेवाला सवाल है कि क्या अनासक्ति और प्रेम साथ-साथ रह सकते हैं? बहुत हद तक, और एक संतुलित मस्तिष्क में, ऐसा संभव है। और क्यों नहीं, यह याद रखना चाहिए कि अनासक्ति का अर्थ उपेक्षा नहीं है, उसका अर्थ है, यथास्थिति को स्वीकार करना । और यह भी सत्य है कि अपने मोह, खासकर भौतिक वस्तुओं की आसक्ति को छोड़ना आसान है। हम ऐशोआराम छोड़ सकते हैं और मूलभूत चीजों के साथ जीवन बिता सकते हैं। लेकिन वास्तविक परीक्षा अपने प्रियजनों और नजदीकी लोगों से खुद को विरक्त करने में है।

हम उनके निर्णयों में हस्तक्षेप न करते हुए और उनसे अपनी अपेक्षाओं को कम करते हुए शुरुआत कर सकते हैं। फिर हम बड़े और अधिक सामान्य विषय, जैसे शिक्षा और गरीबी शमन, जैसे लक्ष्यों पर अपना समय खर्च करने की ओर अपना ध्यान लगा सकते हैं।

धीरे-धीरे हम अपने जीवन को एक नया लक्ष्य दे सकते हैं, जो परिवार और मित्रों से थोड़ा हटकर होता है। आप कह सकते हैं कि यह उन लोगों के लिए आसान है जिनके पास स्वतंत्रता के साधन हैं, लेकिन आप उन लोगों की संख्या से हैरान रह जाएँगे जो बहुत साधारण घरों से आते हैं और लगातार सामाजिक उद्देश्यों के लिए काम करते हैं।

विडंबना यह है कि यदि आप देखें तो इस प्रेम / आसक्ति सिंड्रोम से निकलने का समाधान उसी के एक और रूप में है। यह अपने पर ध्यान देने की बजाए दूसरों को देने की भावना में है, जो भावना हम प्रेम में रखते हैं। यही भावना हमें मुक्ति दिला सकती है।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

विशिष्ट पोस्ट

समाचार का व्रत रखिए

आजकल नकारात्मक समाचार ज्यादा बिकते हैं। हमारे समाज में ज्यादातर लोग एक प्रसिद्ध इन्सान के जुर्म का मुकदमा देखना किसी वास्तव में ...