इसके विपरीत, आयुर्वेद के अनुसार चंद्रमा की रश्मियों का वनस्पति पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। चंद्रमा के घटने व बढ़ने के साथ-साथ पेड़-पौधों के अंदर जो रसायन होता है, वह भी घटता-बढ़ता रहता है और उनका प्रभाव भी भिन्न होता है। इस कारण आयुर्वेद में औषधियों को तैयार करने के लिए पेड़-पौधों से फल व पत्तियाँ चंद्रमा की स्थिति के अनुसार तोड़ने का विधान है।
भारतीय मनीषियों का ऐसा मानना है कि शरत् पूर्णिमा के चंद्रमा की रश्मियाँ भौगोलिक स्थिति के कारण भारत के भू-भाग पर विशेष प्रभाव रखती हैं। इसलिए इस रात्रि में देशी गाय के दूध व चावल से बनी चरू (खीर) बहुत लाभदायक होती है। यह विशेष प्रकार से तैयार की जाती है। शुद्ध मिश्री, इलायची मिलाकर उसको मलमल के कपड़े से ढककर रात्रि में ८ - ९ बजे से अर्धरात्रि के बाद तक चंद्रमा की शीतल व आरोग्यप्रद रश्मियों में रखें। तत्पश्चात् भगवद्स्मरण करते हुए उस खीर को उसी रात्रि को सकुटुंब खाएँ । ऐसा करने से आप वर्ष भर रोग- प्रतिरोधक शक्ति प्राप्त करते हैं। चंद्रमा की रश्मियाँ अपने प्रभाव से खीर को एक अचूक टॉनिक की तरह बना देती हैं। ऐसी भी मान्यता है कि शुक्ल पक्ष में यदि किसान बीज बोते हैं तो उनकी फसल अधिक लाभदायक होगी, क्योंकि चंद्रमा का प्रभाव उस समय बीज पर अपना प्रभाव डालता है और वह सशक्त होकर अंकुरित होता है।
परंतु वायु प्रदूषित इस युग में चंद्रमा की किरणें भी हमें आज शुद्ध रूप में महानगरों में नही मिलतीं। ऐसे में शरत् पूर्णिमा की खीर किसी शुद्ध स्थान पर बनाना हितकर है।
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